नीर, नारी, नदी सम्मेलन में जल योद्धाओं की माँग- सरकार बनाए नदी पुनर्जीवन नीति

Submitted by RuralWater on Thu, 09/29/2016 - 10:15
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नीर, नारी और नदी कार्यक्रम का आयोजननीर, नारी और नदी कार्यक्रम का आयोजनइस वर्ष मानसून सामान्य रहा। बारिश भी खूब हुई। इसके बावजूद देश के कई राज्यों में सूखे जैसे हालात बन गए हैं। एक ओर कर्नाटक का बहुत बड़ा हिस्सा सूखे से प्रभावित है, वहीं उत्तर प्रदेश के गोरखपुर एवं बस्ती मण्डल में वर्षा के अभाव में धान की फसल नष्ट हो रही है। महाराष्ट्र के कई इलाकों में भी इस वर्ष सूखे के हालात हैं।

बुन्देलखण्ड जैसे क्षेत्र में पहले सूखे का सामना करना पड़ा फिर बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हुई, जिससे फसलें प्रभावित हुईं। सूखे और बाढ़ से उत्पन्न हालातों का सर्वाधिक प्रभाव खेती और किसानी पर पड़ रहा है। जिससे किसानों की आर्थिक स्थिति अत्यधिक खराब हो रही है। इस सबके बीच किसानोें के मन में निराशा पनप रही है।

निराशा के बीच में सरकारें सिर्फ न्यूनतम मुआवजा और आश्वासन दे रही हैं जिसके कारण बुन्देलखण्ड और विदर्भ जैसे क्षेत्रों में किसानों की आत्महत्याएँ बढ़ रही हैं। बाढ़ एवं सूखा नियंत्रण के लिये सरकार के पास कोई ठोस योजना न होने के कारण आम आदमी प्राकृतिक आपदा का शिकार बन रहा है।

जल जन जोड़ो अभियान के तहत दिल्ली में 22-23 सितम्बर को एक आयोजन हुआ। बाल भवन के मेखला सभागार में दो दिवसीय 'नीर नारी नदी सम्मेलन' कई सत्रों में विभक्त था। पहले दिन कार्यक्रम के मुख्य अतिथि महाराष्ट्र सरकार के वन एवं वित्तमंत्री सुधीर मुनगुंटीवार ने कहा कि दुनिया में चन्द्रमा और मंगल पर जल की खोज के लिये हजारो करोड़ों रुपए खर्च किया जा रहा है, जबकि स्थानीय स्तर पर पानी बचाने के लिये गम्भीर पहल नहीं की जा रही है।

महाराष्ट्र में जल जन जोड़ो अभियान ने नई चेतना जागृत की है, जिससे महाराष्ट्र में जल संचयन का काम तेजी से बढ़ा है। उन्होंने कहा कि जलयुुक्त सीवर कार्यक्रम देश में एक उदाहरण बना हुआ है। इतिहास भी इस बात का गवाह है कि जो राजा जल, जमीन, जलवायु की चिन्ता करता है उसे प्रकृति भी भरपूर देती हैं और जो इस तरफ ध्यान नहीं देता है, उसे राज्य में दुर्दिन देखना पड़ता है। जिस तरह से पानी का बाजार खड़ा किया जा रहा हैं, वह आने वाले भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती होगी।

इस अवसर पर उत्तर प्रदेश शासन के सिंचाई विभाग के गंगा प्रोजेक्ट के मुख्य अभियन्ता एसके शर्मा ने कहा कि जब तक नदियों में जल का प्रवाह नहीं बढ़ेगा, तब तक नदियों की निर्मलता कायम नहीं होगी, गंगा में आठ हजार क्यूसेक पानी का प्रवाह होना चाहिए जबकि आज छह सौ क्यूसेक पानी छोड़ा जा रहा है। ऋषिकेश के बाद गंगा अपने मूल स्वरूप को खो चुकी है, आज देश में झरनों से निकलने वाली नदियाँ भी लुप्त हो गई हैं।

सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए सुप्रसिद्ध गाँधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. एसएन सुब्बाराव ने कहा कि देश में विकास के नाम पर विनाश को आमंत्रित किया जा रहा है। इसके फलस्वरूप गरीब और अमीर के बीच की खाई बढ़ती जा रही हैं। सबको मिलकर काम करने की जरूरत है। जल पुरुष राजेन्द्र सिंह ने कहा कि देश में अकाल एवं बाढ़ की समस्या के हल निकालने के लिये सरकारें गम्भीर नहीं हैं सरकार के स्तर पर संवाद की प्रक्रिया को बढ़ाने की आवश्यकता है।

