फौजी गाँव की बूँदें

Submitted by RuralWater on Tue, 12/20/2016 - 16:21
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बूँदों के तीर्थ ‘पुस्तक’

पच्चीस साल पहले भी जनसहयोग से इस तालाब के ऊपर एक तालाब बनाया गया था। बाद में यह जीर्ण-शीर्ण हो गया। इसके बाद से ही यह जमीन बंजर पड़ी थी। समाज ने मिलकर तय किया कि तालाब यहीं बनाया जाना चाहिए। लोग जुट गए और चन्द ही दिनों में यह बंजर जमीन पानी के भण्डार में तब्दील हो गई। यह 700 मीटर लम्बा और 500 मीटर चौड़ा बना है। बीच में बरसात बाद रबी के मौसम में भी दस फीट तक पानी भरा है। थोड़ी ऊँचाई पर समीप ही बागोदा गाँव बसा है। यहाँ और आस-पास की पहाड़ियों से बहकर आने वाले पानी को इस तालाब में रोका गया है।।इस गाँव के क्या कहने!नाम है कनासिया। तहसील तराना। इसे फौजियों के गाँव के नाम से पहचाना जाता है। गाँव के पच्चीस फीसदी युवा फौज में तैनात होकर गाँव का झण्डा ऊँचा कर रहे हैं। लेकिन, यह गाँव इतना ही भर नहीं है। यह तहसील का नम्बर वन शिक्षित गाँव भी है। गाँव का एक युवक अमेरिका में, एक पुणे में, तो एक लड़की मुम्बई में इंजीनियर है। अधिसंख्य लोग यहाँ सरकारी कर्मचारी भी हैं। कभी यह गाँव आम के पेड़ों के गाँव के रूप में भी मशहूर था। चारों ओर आम के घने वृक्ष थे। अब इनकी संख्या घटकर काफी कम हो गई है। भला ऐसे गाँव में बूँदें क्यों नहीं थमेगी? लुनियाखेड़ी के पास ही बसा है कनासिया। कनासिया तराना तहसील के घोर जलसंकट वाले गाँवों में शामिल रहा है। सन 1972 से पीने के पानी की समस्या रही है। प्रतिवर्ष 80 हजार से एक लाख रुपए के बीच यहाँ पानी-परिवहन पर राशि व्यय होती थी। गर्मी के दिनों में तो आस-पास के कुँओं व मक्सी से टैंकर बुलवाने पड़ते। मोटे अनुमान के मुताबिक केवल जल परिवहन पर ही सरकार का 20 लाख रुपया खर्च हो गया होगा। खेती के भी कमोबेश यही हालात थे। खरीफ की फसलें होती थीं। रबी की फसलें बहुत कम मात्रा में होती थीं।पानी आन्दोलन की शुरुआत में लोगों को इस संकट से मुक्ति मिलने का विश्वास नहीं हो रहा था, लेकिन पास के गाँव लुनियाखेड़ी में पानी संचय से होने वाले लाभ देखकर समाज ने शनैः-शनैः उत्साह बताना शुरू किया। स्वयंसेवी संगठन एन.सी.एच.एस.सी. के मुकेश बड़गइया, पानी समिति के अध्यक्ष ईश्वरलाल पटेल, सचिव लक्ष्मीनारायण और गाँव-समाज के साथ इस समय हम कनासिया के विशाल तालाब के किनारे खड़े हैं। पच्चीस साल पहले भी जनसहयोग से इस तालाब के ऊपर एक तालाब बनाया गया था। बाद में यह जीर्ण-शीर्ण हो गया। इसके बाद से ही यह जमीन बंजर पड़ी थी। समाज ने मिलकर तय किया कि तालाब यहीं बनाया जाना चाहिए। लोग जुट गए और चन्द ही दिनों में यह बंजर जमीन पानी के भण्डार में तब्दील हो गई। यह 700 मीटर लम्बा और 500 मीटर चौड़ा बना है। बीच में बरसात बाद रबी के मौसम में भी दस फीट तक पानी भरा है। थोड़ी ऊँचाई पर समीप ही बागोदा गाँव बसा है। यहाँ और आस-पास की पहाड़ियों से बहकर आने वाले पानी को इस तालाब में रोका गया है। इस तालाब ने गाँव की अधिकांश आबादी के सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने बदल दिये हैं। नीचे की साइड के चार किलोमीटर तक के कुएँ रिचार्ज हो गए हैं। मोटे अनुमान के मुताबिक इन कुँओं व अन्य स्रोतों के जिन्दा रहने से 300 एकड़ जमीन को प्रत्यक्ष-परोक्ष लाभ पहुँच रहा है। वैसे तो कनासिया गाँव में कुल 282 कुएँ हैं। इनमें से 133 कुएँ रिचार्ज होने का अनुमान है। इस रिचार्जिंग से 45 किसान परिवार लाभान्वित हो रहे हैं। गाँव में इस तालाब के बनने से ‘नई-ऊर्जा’ आई है। पास के कुछ ट्यूबवेल भी तालाब की वजह से अब बढ़िया चल रहे हैं। जहाँ किसान लहसुन और गेहूँ बो रहे हैं। तालाब से थोड़ी दूर एक किसान ने अपने खेत में एक कुआँ खोदा है। कभी बंजर और पथरीली रहने वाली यह जमीन अब पानी से आबाद हो गई है। इस कुएँ का भी वेस्टवेअर चल रहा है। पानी की प्रचुर मात्रा की आप कल्पना कर सकते हैं।नरवर पानी समिति अध्यक्ष कमलसिंह जो यहाँ पानी आन्दोलन देखने आये थे, उन्होंने खेत का जायजा लिया और किसान परिवार से बात कर कहने लगे- “इसके पास 25 बीघा जमीन है। यदि यह केवल चने की फसल ही ले तो 75 क्विंटल उत्पादन हो सकता है। इससे इसे डेढ़ लाख रुपए की आय हो सकती है।” फिलहाल, यह अभी मजदूरी करता है। कनासिया के तालाब की लागत तीन लाख पिच्चासी हजार रुपए आई है। डाउन स्ट्रीम के सभी खेतों से होने वाली आय जोड़ें तो लागत का यह आँकड़ा केवल एक सीजन में ही आराम से निकल सकता है। तालाब बने एक साल हो गया है। गाँव-समाज ने हमें पानी रोकने की तमाम संरचनाओं के बनने के बाद आये बदलाव के रोचक किस्से सुनाए...। पानी समिति अध्यक्ष ईश्वरलाल ने खुद अपनी कहानी सुनाई- “पहले मैं खेतों में मजदूरी किया करता था। 8 बीघा जमीन थी, पर किसी काम की नहीं। पानी आया तो रबी की फसल ले रहा हूँ। अब दूसरों के यहाँ मजदूरी बन्द। स्वयं अपने खेत से आजीविका चला रहा हूँ।” मांगीलाल शर्मा की जल संचय के बाद स्थिति में व्यापक बदलाव। अब वे 50 बीघा में दोनों फसलें ले रहे हैं। मोहनलाल आर्य ने अपनी जमीन में बोरिंग कराया। जाहिर है, पानी अच्छा निकलना था। अब उन्होंने नई जमीन और खरीद ली। रामेश्वरजी ने अब ट्रैक्टर ले लिया है। जल स्रोतों के जिन्दा होने के बाद गाँव में 6 ट्रैक्टर आ गए हैं। कनासिया में मन्दिर के पास एक स्टॉपडैम भी बनाया गया है। समाज के लोगों ने इसकी जरूरत महसूस की थी। इससे भी कुएँ रिचार्ज हुए हैं। 25 बीघा जमीन में सिंचाई भी हो रही है। एक अन्य रपट सह स्टॉपडैम बनाया गया है। पहले यहाँ छापरी का रास्ता था। छापरी यानी नाले से छोटी जल संरचना। बरसात के दिनों में यहाँ पर दो-तीन फीट पानी भरा रहता था। आने-जाने के लिये पानी उतरने का इन्तजार करना पड़ता था। यह भी रिचार्जिंग में मदद कर रहा है। हम आपको पहले ही बता चुके हैं, गाँव में लम्बे समय तक जल संकट रहा है। तालाब बनने के बाद एक किसान ने अपना निजी कुआँ खोदा तो उसमें अच्छा पानी निकला। पंचायत ने ही स्थान चयन कर एक कुआँ अपनी ओर से खुदवाया। इसमें भी अच्छा पानी निकला और गाँव-समाज इसका इस्तेमाल पीने के पानी