बेकार जाता अधिकांश वर्षाजल

Submitted by RuralWater on Fri, 07/29/2016 - 11:57
Source
विज्ञान प्रगति, जुलाई 2016

.एक नवीन अनुसन्धान के अनुसार, पादप उतना जल प्रयोग नहीं करते जितना कि अब तक समझा जाता रहा है। अनुसन्धान से यह तथ्य भी सामने आया है कि वर्षाजल भूमि में पूर्व अनुमान की तुलना में बहुत अधिक गति से चलता है इस कारण पौधों के लिये अधिक जल लाभदायक नहीं होता। वर्षाजल का अधिकांश भाग बेकार चला जाता है।

विश्व में जितना जल वर्षा से गिरता है उसका 77 प्रतिशत समुद्र में तथा मात्र 23 प्रतिशत भूमि पर गिरता है। उपमहाद्वीपों पर गिरने वाले जल में से भी 25 प्रतिशत से अधिक जल बहकर समुद्र में पहुँच जाता है। भूमि पर गिरे जल का 99 प्रतिशत वर्षा से और मात्र एक प्रतिशत हिमपात के रूप में आता है। वाष्प बनकर हवा में मिलने वाले जल का 83 प्रतिशत समुद्र से तथा मात्र 17 प्रतिशत उपमहाद्वीप से प्राप्त होता है।

इस 17 प्रतिशत का अध्ययन हमारे लिये महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसका सम्बन्ध पौधों से है जो चींटी से लेकर हाथी तक का पेट भरते हैं। यही जल कृषि, मानवीय कार्यों तथा जल पारिस्थितिकी तंत्र आदि का आधार होता है। उपमहाद्वीप से वायुमण्डल में मिलने वाले जल का 64 प्रतिशत ही पत्तियों द्वारा वाष्पोत्सर्जन से आता है। पूर्व में यह मात्रा 80 प्रतिशत मानी जाती थी। 6 प्रतिशत जल भूमि की सतह से उड़कर वायु में मिलता है। 3 प्रतिशत झीलों व नदियों की सतह से वाष्प बनकर उड़ जाता है। शेष 27 प्रतिशत पौधों के ऊपर गिरता है और बाहर से ही वाष्प बनकर उड़ जाता है। पौधों के वास्तविक जीवन में इसकी कोई भूमिका नहीं होती।

इस अध्ययन की एक महत्त्वपूर्ण खोज यह है कि वर्षा जल का जो भाग भूमि में प्रवेश करता है उसका एक छोटा भाग ही पौधों के लिये उपयोगी होता है। यह ज्ञात हुआ है कि भूमि में प्रवेश करने वाले वर्षाजल का 38 प्रतिशत ही पौधों को उपलब्ध हो पाता है, शेष जल्दी से नीचे जाकर पौधों की पहुँच से बाहर हो जाता है।

भूमि में जल की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण होती है। जल ही पोषक पदार्थों, उर्वरकों, दूषित पदार्थों व पादपों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाता है। अनेक जैविक क्रियाओं में भाग लेता है। यदि तेजी से बहकर नदियों, झीलों या भूगर्भ में जाता है तो इसका सरल अर्थ यही है कि पौधों के जीवन में इस जल की भूमिका कम ष्टहोती है। स्प है कि तेजी से बहकर जाने वाले जल का, जलचक्र में अधिक महत्त्व नहीं है।

जन-पंचायत में जनता की बात को जल सत्याग्रह करने वाले 61 वर्षीय किशोर कोडवानी को भी मानना पड़ा। और इस तरह बीते आठ दिनों से चला आ रहा पीपल्याहाना तालाब का जल सत्याग्रह फिलहाल सशर्त खत्म हो गया है। इससे पहले शनिवार को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की घोषणा के बाद आन्दोलन में सकारात्मक बदलाव करते हुए जल सत्याग्रह को सत्याग्रह में तब्दील कर दिया गया था। मुख्यमंत्री के मौखिक आदेश को लेकर किशोर कोडवानी संशय में थे और सरकार के लिखित आदेश की माँग पर अड़े थे। आने वाले समय में होने वाले जलवायु परिवर्तन के विषय में कुछ करना है तो पौधों के लिये उपयोगी जल को ध्यान में रखकर ही कार्य करना होगा। जलविज्ञानी स्टीफन गुड का कहना है कि वाष्पोत्सर्जन के कारण वायुमण्डल में आने वाला जल ही, उत्पादक परिस्थिति की तंत्र के लिये महत्त्वपूर्ण है। इसी से निर्धारित होता है कि धरती पर कितनी पत्तियाँ क्रियाशील रहकर भोजन बना रही हैं।

