यक्ष प्रश्न बनता पंचेश्वर बाँध

Submitted by RuralWater on Mon, 02/26/2018 - 18:45

काली नदीकाली नदीनेपाल और भारत की सीमा पर बनने जा रहा विशालकाय पंचेश्वर बाँध को लेकर लोगों का विरोध थम नहीं रहा है। पर्यावरण आकलन समिति नेे भी कई दौर में जनसुनवाइयों को टाला है।

क्षेत्र के जागरूक नागरिक कहानीकार और पयार्वरण चिन्तक अनिल कार्की सहित भीम रावत, हरेन्द्र कुमार अवस्थी एवं महाकाली लोक संगठन के सुरेन्द्र आर्य, विप्लव भटट्, सुमित महर, अंजनी कुमारी, हरिवल्लभ भटट्, प्रकाश भंडारी का मानना है कि पंचेश्वर बाँध के कैचमेंट क्षेत्र और इस विशालकाय बाँध को सन्तुलित करने वाली रुपाली गाड बाँध भी अब सन्देह के घेरे में है। क्योंकि इन अन्य छोटे-छोटे बाँधों का अब तक कोई अध्ययन ही नहीं हुआ है। उनका यह भी कहना है कि पंचेश्वर बाँध देश के कुछ प्रभावशाली राजनीतिक हस्तियों के नाक का सवाल हो सकता है पर क्या कुछ ‘नाकों’ को जिन्दा रखने के लिये हजारों-लाखों ‘नाकों’ की बलिवेदी इस बाँध से चढ़ाई जाएगी?

बस यही सवाल पंचेश्वर बाँध को लेकर खड़े हैं। उनका यह भी कहना है कि पंचेश्वर बाँध यानि काली नदी के बहते पानी को यदि इस्तेमाल करने की बात है तो इस हेतु और कई तकनीकियाँ भी हो सकती हैं। जिससे इस पानी को ऊर्जा के रूप में विकसित किया जा सकता है। उधर बाँध से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि फिर से अध्ययन होगा। जनसुनवाई व अन्य गम्भीर मुद्दों पर ‘मौनघाटी’ का फिर से दौरा किया जाएगा और प्रभावितों की समस्या का समाधान किया जाएगा।

उत्तराखण्ड में महाकाली नदी पर 315 मीटर ऊँचा पंचेश्वर व 95 मीटर ऊँचा रुपाली बाँध के निर्माण को लेकर नेपाल और अपने देश की सरकारें उत्साहित है। पर पंचेश्वर बहुउद्देशीय परियोजना की जनसुनवाइयों के आधार पर ‘नदी घाटी एवं जलविद्युत परियोजनाओं’ पर बनी पर्यावरण आकलन समिति ने पिछली जनसुनवाई में एक घंटे से भी कम समय में दोनों बाँधों में डूब रही हजारों हेक्टेयर जमीन और 40 हजार से ज्यादा परिवारों के भाग्य का फैसला करके दिखाया।

फिलवक्त समिति ने पर्यावरण स्वीकृति के मामलों को अगली बैठक तक तो टाल देने का ऐलान कर दिया मगर इसी बीच परियोजना क्षेत्र का दौरा करने के लिये सात सदस्यों की एक कमेटी को बिना प्रभावितों को विश्वास में लिये बाँध क्षेत्र के अध्ययन के लिये भेजा है। हास्यस्पद यह है कि इस कमेटी के अध्यक्ष शरद कुमार जैन हैं जो पर्यावरण आकलन समिति के भी अध्यक्ष हैं। इसके साथ-साथ सदस्य सचिव व निदेशक डॉ. एस. करकेटा भी कमेटी में मुख्य भूमिका में शामिल हैं।

आकलन लगाया जा रहा है कि बिना प्रभावितों की यह समिति अपनी रिपोर्ट कितनी सही साबित करने वाली है, जो स्थानीय स्तर पर चर्चाओं का विषय बनी हुई है। इसलिये कि इस कमेटी को अनेक जनसंगठनों और प्रभावितों ने अपनी आपत्तियाँ भी भेजीं, पर उनकी आपत्तियाँ इस समिति ने रद्दी की टोकरी में डाल दी।

स्थानीय लोगों का कहना है कि जनसुनवाइयों में जितनी धांधली की गई है उन सबको छुपा दिया गया है। क्योंकि कमेटी के मिनट्स बताते हैं कि परियोजना में कोई रुकावट ही नहीं है अतएव लोगों ने अपनी आपत्तियों को जानने के लिये परियोजना प्रयोक्ता से फिर सवाल पूछे हैं, जिनका उत्तर आना बाकी है।