के तौर पर कर रहा है। एक कुएँ की रोचक कहानी और सुनिए! पानी आन्दोलन से प्रेरित होकर गाँव के माखनलाल जी ने कुएँ के लिये अपनी कीमती जमीन दान में दे दी। जल संचय के कारण जून माह में भी इसे खोदने पर 12 फीट पर ही पानी मिल गया। यह कुआँ 40 फीट गहरा है। फिलहाल, 50 परिवार यहाँ से पीने का पानी ले जाते हैं। ऐसा नहीं है...! कनासिया में समाज ने 246 डबरियाँ भी बनाई हैं। लोगों ने अपनी कीमती निजी जमीन पानी-संग्रहण के लिये रखी। इन डबरियों में से अधिकांश से सिंचाई हो रही है। इनके पास स्थित कुएँ अब जिन्दा रहने लगे हैं। कनासिया के पहाड़ पर भी 20 डबरियाँ बनी हैं। इनका पानी नीचे की ओर रिचार्ज हो रहा है। पानी आन्दोलन के साथ-साथ यहाँ 50 नाडेप भी तैयार हो गए हैं। यहाँ कमोबेश हर परिवार द्वारा पौधारोपण भी किया गया है। गाँव के ईश्वरलाल बैथलिया कहने लगे- “कभी पानी संकट से जूझने वाला यह गाँव अब पानी संग्रह वाला गाँव बन गया है। पहले खरीफ फसलों की बहुतायत थी। अब सूखे के बावजूद रबी की फसलें दिखाई दे रही हैं। तालाब व अन्य जल संरचनाएँ नहीं बनतीं तो हालात और भीषण हो जाते।”पश्चिमी क्षेत्र में तो जल संवर्धन से इतना फायदा हुआ है कि कुएँ में दो-दो मोटरें चलाने के बाद भी उनका पानी खत्म नहीं हुआ है। कनासिया के उप सरपंच श्रीराम कहते हैं- “गाँव में पानी आन्दोलन के बाद जमीन का जलस्तर बढ़ा है। कतिपय कुओं में तो इतना पानी है कि चार मोटर लगाओ तो भी पानी समाप्त नहीं होता है। पिछले साल शुरू दो हैण्डपम्प फुल चल रहे हैं।” कनासिया का समाज एक ‘जिन्दा’ समाज है। जिस गाँव के युवाओं को दुश्मनों के दाँत खट्टे करने में रोमांच होता है, उस गाँव की जमीन पर पानी क्यों नहीं रुकेगा! सच पूछो तो ये बूँदें अपने दिल से कहेंगी... हमें फौजियों का गाँव रास आ गया है! क्योंकि, इन बूँदों के सीने पर भी तो लिखा नजर आता है...। “फौजी गाँव की बूँदें...!” बूँदों के तीर्थ(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)1बूँदों के ठिकाने2तालाबों का राम दरबार3एक अनूठी अन्तिम इच्छा4बूँदों से महामस्तकाभिषेक5बूँदों का जंक्शन6देवडूंगरी का प्रसाद7बूँदों की रानी8पानी के योग9बूँदों के तराने10फौजी गाँव की बूँदें11झिरियों का गाँव12जंगल की पीड़ा13गाँव की जीवन रेखा14बूँदों की बैरक15रामदेवजी का नाला16पानी के पहाड़17बूँदों का स्वराज18देवाजी का ओटा18बूँदों के छिपे खजाने20खिरनियों की मीठी बूँदें21जल संचय की रणनीति22डबरियाँ : पानी की नई कहावत23वसुन्धरा का दर्द 

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About the author

.पत्रकार और लेखक क्रांति चतुर्वेदी का जल पर लेखन से गहरा नाता है। पानी पर आज कई अध्ययन यात्राएँ कर चुके हैं। जल, जंगल और प्राकृतिक संसाधन प्रबन्धन पर पाँच पुस्तकें भी लिख चुके हैं। मध्य प्रदेश के सन्दर्भ ग्रन्थ ‘हार्ट ऑफ इण्डिया’ के सम्पादक भी रह चुके हैं। पानी की पत्रकारिता के लिये भारतीय पत्रकारिता जगत की प्रतिष्ठित के.के.

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