नर्मदा घाटी - लड़ाई तो जीती मगर युद्ध जारी है

Submitted by RuralWater on Fri, 02/10/2017 - 10:34
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Source
सर्वोदय प्रेस सर्विस, फरवरी 2017

मैदान ही में नहीं होता युद्ध
जगहें बदलती रहतीं
कभी -कभी उफ तक नहीं होती वहाँ
जहाँ घमासान जारी रहता!

चन्द्रकान्त देवताले

भोपाल गैस कांड के बाद मध्य प्रदेश का यह दूसरा सबसे महत्त्वपूर्ण निर्णय है और दोनों ही अपने आप में तमाम प्रश्नों को जन्म दे रहे हैं। अतएव प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि माननीय सर्वाेच्च न्यायालय के समक्ष पुनर्विचार याचिका प्रस्तुत करते हुए अनुरोध किया जाना चाहिए कि यदि सम्भव हो तो इस निर्णय को संविधान पीठ के समक्ष रखा जाये। गौरतलब है कि नए भूमि अधिग्रहण कानून के अन्तर्गत मुआवजे के निर्धारण की प्रक्रिया की निगरानी भी आवश्यक है। साथ ही इस निर्णय में भूमिहीनों के लिये किसी भी तरह के प्रावधान का कोई जिक्र तक नहीं है। वे विस्थापन की सबसे ज्यादा पीड़ा झेलते हैं।

सरदार सरोवर बाँध को लेकर नर्मदा बचाओ आन्दोलन की याचिका पर अन्ततः सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आ ही गया। तीन दशक की कानूनी लड़ाई के बाद आये फैसले ने प्रसिद्ध चिन्तक व पत्रकार प्रभाष जोशी के इस कथन की याद दिला दी कि फैसला हुआ है न्याय नहीं। इस बार हम शायद दो कदम आगे बढ़े हैं, क्योंकि इस फैसले ने नबआ की नैतिकता को ठोस आधार प्रदान कर दिया है।

सरकारें, नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण, नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण व तमाम अन्य सरकारी विभाग के जीरो बैलेंस यानी कि कोई भी व्यक्ति पुनर्वास हेतु शेष नहीं रहा है, के दावे की धज्जियाँ उड़ा दी हैं। दूसरे अर्थों में कहें तो नबआ ने लड़ाई जीत ली है, परन्तु युद्ध जीतना अभी शेष है। वैसे सर्वोच्च न्यायालय का नवीनतम फैसला उत्तर कम दे रहा है प्रश्न अधिक खड़े कर रहा है। अतएव इस निर्णय का विश्लेषण न केवल कानूनी पक्ष से बल्कि सामाजिक पक्ष के आधार पर करना आवश्यक हो गया है।

यह कहा जा सकता है कि किसी निर्णय पर पहुँचना, अनिर्णय से बेहतर होता है, परन्तु यह हमेशा लाभदायक हो ऐसा जरूरी नहीं। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कुछ को 60 लाख रु. और कुछ को 15 लाख रु. मुआवजा देने की बात कही है। जबकि पिछली सुनवाई के दौरान उन्होंने दोनों पक्षों को आदेशित किया था कि वे एक समिति जो कि इस मामले की विस्तृत जाँच कर रिपोर्ट देगी, के लिये अपनी पसन्द के नाम 8 फरवरी की सुनवाई में दें।

दोपहर को एक समाचार एजेंसी ने एक तीन सदस्यीय न्यायाधीशों की समिति के नाम भी सार्वजनिक कर दिये थे। परन्तु बाद में न्यायालय ने अपना प्रस्ताव वापस ले लिया। अखबारों में छपी रपट के अनुसार न्यायालय ने कहा कि जमीन के बदले जमीन देना सम्भव नहीं था, क्योंकि सरकारों के पास इतनी जमीन नहीं है। यहाँ पूरे सम्मान के साथ यह उल्लेख करना आवश्यक है कि अकेले मध्य प्रदेश में उद्योगों को देने के लिये जितना लैंड बैंक है, उससे कम में सभी डूब प्रभावितों को जमीन के बदले जमीन आसानी से मिल सकती थी।

बहरहाल इसके अलावा यह प्रश्न भी उठता है कि पुनर्वास नीति की दुहाई देकर पूरा बाँध बना लेने के बाद क्या सरकार अपने द्वारा किये गए वायदे से स्वयं को अलग कर सकती है।

इसी के साथ इस निर्णय से एक अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठता है वह है, ‘व्यावहारिकता बनाम वैधानिकता’ का। सुश्री मेधा पाटकर के नेतृत्व में पिछले तीन दशकों से नर्मदा बचाओ आन्दोलन और नर्मदा घाटी के निवासियों का जीवन कानूनी तौर पर अपना अधिकार पाने के संघर्ष को समर्पित रहा है। अनेक बार यह बात न्यायालय ने भी स्वीकार की है कि नकद मुआवजा एक अर्थ में मुआवजा है ही नहीं।

यदि व्यावहारिकता के आधार पर निर्णय लेना होता तो थोड़े कम ज्यादा में बहुत पहले यह मामला समाप्त हो सकता था परन्तु वास्तविक मुद्दा तो यही था कि सरकारों ने जो वायदे किये हैं उन्हें पूरा करने से वह पीछे कैसे हट सकती है। हाल ही में तमिलनाडु में जल्लीकट्टु को लेकर उठे विवाद के पीछे भी यही तर्क था कि ठोस कानून-नियम, कायदे व निर्णय के बाद इस प्रथा को पुनर्जन्म क्यों दिया जा रहा है?

