झीनी-झीनी हो रही धरती की चदरिया

Submitted by UrbanWater on Mon, 09/12/2016 - 16:09
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अन्तरराष्ट्रीय ओजोन संरक्षण दिवस, 16 सितम्बर पर विशेष


झीनी झीनी बीनी चदरिया ॥
काहे कै ताना काहे कै भरनी,
कौन तार से बीनी चदरिया ॥ 1॥
इडा पिङ्गला ताना भरनी,
सुखमन तार से बीनी चदरिया ॥ 2॥
आठ कँवल दल चरखा डोलै,
पाँच तत्त्व गुन तीनी चदरिया ॥ 3॥
साँ को सियत मास दस लागे,
ठोंक ठोंक कै बीनी चदरिया ॥ 4॥
सो चादर सुर नर मुनि ओढी,
ओढि कै मैली कीनी चदरिया ॥ 5॥
दास कबीर जतन करि ओढी,
ज्यों कीं त्यों धर दीनी चदरिया ॥ 6॥


ओजोनओजोनआज से करीब 600 साल पहले मशहूर कवि कबीर की ये पंक्तियाँ बताती हैं कि झीनी-झीनी चदरिया का उपयोग हमें कितने जतन से सहेज कर करने और फिर ज्यों-की-त्यों रख देने की जरूरत होती है। कबीर के इस पद में चदरिया का आशय भले ही किसी दूसरे सन्दर्भ के लिये दिया गया है, लेकिन इसका एक सन्दर्भ आज के समाज से भी जुड़ता है। हमारी धरती के आसपास की झीनी-झीनी चदरिया भी इन दिनों खतरे में है और इस पर खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है। दिन-ब-दिन हर दिन...

जी, बात है धरती पर फैली उस अदृश्य झीनी चदरिया यानी ओजोन परत की। ओजोन परत हजारों सालों से हमें सूरज की गर्मी और उसके बुरे प्रभावों से बचाती रही है। हमारे पूर्वजों ने इसकी अहमियत को समझा और इसे सदियों तक उसी तरह बने रहने दिया, इसी कारण हमें आज तक इसका फायदा मिलता रहा है।

कबीर जिसे ज्यों-की-त्यों रख देने की बात करते हैं, वह हमारे पूर्वजों ने किया भी। वे पर्यावरण के हित को सर्वोपरी रखते थे और प्रकृति से उनका एक आत्मीय रिश्ता रहा करता था। हालांकि उन्हें शायद ओजोन परत जैसी जानकारियाँ नहीं होंगी पर प्रकृति से जुड़े रहने की वजह से उन्होंने हमेशा प्रकृति के नजदीक का जीवन जिया। लेकिन नए जीवनशैली और पर्यावरणीय नासमझियों के चलते हमने इस सदियों पुरानी ओजोन परत को भी खत्म करना शुरू कर दिया है।

हमें एक बात अच्छी तरह से समझनी होगी कि यह हमारे जीवन के लिये बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। यहाँ तक कि यदि ओजोन परत में छेद बढ़ता गया तो इस धरती पर जीवन मुश्किल में पड़ सकता है।

आँकड़े बताते हैं कि धरती और सूरज के बीच की दूरी करीब 1.5 मिलियन किमी (93 लाख मील) है। इतनी दूरी पर होने के बावजूद सूरज से पूरी दुनिया को जीवन के लिये जरूरी उजाला और ऊर्जा मिलती है। सूरज के बिना जीवन की कल्पना बेमानी है।

इसे आग का गोला कहा जाता है पर यही आग का गोला हमारी जिन्दगी के लिये बेशकीमती वरदान है। शायद आपको यह अचरज भरा लगे लेकिन सूरज पर उसका तापमान 5,500 डिग्री सेंटीग्रेड होता है।

आप कल्पना कीजिए कहाँ हम 35-40 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान में हाय गर्मी-उफ गर्मी करते रहते हैं वहीं इतने भयावह तापमान में जीवन कैसे सम्भव है। हमारे पर्यावरण के लिये ओजोन परत इसलिये जरूरी है कि सूरज से लगातार निकलने वाली पराबैंगनी किरणों के प्रभाव से यही हमें बचाती है। इससे सूरज की किरणें छन-छन कर हम तक पहुँचती हैं। ये पराबैंगनी किरणें जीवन के लिये मुसीबत का सबब बन सकती हैं।

