पुस्तक परिचय - नरक जीते देवसर

Submitted by RuralWater on Thu, 01/05/2017 - 10:34
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नरक जीते देवसरनरक जीते देवसरतालाब, कुएँ, पोखर और जलाशयों का भारतीय संस्कृति में बहुत महत्त्व है। इसका कारण तालाबों का हमारे रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ा होना है। एक समय तालाब और पोखर बनवाना पुण्य का काम समझा जाता था। लेकिन आधुनिकता और विकास के इस दौर में तालाब हमारे जीवन से बाहर हो गए हैं। पीने के लिये नल और सिचाईं के लिये नहर और ट्यूबवेल का उपयोग होने लगा।

इस प्रक्रिया में तालाब और कुएँ उपेक्षा के शिकार हो गए। आज तालाबों के महत्त्व को हम भूल गए। वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार भारद्वाज ने अपनी पुस्तक 'नरक जीते देवसर' में हरियाणा के तालाबों की वर्तमान स्थिति और लोकजीवन में उनके महत्त्व का यथार्थ चित्रण किया है।

पुस्तक की भूमिका में वे लिखते हैं कि हरियाणा के प्रत्येक गाँव, कस्बे और शहर में तालाबों की भरमार है, लेकिन इनमें से बहुत सारे अतिक्रमण के शिकार हो गए हैं। इनकी सब जगह जरूरत है। और हमारी परम्परा में सबसे मजबूत कोई चीज थी तो वह तालाब थी। तालाब और समाज का एक जीवन्त रिश्ता था। यह रिश्ता बहुत जगह टूटा है तो बहुत जगह क्षीण हुआ है। आधुनिकता के पागलपन के सामने उभरकर आ रही विकास की दलीलों ने तालाब और तालाब के प्रति समाज के रिश्तों से जुड़े सवालों को गौण कर दिया है। पानी के दूसरे स्रोत झील-तलैया आदि खत्म हो रहे हैं।

किसी भी गाँव में एक से अधिक तालाब थे। गाँवों के संस्कृति और अर्थतंत्र की रीढ़ तालाब हुआ करते थे। लेकिन आज या तो तालाब पाट कर खेती की जा रही है या उस पर बड़े-बड़े मॉल और इमारत बन गए हैं। लेखक हरियाणा के तालाबों की बात तो करते हैं लेकिन इस प्रक्रिया में वे अपने गाँव के तालाबों का वर्णन करना नहीं भूूलते हैं। ''मेरे अपने गाँव में कई बड़े तालाब थे। इनमें से फिलहाल तीन नहीं हैं। हर तालाब का अपना अलग महत्त्व था, अपनी पहचान थी। खुदाना बहुत गहरा तालाब है। इस तालाब की मिट्टी चिकनी और पीली है। ग्रामीण इसके गारे में थोड़ी मिट्टी और गोबर मिलाकर अपने घरों की दीवारों और फर्श की लिपाई करते थे। शिवाई आला में छोटा सा शिवमन्दिर बना था तो सिसमवाला में शीशम के पेड़ों की भरमार थी।'' इससे साफ जाहिर होता है कि कोई तालाब सिर्फ पानी के लिये ही नहीं पहचाना जाता था बल्कि हर तालाब की अपनी एक पहचान और महत्त्व था।

तालाब और जलाशय हमारे लिये उपयोगी होने के साथ ही पूज्य भी थे। वे लिखते हैं कि तालाब और समाज का रिश्ता आपस में अत्यधिक गुँथा हुआ था। जब भी किसी गाँव का ग्रामीण शौच धोने के लिये निश्चित जलाशय से इतर शौच धोता था, तो ग्रामीण इस पर कड़ी आपत्ति दर्ज करते थे। तालाबों को साफ करने की समाज की सामूहिक जिम्मेवारी होती थी।... तालाब की सफाई के दिन और तारीख की मुनादी होती थी। बस फिर क्या था-हर घर से एक आदमी एक तसला, एक कस्सी लेकर तालाब पहुँच जाता था।

राजकुमार भारद्वाज द्वारा लिखी गई किताब 'नरक जीते देवसर''अरै किसा कुलदे, निरा कूड़दे सै भाई।' अध्याय में वे तालाबों के प्रति आज की स्थिति लिखते हैं कि अपनी जल परम्पराओं के प्रति कोई समाज कितना निष्ठुर, निर्मम और निर्दयी हो सकता है तो बेरी उसके अध्ययन के लिये सबसे उर्वरा और उपयुक्त भूमि है। जिस समाज की आर्थिक धुरी का आकार जोहड़ और कुएँ रहे हों, वहाँ के समाज ने अपने एक-एक कर सारे तालाबों, जोहड़ों और कुओं का खात्मा कर दिया।

'सदानीरा के साथ टूट गया पनघट का जमघट' में वे लिखते हैं कि युवाओं की अरुचि सरकार की गलत नीतियों और बुजुर्गों की लापरवाही के चलते गाँव के तालाबों और कुओं की वह दौलत लगभग खो दी है, जिस पर न जाने उनकी कितनी पीढ़ियों ने जीवन बसर किया था। दौलताबाद गाँव कभी रसभरे टमाटर और मीठी गाजर की खेती के लिये दिल्ली और हरियाणा में मशहूर था।

