महाशीर के बहाने नदी और नदी के बहाने जंगलों का चिन्तन

Submitted by RuralWater on Sat, 10/01/2016 - 11:20
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इस सम्मेलन में कोलकाता, नैनीताल, मुम्बई, उदयपुर, कर्नाटक, बंगलुरु, मध्य प्रदेश, पंजाब और देश के अन्य कई राज्यों के वन अधिकारियों, मत्स्यपालन विशेषज्ञों और वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के मध्य एक जीवन्त संवाद हुआ जिसमें वनों की सघनता, नदियों की निर्मलता और महाशीर की उपलब्धता के बीच गहन सम्बन्ध रेखांकित किया गया। इसमें खुली परिचर्चा के दौरान मछुआरा समुदाय के लोगों की सहभागिता से मछली, जल, वन और आजीविका के आपसी सम्बन्धों पर भी विचार-विमर्श हुआ। ‘महाशीर’ मछली के संरक्षण को लेकर तीन दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन मध्य प्रदेश के इतिहास में दर्ज होने लायक घटना भले ही न समझी जाये, लेकिन इसका महत्त्व किसी बड़ी ऐतिहासिक घटना से कम नहीं। देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इन्दौर के सौजन्य से और वन विभाग एवं महाशीर पालन विभाग तथा देश के अनेक वैज्ञानिक संस्थानों के समन्वय से आयोजित की गई।

इस राष्ट्रीय महाशीर सम्मेलन का महत्त्व किसी ऐतिहासिक घटना से कम नहीं है। कार्यक्रम में वन विभाग और उसके अनुसांगिक संगठनों के प्रमुख अधिकारियों की उपस्थिति वनांचलों में महाशीर संरक्षण की दिशा में एक नई उम्मीद की किरण पैदा करती है।

सम्मेलन के प्रथम दिवस प्रदेश के मुख्य प्राणी अभिरक्षक, राज्य जैवविविधता बोर्ड के मुख्य कार्यपालन अधिकारी, मध्य प्रदेश ईको टूरिज्म बोर्ड के मुख्य कार्यपालन अधिकारी, मध्य प्रदेश बायो टेक्नोलॉजी बोर्ड के मुख्य कार्य पालन अधिकारी और मध्य प्रदेश मत्स्य संघ के प्रबन्धक संचालक के रूप में पाँच वर्षों तक काम कर चुके अनुभवी अधिकारियों की इसी मंच पर उपस्थिति, वह भी एक मछली के संरक्षण को लेकर, यह वन विभाग के इतिहास में पहली घटना है।

अब प्रश्न यह उठता है कि क्या यह राज्य के लिये भी किसी महत्त्व की घटना है या इसे वन विभाग का एक आयोजन समझकर खारिज कर दिया जाये?

महाशीर मछली को राज्य मत्स्य का दर्जा प्राप्त है। बहती साफ नदियों की परिचायक है अर्थात जहाँ महाशीर पाई जाती है वहाँ नदियाँ साफ होती हैं। कुछ वर्ष पूर्व केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री सुश्री उमा भारती ने भी यह कहा था कि गंगा नदी में महाशीर का लौटना इस बात का परिचायक होगा कि गंगा नदी साफ हो चुकी है। यही बात नर्मदा और मध्य प्रदेश की अन्य नदियों के सन्दर्भ में भी सही बैठती है।

इसका आशय यह है कि प्रदेश की नदियों में महाशीर न केवल पाई जाती है बल्कि अच्छी तादाद में पाई जाती है और इसका सफल प्रजनन होता रहता है, तो न केवल यह इस शानदार मछली के लिये शुभ संकेत ही कहा जाएगा। इस अर्थ में महाशीर मछली का नदी में पाया जाना नदी के अच्छे स्वास्थ्य का सूचक है।

अब नदियों के स्वास्थ्य की चिन्ता करते समय मध्य प्रदेश और भारत के अनेक क्षेत्र में जहाँ अभी भी सघन वन मौजूद हैं वहाँ नदियों का स्वास्थ्य अच्छा पाया जाता है अर्थात उनका पानी स्वच्छ, निर्मल और प्रवाहमान होता है। जिसमें अनेक प्रकार के जीव-जन्तु प्राकृतिक रूप से रहते हैं और प्राकृतिक तंत्र के अनुसार अपना जीवनयापन करते हैं।

