केन-बेतवा लिंक बुन्देलखण्ड को बाढ़-सुखाड़ में डुबोकर मारने का काम है- राजेन्द्र सिंह

Submitted by RuralWater on Mon, 08/29/2016 - 15:02
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अरुण तिवारी द्वारा जलपुरुष राजेन्द्र सिंह से बातचीत पर आधारित साक्षात्कार

राजेन्द्र सिंहराजेन्द्र सिंह सुना है कि पानी के मामले में उत्तर प्रदेश सरकार आजकल आपके मार्गदर्शन में काम रही है?
मेरा सहयोग तो सिर्फ तकनीकी सलाहकार के रूप में है। वह भी मैं अपनी मर्जी से जाता हूँ।

उत्तर प्रदेश सरकार अपने विज्ञापनों में आपके फोटो का इस्तेमाल कर रही है। ऐसा लगता है कि आप अखिलेश सरकार से काफी करीबी से जुड़े हुए हैं। पानी प्रबन्धन के मामले में क्या आप सरकार के कामों से सन्तुष्ट हैं?

कुछ काम अच्छे जरूर हुए हैं। लेकिन सरकार के प्लान ऐसे नहीं दिखते कि वे राज्य को बाढ़-सुखाड़ मुक्त बनाने को लेकर बनाए व चलाए जा रहे हों। बाढ़-सुखाड़ तब तक आते रहेंगे, जब तक कि आप पानी को ठीक से पकड़ने के काम नहीं करेंगे।

क्या अच्छे काम हुए हैं?
उत्तर प्रदेश सरकार ने महोबा में बिना किसी ठेकेदारी के 100 तालाबों के पुनर्जीवन का काम किया है। महोबा की चमरावल नदी और झाँसी की गांधारी नदी के पुनर्जीवन का काम भी शुरू कर दिया है। नदी के मोड़ों पर डोह यानी कुण्ड तथा नदी के बेसिन में तालाब, चेकडैम आदि बनाने का काम शुरू हो गया है।

उत्तर प्रदेश सरकार ने वाटर रिसोर्स ग्रुप नामक किसी आस्ट्रेलियाई विशेषज्ञ संस्था के साथ मिलकर हिण्डन नदी पुनर्जीवन की भी कोई योजना बनाई है?
हाँ, अभी हिण्डन किनारे के किसान, उद्योगपति और सामाजिक कार्यकर्ता मिलकर चेतना जगाने का काम कर रहे हैं। जानने की कोशिश कर रहे हैं कि हिण्डन पुनर्जीवन के लिये आपस में मिलकर क्या-क्या काम कर सकते हैं। नदी के दोनों तरफ के सभी शहरों और गाँवों में एक प्रदर्शनी लगाई जा रही है।

हमने सरकार से कहा है कि नदी को इसका हक कैसे मिले; इसके लिये काम हो। लोगों में भी इसकी समझ बने। सरकार कह रही है कि यह काम करेंगे। अब करेंगे कि नहीं; इसकी प्रतीक्षा है।

जब मालूम हो कि हिण्डन के शोषक, प्रदूषक व अतिक्रमणकर्ता कौन हैं, तो उन पर सीधी कार्रवाई करने की बजाय, प्रदर्शनी, डाक्युमेन्टेशन, नेटवर्किंग में जनता की गाढ़ी कमाई का धन बर्बाद करने को क्या आप जायज मानते हैं?
समाज में नदी की समझ, नदी पुनर्जीवन की तरफ बढ़ने का ही काम है। सरकार ने सहारनपुर में पाँवधोई नदी (हिण्डन की सहायक नदी) के दोनों ओर कब्जे हटाने का काम किया है। 54 परिवारों के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कराई है। कई उद्योगों के खिलाफ भी कार्रवाई की गई है।

केन-बेतवा को लेकर उमा भारती जी की जिद को लेकर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
केन-बेतवा लिंक बुन्देलखण्ड के लिये एक अभिशाप साबित होगा। यह बुन्देलखण्ड को बाढ़-सुखाड़ में फँसाकर मारने का काम है। इससे इलाके में बाढ़-सुखाड़ घटने की बजाय, बढ़ेगा।

