पौधारोपण को बनाएँ जन आन्दोलन – प्रधानमंत्री मोदी

Submitted by RuralWater on Sat, 08/20/2016 - 16:44

मन की बात 31 जुलाई 2016

 


.31 जुलाई 2016। हल्की फुहारों के साथ दिन की शुरुआत हुई थी। मौसम सुहाना था, चारों तरफ हरियाली-ही-हरियाली। पेड़–पौधे मन्द हवा के झोकों के साथ लहलहाते खेतों में खड़ी फसल हरहरा उठती। जैसे किसी चित्रकार ने धरती को हरे रंग से रंग दिया हो। आसमान में घुमड़ते काले बादल और इन्हीं मोहक पलों के बीच हमारी गाड़ी के पहिए दौड़ रहे थे बारिश के पानी से धुली हुई काली चारकोल की सड़क पर।

हम देवास के आगे सिया गाँव के अम्बेडकर नगर की बस्ती में जा रहे थे। गाँव के लोग यहाँ पहले से ही मौजूद थे। चबूतरे की दूसरी ओर अपने बच्चों के साथ औरतें भी थी। आँगनबाड़ी के पास एक चबूतरे पर रेडियो रखा हुआ था और प्रधानमंत्री के मन की बात का इन्तजार हो रहा था। बातों में ही पूछ लिया क्या हर बार आप इसी तरह सुनते हैं मन की बात। जवाब आया- सुनते ही नहीं, उस पर अमल भी करते हैं।

पूर्व सरपंच संगीता शिंदे बताती हैं कि वे खुद दलित परिवार से आती हैं पर अब गाँव में छुआछूत जैसी बात नहीं है। वे बताती हैं कि किस तरह उन्होंने अपने सरपंच रहते हुए यहाँ पानी और पर्यावरण के कामों को बढ़ावा दिया। इससे औरतों खास तौर पर दलित वर्ग की औरतों की हालत में भी सुधार हुआ है।

तभी आकाशवाणी से प्रधानमंत्री के मन की बात शुरू होने की उद्घोषणा हुई। सब ध्यान से सुनने लगे। रेडियो से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आवाज गूँजने लगी थी। वे कह रहे थे...

मेरे प्यारे देशवासियों, नमस्कार,
कुछ समय पहले हम लोग अकाल की चिन्ता कर रहे थे और इन दिनों वर्षा का आनन्द भी आ रहा है, तो बाढ़ की खबरें भी आ रही हैं। राज्य सरकार और केन्द्र सरकार मिल कर के बाढ़-पीड़ितों की सहायता करने के लिये कन्धे-से-कन्धा मिलाकर के भरपूर प्रयास कर रही है। वर्षा के कारण कुछ कठिनाइयाँ होने के बावजूद भी हर मन, हर मानवीय मन पुलकित हो जाता है, क्योंकि हमारी पूरी आर्थिक गतिविधि के केन्द्र-बिन्दु में वर्षा होती है, खेती होती है।

कभी-कभी ऐसी बीमारी आ जाती है कि हमें जीवन भर पछतावा रहता है। लेकिन अगर हम जागरूक रहें, सतर्क रहें, प्रयत्नरत रहें, तो इससे बचने के रास्ते भी बड़े आसान हैं। डेंगू ही ले लीजिए। डेंगू से बचा जा सकता है। थोड़ा स्वच्छता पर ध्यान रहे, थोड़े सतर्क रहें और सुरक्षित रहने का प्रयास करें, बच्चों पर विशेष ध्यान दें और ये जो सोच है न कि गरीब बस्ती में ही ऐसी बीमारी आती है, डेंगू का केस ऐसा नहीं है। डेंगू सुखी-समृद्ध इलाके में सबसे पहले आता है और इसलिये इसे हम समझें।

आप टीवी पर विज्ञापन देखते ही होंगे, लेकिन कभी-कभी हम उस पर जागरूक एक्शन के सम्बन्ध में थोड़े उदासीन रहते हैं। सरकार, अस्पताल, डॉक्टर- वो तो अपना काम करेंगे ही, लेकिन हम भी, अपने घर में, अपने इलाके में, अपने परिवार में डेंगू न प्रवेश करे और पानी के कारण होने वाली कोई बीमारी न आये, इसके लिये सतर्क रहें, यही मैं आपसे प्रार्थना करुँगा।

