प्राकृतिक खेती - कहानी मेरे अनुभवों की

Submitted by Hindi on Thu, 11/09/2017 - 14:00

 

यदि आप अपने बच्चों को प्यार करते हैं। उनको सुखी देखना चाहते हैं तो ये अपराध कैसे कर सकते हैं कि उनके लिये पीने का स्वच्छ पानी, स्वच्छ हवा, स्वच्छ खाद्यान्न भी छोड़कर नहीं जावें। ज्यादा उपज लेने के चक्कर में केमिकलों का उपयोग करके आखिर हम क्या कर रहे हैं? मेरे हिसाब से हमलोग तो स्वार्थी की श्रेणी में भी आने लायक नहीं हैं क्योंकि स्वार्थी इन्सान तो अपना स्व + अर्थ सिद्ध करता है।

मैं विज्ञान का छात्र हूँ, कैंसर विशेषज्ञ हूँ। मैं आपसे प्राकृतिक खेती के अपने दो साल के अनुभवों को साझा करना चाहता हूँ। अगस्त-सितम्बर 2015 में मैंने अपने 5 एकड़ के खेत में कुछ करने का निश्चय किया तो नियति द्वारा निर्धारित चीजें अपने आप होती चली गईं। मैनें 2.5 एकड़ में 13 फुट के अन्तर पर आम के 630 पेड़ लगाए। इसके अलावा 1.5 एकड़ में नींबू के 175 पेड़ लगाए। मैं जिन-जिन लोगों से मिला उन सबने अपने-अपने तरीके से मेरी मदद की। मेरे सामने दो विकल्प आए- केमिकल फार्मिंग या ऑर्गेनिक फार्मिंग। मैंने ऑर्गेनिक फार्मिंग को चुना। मैंने चार एकड़ में फलदार वृक्ष लगाए और बचे लगभग एक एकड़ में घर में खाने लायक अनाज पैदा करने का सोचा। चूँकि मेरा झुकाव प्रकृति तथा धर्म की ओर है इसलिये कहना चाहूँगा कि ईश्वर की असीम कृपा ने केवल एक साल के अन्दर ही मेरे लिये प्राकृतिक खेती का रास्ता प्रशस्त कर दिया।

पिछले 15 सालों से मेरा चना, बेसन, मटर, फूलगोभी का खाना छूटा हुआ था। उस समय मैं केवल इतना ही समझता था कि इनको खाने से पेट खराब होता है। सन 2016 में पता चला कि इन सब फसलों को उगाने में बहुत बड़ी मात्रा में केमिकल और कीटनाशक का उपयोग होता है। पर जब अपने खेत की बिना केमिकल और कीटनाशक वाली मटर, चना, उड़द, मूँग और मसूर भरपूर खाई तो पेट बिल्कुल भी खराब नहीं हुआ। इस बात से सारी पिक्चर बिल्कुल स्पष्ट हो गई। खेती में जहर का भोजन पर असर अनुभव हुआ। इस अनुभव से एक डॉक्टर के नाते में जान पाया कि आज के समाज में जो बीमारियाँ जैसे तनाव, मानसिक रोग, शुगर, ब्लड प्रेशर, कैंसर, असहज प्रतिस्पर्धा महामारी बन कर सामने हैं, उन सबका जनक कहीं न कहीं किसानी की पुरातन शैली से दूर जाना है। इसलिये मैनें जहर मुक्त प्राकृतिक खेती का रास्ता चुना। मेरा किसानी का अनुभव मात्र दो साल का है। अप लोग बुजुर्ग हैं। आपका लम्बा अनुभव है। मैं तो केवल अपने अनुभव के साथ अपनी समझ साझा कर रहा हूँ।

