खाद्य शृंखला बचाने से बचेगा वन्य जीवन

Submitted by RuralWater on Sat, 06/04/2016 - 15:31

विश्व पर्यावरण दिवस, 05 जून 2016 पर विशेष


.वायुमण्डल, जलमण्डल और अश्ममण्डल- इन तीन के बिना किसी भी ग्रह पर जीवन सम्भव नहीं होता। ये तीनों मण्डल जहाँ मिलते हैं, उसे ही बायोस्फियर यानी जैवमण्डल कहते हैं। इस मिलन क्षेत्र में ही जीवन सम्भव माना गया है। इस सम्भव जीवन को आवृत कर रक्षा करने वाले आवरण का नाम ही तो पर्यावरण है।

जीवन रक्षा आवरण पर ही प्रहार होने लगे.... तो जीवन पुष्ट कैसे रह सकेगा? हर पर्यावरण दिवस की चेतावनी और और समाधान तलाशने योग्यमूल प्रश्न यही है, किन्तु पर्यावरण दिवस, 2016 की चिन्ता खास है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने ‘वन्य जीवन के अवैध व्यापार के खिलाफ जंग’ को पर्यावरण दिवस, 2016 का लक्ष्य बिन्दु बनाया है।

चिन्ताजनक सच


सच है कि हमने पिछले 40 सालों में प्रकृति के एक-तिहाई दोस्त खो दिये हैं। एशियाई बाघों की संख्या में 70 फीसदी गिरावट आई है। मीठे पानी पर रहने वाले पशु व पक्षी भी 70 फीसदी तक घटे हैं। भागलपुर की गंगा में डालफिन रिजर्व बना है; फिर भी डालफिन के अस्तित्व पर ही खतरे मँडराने की खबरें मँडरा रही हैं। उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में कई प्रजातियों की संख्या 60 फीसदी तक घट गई है। थार रेगिस्तान के आठ किलोमीटर प्रतिवर्ष की रफ्तार से बढ़ने के आँकड़े ने भी भारत की जैव विविधता कम नहीं घटाई।

ताजा खबर है कि गिद्धों की आबादी चार करोड़ से घटकर चार लाख पर पहुँच गई है। बढ़ रहे हैं, तो सिर्फ वीरानी के निशान के रूप में जाने जाने वाले कबूतर। तीन जून को चण्डीगढ़ में गिद्धों की आबादी बढ़ाने को लेकर एक बड़ा कार्यक्रम किया गया। पर्यावरण मंत्री ने कहा कि प्रजनन बढ़ाकर गिद्ध बढ़ाएँगे। अच्छा है कि वन्य जीवों का अवैध व्यापार रुके; कुदरत के सबसे सर्वश्रेष्ठ सफाई कर्मचारी गिद्ध का प्रजनन बढ़े; किन्तु क्या वन्य जीवन की संख्या सन्तुलन बिगड़ने का कारण अवैध व्यापार और प्रजनन का घटना मात्र है?

वनवासियों की वन निष्ठा पर उठी उँगली का सच


यहाँ यह प्रश्न इसलिये है चूँकि वन सम्पदा का अवैध शिकार व व्यापार रोकने के नाम पर पिछले कई वर्षों में वनवासियों को वनों से निकाल बाहर किया गया है; जबकि कोई एक प्रमाणिक शोध ऐसा नहीं है कि जो यह कहता हो कि भारत के वनवासियों के कारण वन नष्ट हुए हैं। उलटे वन संरक्षण के प्रति वनवासी नहीं, वन विभाग की निष्ठा पर उंगली अक्सर उठती रही है।