एक और मुसीबत की ओर मैं, प्यारे देशवासियों, आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ। जिन्दगी इतनी आपा-धापी वाली बन गई है, इतनी दौड़-धूप वाली बन गई है कि कभी-कभी हमें अपने लिये सोचने का समय नहीं होता है। बीमार हो गए, तो मन करता है, जल्दी से ठीक हो जाओ और इसलिये कोई भी एंटीबायोटिक लेकर के डाल देते हैं शरीर में। तत्काल तो बीमारी से मुक्ति मिल जाती है, लेकिन मेरे प्यारे देशवासियों, ये रास्ते चलते-फिरते एंटीबायोटिक लेने की आदतें बहुत गम्भीर संकट पैदा कर सकती हैं।

हो सकता है, आपको तो कुछ पल के लिये राहत मिल जाये, लेकिन डॉक्टरों की सलाह के बिना हम एंटीबायोटिक लेना बन्द करें। डॉक्टर जब तक लिख करके नहीं देते हैं, हम उससे बचें, हम ये शार्टकट के माध्यम से न चलें, क्योंकि इससे एक नई कठिनाइयाँ पैदा हो रही हैं, क्योंकि अनाप-शनाप एंटीबायोटिक उपयोग करने के कारण मरीज को तो तत्कालीन लाभ हो जाता है, लेकिन इसके जो जीवाणु हैं, वे इन दवाइयों के आदी बन जाते हैं और फिर दवाइयाँ इन जीवाणुओं के लिये बेकार साबित हो जाती हैं और फिर इस लड़ाई को लड़ना, नई दवाइयाँ बनाना, वैज्ञानिक शोध करना, सालों बीत जाते हैं और तब तक ये बीमारियाँ नई मुसीबतें पैदा कर देती हैं और इसलिये इस पर जागरूक रहने की जरूरत है।

एक और मुसीबत आई है कि डॉक्टर ने कहा हो कि भाई, ये एंटीबायोटिक लीजिए और उसने कहा कि भाई, 15 गोली लेनी है, पाँच दिन में लेनी है; मैं आपसे आग्रह करता हूँ कि डॉक्टर ने जितने दिन लेने के लिये कहा है, कोर्स पूरा कीजिए; आधा-अधूरा छोड़ दिया, तो भी वो जीवाणु के फायदे में जाएगा, आवश्यकता से अधिक ले लिया, तो भी जीवाणु के फायदे में जाएगा और इसलिये जितने दिन का, जितनी गोली का कोर्स तय हुआ हो, उसको पूरा करना भी उतना ही जरूरी है; तबीयत ठीक हो गई, इसलिये अब जरूरत नहीं है, ये अगर हमने किया, तो वो जीवाणु के फायदे में चला जाता है और जीवाणु ताकतवर बन जाता है।

जो जीवाणु टीबी और मलेरिया फैलाते हैं, वो तेज गति से अपने अन्दर ऐसे बदलाव ला रहे हैं कि दवाइयों का कोई असर ही नहीं होता है। मेडिकल भाषा में इसे एंटीबायोटिक रेसिस्टेंस कहते हैं और इसलिये एंटीबायोटिक का कैसे उपयोग हो, इसके नियमों का पालन भी उतना ही जरूरी है। सरकार एंटीबायोटिक रेसिस्टेंस को रोकने के लिये प्रतिबद्ध है और आपने देखा होगा, इन दिनों एंटीबायोटिक की जो दवाइयाँ बिकती हैं, उसका जो पत्ता रहता है, उसके ऊपर एक लाल लकीर से आपको सचेत किया जाता है, आप उस पर जरूर ध्यान दीजिए।

जब हेल्थ की ही बात निकली है, तो मैं एक बात और भी जोड़ना चाहता हूँ। हमारे देश में गर्भावस्था में जो माताएँ हैं, उनके जीवन की चिन्ता कभी-कभी बहुत सताती है। हमारे देश में हर वर्ष लगभग 3 करोड़ महिलाएँ गर्भावस्था धारण करती हैं, लेकिन कुछ माताएँ प्रसूति के समय मरती हैं, कभी माँ मरती है, कभी बालक मरता है, कभी बालक और माँ दोनों मरते हैं। ये ठीक है कि पिछले एक दशक में माता की असमय मृत्यु की दर में कमी तो आई है, लेकिन फिर भी आज भी बहुत बड़ी मात्रा में गर्भवती माताओं का जीवन नहीं बचा पाते हैं।