कुछ चीजें मेरे दिल दिमाग में बिल्कुल साफ हैं। उन बातों को मैं आपसे शेयर करना चाहूँगा। प्राकृतिक खेती या पुरातन खेती में हिंसा नहीं है, असहज प्रतिस्पर्धा नहीं है। उसकी नींव सहजीवन पर आधारित है। जैसे बिना जामन के दही नहीं जम सकता उसी तरह खेत में प्रकृति के नियमों के अनुसार पल रहे असंख्य अरबों-खरबों जीव, जन्तु, कीटाणु और फंगस को खेती सो दूर कर खेती नहीं की जा सकती। खेती में उन सबकी अपनी-अपनी भूमिका है। जैसे यदि दीमक नहीं होगी तो सूखी लकड़ी, मृत टिस्यु इत्यादि को खाद में कौन बदलेगा? सब एक दूसरे के सानिध्य में पल बढ़ रहे हैं। एक दूसरे को मदद कर रहे हैं। जैसे-जैसे समझ बढ़ी तब लगा कि यह विषय बहुत बड़ा है। कई बार यह मेरे लिये कठिन हो जाता है। मैं गेहूँ के देशी बीज और हाइब्रिड बीज की तुलना आपके सामने रख रहा हूँ-

 

देशी बीज

हाइब्रिड बीज

गर्मी और ठंडी सहने की क्षमता - अच्छी

गर्मी और ठंडी सहने की क्षमता - अपेक्षाकृत कम

रोग - कम होते हैं, जल्दी ठीक हो जाते हैं।

रोग - अधिक होते हैं, दवाई लगती है।

सहजीवन - बहुत अच्छा

सहजीवन - अपेक्षाकृत कम

विपरीत मौसम सहन करने की क्षमता - बेहतर

विपरीत मौसम सहन करने की क्षमता - बहुत कम

उत्पादकता - अपेक्षाकृत कम

उत्पादकता - अपेक्षाकृत अधिक

देखरेख का खर्च - बहुत कम

देखरेख का खर्च - अपेक्षाकृत अधिक

कहाँ विकसित - गाँव में

कहाँ विकसित - प्रयोगशाला में

 

प्राकृतिक खेती की लागत का निम्न मूलभूत आधार है -

- खुद का देशी बीज- लागत शून्य
- गोबर एवं गोमूत्र आधारित खेती - लागत शून्य
- मिश्रित फसल/सहजीवन - कोई न कोई फसल आने से घाटा बहुत कम
- पानी/बिजली का खर्च - 75 प्रतिशत कम
- जमीन में तीन से चार इंच तक नमी का संरक्षण

आज भारतवर्ष में अधिकांश किसान दो से पाँच एकड़ जमीन पर खेती करते हैं। मेरे अनुसार, पुरातन खेती ही इनके जीवन-यापन के लिये बेहतर विकल्प है। हर परिवार में दो से तीन व्यक्ति होते हैं। ये लोग मिलकर, बिना किसी बाहरी मदद के, पूरी खेती संभाल सकते हैं।

खेत में जो भी कचरा उत्पन्न होता है, प्रृकति के हिसाब से जरूरी होता है। प्रकृति में कोई भी चीज फालतू नहीं है। यदि आप प्रकृति के नियम के अन्तर्गत अपने खेत में पनपी गाजर घास को देखें तो पता चलता है कि उसका व्यापक होना केवल इस तथ्य को सूचित करता है कि खेत की जमीन में बहुत अधिक जहर है। वह, उस जहर को अपनी जड़ों के माध्यम से खींचती है। खेत को जहर मुक्त करती है। इसी कारण गाजर घास को छूने से बहुत से लोगों को एलर्जी हो जाती है। प्राकृतिक खेती के अन्तर्गत जब किसी किसी खेत में हम कीटनाशक या नींदनाशक नहीं डालते तो वहाँ रहने वाले अरबों-खरबों जीव-जन्तु, फंगस, देशी केंचुए इत्यादि सजीव हो उठते हैं। उनका आपसी तालमेल प्रारम्भ हो जाता है। उस तालमेल के कारण पौधों को प्रकृति द्वारा निर्धारित जो भी पोषक तत्व चाहिये, उपलब्ध होने लगते हैं। कीटनाशक के अभाव में देशी केंचुये सक्रिय हो जाते हैं और भू-माता में अपनी विष्टा डालकर उसे पोषक तत्वों से परिपूर्ण कर देते हैं। वे मिट्टी खाने के लिये धरती में लगभग 15 फुट तक ऊपर नीचे यात्रा करते हैं। हर बार अपना यात्रा मार्ग बदलते हैं तथा अपनी विष्ठा ऊपर छोड़ते हैं। इस प्रक्रिया द्वारा वे मिट्टी को भुरभुरी कर देते हैं। इस कारण जो भी पानी बरसता है वह धरती में उतर जाता है। भूजल स्तर को ऊपर उठाता है।

