पानी के टाइगर को बचाने की जुगत अब जरूरी

Submitted by UrbanWater on Thu, 07/20/2017 - 10:43


महाशीरमहाशीर‘पानी के टाइगर’ नाम से पहचाने जाने वाली राज्य मत्स्य महाशीर के संरक्षण के लिये विविध प्रयासों की आवश्यकता है। मध्य प्रदेश में इन दिनों नर्मदा सेवा मिशन के तहत नदी संरक्षण के उपाय किये गए हैं। ऐसे में समाज और सरकार ने महाशीर के संरक्षण के प्रयास भी और तेज कर देना चाहिए।

प्रदेश की राज्य मछली महाशीर पर 14 साल से शोध और अध्ययन में जुटी वैज्ञानिक डॉ. श्रीपर्णा सक्सेना ने अभी हाल ही में इस विषय पर एक ताजा अध्ययन किया है। यह अध्ययन स्वयंसेवी संगठन नर्मदा संरक्षण पहल ने एक रिपोर्ट के रूप में प्रकाशित किया है। डॉ. सक्सेना वनांचलों में महाशीर संरक्षण परियोजना की मुख्य शोध समन्वयक भी हैं। आपने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि महाशीर प्रजाति के संरक्षण की कार्रवाई महाशीर के प्राकृतिक रहवास को बचाए बिना नहीं की जा सकती। महाशीर के रहवास में हुए विखण्डन, प्रदूषण, अनियंत्रित आखेट जैसे अनेक मानव निर्मित कारणों से महाशीर के प्राकृतिक रहवास सिमटे जा रहे हैं।

किसी समय मध्य प्रदेश की नदियों की शान समझी जाने वाली यह प्रजाति अब संकट में है। महाशीर का संरक्षण करने के लिये प्राकृतिक रहवासों का संरक्षण करने के साथ-साथ इनका तालाबों में पालन तथा कृत्रिम प्रजनन कराते हुए अंगुलिकाओं को प्राकृतिक जलधाराओं में छोड़ा जा सकता है। इस प्रकार रहवास का संरक्षण और प्रजाति की संख्या में आ रही कमी को दूर करने के प्रयास एक साथ करते हुए महाशीर को बचाया जा सकता है। अनियंत्रित और अवैधानिक तरीकों से मत्स्य आखेट पर रोक लगाना और प्राकृतिक प्रजनन स्थलों की सरकारी अमले द्वारा कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए प्रजनन योग्य बड़ी मछलियों का शिकार रोकना भी महाशीर के संरक्षण में उपयोगी सिद्ध हो सकता है।

 

खास बिन्दु


- महाशीर का आखेट प्रतिवर्ष जून-जुलाई से लेकर सितम्बर तक प्रतिबन्धित रहता है।
- प्रजनन व इससे जुड़े प्रवास के समय मछलियों को सुरक्षित रखने के कानूनी प्रावधान हैं, जिनका पालन कड़ाई से करते हुए अन्य प्रजातियों के साथ-साथ महाशीर को भी बचाया जा सकता है।
- शासन द्वारा नियत मापदण्ड के अनुसार मत्स्य आखेट में इस्तेमाल किये जाने वाले जाल के आकार व दक्षता को सीमित करते हुए मछलियों के संरक्षण की व्यवस्था अवश्य है, परन्तु इनका क्रियान्वयन कड़ाई से करने की आवश्यकता है।
- सन 1953 से म.प्र. में 22.9 सेंटीमीटर आकार से कम की महाशीर (टोर टोर) को पकड़ने को सीमित किया गया था।

 

जलाशयों में संचयन हो


हैचरी में महाशीर का मत्स्य बीज उत्पादन, नर्मदा नदी से महाशीर बीज का एकत्रीकरण, संवर्धन व संचयन तथा प्रेरित प्रजनन से वंशवृद्धि, प्रदेश के बाहर से महाशीर बीज क्रय कर जलाशयों में संचयन, महाशीर मिलने के प्राकृतिक स्थलों पर मछुआरों में जागरुकता हेतु मछुआ गोष्ठियों का आयोजन, नदियों, विभागीय एवं अन्य जलाशयों में महाशीर के निष्कासन को प्रतिबन्धित करना, महाशीर फिश मिल्ट का क्रायो प्रिजर्वेशन जैवविविधता के संरक्षण हेतु अनुसन्धान व महाशीर संरक्षण पर गहन अध्ययन आदि पर जोर देना आवश्यक है।