वैश्विक ऊष्मायन से त्रस्त मानव के लिये वाष्पोत्सर्जन के रूप में उड़े जल की मात्रा इस दृष्टि से भी राहतदायक है कि वाष्पोत्सर्जन करने वाली पत्तियाँ प्रकाश-संश्लेषण भी करती हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो वाष्पोत्सर्जन का सीधा सम्बन्ध वायुमण्डल से कार्बन डाइऑक्साइड के भार को कम करने से है। इस अध्ययन से यह तथ्य भी सामने आया है कि जल का उपयोग करने में पौधे, पूर्व अनुमानों की तुलना में अधिक दक्ष होते हैं।

अनुसन्धान का आधार


इस अनुसन्धान हेतु आँकड़े दो स्रोतों से जुटाए गए हैं। अन्तरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के वैश्विक नेटवर्क के माध्यम से वर्ष 1950 से समस्थानिक वर्षा के आँकड़े प्राप्त किये गए। इसमें अन्तरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के 500 केन्द्रोें से वर्षाजल में हाइड्रोजन-2 अर्थात समस्थानिक ड्यूटीरियम की मात्रा की जानकारी प्राप्त की गई थी। दूसरे स्रोत, नासा के और उपग्रह में लगे ट्रोपोस्फीरिक इमिशन स्पेक्ट्रोमीटर से पृथ्वी की सतह के समीप के वायुमण्डल में उपस्थित जलवाष्प में ड्यूटीरियम की सान्द्रता के आँकड़े लिये गए।

अनुसन्धान के अनुसार, पौधों द्वारा छोड़े जल, नदी, बाँध आदि से उड़े जल को वायुमण्डल में अलग-अलग पहचाना जा सकता है। दोनों स्रोतों से आये पानी में सामान्य हाइड्रोजन परमाणुओं व ड्यूटीरियम हाइड्रोजन परमाणुओं के अनुपात में अन्तर होता है।

पादपों की सतह पर गिरे पानी तथा नदियों बाँधों या भूमि की सतह से उड़े जल में ड्यूटीरियम हाइड्रोजन परमाणुओं का अनुपात कम होते हैं। जबकि पादपों द्वारा वाष्पोत्सर्जन में छोड़ी गई जलवाष्प में ड्यूटीरियम हाइड्रोजन अधिक होते हैं। अनुसन्धान में समस्थानिकों को पहचान कर, भूमि व वायुमण्डल के मध्य होने वाले के आदान-प्रदान के कम्प्यूटर अनुकरण प्रयोग को हजारों बार दोहराया गया। इसी के आधार पर यह अनुमान लगाया गया है।

पौधों के लिये अधिक जल लाभदायक नहीं होताएक अन्य अनुसन्धान में यीन्टा पहाड़ियों से घिरी हेनरी झील क्षेत्र को चुना गया जहाँ जलचक्र सभी घटक एक साथ क्रियाशील थे। धन की व्यवस्था अमेरिका के रक्षा विभाग तथा वहाँ के राष्ट्रीय विज्ञान संस्थान द्वारा की गई। यह अध्ययन वर्षा, पौधे, मृदा, भूजल तथा अलवण जल की अन्तः क्रियाओं को समझने के लिये किया गया है। अनुसन्धान की रिपोर्ट साइंस पत्रिका में प्रकाशित हुई है।

सम्पर्क सूत्रः


श्री विष्णु प्रसाद चतुर्वेदी, पूर्व प्रधानाचार्य
2 तिलक नगर, पाली 306 406 (राजस्थान)

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