सौभाग्य से इन संसाधनों के प्रबन्धन का दृष्टिकोण खण्डित होने के कारण इनके बीच का तालमेल प्रबन्धकों, योजनाकारों और निर्णायकों की नजर से अनदेखा कर दिया जाता है। इसके फलस्वरूप मत्स्य पालन और मछलियों के संरक्षण से सम्बन्धित विभाग और संस्थान कभी जल संसाधन विभाग के सम्पर्क में काम नहीं करते, इसी प्रकार वन विभाग कभी जल संसाधन विभाग के साथ मिलकर काम नहीं करता और जल संसाधन विभाग का कभी मछली पालन विभाग से और न ही वन विभाग से कोई लेना-देना है।

इस प्रकार मछली, जल और वन इन तीनों संस्थानों के प्रबन्धकों के आपसी तालमेल के अभाव का शिकार बनी रहती है। इन्दौर नगर के देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में आयोजित महाशीर सम्मेलन इस मामले में अनूठा कहा जा सकता है। साफ पानी की नदियों में पाये जाने वाले राज्य मत्स्य जिसे पानी का टाइगर भी कहा जाता है ने मछली, नदी और जंगल के खण्डित रिश्ते को जोड़कर एक साथ देखने का नजरिया पैदा किया।

इस सम्मेलन में कोलकाता, नैनीताल, मुम्बई, उदयपुर, कर्नाटक, बंगलुरु, मध्य प्रदेश, पंजाब और देश के अन्य कई राज्यों के वन अधिकारियों, मत्स्यपालन विशेषज्ञों और वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के मध्य एक जीवन्त संवाद हुआ जिसमें वनों की सघनता, नदियों की निर्मलता और महाशीर की उपलब्धता के बीच गहन सम्बन्ध रेखांकित किया गया। इसमें खुली परिचर्चा के दौरान मछुआरा समुदाय के लोगों की सहभागिता से मछली, जल, वन और आजीविका के आपसी सम्बन्धों पर भी विचार-विमर्श हुआ।

सम्मेलन के दौरान प्राप्त हुई अनुशंसाएँ अपने आप में काफी महत्त्वपूर्ण हैं, क्योंकि उनके जरिए वन अंचलों में महाशीर के संरक्षण की शुरुआत पहली बार होने जा रही है। वन विभाग द्वारा इस मौके पर पूरे प्रदेश के वनों की नदियों में महाशीर की उपलब्धता का एक एटलस तैयार करने का भी संकल्प लिया गया है और इसके बारे में जागरुकता फैलाने के लिये एक विशेष आवरण डाकतार विभाग के सहयोग से जारी कराया गया है जिससे लोगों को इस मछली के बारे में ज्यादा-से-ज्यादा पता चल सके।

इस प्रकार यह महाशीर मत्स्य को लेकर किये गए राष्ट्रीय सम्मेलन ‘महाशीर’ पर किये गए चिन्तन का एक छोटा-मोटा कुम्भ कहा जा सकता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले समय में इस सम्मेलन के निचोड़ से मध्य प्रदेश की नदियों में महाशीर के संरक्षण और संवर्धन की नींव को मजबूत किया जा सकेगा।

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About the author

.पत्रकार और लेखक क्रांति चतुर्वेदी का जल पर लेखन से गहरा नाता है। पानी पर आज कई अध्ययन यात्राएँ कर चुके हैं। जल, जंगल और प्राकृतिक संसाधन प्रबन्धन पर पाँच पुस्तकें भी लिख चुके हैं। मध्य प्रदेश के सन्दर्भ ग्रन्थ ‘हार्ट ऑफ इण्डिया’ के सम्पादक भी रह चुके हैं। पानी की पत्रकारिता के लिये भारतीय पत्रकारिता जगत की प्रतिष्ठित के.के.

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