जल संरक्षण में अल्मोड़ा विलेन तो पौम्दा गाँव हीरो

Submitted by UrbanWater on Sun, 04/16/2017 - 16:40


पौम्दा गाँव का नौलापौम्दा गाँव का नौलावैसे भी प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में उत्तराखण्डवासियों की अग्रणी भूमिका रही है। इस वर्ष के आरम्भ में जब ‘नेशनल साइंस फिल्म फेयर फेस्टिवल’ में उत्तराखण्ड की दो फिल्मों ने पुरस्कार जीता तो वह इस बात का गवाह बन गई कि राज्य के लोग आज भी जल संरक्षण के लिये संवेदनशील हैं। गौरव की बात यह है कि इस फिल्म को बनाने वाले भी उत्तराखण्डी ही थे और फिल्म की कहानी के पात्र भी उत्तराखण्ड के प्राकृतिक संसाधन ही थे। जिसमें ‘जल’ की महत्ता को प्रमुखता से चित्रित किया गया है।

राज्य की शायद यह पहली फिल्म होगी जिसने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी मौजूदगी को न सिर्फ दमदार ढंग से प्रस्तुत किया बल्कि पुरस्कार पाने में भी अग्रणी रही है। ऐसा भी नहीं है कि इस विषय को लेकर कभी काम ना हुआ हो। कई डॉक्यूमेंटरी फिल्में बनाई गईं, कई चल-चित्र और गीत पानी के सवाल पर फिल्माए गए परन्तु वे इस प्रतियोगिता तक अपनी पहुँच नहीं बना पाये। मगर चम्पावत जिले के लोहाघाट निवासी श्रीनिवास ओली द्वारा प्रदर्शित व निर्देशित फिल्म ‘नौला : वाटर टेम्पल ऑफ हिमालयाज’ को इस सफलता पर कांस्य पदक भी मिला है।

दिलचस्प यह है कि एक तरफ अल्मोड़ा शहर जो कभी नौलों के लिये विख्यात था, आज वह पानी के लिये तरस रहा है। वहीं दूसरी ओर चम्पावत जिले का पौम्दा गाँव है जो ग्लोबल वार्मिंग को ललकार रहा है कि उनके नौले सदैव पानी से लबा-लब भरे रहेंगे। अर्थात यह कह सकते हैं कि यह फिल्म अल्मोड़ा को नौलों के सरंक्षण में विलेन बता रही है तो पौम्दा गाँव को हीरो।

ज्ञात हो कि उत्तराखण्ड एक ऐसा राज्य है जहाँ पानी पर अनेक कहानियों को लोग मौखिक रूप से यूँ ही बयाँ करते आये हैं और कई कहानियाँ ऐसी हैं जिन पर लोग उत्सव व त्योहार का भी आयोजन करते हैं। बता दें कि जब गाँव में नई विवाहिता का प्रवेश होता है तो उसका पहला परिचय पानी के धारे/नौले से करवाया जाता है। उसके बाद नव विवाहिता अपने घर की देहरी पर ‘जल कलश’ लेकर प्रवेश करती है। यहीं से ‘नौला : वाटर टेम्पल ऑफ हिमालयाज’ फिल्म की कहानी का आरम्भ होता है।

फिल्म में पानी के संरक्षण और दोहन में महिलाओं के कष्ट को अच्छी तरह से उकेरा गया है। फिल्म के निर्देशक श्रीनिवास ओली बताते हैं कि उन्हें यह फिल्म बनाने के लिये एक दृश्य ने उद्वेलित किया है। वे बताते हैं कि इस फिल्म की कहानी के लिये अल्मोड़ा शहर को इसलिये चुना गया क्योंकि वहाँ कभी अतीत में ‘चन्द राजाओं’ की राजधानी हुआ करती थी। ये राजा यहाँ राजधानी का काम इसलिये महफूज समझते थे कि वहाँ कालातीत में ‘नौलों’ की भरमार थी जिनके अवशेष आज भी मौजूद हैं।