गर्भावस्था के दौरान या बाद में खून की कमी, प्रसव सम्बन्धी संक्रमण, हाई बीपी न जाने कौन सी तकलीफ कब उसकी जिन्दगी को तबाह कर दे। इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने पिछले कुछ महीनों से एक नया अभियान शुरू किया है- ‘प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान’। इस अभियान के तहत हर महीने की 9 तारीख को सभी गर्भवती महिलाओं की सरकारी स्वास्थ्य केन्द्रों में निशुल्क जाँच की जाएगी।

एक भी पैसे के खर्च के बिना सरकारी अस्पतालों में हर महीने की 9 तारीख को काम किया जाएगा। मैं हर गरीब परिवारों से आग्रह करुँगा कि सभी गर्भवती माताएँ 9 तारीख को इस सेवा का लाभ उठाएँ, ताकि 9वें महीने तक पहुँचते-पहुँचते अगर कोई तकलीफ हो, तो पहले से ही उसका उपाय किया जा सके। माँ और बालक - दोनों की जिन्दगी बचाई जा सके। क्या आप महीने में एक दिन 9 तारीख को गरीब माताओं के लिये मुफ्त में ये सेवा नहीं दे सकते हैं।

क्या मेरे डॉक्टर भाई-बहन एक साल में बारह दिन गरीबों के लिये इस काम के लिये नहीं लगा सकते हैं? पिछले दिनों मुझे कइयों ने चिठ्ठियाँ लिखी हैं। हजारों ऐसे डॉक्टर हैं, जिन्होंने मेरी बात को मान करके आगे बढ़ाया है, लेकिन भारत इतना बड़ा देश है, लाखों डॉक्टरों ने इस अभियान में जुड़ना चाहिए। मुझे विश्वास है, आप जरूर जुड़ेंगे।

मेरे प्यारे देशवासियों, आज पूरा विश्व– क्लाइमेट चेंज, ग्लोबल वार्मिंग। पर्यावरण - इसकी बड़ी चिन्ता करता है। देश और दुनिया में सामूहिक रूप से इसकी चर्चा होती है। भारत में सदियों से इन बातों पर बल दिया गया है। कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में भी भगवान कृष्ण वृक्ष की चर्चा करते हैं, युद्ध के मैदान में भी वृक्ष की चर्चा चिन्ता करना मतलब कि इसका माहात्म्य कितना होगा, हम अन्दाज कर सकते हैं। गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं- ‘अश्वत्थ: सर्ववृक्षाणां’ अर्थात सभी वृक्षों में मैं पीपल हूँ।

शुक्राचार्य नीति में कहा गया है - ‘नास्ति मूलं अनौषधं’ - ऐसी कोई वनस्पति नहीं है, जिसमें कोई औषधीय गुण न हो। महाभारत का अनुशासन पर्व - उसमें तो बड़ी विस्तार से चर्चा की है और महाभारत के अनुशासन पर्व में कहा गया है - ‘जो वृक्ष लगाता है, उसके लिये ये वृक्ष सन्तान रूप होता है, इसमें संशय नहीं है। जो वृक्ष का दान करता है, उसको वह वृक्ष सन्तान की भाँति परलोक में भी तार देते हैं। इसलिये अपने कल्याण की इच्छा रखने वाले माता-पिता अच्छे वृक्ष लगाएँ और उनका सन्तानों के समान पालन करें। हमारे शास्त्र- गीता हो, शुक्राचार्य नीति हो, महाभारत का अनुशासन पर्व हो - लेकिन आज की पीढ़ी में भी कुछ लोग होते हैं, जो इन आदर्शों को जी कर के दिखाते हैं।

कुछ दिन पहले मैंने, पुणे की एक बेटी सोनल का एक उदाहरण मेरे ध्यान में आया, वो मेरे मन को छू गया। महाभारत के अनुशासन पर्व में कहा है न कि वृक्ष परलोक में भी सन्तान की जिम्मेवारी पूरी करता है। सोनल ने सिर्फ अपने माता-पिता की नहीं, समाज की इच्छाओं को पूर्ण करने का जैसे बीड़ा उठाया है। महाराष्ट्र में पुणे के जुन्नर तालुका में नारायणपुर गाँव के किसान खंडू मारुती महात्रे, उन्होंने अपनी पोती सोनल की शादी एक बड़े प्रेरक ढंग से की।