सच यह है कि वनवासियों के वनों में बने रहने से पानी और मवेशियों के रहते पीने और भोजन का जो इन्तजाम वन्य जीवों को हमेशा उपलब्ध था; वह छिना है। वन्य जीवों के वनों सेे बाहर आने की मजबूरी बढ़ी है। जुताई घटने से झरने घटे हैं। ‘इको टूरिज्म’ के नाम पर बाहरी का दखल बढ़ा है। वनवासियों के वनों से बाहर निकालने के बाद से उत्तराखण्ड के जंगलों में आग व तबाही बढ़ी है। वन के समवर्ती सूची में आने के बाद से यह प्रक्रिया ज्यादा तेज हुई है।

वन्य जीव खाद्य शृंखला बचाना जरूरी


हमें समझना होगा कि वन्य जीवन पर वनवासी से ज्यादा, वन्य खाद्य शृंखला टूटने का खतरा है। वनों के प्राकृतिक व फलदार की जगह, इमारती हो जाने के चलन ने अवैध व्यापार का खतरा ज्यादा बढ़ाया है। अवैध व्यापार रोकना है, तो वनवासी नहीं, वन विभाग को सुधारें। वनों को प्राकृतिक रहने दें। यदि गिद्धों की घटोत्तरी रोकनी है, तो कृत्रिम रसायन का उपयोग घटाएँ।

हम कैसे भूल जाते हैं कि गिद्ध हों या गोरैया, इनकी घटती संख्या का मुख्य कारण वे कृत्रिम कीटनाशक व रसायन हैं, जिनका हम खेती और खाद्य प्रसंस्करण में धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रहे हैं? इनके कारण खात्मे का आइडिया ‘हिट’ हो गया है। नूडल्स है तो सीसा यानी लैडयुक्त, ब्रैड है तो ब्रोमेटयुक्त, नमक है तो आयोडाइज्ड, तेल है तो रिफाइंड, जूस हैं तो प्रिजर्वेटिवयुक्त। और तो और खुले में मिलने वाली फल और सब्जियाँ भी कृत्रिम रसायनयुक्त ही मिल रही हैं। क्या इस रसायनयुक्ति से मुक्ति के बगैर गिद्ध-गोरैया का संरक्षण सम्भव है?

कीटनाशक और बढ़ते शहरीकरण से बढ़ा खतरा


गोरैया पौधे और मिट्टी में मौजूद जिन कीड़ों को खिलाकर अपने नन्हीं बेटी को पालती थी, उन्हें तो कीटनाशक खा गए। गिद्ध, जिन मृत जीवों को खाकर जीवन पाता था, वे सब रसायन खा-खाकर इतने जहरीले हो गए हैं कि उन्हे खाने से अब गिद्ध मृत्यु को प्राप्त होता है। तीन रुपए कीमत वाले साधारण नमक को 20 रुपए में बेचने के लिये धरती के जन-जीवन के साथ खिलवाड़ हो रहा है।

जब तक खुले में शौच की मजबूरी थी, गाँव के करीब जंगल और झाड़ को समृद्ध रखने की मजबूरी भी थी। जहाँ-जहाँ शौच की नई कमराबन्द सुविधा आई, वहाँ-वहाँ झाड़ व जंगलों में निपटने की रही-सही जरूरत खत्म हुई। इसका वन्य जीव सुरक्षा कनेक्शन है। निगाह डालिए कि हमने वहाँ-वहाँ झाड़-जंगलों को ही निपटाना शुरू कर दिया है। नेवला, साही, गोह के झुरमुट झाड़ू लगाकर साफ कर दिये हैं। भेड़-बकरियों के चारागाह हम चर गए हैं। हंसों को हमने कौवा बना दिया है। ज्यादा दूध लेने के लिये भैसों को ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन लगाया जा रहा है। भारत का तेल के कोल्हू, गुड़ की कड़ाहियाँ बन्द कराने के बाद अब डॉक्टर कह रहे हैं कि रिफाइंड से साधारण सरसों-तिल तेल अच्छा; चीनी से गुड़ अच्छा। क्या बाजार के लालच पर लगाम लगाए बगैर गिद्ध-गौरैया बच पाएँगे? यह सब कुछ बाजार का किया धरा है और उपभोक्ता का भी।

