चाड झील, गहरे संकट

Submitted by UrbanWater on Sat, 04/01/2017 - 13:05
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डाउन टू अर्थ, मार्च 2017

कैमरून और नाइजीरिया के लोग पानी के लिये लगातार लड़ते रहते हैं। नाइजीरिया के लोग गाँव में सबसे पहले बसने का दावा करते हैं जबकि कैमरून के लोग राष्ट्रवादी भावनाओं का आह्वान करते हैं। 1983 में झील में द्वीपों के स्वामित्व को लेकर चाड और नाइजीरिया के बीच खूनी संघर्ष हुआ। सन 1980 में कोमाडुबू-योबे नदी प्रणाली के प्रवाह को लेकर नाइजीरिया और नाइजर में लड़ाई हुई। 1992 में झील के दक्षिणी-पश्चिमी किनारे पर बने टीगा और चलावा बाँध से पानी के उपयोग को लेकर नाइजीरिया के ऊपरी और नाइजर के निचले समुदायों के बीच संघर्ष हुआ।

पिछले साल नाइजीरिया ने खाद्य असुरक्षा का संकेत देते हुए बोर्नों प्रान्त में पोषण आपातकाल घोषित किया और बताया कि इस क्षेत्र में रोजाना 80 बच्चों को जान से हाथ धोना पड़ रहा है। इस घोषणा ने दुनिया का ध्यान अपनी तरफ खींचा। पश्चिमी अफ्रीका में काम कर रहे दर्जन से ज्यादा मानवीय संगठनों ने संयुक्त बयान जारी करते हुए कहा कि जिहादी संगठन बोको हराम के साथ चल रहे संघर्ष के कारण 60 लाख से ज्यादा लोगों को इस क्षेत्र में गम्भीर रूप से भुखमरी का सामना करना पड़ रहा है। इस साल जनवरी में संयुक्त राष्ट्र के आपातकालीन राहत समन्वयक स्टीफन ओ’ ब्रायन ने सुरक्षा परिषद को सूचित किया कि पूर्वोत्तर नाइजीरिया, कैमरून, चाड और नाइजर के हिस्सों में बोको हराम के हिंसक और अमानवीय अभियान की वजह से मानवीय संकट गहरा होता जा रहा है। उसके बाद, संयुक्त राष्ट्र ने अपनी अपील को संशोधित करते हुए इस क्षेत्र में मानवीय सहायता के लिये अधिक धनराशि की माँग की है। इस क्षेत्र को चाड बेसिन के रूप में भी जाना जाता है। क्षेत्र में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने, कुपोषण कम करने, शरणार्थियों और आन्तरिक रूप से विस्थापित लोगों को आश्रय देने में अन्तरराष्ट्रीय संगठनों ने तेजी दिखाई हैं।

इस समय ज्यादातर चर्चाएँ तात्कालिक संकट के चारों तरफ घूम रही हैं, जबकि बेसिन में मानवीय आपातकाल की स्थितियों का निर्माण दशकों से हो रहा है। साल 2016 में जारी विश्व खाद्य कार्यक्रम की रिपोर्ट के मुताबिक वर्तमान नागरिक, सशस्त्र संघर्ष और सम्बन्धित सुरक्षा खतरों ने पहले से मौजूद खाद्य असुरक्षा और पोषण की समस्याओं को उल्लेखनीय तरीके से गहरा किया है। क्षेत्र में सुरक्षा खतरे के पहलू से इनकार नहीं किया जा सकता है। हाल की खबरें और रिपोर्ट आपातकाल कि चिन्ताजनक स्थिति के लिये बोको हराम की गतिविधियों को जिम्मेदार ठहराती हैं। लेकिन ऐसा करते हुए जटिल सामाजिक-पारिस्थितिकीय मुद्दों का अति सरलीकरण भी किया जाता है।