महात्रे जी ने क्या किया, सोनल की शादी में जितने भी रिश्तेदार, दोस्त, मेहमान आये थे, उन सब को ‘केसर आम’ का एक पौधा भेंट किया, उपहार के रूप में दिया और जब मैंने सोशल मीडिया में उसकी तस्वीर देखी, तो मैं हैरान था कि शादी में बराती नहीं दिख रहे थे, पौधे ही पौधे नजर आ रहे थे। मन को छूने वाला ऐसा दृश्य उस तस्वीर में था। सोनल जो स्वयं एक एग्रीकल्चर ग्रेजुएट है, ये आईडिया उसी को आया और शादी में आम के पौधे भेंट देना, देखिए, प्रकृति का प्रेम कितना उत्तम तरीके से प्रकट हुआ।

एक प्रकार से सोनल की शादी प्रकृति प्रेम की अमर गाथा बन गई। मैं सोनल को और श्रीमान महात्रे जी को इस अभिनव प्रयास के लिये बहुत-बहुत शुभकामनाएँ देता हूँ। और ऐसे प्रयोग बहुत लोग करते हैं। मुझे स्मरण है, मैं जब गुजरात मैं मुख्यमंत्री था, तो वहाँ अम्बा जी के मन्दिर में भाद्र महीने में बहुत बड़ी मात्रा में पदयात्री आते हैं, तो एक बार एक समाजसेवी संगठन ने तय किया कि मन्दिर में जो आएँगे, उनको प्रसाद में पौधा देंगे और उनको कहेंगे कि देखिए, ये माता जी का प्रसाद है, इस पौधे को अपने गाँव-घर जाकर के ये बड़ा बने, माता आपको आशीर्वाद देती रहेगी, इसकी चिन्ता कीजिए। और लाखों पदयात्री आते थे और लाखों पौधे बाँटे थे उस वर्ष मन्दिर भी इस वर्षा ऋतु में प्रसाद के बदले में पौधे देने की परम्परा प्रारम्भ कर सकते हैं।

एक सहज जन-आन्दोलन बन सकता है वृक्षारोपण का। मैं किसान भाइयों को तो बार-बार कहता हूँ कि हमारे खेतों के किनारे पर जो हम बाड़ लगा करके हमारी जमीन बर्बाद करते हैं, क्यों न हम उस बाड़ की जगह पर टिम्बर की खेती करें। आज भारत को घर बनाने के लिये, फर्निचर बनाने के लिये, अरबों-खरबों का टिम्बर विदेशों से लाना पड़ता है। अगर हम हमारे खेत के किनारे पर ऐसे वृक्ष लगा दें, जो फर्नीचर और घर काम में आएँ, तो पन्द्रह-बीस साल के बाद सरकार की परमिशन से उसको काट करके बेच भी सकते हैं आप और वो आपके आय का एक नया साधन भी बन सकता है और भारत को टिम्बर इम्पोर्ट करने से बच भी सकते हैं।

पिछले दिनों कई राज्यों ने इस मौसम का उपयोग करते हुए काफी अभियान चलाए हैं, भारत सरकार ने भी एक ‘सीएएमपीए’ कानून अभी-अभी पारित किया, इसके कारण वृक्षारोपण के लिये करीब चालीस हजार करोड़ से भी ज्यादा राज्यों के पास जाने वाले हैं। मुझे बताया गया है कि महाराष्ट्र सरकार ने एक जुलाई को पूरे राज्य में करीब सवा-दो करोड़ पौधे लगाए हैं और अगले साल उन्होंने तीन करोड़ पौधे लगाने का संकल्प किया है।

सरकार ने एक जन-आन्दोलन खड़ा कर दिया। राजस्थान, मरू-भूमि - इतना बड़ा वन-महोत्सव किया और पच्चीस लाख पौधे लगाने का संकल्प किया है। राजस्थान में पच्चीस लाख पौधे छोटी बात नहीं हैं। जो राजस्थान की धरती को जानते हैं, उनको मालूम है कि कितना बड़ा बीड़ा उठाया है। आन्ध्र प्रदेश ने भी 2029 तक अपना ग्रीन कवर फिफ्टी परसेंट बढ़ाने का फैसला किया है। केन्द्र सरकार ने जो ‘ग्रीन इण्डिया मिशन’ चल रहा है, इसके तहत रेलवे ने इस काम को उठाया है।