बाजार को सुधारना होगा। उपभोक्ता को अपनी पसन्द और प्राथमिकताएँ बदलनी होगी। चौथे उपाय के तौर पर हमें शहरीकरण की सीमा बनानी होगी। गाँवों के रहन-सहन को शहरीकृत होगा कितना अच्छा है और कितना बुरा; यह सोचना होगा।

हमने छीने उनके ठिकाने


गौर कीजिए कि जब तक खुले में शौच की मजबूरी थी, गाँव के करीब जंगल और झाड़ को समृद्ध रखने की मजबूरी भी थी। जहाँ-जहाँ शौच की नई कमराबन्द सुविधा आई, वहाँ-वहाँ झाड़ व जंगलों में निपटने की रही-सही जरूरत खत्म हुई। इसका वन्य जीव सुरक्षा कनेक्शन है। निगाह डालिए कि हमने वहाँ-वहाँ झाड़-जंगलों को ही निपटाना शुरू कर दिया है।

नेवला, साही, गोह के झुरमुट झाड़ू लगाकर साफ कर दिये हैं। भेड़-बकरियों के चारागाह हम चर गए हैं। हंसों को हमने कौवा बना दिया है। नीलगायों के ठिकानों को ठिकाने लगा दिया है। भारत के 77 फीसदी जल ढाँचे हमने गायब कर दिये हैं। नतीजा यह है कि झाड़-जंगलों के घोषित सफाई कर्मचारी सियार अपनी ड्यूटी निपटाने की बजाय खुद ही निपट रहे हैं। इधर बैसाख-जेठ में तालाबों के चटकते धब्बे और छोटी स्थानीय नदियों की सूखी लकीरें इन्हें डराने लगी हैं और उधर इंसान की हाँक व खेतों में खड़े इंसानी पुतले।

हमने ही उनसे उनके ठिकाने छीने। अब हम ही उन पर पत्थर फेंकते हैं, कहीं-कहीं तो गोलियाँ भी। वन्य जीव संरक्षण कानून आड़े न आये, तो हम उन्हें दिन-दहाड़े ही खा जाएँ। बाघों का भोजन हम ही चबा जाएँ। आखिर वे हमारे खेतों में न आएँ, तो जाएँ, तो जाएँ कहाँ? वन्य खाद्य शृंखला तो टूटेगी-ही-टूटेगी। यह हम इंसान ही तो हैं, जिन्होंने ऐसे तमाम हालात पैदा करने शुरू कर दिये हैं कि यह दुनिया.. दुनिया के दोस्तों के लिये ही ‘नो एंट्री जोन’ में तब्दील हो जाये। लिहाजा, अब इंसानों की गिनती, कुदरत की दूसरी कृतियों के दुश्मनों में होने लगी है। ऐसे में जैव विविधता बचे, तो बचे कैसे? आप ही बताइए।

समझ और संवेदना हैं उपाय


सरिस्का के पिछले आँकड़े और नई कोशिशें गवाह हैं कि न अभ्यारण्य इसका उपाय है और न सिर्फ कोई कानून। संवेदना और समझ ही वन्य जीवन व सम्पदा का संरक्षण सम्भव है। हमें अपनी सोच बदलनी होगी। सोचना होगा कि प्रकृति की कोई रचना निष्प्रयोजन नहीं है।

हर रचना के नष्ट होने का मतलब है कि कुदरत की गाड़ी से एक पेच या पार्ट हटा देना। सोचना होगा कि कुदरत के सारे संसाधन सिर्फ-और-सिर्फ इंसानों के लिये नहीं हैं; दूसरे जीव और वनस्पतियों का भी उन पर बराबर हक है। हमें प्रकृति व उसकी दूसरी कृतियों को उनका हक ही लौटाना होगा। इस हक को लौटाने के लिये उपभोग घटाना होगा; सादगी को शान बनाना होगा; विकास का मॉडल बदलना होगा। क्या हम बदलेंगेे?

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