दीर्घकालीन संकट


दरअसल संकट की जड़ें चाड झील के सिमटने और आस-पास के क्षेत्र के बंजर होते जाने में छिपी हैं। सहारा रेगिस्तान के दक्षिणी किनारे पर स्थित यह झील, इसके अर्द्ध शुष्क बेसिन में रहने वाले तीन करोड़ लोगों के लिये किसी मरु उद्यान की तरह है। यहाँ की हवा धूल भरी, भीषण और गर्म है। रेत के टीले और विरल वनस्पति इस इलाके की पहचान हैं।

साल 1964 में जब झील के संरक्षण, प्रबन्धन और तटीय देशों के बीच संसाधनों को साझा करने के लिये चाड झील बेसिन कमीशन स्थापित किया गया था, तब झील का पानी 26 हजार वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ था। यानी दिल्ली से 22 गुना बड़ा क्षेत्र, जिसमें अफ्रीका की 8 प्रतिशत भूमि समाहित थी। यह झील आठ देशों के लोगों की आजीविका का आधार रही है जिनमें चाड, नाइजीरिया, अल्जीरिया, लीबिया, मध्य अफ्रीकी गणराज्य और सूडान शामिल हैं। लेकिन पिछले करीब 50 सालों में यह झील 90 प्रतिशत से अधिक सिमट चुकी है। अब जो बचा है वह तालाब और पोखरा से ज्यादा कुछ भी नहीं, जो 1500 वर्ग किलोमीटर में फैला है। इस स्थिति को खाद्य और कृषि संगठन ने पारिस्थितिकीय आपदा कहा है और आशंका जताई है कि सदी के अन्त तक यह झील विलुप्त हो सकती है।

उत्तर में सहारा रेगिस्तान, मध्य क्षेत्र के अर्द्धशुष्क साहेल और दक्षिण में उष्णकटिबन्धीय सवाना जलवायु जैसे तीन जलवायु क्षेत्रों में फैला यह उथला और जमीन से घिरा जल क्षेत्र है। चाड झील का आकार हमेशा मौसमों के हिसाब से बदलता रहता है। लेकिन साहेल क्षेत्र में सन 1970 और 1980 के भयानक सूखे के बाद से यह लगातार सिकुड़ता जा रहा है। इस बात का उल्लेख ‘विश्व मौसम विज्ञान संगठन’ की पत्रिका के वर्ल्ड क्लाइमेट न्यूज के 19वें अंक में किया गया है। सन 1972 में यह झील दो भागों में विभाजित हो गई। उत्तरी हिस्सा 1986 में पूरी तरह सूख गया जबकि दक्षिणी भाग तब से सिमटता जा रहा है।

अगस्त 2011 में ‘आईओपी साइंस’ जर्नल में प्रकाशित एक रिपोर्ट बताती है कि 1990 में शायद यह झील ज्यादा बारिश की वजह से उबर सकती थी, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। ब्रिटेन के लीड्स विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने 2014 में प्रकाशित अपने अध्ययन में बताया कि जहाँ एक तरफ भयानक सूखे और पानी की कमी की वजह से झील पर मानवीय दबाव बढ़ा है, वहीं दूसरी ओर तटवर्ती देश मौजूदा जल-समझौतों का पालन या ‘एलसीबीसी’ के साथ विचार-विमर्श किये बिना नदियों पर बाँध बनाने का एकतरफा निर्णय लेते रहे और झील तक पानी पहुँचाने वाली नदियों का रुख मोड़ते रहे। सन 1970 में लोगोन नदी पर तटबन्ध और बाँध बनाए जाने की वजह से चारी-लोगोन प्रवाह में जबरदस्त बदलाव आया। झील को 80 प्रतिशत से ज्यादा पानी इसी से मिलता था, लेकिन इसके एक तिहाई पानी का रुख मोड़ दिया गया। नाइजीरिया ने तीन बाँधों का निर्माण किया है और कोमाडूगू-योब नदी प्रवाह पर चौथा बाँध बनाने की योजना है। इस नदी प्रणाली से झील को 2.5 प्रतिशत पानी मिलता है। नाइजीरिया ने बोनों में येदसारम-नगाड्डा नदी प्रवाह पर भी बाँध का निर्माण किया है।