सूरज से निकलती पराबैंगनी किरणें मानव स्वास्थ्य के लिये बहुत घातक होती हैं। इनके दुष्प्रभाव से पूरी दुनिया तबाह हो सकती है। यहाँ तक कि इनकी मात्रा तयशुदा से थोड़ी भी ज्यादा बढ़ जाये तो इससे मानव स्वास्थ्य पर खतरा बढ़ जाता है। इससे कई तरह की गम्भीर बीमारियाँ होती हैं। जैसे स्किन कैंसर, प्रतिरोधी तंत्र में विकार या आँखों में परेशानी आदि।

गर्मियों के दिनों में जैसे त्वचा पर सनबर्न होता है, उसी तरह पराबैंगनी किरणों के सम्पर्क में आने पर त्वचा झुलस सकती है। आँखों की रेटिना के लिये यह इतनी नुकसानदायक होती है कि इससे व्यक्ति अन्धा तक हो सकता है।

अस्थमा और क्रोनिक ब्रोंकाइटिस जैसी साँस की बीमारियाँ बढ़ सकती है, इसमें फेफड़े कमजोर होने और साँस लेने में परेशानियों के बढ़ने से शरीर का प्रतिरोधी तंत्र कमजोर हो जाता है। वह अन्य बीमारियों के संक्रमण का शिकार हो जाता है। इससे छाती में दर्द, जलन, खाँसी, गले में संक्रमण सहित दिल की बीमारियाँ भी सम्भव है।

ओजोन एक तरह की प्राकृतिक गैस है, जो नीले रंग की होती है। यह ऑक्सीजन के तीन परमाणुओं से मिलाकर बनती है। यह मोटी परत के रूप में धरती और आसमान के बीच एक चादर या छतरी के रूप में स्थित होती है। इसकी सघनता या डेंसिटी करीब 10 पीपीएम होती है। इस चादर की मोटाई करीब 300 डोबसन यूनिट (करीब तीन किमी) होती है।


पेड़, पहाड़, जंगल और नदियों जैसी विरासत को हम बर्बाद करते जा रहे हैं। खेती के तौर-तरीके भी हमने पूरी तरह बदल दिये हैं। कीटनाशकों और रासायनिक खादों का वातावरण और जलस्रोतों पर क्या असर पड़ेगा, इसकी परवाह किये बिना इनका उपयोग कर रहे हैं। इससे ओजोन परत को भी नुकसान हो रहा है और हमारी प्राकृतिक विरासत को भी। हम जमीन के पानी का मनमाना दोहन करते चले जा रहे हैं। नदियों, तालाबों और अन्य जलस्रोतों को लगातार प्रदूषित करते जा रहे हैं।

हमारे वायुमण्डल के कुल पाँच भागों में से दो परतों में ओजोन मौजूद होती है। धरती के ऊपर फैली ट्रोपोस्फेयर में करीब 9 फीसदी हिस्सा ओजोन का होता है। जबकि स्ट्रेट्रोस्फेयर में यह करीब 91 फीसदी मौजूद होती है। यह परत धरती से 10 से 50 किमी ऊपर वायुमंडल में होती है और इसमें भी 35 किमी तक ओजोन भरी रहती है। लेकिन धरती पर बढ़ती रासायनिक गैसों की वजह से ओजोन परत को खतरा है।

ये रासायनिक गैसें इस ओजोन परत में छेद करते हुए और ऊपर की ओर बढ़ती है। इनमें सबसे घातक है क्लोरोफ्लोरो कार्बन। यह ओजोन परत को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है और उसके परमाणुओं को तोड़ता है। फ्रीज और एयरकंडीशनर में यह निकलता है। इन दिनों इनका खासतौर पर एसी का धड़ल्ले से उपयोग होता है। इसके अलावा खेतों में कीटनाशक के रूप में इस्तेमाल होने वाला मेथाइल ब्रोमाइड भी ओजोन परत को नुकसान पहुँचाता है।