मगर सरकार के लोग तो कह रहे हैं कि केन-बेतवा नदी जोड़ विरोधी बातों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है।
वे यह कैसे कह सकते हैं? प्रो. जीडी अग्रवाल, प्रो. आर. एच. सिद्दिकी, श्री परितोष त्यागी और रवि चोपड़ा जैसे देश के चार नामी वैज्ञानिकों तथा मैंने मिलकर केन-बेतवा नदी जोड़ का जमीनी वैज्ञानिक अध्ययन किया था। उसी अध्ययन के आधार पर केन-बेतवा नदी जोड़ का काम दस साल से रुका पड़ा है; नहीं तो इसे लेकर राज्य-सरकारों के बीच का एग्रीमेंट तो 15 साल पहले ही हो गया था। उन्हें समझना चाहिए कि बाढ़-सुखाड़ मुक्ति का एक ही उपाय है और वह है पानी का विकेन्द्रित प्रबन्धन।

किन्तु आपने तो उमाजी की जिद के खिलाफ कोई बयान दिया हो या मुहिम शुरू की हो; ऐसा मैंने नहीं सुना।
अरे, हम तो पिछले 15 साल से नदी जोड़ परियोजना का विरोध कर रहे हैं। बतौर सदस्य, राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी की बैठकों में भी नदी जोड़ परियोजना का खुलकर विरोध किया था। अब लगता है कि केन्द्र की यह सरकार तो संवेदनहीन सरकार है, तो संवेदनहीन के बीच में क्या बोलना। अपनी ऊर्जा लगाने का कोई मतलब नहीं। यूँ भी मैं खिलाफ मोर्चाबन्दी नहीं करता। मैं सिर्फ सरकारों को सजग करने का दायित्व निभाता हूँ। जन-जोड़ अभियान चलाकर मैं यही दायित्व निभा रहा हूँ।

लेकिन मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते तो आपने गंगा-यमुना को लेकर खूब मोर्चाबन्दी की थी। क्या मोदी जी के आते ही नदियों के सब मसले सुलझ गए; नदी के शोषण, अतिक्रमण, प्रदूषण व पानी के व्यावसायीकरण सम्बन्धी सब चुनौतियाँ खत्म हो गईं?
नहीं, इस मोदी शासनकाल में तो ये सभी मुद्दे और भी गम्भीर हो गए हैं। कांग्रेस शासन गंगा को माँ नहीं कहता था, लेकिन उन्होंने लोहारी-नाग-पाला परियोजना रद्द की; भागीरथी इको सेंसटिव जोन घोषित किया; गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कर माँ जैसा सम्मान दिया। गंगा को लेकर उनकी कथनी-करनी में उतना अन्तर नहीं था, जितना मोदी सरकार की कथनी-करनी में है। कांग्रेस सरकार में नदी का समाज बोलता था, तो सरकार सुनती थी। यह सरकार सुनती ही नहीं, तो हम क्या बोलें?

कहीं ऐसा तो नहीं कि कांग्रेस शासन के समय आपकी गंगा निष्ठा और थी और मोदी शासन के समय कुछ और?
नहीं ऐसी बात नहीं है, जहाँ तक गंगा की बात है, तो गंगा के प्रति मेरे मन का दर्द अब पहले से भी ज्यादा है। किन्तु झूठ को झूठ सिद्ध करने के लिये कभी-कभी थोड़ा इन्तजार करना पड़ता है। दूसरों के बारे में तो मैं नहीं कहता, मैं इन्तजार ही कर रहा हूँ। यह भी कह सकते हैं कि तैयारी कर रहा हूँ।

क्या तैयारी कर रहे हैं?
समय आएगा, तो उसका भी खुलासा करुँगा।

कहीं ऐसा तो नहीं कि आई बी रिपोर्ट के बाद प्राप्त अनुदान के अनुचित उपयोग और खातों की जाँच के जरिए एनजीओ सेक्टर की मुश्कें कसने के लिये जो कोशिश मोदी सरकार ने की है; यह सन्नाटा.. यह चुप्पी उसी कार्रवाई के डर के कारण हो?
राजेन्द्र सिंह पर किसी दान-अनुदान, जाँच या रिपोर्ट का कोई दबाव नहीं है। राजेन्द्र सिंह एक स्वैच्छिक कार्यकर्ता है, जिसे अपना साध्य मालूम है। साध्य को साधने के लिये जो साधन चाहिए, वह उसकी शुद्धि का पूरा ख्याल रखता है।