‘संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम’ द्वारा 2006 में प्रकाशित ‘ग्लोबल इंटरनेशनल वाटर्स असेसमेंट रिपोर्ट’ में कहा गया है कि यद्यपि यह झील अतीत में भी कई बार सूख चुकी है, लेकिन लोगों और पारिस्थितिकीय तंत्र पर पड़ने वाले प्रभाव की परवाह किये ऊपरी इलाकों में बाँधों के निर्माण से अब इसे गम्भीर नुकसान पहुँच रहा है।

प्रभावित होता जनजीवन


झील की घटती तटरेखा इसके बेसिन में रह रहे लोगों को गम्भीर रूप से प्रभावित करते हुए खाद्य असुरक्षा शरणार्थियों में बदल रही है जिन्हें ‘एफएओ’ द्वारा विश्व के महत्त्वपूर्ण कृषि धरोहर पद्धतियों में से एक का संरक्षक बताया गया है।

बेसिन के लोग झील और नदी से दूर रेतीले भाग पर परम्परागत रूप से वर्षा आधारित जैसे बाजरा, आलू, प्याज और मूँगफली की पैदावार करते हैं। वहीं मानसून के दिनों में पानी से भर जाने वाली जमीन पर चारा और धान की खेती करते हैं।

बाढ़ के पानी में बढ़ोत्तरी के साथ फसलें बढ़ती हैं जिन्हें डोंगी के सहारे काटा जाता है। किसान झील के चारों ओर काली कपास मिट्टी पर चारा भी उगाते हैं। मिट्टी अपारगम्य होने के कारण वे आखिर शुष्क मौसम के अन्त में अपवाह को बचाए रखने के लिये छोटे पुश्तों का निर्माण करते हैं। लेकिन, हाल के वर्षों में इस तरह की गतिविधियों में कमी आई है। नदियों के ऊपरी इलाकों में सिंचाई परियोजनाओं के निर्माण ने झील के जलस्तर में कमी के साथ-साथ प्रवाह को भी बदल दिया है।

नवम्बर 2016 में ‘एमबायो’ जर्नल में प्रकाशित लीड्स के शोधकर्ताओं की रिपोर्ट कहती है कि बेसिन की जनसंख्या में 60 प्रतिशत किसान हैं जो पैदावार में कमी की मार झेल रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, ज्वार की पैदावार सन 1960 में 32.8 लाख टन से घटकर 2010 के बाद सिर्फ 18 लाख टन रह गई है। ‘जीआईडब्ल्यूए’ रिपोर्ट बताती है कि क्षेत्र में वर्षा की कमी ने किसानों को सीधे तौर पर प्रभावित किया है, क्योंकि बेसिन में उगने वाली 95 फीसदी से अधिक फसलें परम्परागत और वर्षा आधारित हैं।

रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि बेसिन में पैदा की जाने वाली ज्यादातर फसलों को सिंचाई की जरूरत नहीं है। सरकारें अपरिपक्व सिंचाई परियोजनाओं को लागू कर रही हैं। इस तरह की परियोजनाएँ क्षेत्र में पारिस्थितिकीय असन्तुलन का कारण बनती हैं और किसानों की परेशानियों को और जटिल बनाती हैं। घटते कृषि उत्पादन के बारे में चिन्तित नाइजीरियाई सरकार ने 1979 में झील में तीन प्रतिशत वार्षिक प्रवाह की दिशा बदलकर उसके चारों ओर स्थित 660 वर्ग किलोमीटर भूमि को सिंचित करने के लिये दक्षिण चाड सिंचाई परियोजना की शुरुआत की। लेकिन 1980 में झील के स्तर में फिर से गिरावट के कारण ये सिंचाई परियोजना किसी काम नहीं आई। इन अधूरी नहरों में अब सरकंडे जैसे जलीय पौधे उग आये हैं। इन पौधों के तन्तु क्विलिआ चिड़ियों का पसन्दीदा ठिकाना हैं, जो कि किसानों के लिये खतरा मानी जाती हैं। बीस लाख क्विलिआ चिड़ियों का झुंड एक दिन में 20 टन अनाज खा सकता है।