आज से लगभग 40 साल पहले जब हम किसी नलकूप का पानी पीते थे तो वह बेहद स्वादिष्ट लगता था। आप यदि कान्हा, पेंच या सतपुड़ा के जंगलों में पानी पीयेंगे तो वह बेहद स्वादिष्ट लगेगा क्योंकि वह पानी अभी भी प्रकृति के अधीन है। बिना लोभी मानवी हस्तक्षेप के।

मैंने अपने खेत में केवल जीवामृत जो गोबर, गोमूत्र, दलहन के बेसन तथा गुड़ को सड़ाकर बनाया जाता है, का ही स्प्रे कराया है। परिणामस्वरूप पूरे खेत में जो अरबों-खरबों जीव-जन्तु, वायरस, फंगस इत्यादि प्राकृतिक रूप में रहते थे, को वापिस स्थापित कर दिया है। इस कारण मेरे खेत में प्रकृति का नियम फिर से संचालित होने लगा है। मैंने अपने खेत में 10-12 आयुर्वेदिक तथा औषधीय वृक्षों, पौधों तथा झाड़ियों की पत्तियों को 45 दिन सड़ाकर दसपर्षी अर्क तैयार किया है। इस अर्क का है 15 दिन बाद खेत में छिड़काव किया जाता ह। इससे इल्ली तथा कीड़े नियंत्रण में रहते हैं।

यदि आप अपने बच्चों को प्यार करते हैं। उनको सुखी देखना चाहते हैं तो ये अपराध कैसे कर सकते हैं कि उनके लिये पीने का स्वच्छ पानी, स्वच्छ हवा, स्वच्छ खाद्यान्न भी छोड़कर नहीं जावें। ज्यादा उपज लेने के चक्कर में केमिकलों का उपयोग करके आखिर हम क्या कर रहे हैं? मेरे हिसाब से हमलोग तो स्वार्थी की श्रेणी में भी आने लायक नहीं हैं क्योंकि स्वार्थी इन्सान तो अपना स्व + अर्थ सिद्ध करता है। वह बच्चों के लिये जहर, तनाव, बीमारियाँ, बिगड़ता पर्यावरण नहीं। मेरे हिसाब से यह बेहोश लोगों की श्रेणी है।

इस सीमित समय में अपने दो साल के प्रयासों को आप तक पहुँचाने का प्रयास किया है। पर यदि आप मेरे अनुभवों को आधुनिक खेती की तुला पर तौलने के स्थान पर खेती की दोनों पद्धतियों की तुला पर तौलेंगे तो मेरे साथ न्याय होगा।

अन्त में, आपसे मेरी विनम्र विनती है, जो भी सज्ज्न मेरे प्रयासों को देखना और समझना चाहते हैं, वे सीधे मेरे खेत पर भी जा सकते हैं जो भी जानकारी लेना चाहें, मेरे खेत पर काम कर रहे लोगों से या कमठिया गाँव के किसानों से ले सकते हैं। इस जानकारी को प्राप्त करने या पद्धति को समझने के लिये मेरी आवश्यकता नहीं है।
 

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