नदी किनारे बागली प्यासा, अब जुटे प्रायश्चित में

Submitted by RuralWater on Fri, 08/26/2016 - 15:39
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. शहरों में जब कभी पानी की कमी होती है तो आमतौर पर टैंकर या ट्यूबवेल जैसे अस्थायी संसाधनों पर ही नजर जाती है। लेकिन एक शहर ऐसा भी है, जहाँ के बाशिंदों और नगर पंचायत ने मिलकर कुछ ऐसे परम्परागत जल संरक्षण के प्रयास किये हैं कि उन्हें अगले साल गर्मियों के दिनों में पानी की किल्लत नहीं झेलनी पड़ेगी।

बीते साल यहाँ के लोगों ने जबरदस्त जल संकट झेला है। नल-जल योजना के दम तोड़ देने से यहाँ 4 से 6 किमी दूर खेतों के कुओं से उलीचकर नगर पंचायत ने टैंकरों से पानी बाँटा है। लोग आधी-आधी रात तक जाग कर पानी का इन्तजाम करते रहते थे। पानी की कमी से कुछ लोग तो अपने रिश्तेदारों के यहाँ जाने को मजबूर हो गए थे। लेकिन इस बारिश में यहाँ के लोगों ने अपनी गलती का अहसास करते हुए पानी बचाने की कई तकनीकें शुरू की हैं।

जन सहयोग और कुछ संस्थाओं की मदद से अब ये काम पूरे होने की स्थिति में हैं। इस बरसात में अब तक सैकड़ों गैलन बरसाती पानी को इन्होंने रोककर जमीन की रगों तक पहुँचाया है। इससे यहाँ की नगर पंचायत को करीब 10 लाख रुपए का फायदा होगा। अब तक हर साल करीब दस लाख रुपए की राशि टैंकर और अन्य अस्थायी संसाधनों पर नगर पंचायत को खर्च करना पड़ रहा था।

इन्दौर–बैतूल राष्ट्रीय राजमार्ग पर इन्दौर से करीब 60 किमी दूर चापड़ा के पास बसा है देवास जिले का बागली नगर। करीब 12 हजार की आबादी वाले बागली से मात्र 2 किमी दूर बरझाई की पहाड़ियों से कालीसिंध नदी का उद्गम होता है और बड़ी बात है कि इस पूरे नगर के आसपास से बहते हुए कालीसिंध आगे बढ़ती है। यही कालीसिंध नदी आगे मध्य प्रदेश के बड़े हिस्से में शाजापुर, राजगढ़ जिले से होती हुई राजस्थान में चम्बल नदी में मिलती है। बागली के आसपास घने जंगल होने से नदी में बरसात के दिनों में अच्छा–खासा पानी इकट्ठा होता है।

इन जंगलों में बहुतायत में मिलने वाले बाघों के कारण ही कभी इसका नाम बाघली (बाघ स्थली) और बाद में बागली हुआ। बागली रियासत के पूर्व राजा छतरसिंह के अनुसार सन 1536 में राजस्थान के नागौर से ठाकुर गोकुलदास अपने पाँच भाइयों के साथ यहाँ आये और लूटपाट करने वाले गरासियों को हराकर यहाँ चम्पावत राजपरिवार ने शासन आरम्भ किया। तब से 4 दिसम्बर 1952 तक करीब आठ शासकों ने यहाँ राज किया।

आज से करीब सवा सौ साल पहले बागली रियासत के तत्कालीन राजाओं ने पानी का मोल समझते हुए नगर से लगी कालीसिंध नदी के किनारों पर सुन्दर घाट बनवाए थे। वरिष्ठ अभिभाषक राजेंद्र प्रसाद शिवहरे बताते हैं कि उस जमाने में नदी के पानी को रोकने के लिये पत्थर के एरण व ईंटों को चूने से जोड़कर छोटा बाँध (स्टापडैम) जैसा बनाया था। जो आज भी मौजूद है और इसके शिलालेख पर रणजीत बन्ध (सन 1906) लिखा हुआ है।

इस बाँध में पानी भरा होने से यहाँ रियासत के दौरान खाली मटके पानी में छोड़े जाते थे और फिर तट से बन्दूकों के निशानेबाज इन पर निशाना साधते थे। यह चांदामारी दूर-दूर तक प्रसिद्ध थी और आसपास से लोग देखने आते थे। बुजुर्ग मदनलाल भास्कर बताते हैं कि इस बाँध की वजह से गर्मियों तक नदी में साफ पानी हुआ करता था। नगर के लोग नहाने और कपड़े धोने जैसे कामों में इसका उपयोग करते थे।

नदी में पानी होने से आसपास के कुओं-कुण्डियों का जलस्तर भी बना रहता था। वे बताते हैं कि बीते 80 सालों में उन्होंने कभी यहाँ पानी की किल्लत के बारे में सुना तक नहीं था लेकिन बीते 20-25 सालों में, जबसे स्थानीय लोगों ने नदी का निरादर करना शुरू किया और नदी के पानी की जगह नल-जल योजना से घर-घर पानी पहुँचने लगा, तब से ही पानी का संकट शुरू हो गया। नल-जल योजना 10-15 सालों में ही दम तोड़ने लगी।

इधर के दिनों में जब नल-जल योजना से लोगों को घर बैठे पर्याप्त पानी मिलने लगा तो किसी ने भी नदी और उसके पानी की चिन्ता नहीं पाली। इसी दौरान नदी की बाढ़ के तेज बहाव के साथ रणजीत बन्ध का एक हिस्सा और कुछ घाट भी बह गए।