नदियों के ऊपर बाँध, झील के सिकुड़ने, सूखे और अत्यधिक मछली मारने की वजह से मछली पालन को भी नुकसान उठाना पड़ा है। नाइजीरिया के ‘नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर फ्रेशवॉटर फिशरीज रिसर्च’ के एक अधिकारी सोलोमन आई ओवी का कहना है कि चाड झील का मछलीपालन अफ्रीका में सबसे बड़ा और सबसे उत्पादक मछली पालन है। इसके जरिए परम्परागत रूप से क्षेत्र के निवासियों को आय और खाद्य सुरक्षा मिल रही है। लेकिन उनका उत्पादन घटकर एक लाख टन रह गया है जो 1974 में 2.20 लाख टन था। ओवी का कहना है कि व्यावसायिक रूप से महत्त्वपूर्ण मछलियों की दो प्रजातियाँ ‘नील बसेरा’ और ‘लेबियो’ 1980 के दशक में ही झील से विलुप्त होती गई थीं। इससे यहाँ की जैवविविधता को हुए भारी नुकसान का अन्दाजा लगाया जा सकता है। पानी की कमी के चलते चारा वाली भूमि और फसलों की खेती में आई कमी ने पशुधन और निर्यात को प्रभावित किया है। जो 1970 से पहले बेसिन में रहने वाले परिवारों के लिये आय का तीसरा सबसे बड़ा स्रोत था। 1970 के सूखे की वजह से बेसिन में चारों ओर कम होती चारा भूमि ने चरवाहों को पशु और ऊँट की जगह बकरी और भेड़ पालने के लिये प्रोत्साहित किया।

दिसम्बर 2014 में जारी अफ्रीकी विकास बैंक की रिपोर्ट बताती है कि जलवायु परिवर्तन और मानवीय गतिविधियों की वजह से चाड झील का उत्पादक पारिस्थितिकी तंत्र बर्बाद हुआ है। इसका असर बेसिन के सभी क्षेत्रों पर पड़ रहा है। क्षेत्र में करीब पाँच करोड़ के लोग खतरनाक और असुरक्षित स्थिति में रह रहे हैं। किसान, मछुआरे और चरवाहे अपने परिवार के साथ कृषि योग्य भूमि और आजीविका की खोज में झील की तरफ विस्थापित हुए हैं। जिसका नतीजा विवादों और सामाजिक संघर्ष के रूप में सामने आ रहा है।

जीवन संघर्ष


लीड्स का 2014 का अध्ययन चाड झील में बचे पानी और संसाधनों के आस-पास संघर्षों का विश्लेषण करता है। 1980 से 1994 के बीच लगभग 60 हजार नाइजीरियाई लोगों ने झील के घटते पानी का पीछा करते हुए बेसिन की कैमरून सीमा तक मछली पकड़ने के साथ फसलों की पैदावार और जानवर पालने का काम किया। जिससे समुदायों के बीच शत्रुता बढ़ी। उदाहरण के लिये डारक गाँव में कैमरून और नाइजीरिया के लोग पानी के लिये लगातार लड़ते रहते हैं। नाइजीरिया के लोग गाँव में सबसे पहले बसने का दावा करते हैं जबकि कैमरून के लोग राष्ट्रवादी भावनाओं का आह्वान करते हैं। 1983 में झील में द्वीपों के स्वामित्व को लेकर चाड और नाइजीरिया के बीच खूनी संघर्ष हुआ। सन 1980 में कोमाडुबू-योबे नदी प्रणाली के प्रवाह को लेकर नाइजीरिया और नाइजर में लड़ाई हुई। 1992 में झील के दक्षिणी-पश्चिमी किनारे पर बने टीगा और चलावा बाँध से पानी के उपयोग को लेकर नाइजीरिया के ऊपरी और नाइजर के निचले समुदायों के बीच संघर्ष हुआ। 2005 के बाद से अन्तर-जातीय प्रतिस्पर्धा और झील संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर उपजे विवाद ने इसके दक्षिणी ध्रुव पर सुरक्षा चिन्ताओं को गहरा कर दिया। झील के आसपास पर्यावरण की बर्बादी के कारण पैदा बेरोजगारी ने युवाओं को आतंकवाद की ओर धकेल दिया। बोको हराम के उभार के पीछे यह भी एक प्रमुख कारण है।