 

महाशीर को खतरे


रिपोर्ट में कहा गया है मध्य प्रदेश की अनेक नदियों में महाशीर (टोर-टोर) प्रजाति की उपस्थिति दर्ज की जाती रही है। प्रदेश की जीवनरेखा कही जाने वाली नर्मदा नदी में कभी बहुतायत से पाई जाने वाली महाशीर की उपलब्धता विगत आधी सदी में लगभग 30 प्रतिशत से घटकर मात्र 3 प्रतिशत तक ही सिमट कर रह गई है। इससे जहाँ एक ओर मध्य प्रदेश की जलीय जैवविविधता का एक गौरवशाली हिस्सा संकट में है, वहीं दूसरी ओर मत्स्य आखेट से आजीविका कमाने वाले लाखों मछुआरों की आमदनी पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

महाशीर मछली अपने प्रजनन काल में मुख्य नदी से सहायक नदी में प्रवाह के विपरीत जाकर अंडे देती है जिनमें से कई नदियों का प्रवाह अभी भी घने जंगलों से होकर गुजरता है। अनेक नदियों पर बाँधों के बनने से इस प्रकार के आवागमन में गम्भीर व्यवधान उत्पन्न हो रहे हैं जिससे इस प्रजाति का प्रजनन प्रतिकूल रूप से प्रभावित हो रहा है। इसके साथ ही जल का प्रदूषण बढ़ने से भी इस प्रजाति के अस्तित्व पर संकट मँडराने लगा है और इसकी प्राकृतिक उपलब्धता में भारी कमी आई है। महाशीर को मुख्यत: निम्न बातों से खतरा है:-

- मछली पकड़ने के विध्वंसक तरीके
- अनियंत्रित मत्स्य आखेट
- रहवास में अवांछित भौतिक अथवा रासायनिक बदलाव
- नदियों पर सिंचाई तथा जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण
- निर्माण सामग्री का अनियंत्रित खनन
- जल प्रदूषण

 

मछुआरों को जोड़ना जरूरी


महाशीर संरक्षण के कार्य में जनभागीदारी सुनिश्चित करना भी एक कारगर रणनीति सिद्ध हो सकता है। लाखों मछुआरों की आजीविका से जुड़ा हुआ मुद्दा होने के कारण मछुआरों को इस संरक्षण के कार्य से जोड़ना अत्यन्त आवश्यक है। मछलियों के प्राकृतिक रहवास, प्रजनन स्थलों, शिकार के स्थलों, विस्फोटकों के उपयोग अथवा अन्य ऐसी समस्याओं के बारे में स्थानीय मछुआरों को जानकारी रहती है, अत: उन्हें संगठित रूप से इस काम में जोड़ने की आवश्यकता है। इस दिशा में मछुआरों के मित्रमण्डल व सम्बन्धित ग्राम पंचायतों की जैवविविधता प्रबन्धन समितियाँ (बीएमसी) काफी प्रभावी भूमिका निभा सकता हैं... -डॉ. श्रीपर्णा सक्सेना (जलीय वैज्ञानिक)

 

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About the author

.पत्रकार और लेखक क्रांति चतुर्वेदी का जल पर लेखन से गहरा नाता है। पानी पर आज कई अध्ययन यात्राएँ कर चुके हैं। जल, जंगल और प्राकृतिक संसाधन प्रबन्धन पर पाँच पुस्तकें भी लिख चुके हैं। मध्य प्रदेश के सन्दर्भ ग्रन्थ ‘हार्ट ऑफ इण्डिया’ के सम्पादक भी रह चुके हैं। पानी की पत्रकारिता के लिये भारतीय पत्रकारिता जग

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