गुजरात में भी वन महोत्सव की एक बहुत बड़ी उज्जवल परम्परा है। इस वर्ष गुजरात ने आम्र वन, एकता वन, शहीद वन - ऐसे अनेक प्रकल्पों को वन महोत्सव के रूप में उठाया है और करोड़ों वृक्ष लगाने का अभियान चलाया है। मैं सभी राज्यों का उल्लेख नहीं कर पा रहा हूँ, लेकिन बधाई के पात्र हैं।

मेरे प्यारे देशवासियों, इन दिनों पार्लियामेंट का सत्र चल रहा है, तो संसद के सत्र के दरम्यिान मुझे देश के बहुत सारे लोगों से मिलने का अवसर भी मिलता है। हमारे सांसद महोदय भी अपने-अपने इलाके से लोगों को लाते हैं, मिलवाते हैं, बातें बताते हैं, अपनी कठिनाइयाँ भी बताते हैं। लेकिन इन दिनों मुझे एक सुखद अनुभव हुआ। अलीगढ़ के कुछ छात्र मेरे पास आये थे।

लड़के-लड़कियों का बड़ा उत्साह देखने को था और बहुत बड़ा एल्बम ले के आये थे और उनके चेहरे पर इतनी खुशी थी। और हमारे अलीगढ़ के सांसद उनको ले करके आये थे। उन्होंने मुझे तस्वीरें दिखाईं। उन्होंने अलीगढ़ रेलवे स्टेशन का सौन्‍दर्यीकरण किया है। स्टेशन पर कलात्मक पेंटिंग किये हैं। इतना ही नहीं, गाँव में जो प्लास्टिक की बोतलें या ऑइल के केन ऐसे ही कूड़े-कचरे में पड़े हुए, उसको उन्होंने खोज-खोज करके इकट्ठा किया और उनमें मिट्टी भर कर के, पौधे लगा करके उन्होंने वर्टिकल गार्डन बनाए।

और रेलवे स्टेशन की तरफ प्लास्टिक बोतलों में ये वर्टिकल गार्डन बना करके बिल्कुल उसको एक प्रकार से नया रूप दे दिया। आप भी कभी अलीगढ़ जाएँगे, तो जरूर स्टेशन को देखिए। हिन्दुस्तान के कई रेलवे स्टेशनों से आजकल मुझे ये खबरें आ रही हैं। स्थानीय लोग रेलवे स्टेशन की दीवारों पर अपने इलाके की पहचान अपनी कला के द्वारा प्रस्तुत कर रहे हैं। एक नयापन महसूस हो रहा है। जन-भागीदारी से कैसा बदलाव लाया जा सकता है, इसका ये उदाहरण है। देश में इस प्रकार से काम करने वाले सबको बधाई, अलीगढ़ के मेरे साथियों को विशेष बधाई।

मेरे प्यारे देशवासियों, वर्षा की ऋतु के साथ-साथ हमारे देश में त्योहारों की भी ऋतु रहती है। आने वाले दिनों में सब दूर मेले लगे होंगे। मन्दिरों में, पूजाघरों में उत्सव मनाए जाते होंगे और आप भी घर में भी, बाहर भी उत्सव में जुड़ जाते होंगे। रक्षाबन्धन का त्योहार हमारे यहाँ एक विशेष महत्त्व का त्योहार है। पिछले साल की भाँति इस साल भी रक्षाबन्धन के अवसर पर अपने देश की माताओं-बहनों को क्या आप प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना या जीवन ज्योति बीमा योजना भेंट नहीं कर सकते? सोचिए, बहन को ऐसी भेंट दें, जो उसको जीवन में सचमुच में सुरक्षा दे।

इतना ही नहीं, हमारे घर में खाना बनाने वाली महिला होगी, हमारे घर में साफ-सफाई करने वाली कोई महिला होगी, गरीब माँ की बेटी होगी यह रक्षाबन्धन के त्योहार पर उनको भी तो सुरक्षा बीमा योजना या जीवन ज्योति बीमा योजना भेंट दे सकते हैं आप और यही तो सामाजिक सुरक्षा है, यही तो रक्षाबन्धन का सही अर्थ है।

