भौतिकवादी युग में बिहार के तालाब हो रहे विलुप्त

Submitted by RuralWater on Fri, 02/03/2017 - 11:49
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जिन पेयजल स्रोतों ने हमारी पहचान बनाई, उसे हम यूँ बर्बाद होने को नहीं छोड़ सकते। अन्यथा आने वाली पीढ़ी को जलाशय, झील, नदियाँ व तालाबों को सिर्फ तस्वीरों में ही देखने को नसीब हो सकेगी। इन तालाबों का नष्ट होना इस बात का भी प्रतीक है कि हम अपने जल संस्कारों के प्रति कितने उदासीन हो गए हैं। तालाबों को धरोहर मानने वाली हमारी संस्कृति कहाँ चली गई।

बिहार की राजधानी पटना में एक तालाब ऐसा था जो ठीक गाँधी मैदान के आकार की तरह था। इस तालाब का नाम गुणसागर तालाब के नाम से जाना जाने वाला तालाब महज दस कठ्ठा में सिमट गया है। लोगों ने इसे भर कर मकान बना लिये। ऐसा प्रतीत होता है कि अति शीघ्र यह तालाब पटना के भौगोलिक मानचित्र से विलुप्त होने वाला है।

यह सिर्फ गुणसगार तालाब का ही नहीं हाल है बल्कि पटना शहर में ऐसे लगभग 30 तालाब की भी स्थिति कमोबेश यही है। कही घुमने के लिये पार्क तो, कहीं ऊँची इमारतें बन गई हैं। शहर में आज की तारीख में लगभग चार तालाब ऐसे हैं जिनकी स्थिति ठीक-ठाक है। यदि हम बिहार के शहरों तालाबों की बारे में बता करें तो इसकी स्थिति और खराब है।

पटना से 157 किलोमीटर दूर दरभंगा शहर में महज 25 वर्ष पहले लगभग 213 तालाब थे जो आज घट कर लगभग 84 तालाब रह गए हैं। गया टाउन में सरकारी तालाबों की संख्या 1063 तथा प्राइवेट तालाबों की संख्या 331 थी। वह अब आधी रह गई है। वहीं मुजफ्फरपुर जिला का सिकंदरपुरम अपने अस्तित्व को बचाने के लिये कोशिश कर रहा है।

बिहार सरकार के आँकड़ों के मुताबिक पूरे राज्य में लगभग 67 हजार से अधिक निजी तालाब महज बीस साल के समय में विलुप्त हो गए। सरकारी तालाबों की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है। उनके चारों तरफ घर बन गए हैं और अक्सर नगर पालिका या नगर निगम के लोग उसमें कचरा डम्प कराते रहतें हैं।

दरभंगा शहर का दिग्घी तालाब जो काफी बडा है लगातार इस तरह के अतिक्रमण का आये दिन शिकार हो रहा है। उसके साथ ही गंगा सागर, हराही और मिर्जा खां तालाब जैसे झीलनुमा बड़े तालाबों को भरे जाने की साजिश चलती रहती है।

बिहार सरकार के मत्स्य निदेशालय के आँकाड़ों के मुताबिक लगभग 20 वर्ष पहले बिहार में सरकारी तालाबों की संख्या ढाई लाख व प्राइवेट तालाब हुआ करते थे, लेकिन आज के समय में उनकी संख्या लगभग 98,401 पर आ गई है। यह जग जाहिर सी बात है तालाबों को भरे जाने की प्रक्रिया ग्रामीण क्षेत्रों में भी कम नहीं हैं। बढ़ती आबादी को फैलाने की कोशिश में लोग तालाबों को भर दे रहे हैं।

इन तालाबों को कब्जे से मुक्त बनाने का काम इसलिये भी ढंग से नहीं हो रहा क्योंकि बिहार में तालाबों की सुरक्षा, साफ-सफाई और कब्जा मुक्ति का काम शहरी क्षेत्रों में नगर विकास, ग्रामीण क्षेत्रों में ग्रामीण कार्य विभाग, मत्स्य पालन। अधिक क्षेत्रों में पशु व मत्स्य पालन और अन्य क्षेत्रों में भूमि राजस्व सुधार विभाग ही देखता है चारों विभागों कें बीच बेहतर समन्वय तालमेल न होने के कारण तालाब या तो लुप्त हो रहें हैं या अतिक्रमित होते जा रहें हैं।

यही हाल गया में पितामहेश्वर तालाब व घाट दोनों की स्थिति खराब है। पितृपक्ष मेला शुरू होने के समय ही प्रशासन की ओर से ध्यान दिया जाता है। बावजूद स्थिति ठीक नहीं है। शहर के पितामहेश्वर मोहल्ले में तालाब परिसर में उत्तर मानस पिंडवेदी है। पितृपक्ष पखवारे के दूसरे दिन यहाँ कर्मकांड का विधान है। पिंडदान के बाद तीर्थयात्री यहाँ स्थित पितामहेश्वर तालाब में तर्पण करते हैं। यहाँ सबसे ज्यादा मारवाड़ी समाज के तीर्थयात्री आते हैं। तालाब परिसर में बैठकर पिंडदान भी करतें हैं।

तालाब परिसर में उत्तर मानस वेदी के अलावा प्रसिद्ध शीतला माई मन्दिर है। यहाँ तीन चापाकल लगे हैं। तीन में दो खराब हैं। यहाँ सबसे ज्यादा पिंडदानियों को पानी के लिये परेशानी होती है। तालाब का पानी हरा है। ऐसे में गन्दे पानी का कर्मकांड में उपयोग करने तीर्थयात्री परहेज करते हैं।