इधर बारिश में तो नदी पानी से लबालब रहती पर ठंड शुरू होते ही धीरे-धीरे पानी कम होने लगता और ठंड के आधी होते-होते दिसम्बर तक नदी सूख जाती। उधर कुछ लोगों ने नदी के तट पर अतिक्रमण कर लिये। इससे उसका प्रवाह क्षेत्र भी कम होने लगा। कुल मिलाकर लोगों ने नदी को भुला दिया तो नदी ने भी लोगों को पानी से मोहताज कर दिया।

वैसे तो बीते पाँच सालों से हर साल गर्मियों के दौरान बागली के लोगों को पीने के पानी के संकट का सामना करना पड़ रहा था लेकिन इस साल तो यहाँ के लोगों ने अभूतपूर्व जल संकट का सामना किया। अलसुबह से खाली बर्तनों के साथ लोगों की पानी की तलाश शुरू हो जाती। पानी के लिये लोग आपस में झगड़ने लगे।

मजदूर पेशा लोगों की दिक्कत बढ़ गई कि वे पानी का इन्तजाम करें या पेट के लिये मजदूरी। पानी मिले तो पेट खाली और मजदूरी करने जाएँ तो पानी नहीं। नगर पंचायत भी इन्तजाम करते-करते थक गई। खेतों के कुओं से 4 से 6 किमी दूर टैंकरों से पानी लाना पड़ता। उधर धरती का पानी भी पाताल में समा गया। लगातार ट्यूबवेल खनन की वजह से यहाँ का जलस्तर 350-400 से बढ़कर 500-600 फीट तक नीचे उतर गया।

मन्दिर की छत से पानी का निकास कुएँ मेंऐसी हाहाकार मची तो लोगों ने पानी पर गम्भीरता से सोचना शुरू किया। पत्रकार गगन शिवहरे बताते हैं कि बागली का जल संकट हमारी लापरवाही का ही नतीजा है। यहाँ के समाज ने नदी और उसके तंत्र की जिस तरह से अवहेलना की है, अब हम घड़े-घड़े पानी को मोहताज हैं। हमने धरती से पानी तो उलीचा पर बदले में बारिश का पानी धरती को नहीं दे पाये।

इस तरह की सोच ने लोगों को सोचने पर मजबूर किया और इसी कुहासे से राय बनी कि अब हम सब मिलकर अपनी गलतियों का प्रायश्चित करेंगे। बातों ही बातों में तय हुआ कि नगर के दर्जन भर कुएँ-कुण्डियों की सफाई कर इन्हें बरसाती पानी से लबालब करेंगे। बीते दस-पन्द्रह सालों से अब तक उपेक्षा का शिकार होने से ये कुएँ-कुण्डियाँ कचरे और मलबे के ढेर में तब्दील हो गई थीं।

नगर पंचायत के अध्यक्ष अमोल राठौर बताते हैं कि नदी का काम बड़ा है पर फिलहाल हमने 12 कुएँ-कुण्डियों को रिचार्ज करने का काम हाथ में लिया है। इसमें कुछ संस्थाओं और लोगों का सहयोग भी मिल रहा है। हमने बारिश से पहले ही इन कुएँ-कुण्डियों की बड़े स्तर पर साफ-सफाई करवाई। हमने कुओं को उनके आसपास की बड़ी छतों की आउटलेट से जोड़ा है। इससे बारिश का पानी सीधे कुएँ-कुण्डियों में पहुँच रहा है। अब तक की बारिश में ये कुएँ-कुण्डियाँ आधे से ज्यादा भर चुके हैं।

फिलहाल चापड़ा मार्ग के मुख्य कुएँ, राधाकृष्ण मन्दिर की कुण्डी, गीता भवन के पास का कुआँ, मस्जिद परिसर के कुएँ सहित अन्य कुएँ-कुण्डियों में इसे लगाया जा चुका है। प्राचीन शंकर मन्दिर तालाब की भी गाद और अतिक्रमण हटाकर इसे पुनर्जीवित किया गया है।

श्री राठौर बताते हैं कि नल-जल योजना संचालित करने वाले नदी के किनारे रियासतकालीन बडपाय कुएँ को भी गाद निकालकर करीब 17 फीट और गहरा कराया है। इन सबसे फायदा यह होगा कि अगली गर्मियों में हमें पानी के लिये दिक्कत नहीं होगी। अभी तीन महीने हमारा काम इसी पानी से चल जाएगा। इसके बाद हम रिजर्व पानी का उपयोग कर सकेंगे।

बीते साल हमने मस्जिद के पास की बोरिंग में रूफ वाटर हार्वेस्टिंग करवाया था। इसके अच्छे परिणामों को देखते हुए हमने अब इसे पूरे नगर में प्रारम्भ किया है। हमें उम्मीद है कि इस बार इन प्रयासों से नगर पंचायत के करीब दस लाख रुपए बचाए जा सकेंगे। यह प्रयोग सफल होने पर अगले चरण में नदी का पानी रोकने की कोशिश करेंगे।
 

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मनीष वैद्यमनीष वैद्यमनीष वैद्य जमीनी स्तर पर काम करते हुए बीते बीस सालों से लगातार पानी और पर्यावरण सहित जन सरोकारों के मुद्दे पर शिद्दत से लिखते–छपते रहे हैं। देश के प्रमुख अखबारों से छोटी-बड़ी पत्रिकाओं तक उन्होंने अब तक करीब साढ़े तीन सौ से ज़्यादा आलेख लिखे हैं। वे नव भारत तथा देशबन्धु के प्रथम पृष्ठ के लिये मुद्दों पर आधारित अ

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