मेरे प्यारे देशवासियों, हम में से बहुत लोग हैं, जिनका जन्म आजादी के बाद हुआ है। और मैं देश का पहला ऐसा प्रधानमंत्री हूँ, जो आजाद हिन्दुस्तान में पैदा हुआ हूँ। 8 अगस्त ‘क्वेट इण्डिया मूवमेंट’ का प्रारम्भ हुआ था। हिन्द छोड़ो, भारत छोड़ो - इसे 75 साल हो रहे हैं। और 15 अगस्त को आजादी के 70 साल हो रहे हैं। हम आजादी का आनन्द तो ले रहे हैं। स्वतंत्र नागरिक होने का गर्व भी अनुभव कर रहे हैं। लेकिन इस आजादी दिलाने वाले उन दीवानों को याद करने का ये अवसर है।

हिंद छोड़ो के 75 साल और भारत की आजादी के 70 साल हमारे लिये नई प्रेरणा दे सकते हैं, नई उमंग जगा सकते हैं, देश के लिये कुछ करने के लिये संकल्प का अवसर बन सकते हैं। पूरा देश आजादी के दीवानों के रंग से रंग जाये। चारों तरफ आजादी की खुशबू को फिर से एक बार महसूस करें। ये माहौल हम सब बनाएँ और आजादी का पर्व- ये सरकारी कार्यक्रम नहीं, ये देशवासियों का होना चाहिए। दीवाली की तरह हमारा अपना उत्सव होना चाहिए। मैं आशा करता हूँ कि आप भी देशभक्ति की प्रेरणा से जुड़ा कुछ-न-कुछ अच्छा करेंगे। देश में एक माहौल बनाइए।

प्यारे देशवासियों, 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से मुझे देश के साथ बात करने का एक सौभाग्य मिलता है, एक परम्परा है। आपके मन में भी कुछ बातें होंगी, जो आप चाहते होंगे कि आपकी बात भी लाल किले से उतनी ही प्रखरता से रखी जाये। मैं आपको निमंत्रण देता हूँ, आपके मन में जो विचार आते हों, जिसको लगता है कि आपके प्रतिनिधि के रूप में, आपके प्रधान सेवक के रूप में मुझे लाल किले से ये बात बतानी चाहिए, आप मुझे जरूर लिख करके भेजिए।

सुझाव दीजिए, सलाह दीजिए, नया विचार दीजिए। मैं आपकी बात देशवासियों तक पहुँचाने का प्रयास करुँगा और मैं नहीं चाहता हूँ कि लाल किले की प्राचीर से जो बोला जाये, वो प्रधानमंत्री की बात हो; लाल किले की प्राचीर से जो बोला जाये, वो सवा-सौ करोड़ देशवासियों की बात हो। आप जरूर मुझे कुछ-न-कुछ भेजिए।

‘NarendraModi App’ पर भेज सकते हैं, MyGov.in पर भेज सकते हैं और आजकल तो टेक्नोलॉजी के प्लेटफार्म इतने आसान हैं कि आप आराम से चीजें मुझ तक पहुँचा सकते हैं। मैं आपको निमंत्रण देता हूँ, आइए, आजादी के दीवानों का पुण्य स्मरण करें। भारत के लिये जिन्दगी खपाने वाले महापुरुषों को याद करें और देश के लिये कुछ करने का संकल्प लेकर के आगे बढ़ें। बहुत-बहुत शुभकामनाएँ। बहुत-बहुत धन्यवाद।

प्रधानमंत्री के मन की बात लोगों ने सुनी। उन्होंने वहीं तय भी किया कि वे इस बारिश में गाँव और उसके आसपास पौधरोपण करेंगे। बस्ती की साफ-सफाई का खुद ध्यान करेंगे और इसके लिये हर महीने एक दिन सब इकट्ठा होंगे। हमें लगा कि धीरे ही सही, कहीं कुछ बदलने की पहल तो शुरू हुई है।
 

 

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मनीष वैद्यमनीष वैद्यमनीष वैद्य जमीनी स्तर पर काम करते हुए बीते बीस सालों से लगातार पानी और पर्यावरण सहित जन सरोकारों के मुद्दे पर शिद्दत से लिखते–छपते रहे हैं। देश के प्रमुख अखबारों से छोटी-बड़ी पत्रिकाओं तक उन्होंने अब तक करीब स

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