झील पर टिका जीवन


संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों का कहना है कि सरकारी लड़ाकों और बोको हराम के बीच बढ़ते संघर्ष के कारण 24 लाख लोग, जिसमें 15 लाख बच्चे शामिल हैं, अपना घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं। जो लोग घरों में रह गए हैं, उनकी हालत भी अच्छी नहीं है। वे अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिये झील पर निर्भर हैं, जो गायब होने के कगार पर है।

‘डब्ल्यूएफपी’ की रिपोर्ट के अनुसार, चूँकि क्षेत्र में तत्काल भुखमरी को रोकना मुश्किल है, इसलिये इन मुद्दों से निपटने के लिये एक दीर्घकालीन रणनीति को विकसित किया जाना चाहिए।

बेसिन को पुनर्जीवित करने के लिये एलसीबीसी एक महत्त्वाकांक्षी परियोजना पर निर्भर है, जो कांगो नदी के जल प्रवाह को मोड़कर 1300 किलोमीटर दूर चारी को देगा जिससे झील को पानी की पूर्ति होगी। 14.5 अरब डॉलर की इस परियोजना में पालैम्बो पर बाँध बनाना है जो जलग्रह क्षेत्र के रूप में काम करेगा। जलग्रह से पानी को 1350 किलोमीटर लम्बे फीडर चैनल के जरिए फीफा नदी में पहुँचाया जाएगा। फिर वह कैमरून की चारी नदी में जाएगा और आखिर में चाड झील तक पहुँचेगा। एलसीबीसी का दावा है कि यह परियोजना बिजली भी पैदा करेगी और नदी परिवहन को भी अनुमति देगी।

इस योजना में कई कमियाँ भी हैं। अमेरिका स्थित जल संसाधन विशेषज्ञ लॉरेन स्टीली का कहना है कि बाँध का मानव पर प्रभाव समूचे क्षेत्र में महसूस किया जाएगा, क्योंकि प्रस्तावित नहर की वजह से बहुत-से लोगों को विस्थापित करना पड़ेगा। नदी के आस-पास पानी की उपलब्धता कृषि और भूमि उपयोग में परिवर्तन को बढ़ावा देकर स्थिति को बदतर बना सकती है। सन 2014 में चाड बेसिन का दौरा करने के बाद विश्व बैंक के अफ्रीका विशेषज्ञ जोनाथन कमकवालाला ने कहा कि चाड झील का प्रबन्धन खंडित है, जो खाद्य आपूर्ति और लाखों लोगों की आजीविका को खतरे में डाल रहा है। उनका सुझाव है कि नदी किनारे के देशों को ऐसी अन्तरराष्ट्रीय एजेंसियों की मदद लेनी चाहिए, जिन्हें इस प्रकार की चुनौतियों से निपटने का अनुभव है।

इस व्यापक संकट के आपातकालीन उपायों के जारी रखने के बजाय सरकारों को चाड बेसिन के परम्परागत ज्ञान से सीखना चाहिए। तभी इस प्राकृतिक और राजनैतिक त्रासदी से बचा जा सकता है।

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