बीते सालों में हुए अध्ययन बताते हैं कि धरती के ऊपर हजारों सालों से मौजूद ओजोन परत अब तेजी से खत्म होती जा रही है। अंटार्कटिका ध्रुव के थोड़ा ऊपर ओजोन परत में एक बड़ा छेद भी वैज्ञानिकों ने बताया है। नासा के उपग्रहीय सर्वेक्षण के आँकड़े बताते हैं कि 13 सितम्बर 2007 को 97 लाख वर्ग मील के बराबर इस छेद को आँका गया है, यह आकार अमेरिका के क्षेत्रफल के बराबर है। 12 सितम्बर 08 को इसका आकार और बढ़ गया। इस तरह यह लगातार बढ़ता ही जा रहा है। इसका सबसे ज्यादा नुकसान भी अमेरिका को ही उठाना पड़ा क्योंकि यह छिद्र उसी के समीप हुआ है। अब इसके लगातार बढ़ते रहने से कई अन्य महाद्वीपों पर भी खतरा मँडराने लगा है। वैज्ञानिकों को यह भी चिन्ता सता रही है कि इसका प्रभाव यदि बढ़कर अंटार्कटिका पर पड़ा तो इसकी वजह से वहाँ के ग्लेशियर पिघलकर बहने लगेंगे। इससे कई देशों में जल तबाही मच सकती है।

बीते सालों में वैज्ञानिकों ने साफ चेतावनी दी है कि हर साल पाँच फीसदी के करीब ओजोन परत घटती जा रही है। उन्होंने पराबैंगनी किरणों के दुष्प्रभाव और ग्लोबल वार्मिंग सहित तमाम आसन्न खतरों से आगाह किया है और बताया है कि इससे आने वाले सालों में बड़ा संकट खड़ा हो सकता है। लेकिन इन सबके बावजूद हमने अपने जीवन जीने के ढंग या जीवनशैली में कोई बदलाव नहीं किया है, बल्कि बीते सालों में इन चेतावनियों के बावजूद क्लोरोफ्लोरो कार्बन के इस्तेमाल को कम नहीं किया है।

ओजोन परत के लिये खतरा होने के बाद भी एसी हमारे लिये स्टेटस सिंबल बनता जा रहा है। जरूरत नहीं होने पर भी कई जगह इसका इस्तेमाल किया जाता है। केवल घरों में ही नहीं ऑफिस, होटल, रेस्टोरेंट, मीटिंग हाल, शादी समारोह, ट्रेन, बस, कारों सब जगह हमें एसी की दरकार होती है, जबकि हमारे देश में सिर्फ कुछ महीने ही गर्मी के होते हैं। हम हवा के लिये प्राकृतिक तौर-तरीकों की जगह मशीनों पर निर्भर हो गए हैं।

हम प्रकृति से लगातार कटते जा रहे हैं और प्राकृतिक तौर-तरीकों की जगह नई तरह की शैली में जी रहे हैं। पेड़, पहाड़, जंगल और नदियों जैसी विरासत को हम बर्बाद करते जा रहे हैं। खेती के तौर-तरीके भी हमने पूरी तरह बदल दिये हैं। कीटनाशकों और रासायनिक खादों का वातावरण और जलस्रोतों पर क्या असर पड़ेगा, इसकी परवाह किये बिना इनका उपयोग कर रहे हैं। इससे ओजोन परत को भी नुकसान हो रहा है और हमारी प्राकृतिक विरासत को भी। हम जमीन के पानी का मनमाना दोहन करते चले जा रहे हैं। नदियों, तालाबों और अन्य जलस्रोतों को लगातार प्रदूषित करते जा रहे हैं।

हमें जरूरत है कबीर की 600 साल पहले कही गई बात को नए सन्दर्भों में समझने और उस पर अमल करने की। यदि अब भी नहीं चेते तो सदियों की हमारी यह झीनी-झीनी चदरिया तार-तार हो जाएगी और तब हमारे पास सिवा पश्चाताप के कुछ नहीं बचेगा।

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मनीष वैद्यमनीष वैद्यमनीष वैद्य जमीनी स्तर पर काम करते हुए बीते बीस सालों से लगातार पानी और पर्यावरण सहित जन सरोकारों के मुद्दे पर शिद्दत से लिखते–छपते रहे हैं। देश के प्रमुख अखबारों से छोटी-बड़ी पत्रिकाओं तक उन्होंने अब तक करीब साढ़े तीन सौ से ज़्यादा आलेख लिखे हैं। वे नव भारत तथा देशबन्धु के प्रथम पृष्ठ के लिये मुद्दों पर आधारित अ

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