चापाकल खराब होने की स्थिति में बाहर से पानी लाते हैं। मेले के समय बोरिंग से तालाब में पानी भरा जा जाता है। इस कारण वाटर लेवल ठीक रहता है। यहाँ मेला के समय तालाब की सफाई तो होती है वह भी सिर्फ नाम की।

बिहार के कई जिले तालाबों को लेकर अलग कहावत को लेकर पूरी दुनिया में चर्चित हैं जैसे दरभंगा को पग-पग पोखर, माछ-मखान के नाम से विश्व भर में जाना जाता है किन्तु आज की स्थिति में लगभग 9,113 सरकारी और प्राइवेट तालाब बचे हैं। दरभंगा शहर पर्यावरण असन्तुलन से इन दिनों कराह रहा है।

पैसे वाले लोगों ने शहरी एरिया के तालाबों पर कब्जा जमाना शुरू कर दिया है। वहाँ के लोगों का कहना है कि 1964 के जिला गजेटियर के मुताबिक दरभंगा और लेहरियासराय शहर में 300 से अधिक तालाब थे। पिछले 10-15 सालों से दर्जनों तालाबों को मिट्टी से भराई कर बेच दिया गया है। इस समय दरभंगा शहर में 10 से अधिक तालाबों को मिट्टी से भरा जा रहा है और तालाब की जमीन पर अवैध निर्माण किया जा रहा है। लोगों का कहना है कि जिस शहर में कमीश्नर , आइजी, डीआइजी, डीएम , एसपी जैसे वरिष्ठ पदाधिकारी स्थायी तौर पर रह रहे हैं।

दरभंगा के शहरी इलाके के तालाब इस प्रकार हैं

1. दिग्घी
2. हराही
3. गंगा सागर
4. गामी पोखर , शाहगंज बेता
5. बाबा सागर दास पोखर
6. मिल्लत कॉलेज के पास उत्तर का पोखर
7. कबाड़ाघाट स्थित पोखर
8. पीएचइडी के दक्षिण का पोखर, खानकाह समर कंदिया पोखर
9. शाह -सुपन मोहल्ले का डबड़ा
10. पुरानी मुंसिफ स्थित पोखर
11. मिल्लत कॉलेज के पश्चिम
12. मिर्जा खां तालाब
13. कुवंर सिंह कॉलेज के उत्तर का नाशी जलाशय
14. डीएमसीएच आउटडोर के पीछे का तालाब

दरभंगा के ग्रामीण इलाके तालाब इस प्रकार हैं
1. क्योटी प्रखण्ड में तेलिया पोखर
2. बाढ़ पोखर
3. सिंहवाड़ा प्रखंड में होलिया पोखर
4. नेस्ता पोखर
5. घौड़दौर पोखर
6. रजोखर पोखर
7. मनीगाछी प्रखंड में
8. दिग्घी पोखर

यदि मधुबनी की बात करें तो सबसे अधिक लगभग 10,755 सरकारी और प्राइवेट तालाब हैं।

बिहार में लगभग कुल 93296.20 हेक्टेयर में सरकारी और प्राइवेट तालाब हैं, हालांकि इस स्थिति में सरकारी तालाब आगे हैं। हालांकि इन तालाबों के विलुप्त होने का खामियाजा पूरा समाज भुगत रहा है। मगर सबसे अधिक क्षति मछुआरा समुदाय झेल रहा है। बिहार राज्य मत्स्यजीवी सहकारी संघ का कहना है कि लगभग पचास प्रतिशत से अधिक सरकारी तालाब अतिक्रमण हो चुके हैं।

यदि तालाब को नहीं बचाया गया तो आने वाले दिनों में जल संकट इलाकों को जूझना पड़ेगा। साथ ही खेत को पानी भी नहीं मिल पाएगा। गर्मियों के दिनों में दरभंगा के शहरी इलाकों में पानी का संकट गहरा जाता है। बोरिंग से पानी निकलना दूभर हो जाता है। क्योंकि पानी का जलस्तर घट जाता है। ऐसी स्थिति में तालाबों को बचाना जरूरी है। हमें वे सब काम करने होंगे जो अब तक हमने नहीं किये मसलन पानी बचाकर पेड़ लगाना, प्रदूषण कम करना, बारिश के पानी का संचयन करना ताजा हालातों में बेहद जरूरी हो गया है।

बिहार का अधिकांश भाग आज जलसंकट से जूझ रहा है। हमें सर्वप्रथम इसके संरक्षण व शुद्धता के उपाय के लिये चिन्तित होना होगा। बाजारवाद व भौतिकतावाद से हटकर जीवन को बेहतर करने की सोच विकसित करनी होगी। तभी पेयजल स्रोत बचाए जा सकते हैं। लोगों को विकास का सही अर्थ समझने की आवश्यकता है।

जिन पेयजल स्रोतों ने हमारी पहचान बनाई, उसे हम यूँ बर्बाद होने को नहीं छोड़ सकते। अन्यथा आने वाली पीढ़ी को जलाशय, झील, नदियाँ व तालाबों को सिर्फ तस्वीरों में ही देखने को नसीब हो सकेगी। इन तालाबों का नष्ट होना इस बात का भी प्रतीक है कि हम अपने जल संस्कारों के प्रति कितने उदासीन हो गए हैं। तालाबों को धरोहर मानने वाली हमारी संस्कृति कहाँ चली गई।

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