जिस तरह से प्राकृतिक आपदा बढ़ रही हैं, उसके अनुरूप शासकीय और गैरशासकीय हस्तक्षेप दिखाई नहीं दे रहे हैं। देश में जमीन और जंगल की लड़ाई लड़ने वाले एकता परिषद के संस्थापक पीवी राजगोपाल ने कहा कि जल, जंगल, जमीन बचाना चाहिए, इनके संरक्षण की बात करने वालों की सरकारें सुनती नहीं है। सरकारी संरक्षण में नैसर्गिक सम्पत्ति की लूट शुरू है और सरकारें आराम से सो रही हैं। विकास के नाम पर जल, जंगल और जमीन को लोगों से छीना जा रहा है। इसलिये समाज में संघर्ष बढ़ रहा है। भविष्य में अगर इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो सामाजिक संघर्ष के खतरे और बढ़ेंगे।

महाराष्ट्र से आई लोक संघर्ष मोर्चा की प्रमुख प्रतिभा शिंदे ने कहा कि सामुदायिक वनाधिकार के तहत उन्होंने महाराष्ट्र के नंदूरवाड़, धूले, जलगाँव जिले के 230 गाँवों में वन पुनर्जीवन का कार्य सामुदायिक सहयोग से किया है। जिसके तहत इन क्षेत्रों के वन जीवित हुए। राजस्थान के कोटा से आये जल बिरादरी के कार्यकर्ता बृजेश विजयवर्गीय ने कहा कि चम्बल शुद्धिकरण योजना ठप्प हो गई है। इस पर पुन: काम शुरू करना चाहिए।

नमामि गंगे योजना में चम्बल के शुद्धिकरण का प्रयास प्रमुखत: से करना चाहिए। चम्बल यमुना की प्रमुख सहायक नदी है, जो उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के पचनद क्षेत्र में मिलकर यमुना को नया जीवन देती है। बिना चम्बल के शुद्धीकरण के न तो यमुना शुद्ध होगी और न ही गंगा। गोरखपुर के जलकर्मी विश्वविजय सिंह ने कहा कि नदियों के पुनर्जीवन को लेकर सरकारें गम्भीर नहीं हैं।

बुन्देलखण्ड से आये किसान बलिराम ने कहा कि जल संकट बढ़ने से खेती का संकट बढ़ रहा है। इस संकट से समाज में गरीबी बढ़ रही है। द्वितीय सत्र में प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में महिलाओं की भूमिका पर चर्चा हुई। जिसमें वक्ताओं ने कहा कि देश में जहाँ भी महिलाएँ प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिये आगे आई है वहाँ बेहतर परिणाम रहे, बुन्देलखण्ड से आई जल सहेली राखी, रेखा, श्री कुंवर, लक्ष्मी, ने बताया कि 240 जल सहेलियों ने एक सैकड़ा से अधिक गाँवों को पानीदार बनाया है, महाराष्ट्र के सांगली जिले से आई तहसीलदार अंजली मरौड ने बताया कि उन्होंने अपनी सरकारी सेवा में रहते हुए अग्रणी नदी के पुनर्जीवन का कार्य किया है।

इस कार्य के लिये उन्होंने मई से लेकर अगस्त माह तक मात्र चार महीनों में तीस किलोमीटर लम्बी नदी को पुनर्जीवित किया। उन्होंने बताया कि आज उस 30 किलोमीटर के इलाके में नदी बह रही है, एक दशक से सूखी पड़ी नदी को जीवित देखकर स्थानीय लोगों में विशेष उत्साह है। उन्होंने कहा कि जब समाज आगे होता है सरकार पीछे होती है तो निश्चित परिवर्तन होता है।

देश के 142 नदी क्षेत्रों से जुड़े प्रतिनिधियों द्वारा अपने-अपने नदी बेसिन के हालातों का सजीव प्रस्तुतिकरण दिया, जिसमें महाराष्ट्र के उस्मानाबाद के निपानी ग्राम पंचायत के सरपंच राजशेखर पाटिल ने बताया कि उन्होंने जन सहयोग से 32 किलोमीटर लम्बे नाले के गहरीकरण का कार्य किया। सोलापुर जिले के महुद गाँव के सरपंच बालासाहब ढाले ने भी अपने गाँव में जन सहयोग के माध्यम से 'कासालओढ़ा' के पुनर्जीवन के विषय में बताया। झारखण्ड के पलामू जिले के विनोद ने बताया कि उन्होंने अपने क्षेत्र में आहर पाईन बचाने का कार्य प्रारम्भ किया। राजस्थान के अलवर जिले के नीमराणा क्षेत्र में स्थित एनआईआईटी विश्वविद्यालय के कुलपति मेजर जनरल एके सिंह ने बताया कि उन्होंने सावी नदी के पुनर्जीवन का कार्य प्रारम्भ किया।