अब चारों ओर बिल्डर्स बड़ी-बड़ी इमारतें बना रहे हैं। जिससे गाँव के जमीन की कीमतें आसमान छू रही हैं। इसी का परिणाम है कि यहाँ के किसानों के पास आज रुपयों की भरमार है। भूतलीवाला तालाब पूरी तरह समतल कर दिया गया है। गाँव के तकरीबन ढाई दर्जन कुओं में पानी की बूँद नहीं है।

'लोग बाग्गां की आख्यां का पाणी भी उतर गया।' अध्याय में बताते हैं कि अढ़ाई दशक पहले तक वजीराबाद गाँव में इलाके में सबसे अधिक तालाब थे। लेकिन आज तालाबों के नाम पर सिर्फ एक तालाब बचा है। गाँव के बुजुर्ग रामचंद्र इस स्थिति से दुखी होकर कहते हैं कि पानी था तब गाँव हरा-भरा था, खुशहाल था, खूब खेती होती थी। हमारे गाँव के चने की खेती दूर तक मशहूर थी। अब तालाब नहीं है, कुएँ नहीं है, पानी नहीं है, तो लोग बाग्गां की आँखों का पाणी भी उतर गया है।

'नरक जीते देवसर' पुस्तक हरियाणा के मुख्यमंत्री के ओ.एस.डी. (मीडिया) राजकुमार भारद्वाज द्वारा लिखी गई है। पुस्तक में कुल 21 अध्याय हैं। हर अध्याय में तालाबों का जीवन्त और यथार्थ चित्रण किया गया है। तालाबों के अतीत, वर्तमान और महत्त्व को बताने में वे कामयाब रहे। पुस्तक में उन्होंने बड़ी बारीकी से भारतीय समाज, धर्म और कृषि में तालाबों, जलाशयों और पोखरों के महत्त्व को रेखांकित किया है। इस पुस्तक में हरियाणा के अलग-अलग इलाकों में प्राचीन तालाबों की स्थिति की शोध पूर्ण जानकारी दी गई है।


पुस्तक की शैली बेहद रोचक है। यह पुस्तक अपनी प्राचीन धरोहरों से जुड़ी उपयोगी जानकारी पहुँचाने में बेहद कारगर साबित हुई है। साथ ही युवा पीढ़ी को जल संरक्षण का सन्देश भी देती है।

 

नरक जीते देवसर

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिए कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें)

क्रम

अध्याय

1

भूमिका - नरक जीते देवसर

2

अरै किसा कुलदे, निरा कूड़दे सै भाई

3

पहल्यां होया करते फोड़े-फुणसी खत्म, जै आज नहावैं त होज्यां करड़े बीमार

4

और दम तोड़ दिया जानकीदास तालाब ने

5

और गंगासर बन गया अब गंदासर

6

नहीं बेरा कड़ै सै फुलुआला तालाब

7

. . .और अब न रहा नैनसुख, न बचा मीठिया

8

ओ बाब्बू कीत्तै ब्याह दे, पाऊँगी रामाणी की पाल पै

9

और रोक दिये वर्षाजल के सारे रास्ते

10

जमीन बिक्री से रुपयों में घाटा बना अमीरपुर, पानी में गरीब

11

जिब जमीन की कीमत माँ-बाप तै घणी होगी तो किसे तालाब, किसे कुएँ

12

के डले विकास है, पाणी नहीं तो विकास किसा

13

. . . और टूट गया पानी का गढ़

14

सदानीरा के साथ टूट गया पनघट का जमघट

15

बोहड़ा में थी भीमगौड़ा सी जलधारा, अब पानी का संकट

16

सबमर्सिबल के लिए मना किया तो बुढ़ापे म्ह रोटियां का खलल पड़ ज्यागो

17

किसा बाग्गां आला जुआं, जिब नहर ए पक्की कर दी तै

18

अपने पर रोता दादरी का श्यामसर तालाब

19

खापों के लोकतंत्र में मोल का पानी पीता दुजाना

20

पाणी का के तोड़ा सै,पहल्लां मोटर बंद कर द्यूं, बिजली का बिल घणो आ ज्यागो

21

देवीसर - आस्था को मुँह चिढ़ाता गन्दगी का तालाब

22

लोग बागां की आंख्यां का पाणी भी उतर गया

 

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.पत्रकारिता को बदलाव का माध्यम मानने वाले प्रदीप सिंह एक दशक से दिल्ली में रहकर पत्रकारिता और लेखन से जुड़े हैं। दिल्ली से प्रकाशित होने वाले कई अखबारों और पत्रिकाओं से जुड़कर काम किया।

वर्तमान में यथावत पाक्षिक पत्रिका में बतौर प्रमुख संवाददाता कार्यरत हैं। प्रदीप सिंह का जन्म 13 जुलाई 1976 को प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश) में हुआ। प्राथमिक से लेकर बारहवीं तक की शिक्षा प्रतापगढ़ में हुई।

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