अरुंधति राय ने सरदार सरोवर बाँध से सम्बन्धित अपने निबन्ध में लिखा भी है, ‘राज्य कभी नहीं थकता है। कभी बुढ़ाता नहीं, उसे आराम नहीं चाहिए। यह एक अन्तहीन दौड़ दौड़ता रहता है। मगर लड़ते हुए लोग थक जाते हैं। वे बीमार पड़ जाते हैं। यहाँ तक कि जवान भी उम्र के पहले बूढ़े हो जाते हैं। यदि नकद मुआवजा ही स्वीकारना होता तो न्यायालय की शरण में जाने की आवश्यकता ही क्या थी। यदि दुनिया में व्यावहारिकता ही सर्वोपरी होती तो सैद्धान्तिकता की आवश्यकता ही क्या थी? इस निर्णय से अभी तक यह भी स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि इस आयोग द्वारा दोषी ठहराए गए अधिकारी व दलालों पर भी होने वाली आपराधिक कार्यवाही का क्या भविष्य हैं?

नर्मदा घाटी में नर्मदा नदी अत्यन्त गहरी है अतएव वहाँ लहरें भी उठती कम ही दिखती हैं। ठीक वैसा ही वहाँ के निवासियों की स्थिति है। वे अत्यन्त शान्तिप्रिय व कानून का पूर्ण अनुपालन करने वाले समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं। परन्तु इस निर्णय को लेकर उनके मन में शंका पैदा होना वाजिब है।

भोपाल गैस कांड के बाद मध्य प्रदेश का यह दूसरा सबसे महत्त्वपूर्ण निर्णय है और दोनों ही अपने आप में तमाम प्रश्नों को जन्म दे रहे हैं। अतएव प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि माननीय सर्वाेच्च न्यायालय के समक्ष पुनर्विचार याचिका प्रस्तुत करते हुए अनुरोध किया जाना चाहिए कि यदि सम्भव हो तो इस निर्णय को संविधान पीठ के समक्ष रखा जाये। गौरतलब है कि नए भूमि अधिग्रहण कानून के अन्तर्गत मुआवजे के निर्धारण की प्रक्रिया की निगरानी भी आवश्यक है। साथ ही इस निर्णय में भूमिहीनों के लिये किसी भी तरह के प्रावधान का कोई जिक्र तक नहीं है। वे विस्थापन की सबसे ज्यादा पीड़ा झेलते हैं।

वैसे भी भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में स्पष्ट उल्लेख है, ‘राज्य, भारत के राज्य क्षेत्र में किसी व्यक्ति के समक्ष समता से या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेेगा। इस परिप्रेक्ष्य में इस तथ्य पर ध्यान देना होगा कि सरकार ने न्यायालय में अभी भी प्रभावितों की संख्या अनिश्चित (टेंटेटिव) ही बताई है।’ अतएव सर्वप्रथम तो निश्चित संख्या पर दोनों पक्षों की सहमति बनना और उस पर न्यायालय की मोहर लगवाना भी आवश्यक है।

गौरतलब है नर्मदा बचाओ आन्दोलन के तीन दशक के अहिंसक संघर्ष की परिणति और भी बेहतर निर्णय के साथ हो पाना अपेक्षित है। सर्वोच्च न्यायालय भी घाटी के लोगों की अधीरता को ध्यान में रखते हुए इस निर्णय पर पहुँचा है। न्यायालय की मंशा सन्देह से परे है। परन्तु, सरदार सरोवर बाँध प्रभावितों व नर्मदा बचाओ आन्दोलन का संघर्ष कुछ अन्य व्यापक विषयों पर भी निर्णय चाहता था।

यदि सरकारें अपने वायदे पूरे न कर मामलों को अन्तहीन दौड़ का स्वरूप दे दें तो क्या यह निर्णय उनको सही राह पर लाने का पैमाना बन पाएगा? यह तय है कि निर्णय से पूरी तरह सन्तुष्ट करवाना न्यायालयों का काम नहीं है। परन्तु आम जनता का भी यह नैतिक दायित्व है कि वह ऐसे महत्त्वपूर्ण मसलों पर अपनी राय अवश्य दें।

भारतीय आजादी को महात्मा गाँधी राजनीतिक आजादी तक समेटते हुए कहते थे कि अभी हमें पूर्ण सामाजिक आजादी तक पहुँचने में और अधिक प्रयत्नशील होना होगा। सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय उस ओर उठा हुआ कदम प्रतीत होता है। मुख्य न्यायाधीश ने मेधा पाटकर से कहा कि आप 38 साल से मुआवजे की लड़ाई लड़ रही हैं। हमने एक ही बार में आपकी माँग पूरी कर दी। इससे साफ जाहिर हो गया कि विकास के मार्ग में अड़ंगा नबआ नहीं सरकारें स्वयं लगा रहीं थीं। नर्मदा घाटी के साहसी व धैर्यवान निवासियों को इस कानूनी लड़ाई में छोटी जीत की बधाई और युद्ध में विजय हेतु शुभकामनाएँ।शंकर गुहा नियोगी ने कहा है

शहीदों के खून से सींचे हुए
कुर्बानी के रास्ते पर
बढ़ते चलो कदम-कदम
इस आखिरी युद्ध में
सुनिश्चित है हमारी विजय।


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