ललितपुर से आये बासुदेव ने बताया कि उन्होंने अपने क्षेत्र की बनडई नदी को जिन्दा किया। अन्तिम सत्र में कर्नाटक कृषि मूल आयोग के अध्यक्ष डॉ. प्रकाश ने कहा कि कावेरी जल विवाद देश के प्राचीन जलविवादों में से एक है। यह विवाद सबसे जटिल विवाद है, जो राजनेताओं द्वारा प्रायोजित है। इस विवाद का समाधान केवल समुदाय कर सकता है, लेकिन सरकारें इस विवाद का हल नहीं करना चाहतीं।

केन्द्र और राज्य इस विवाद को अपने-अपने हितों से जोड़कर देखते हैं। सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए मद्रास इन्टीग्रेटिड डेवलपमेंट स्टडीज के प्रो जनकराजन ने कहा कि कावेरी मुद्दे का राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए। इस विवाद का सर्वाधिक असर कर्नाटक और तमिलनाडु की आम जनता पर पड़ रहा है, जो शान्तिपूर्वक रहना चाहती है। कावेरी विवाद के कारण चेन्नई से आने वाले अंडे और कर्नाटक से जाने वाली प्याज दोनों के व्यापार पर प्रभाव पड़ रहा है। जिसका सर्वाधिक असर किसान और छोटे व्यापारियों पर पड़ रहा है। सम्मेलन में कावेरी विवाद प्रमुख चर्चा का विषय रहा।

सम्मेलन के अन्तिम सत्र में सामूहिक रूप से तय किया गया कि नदी विवादों के समाधान हेतु जल जन जोड़ो अभियान 'जल समाधान खोज यात्राओं' का आयोजन करेगा। दक्षिणी नदियाँ और हिमालयन नदियों के पुनर्जीवन का काम जनसहयोग से करना होगा। कावेरी नदी विवाद को मिटाने हेतु प्रक्रिया शुरू की जाएगी। जिसके लिये कावेरी परिवार का निर्माण किया जाएगा, साथ ही छोटी नदियों पर त्वरित रूप से कार्य प्रारम्भ किया जाएगा, ताकि देश सूखे और अकाल से मुक्त हो सके तथा किसान और आम जनता खुशहाल हो सके। सम्मेलन में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया गया कि केन्द्र सरकार नदियों के पुनर्जीवन की नीति व कानून बनाए, अन्यथा की स्थिति में 23 नवम्बर को दिल्ली कूच किया जाएगा, इसके पूर्व केन्द्र व राज्य सरकारों से संवाद भी किया जाएगा। आवश्यकता पड़ने पर जल जन जोड़ो अभियान, जल सत्याग्रह का आयोजन करेगा।

जल जन जोड़ो अभियान के राष्ट्रीय संयोजक संजय सिंह ने बताया कि इस दो दिवसीय सम्मेलन में देश के बीस राज्यों के एक सैकड़ा से अधिक नदियों के संरक्षण पर कार्य करने वाले तीन सौ से अधिक सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। इनमें गंगा, यमुना, चम्बल, केन, धसान, पहूज, बेतवा, हिंडन, कोसी, सरस्वती, आमी, गंडक, घाघरा, सरयू, साबी, गोमती, झेलम, चन्द्रावल, लखेरी जैसी नदियाँ प्रमुख हैं।

सम्मेलन के प्रथम दिवस जल एवं पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित तीन सत्रों का आयोजन किया गया। जिसमें देश भर के विभिन्न राज्यों से आये तीन सौ से अधिक जलयोद्धाओं की सहभागिता रही। जिसमें कर्नाटक से विश्वनाथ पाटिल और भाग्या, ओड़िशा से विष्णुप्रिया, बुन्देलखण्ड से संध्या नामदेव, उत्तराखण्ड से सुनीला भण्डारी, एकता परिषद से मनीष राजपूत, महाराष्ट्र से सुनील जोशी के अलावा कृष्णपाल, विनीता यादव, संध्या, डॉ मुहम्मद नईम, मेजर हिमांशु, डॉ विनोद मिश्रा, आरएस साहूकार, विनोद वोधनकर, नरेन्द्र चुग्य, बस्वाराज पाटिल, रण सिंह परमार, निशिकान्त पगारे, रमेश शर्मा, जिल कैरी, पीटर अलकजेंडर, पंकज कुमार, इब्राहिम खान, बृजेश विजयवर्गीय, अप्पा साहिब, सुनीला सिंह आदि उपस्थित रहे। सम्मेलन के प्रारम्भ में बुन्देलखण्ड के जलकर्मियों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किये।
 

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.पत्रकारिता को बदलाव का माध्यम मानने वाले प्रदीप सिंह एक दशक से दिल्ली में रहकर पत्रकारिता और लेखन से जुड़े हैं। दिल्ली से प्रकाशित होने वाले कई अखबारों और पत्रिकाओं से जुड़कर काम किया।

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