यह दिलचस्प है कि पंचेश्वर बाँध और उसके सहायक बाँध को लेकर काली घाटी में ऊहापोह की स्थिति जारी है। दरअसल काली नदी की सहायक रूपाली नदी पर भी बाँध प्रस्तावित है। रुपाली गाड बाँध प्रस्तावित स्थान से दो किलोमीटर नीचे की ओर स्थानान्तरित हो रहा है। इसलिये अध्ययन की सिफारिश समिति ने की है। साथ ही नेपाल के हिस्से वाली पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट भी माँगी गई है।

समिति ने जल संसाधन मंत्रालय की अक्टूबर 2016 वाली अधिसूचना पर सफाई माँगी है, जिसमें वृहद गंगा नदी घाटी में बड़े निर्माणों पर रोक लगाई गई है। विचारणीय यह है कि ईएसी की बैठक में संगठनों ने मात्र पाँच मिनट मिलने का समय माँगा था। जो नहीं दिया गया है। जबकि प्रभावित गाँवों में स्थिति यह है कि लोगों को आज भी बाँध सम्बन्धी कागजातों की जानकारी नहीं है।

यहाँ तक की पुनर्वास के लिये बनाई गई नीति भी गाँवों में नहीं दी गई। और-तो-और खुली बैठकों के नाम पर जल्दी-जल्दी लोगों से अनापत्ति भी ली गई। प्रभावितों ने जो भी सुझाव दिये वह पूरी तरह परियोजना के बारे में गैर जानकारी दर्शाते हैं। हालात ऐसे बने हैं कि लोग सिर्फ अपनी बात कहना चाहते हैं पर बाँध से जुड़ी सरकारी संस्थाएँ सुनने को तैयार नहीं हैं।

पंचेश्वर बाँध को लेकर लोगों के सामने यक्ष प्रश्न इसलिये खड़े हैं कि इस विशालकाय जलविद्युत परियोजना से विस्थापितों के लिये जमीन कहाँ से मिलेगी? अभी टिहरी के ही विस्थापित जमीन के लिये पंक्तिबद्ध खड़े हैं। ग्लोबल वार्मिंग जैसे खतरे भी हमारे सामने मुस्तैद हैं। यही नहीं ऊर्जा मंत्रालय देश में बिजली की अधिकता बता रहा है। इधर उत्तराखण्ड सरकार ने पलायन रोकने के लिये पलायन आयोग बना दिया है।

इन योजनाओं से पलायन होगा उस पर आयोग की संवैधानिक मर्यादाएँ होनी चाहिए यह भी स्पष्ट नहीं है। बाँध-ऊर्जा परियोजनाओं के कारण राज्य में 40 हजार परिवारों के विस्थापन की तैयारी है। इसके अलावा 350 गाँव भूस्खलन प्रभावित होने के कारण पुनर्वास की राह ताक रहे हैं। भारत नेपाल के सांस्कृतिक, सामाजिक सम्बन्धों का प्रतीक झूलाघाट-जौलजीबी जैसे बाजार पंचेश्वर बाँध के कारण जल समाधि लेंगे। ऐसे तमाम प्रश्न खड़े हैं जिसके जवाब जनता माँग रही है। क्योंकि सामाजिक आकलन रिपोर्ट में ऐसे सवालों को जगह ही नहीं मिली है।

ऐसी परिस्थिति में प्रसिद्ध पर्यावरणविद व नदी कार्यकर्ताओं डा. रवि चोपड़ा, दुनू रॉय, डॉ. भरत झुनझुनवाला, मनोज मिश्रा, हिमांशु ठक्कर जैसे लगभग 45 विशेषज्ञों ने पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सचिव व पर्यावरण आकलन समिति के अध्यक्ष एवं सदस्य सचिव तथा सभी सदस्यों को पत्र लिखकर ऐसे विशालकाय बाँधों की पर्यावरणीय जनसुनवाई पर अपनी आपत्ति दर्ज की है। उन्होंने बताया कि जनसुनवाई की सूचना प्रभावितों को 14 सितम्बर 2006 की अधिसूचना के अनुसार नहीं मिली। यहाँ काली नदी घाटी में 134 गाँव बहुत सुदूर क्षेत्र के हैं जहाँ ज्यादातर गाँवों में अखबार तक नहीं पहुँचता है। उन्होंने पत्र के मार्फत कहा कि यह एक अन्तरराष्ट्रीय स्तर की परियोजना की शुरुआत के लिये बहुत ही गलत सन्देश है।

परियोजना का उद्देश्य कुछ भी हो, फायदा नुकसान कुछ भी हो, किन्तु प्रभावितों को परियोजना की अक्षरशः जानकारी योजना के आरम्भ होने से पूर्व ही बता देनी चाहिए। उन्होंने पत्र द्वारा माँग की है कि ईएसी पुनर्विचार करे। जन-सुनवाई के दौरान अथवा परियोजना की पूरी, सही, जानकारी प्रभावितों को उनकी और राष्ट्र भाषा हिन्दी में उपलब्ध करवाई जाये।

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