बरैला चौर में सफलतापूर्वक पेन कल्चर - बिहार में एक अनुभव

Submitted by UrbanWater on Fri, 07/07/2017 - 12:48
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केन्द्रीय अन्तर्स्थलीय मात्स्यिकी अनुसन्धान संस्थान

प्रौद्योगिकी प्रसार की सम्भावनाओं को ध्यान में रखते हुए दुलौर के मछुआरों को समूह बनाने के लिये प्रेरित किया गया ताकि उन्हें आवश्यक सामग्री दी जा सके। उसके बाद ज्ञान सशक्तिकरण के लिये दस मछुआरों के एक समूह को केन्द्रीय अनुसन्धान संस्थान (सीफरी), बैरकपुर में एन.ए.आई.पी. के अन्तर्गत प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण के बाद मछुआरों ने बरेला चौर में पेन कल्चर को अपनाने में रुचि जताई।

बिहार के लगभग 2 लाख हेक्टेयर से अधिक बाढ़कृत आर्द्र क्षेत्र मत्स्य पालन बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। ये कम गहराई वाले और जलीय पौधों से भरे हुए चौर क्षेत्र बंजर भूमि माने जाते हैं जिन्हें मत्स्य प्रबन्धन की वैज्ञानिक तकनीकों द्वारा बहुमूल्य भूमि में परिवर्तित किया जा सकता है। ऐसे ही एक क्षेत्र, बरेला चौर, पातेपुर ब्लॉक, वैशाली, उत्तर बिहार में स्थित है। चौर के आसपास मुख्य रूप से मुछआरों (सहनी) का निवास स्थान है जो कि मछली पकड़कर अपना जीवनयापन करते हैं। बाढ़, जलीय पौधे तथा चौर भूमि पर बहुस्वामित्व बरेला चौर में मत्स्य उत्पादन की मुख्य बाधाएँ हैं।

एन.ए.आई.पी.-3 परियोजना के अन्तर्गत सकरी चौर, जन्दाहा कलस्टर में मत्स्य पालन प्रौद्योगिकी (पेन कल्चर) द्वारा स्थानीय लोगों की आजीविका सुधारने का कार्य किया जा रहा था। पड़ोसी गाँव दुलौर के मछुआरे सकरी चौर में किये गए कार्य-कलापों से प्रेरित हुए। वे चाहते थे कि इस तरह का काम उनके लिये बरेला चौर में भी किया जाये। प्रौद्योगिकी प्रसार की सम्भावनाओं को ध्यान में रखते हुए दुलौर के मछुआरों को समूह बनाने के लिये प्रेरित किया गया ताकि उन्हें आवश्यक सामग्री दी जा सके। उसके बाद ज्ञान सशक्तिकरण के लिये दस मछुआरों के एक समूह को केन्द्रीय अनुसन्धान संस्थान (सीफरी), बैरकपुर में एन.ए.आई.पी. के अन्तर्गत प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण के बाद मछुआरों ने बरेला चौर में पेन कल्चर को अपनाने में रुचि जताई।

सीफरी द्वारा समूह को जिम्मेदार बनाने और उनकी सहभागिता को जागरूक करने के लिये पेन कल्चर की पूरी प्रक्रिया का 50 प्रतिशत खर्च मछुआरों से लिया गया तथा 50 प्रतिशत एन.ए.आई.पी. द्वारा दिया गया। 1.0 हेक्टेयर क्षेत्र को घेरने के लिये 330 मी. एच.डी.पी.ई. से बना जाल दिया गया जबकि चौथी ओर हल्का ऊँचा बाँध था। समूह को पेन की स्थापना तथा प्रबन्धन के लिये तकनीकी सहायता प्रदान की गई। चौर की पारिस्थितिकी को ध्यान में रखते हुए कतला, रोहू, नयनी, ग्रास कार्प तथा कामन कार्प की 400 कि.ग्रा. (11660 सं.) अंगुलिकाएँ पेन में संचयित की गईं। मछलियों को कोई भी पूरक आहार नहीं दिया गया।

पाँच महीनों में 61.49 प्रतिशत उत्तरजीविता के साथ 2.77 टन (7170 सं.) मछलियाँ निकाली गई। पेन कल्चर द्वारा मछुआरों को रु. 2,13,330/- (21,333 रु./समूह सदस्य) की अतिरिक्त शुद्ध आय प्राप्त हुई जो कि लगभग 106 श्रम दिवस के बराबर हैं। पेन कल्चर के लिये लाभ खर्च अनुपात 2.33 प्राप्त किया गया। सफलता और लाभ प्राप्त करने के बाद समूह ने पेन क्षेत्र को अगले सीजन के लिये 2 हेक्टेयर तथा उससे अगले सीजन के लिये 4 हेक्टेयर बढ़ा दिया । दुलौर गाँव के समूह द्वारा बरेला चौर में पेन कल्चर को अपनाना बिहार के चौर क्षेत्रों में मत्स्य विकास के लिये एक मॉडल बन गया है।

 

चौर क्षेत्र में मात्स्यिकी द्वारा जीविकोत्थान के अवसर - जनवरी, 2014


(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

आजीविका उन्नति के लिये मत्स्य-पालन प्रौद्योगिकी

2

चौर में मत्स्य प्रबन्धन

3

पेन में मत्स्य-पालन द्वारा उत्पादकता में वृद्धि

4

बरैला चौर में सफलतापूर्वक पेन कल्चर बिहार में एक अनुभव

5

चौर संसाधनों में पिंजरा पद्धति द्वारा मत्स्य पालन से उत्पातकता में वृद्धि

6

एकीकृत समन्वित मछली पालन

7

बिहार में टिकाऊ और स्थाई चौर मात्स्यिकी के लिये समूह दृष्टिकोण

8

विपरीत परिस्थितीयों में चौर क्षेत्र के पानी का समुचित उपयोग

 

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