मैं आपकी व्यक्तिगत बात नहीं कर रहा; फंड आधारित पूरे एनजीओ सेक्टर की बात कर रहा हूँ।
हाँ, यह सही है कि बीते दो सालों में कोई हलचल नहीं है, लेकिन आपको याद होगा कि बीती पाँच मई को हमने चुप्पी तोड़ी। देश भर से लगभग सात हजार लोग संसद मार्ग पर पहुँचे। जल सुरक्षा को लेकर सरकार को आगाह किया।

आपकी यह बात भी सही है कि मोदी जी की सरकार ने समाज में एक डर पैदा कर दिया है। अपनी तानाशाही दिखाकर संवेदनशील लोगों को भी भयभीत करने की कोशिश की है। जो डर से नहीं माने, उन्हें लोभ-लालच में फँसाने की कोशिश कर रही है। लेकिन भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में ऐसे पैदा किया डर, ऐसे लोभ का वातावरण ज्यादा दिन नहीं टिकता। भारत के लोगों ने जमीन के मसले पर लड़कर सरकार को झुकने को मजबूर किया। देखना, पानी के मसले पर भी लोग खड़े होंगे।

जो समाज, अपनी समाज व प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारियों के प्रति लापरवाह दिखाई दे रहा है; ऐसा समाज अपनी हकदारी के लिये खड़ा होगा, आपकी इस उम्मीद का कोई आधार तो होगा?
समाज को दायित्वपूर्ण बनाने के लिये वातावरण निर्माण की एक प्रक्रिया होती है। वह प्रक्रिया उद्देश्य के साथ-साथ उद्देश्य प्राप्ति के मार्ग में रुकावट पैदा करने वाली शक्तियों को पहचानकर शुरू की जाती है। ऐसी शक्तियाँ पिछली केन्द्र सरकार में भी थी, इस केन्द्र सरकार में भी हैं। लेकिन पिछली सरकार में दूसरी तरह की शक्तियाँ थीं, इस सरकार में दूसरे तरह की हैं। ऐसी शक्तियों के खिलाफ लड़ने वाले लोग अभी बिखरे हुए हैं। सरकार ने भी उन्हें बिखेरने का काम किया है। वे अब जुड़ने भी लगे हैं।

जमीन के मसले पर तरुण भारत संघ श्री पी वी राजगोपाल जी के संघर्ष से जुड़ा, तो पानी के काम में पी वी, निखिल डे, मेधा जी समेत देश के कई प्रमुख संगठन अब आपस में जुड़ रहे हैं। किसी व्यक्ति या संगठन का अस्तित्व कभी महत्त्वपूर्ण नहीं होता; महत्त्वपूर्ण होता है दायित्त्व की पूर्ति। यह एकजुटता अपने दायित्त्व की पूर्ति के लिये है।

क्या आप भाजपा विरोधी हैं?
मेरा किसी पार्टी से कोई विरोध नहीं। जो भी सरकार पानी प्रबन्धन की दिशा में कुछ अच्छा काम करने की इच्छा प्रकट करती है, मैं उसके साथ सहयोग को हमेशा तैयार रहता हूँ। महाराष्ट्र में जिस सरकार के साथ मिलकर मैंने ‘जलायुक्त शिवार’ योजना पर काम किया, वह भाजपा दल के नेतृत्व वाली ही सरकार है। लातूर को फिर से पानीदार बनाने का काम भी हम इसी सरकार के साथ मिलकर कर रहे हैं। जलायुक्त शिवार का मतलब ही है, बेपानी जगह को फिर से पानीदार बनाना।

भारत की राजनैतिक पार्टियों में सबसे ज्यादा नम्बर किसे देंगे?
भारत की मुख्य राजनैतिक पार्टियों में फिलहाल कोई पार्टी ऐसी नहीं, जिसे देश की परवाह हो; जो देश की जनता-जर्नादन के प्रति संवेदनशील हो।

विकल्प क्या है?
रचना; रचना ही वह विकल्प है, जो समता की लड़ाई में गरीबों को आगे लेकर आएगा। लेकिन उसमें अरविंद केजरीवाल जैसे कार्यकर्ताओं से बचना होगा, जो रचना की शक्ति को अपनी निजी महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिये इस्तेमाल करने से भी नहीं चूकते।
 

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अरुण तिवारीअरुण तिवारी

शिक्षा:


स्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

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