हालांकि अधिकांश नौले वहाँ सूख चुके हैं फिर भी कुछ नौले आज भी जल संरक्षण के ‘लोक विज्ञान’ को अच्छी तरह बयाँ करते हैं। दूसरा इस फिल्म में बाराकोट ब्लॉक के पौम्दा गाँव की कहानी को पिरोया गया है। जहाँ के लोग ‘जल संरक्षण’ की परम्परा को आज जिन्दा रखे हुए हैं। बताते हैं कि पौम्दा गाँव के लोग नौले से पानी का वितरण एक बर्तन/पात्र से करते हैं ताकि पानी की फिजूलखर्ची पर सन्तुलन बना रहे। यही नहीं प्रत्येक दिन गाँव के दो-दो लोग इस नौले की सुरक्षा के लिये बारी-बारी से तैनाती देते हैं।

 

 

1. फिल्म नौला में एक तरफ हजारों नौलों का परिचय है और दूसरी तरफ नौलों की महत्ता को बखूबी प्रस्तुत किया गया।

2. अल्मोड़ा और चम्पावत जिले का पौम्दा गाँव है फिल्म के केन्द्र में।

3. फिल्म नौला : वाटर टेम्पल ऑफ हिमालयाज अवार्ड

4. भारत सरकार के विज्ञान एवं तकनीकी विभाग की ओर से आयोजित होता है ‘नेशनल साइंस फिल्म फेयर अवॉर्ड’।

5. फिल्म फेस्टिवल में ऑन द स्पॉट फिल्म मेकिंग प्रतियोगिता पहली बार आयोजित की गई।

6. जाने-माने फिल्म निर्देशक मधुर भण्डारकर ने उन्हें यह पुरस्कार प्रदान किया।

 

गाँव के लोग जिस तरह से इस नौले से पानी का दोहन करते हैं उसी तरह इस नौले में पानी के उत्पादन को बढ़ाने का काम करते हैं। नौले में पानी का उत्पादन कैसे हो इसके लिये वे इस नौले के जलागम क्षेत्र में वर्ष में दो बार वृक्षारोपण करते हैं। समय-समय पर नौले की साफ-सफाई करते हैं। इस कार्य को वे लोग सामूहिक रूप से श्रमदान करके करते हैं। उन्होंने बताया कि फिल्म की कहानी में उत्तराखण्ड स्थित जलस्रोतों के संरक्षण व संवर्धन की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। चम्पावत जिले के पौम्दा गाँव को फिल्म में इसलिये उदाहरण बनाकर प्रस्तुत किया गया कि वहाँ ग्रामीणों ने पारम्परिक जलस्रोतों के संरक्षण के नए आयाम स्थापित किये हैं।

उल्लेखनीय हो कि कोलकाता में फरवरी माह के उत्तर्राद्ध में आयोजित नेशनल साइंस फिल्म फेयर अवॉर्ड में अलग-अलग प्रदेशों से आये फिल्मकारों ने अपनी-अपनी फिल्म का प्रदर्शन किया। वहीं उत्तराखण्ड की ‘नौला’ फिल्म का भी प्रदर्शन हुआ। पाँच दिवसीय इस फिल्म फेस्टिवल में देश के अलग-अलग राज्यों की विज्ञान आधारित चुनिन्दा फिल्मों को प्रदर्शन में सम्मिलित किया गया था। भारत सरकार के विज्ञान एवं तकनीकी विभाग की ओर से आयोजित इस समारोह में श्रीनिवास ओली की फिल्म ‘नौला’ को स्वतंत्र फिल्म की श्रेणी में तीसरे स्थान पर चुना गया।

जबकि दूसरी ओर उत्तराखण्ड निवासी व पत्रकार मनीष ओली की फिल्म ‘कम होती दूरियाँ’ ने बेस्ट ऑन द स्पॉट फिल्म का अवॉर्ड जीता। यह फिल्म ऑन द स्पॉट श्रेणी में पहले स्थान पर रही है। मनीष ने इस फिल्म के जरिए यातायात के क्षेत्र में विज्ञान के प्रयोगों से आई क्रान्ति को चित्रित किया। यातायात को सुगम और सुरक्षित बनाने में विज्ञान की उपयोगिता को फिल्म के जरिए लोगों के सामने प्रस्तुत किया।
 

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