केन-बेतवा नदी जोड़ योजना का बुन्देलखण्ड जल संसद द्वारा विरोध

Submitted by RuralWater on Thu, 02/16/2017 - 12:42

पिछले सौ या पचास साल के वर्षा के आँकड़ों का आकलन किया जाय तो स्पष्ट होता है कि जब-जब केन नदी के जलग्रहण क्षेत्र में कम वर्षा हुई है उसी समय बेतवा नदी के जलग्रहण क्षेत्र में भी कम वर्षा हुई है। साथ ही अतिवृष्टि के मामले में भी दोनों क्षेत्रों की स्थिति एक जैसी रही है। इसके अलावा यह बात समझ से परे हैं कि जब केन के जलग्रहण क्षेत्र में सिंचाई की पूरी व्यवस्था नहीं हो पाती है तो केन का पानी दूसरे नदी में डालने का क्या मतलब है? इसके अलावा उतार-चढ़ाव युक्त पहाड़ी इलाकों वाले बुन्देलखण्ड में यह योजना बिल्कुल अव्यावहारिक है। महाभारत काल में पांडवों की अज्ञातवास की अवधि के दौरान एक बार जंगल से गुजरते हुए उन्हें प्यास लगी। एक-एक करके अर्जुन, भीम, नकुल व सहदेव पानी की तलाश में निकले एवं पानी मिल जाने पर जब वे उसे लेने लगे तो एक यक्ष ने उनसे कुछ सवाल पूछा और कहा कि सवाल का जवाब देने पर ही वे पानी ले सकते हैं। इसका पालन न करने पर यक्ष ने उन सबको बारी-बारी से मूर्छित कर दिया। अन्त में युद्धिष्ठिर भी गए और यक्ष ने उनसे भी सवाल पूछा। पहला सवाल यह था कि दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है? युद्धिष्ठिर ने जवाब दिया कि हरेक व्यक्ति जानता है कि मृत्यु शाश्वत सत्य है फिर भी लोग मरना नहीं चाहते। लेकिन शायद आज की परिस्थिति में उनसे यह सवाल पूछा जाता तो वे कुछ और ही जवाब देते। वह जवाब यह होता कि यह शाश्वत सत्य है कि जल ही जीवन है और उनके जीवन पर ही संकट आ खड़ा हुआ है फिर भी लोग उसका हल स्वयं नहीं ढूँढते बल्कि सरकार या दूसरों पर आश्रित रहते हैं।

मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले के ओरछा में आयोजित एक दिवसीय ‘बुन्देलखण्ड जल संसद’ इसी सत्य से रूबरू होने का एक प्रयास था। 23 जुलाई 2003 को सम्पन्न हुए इस एक दिवसीय जल संसद का मुख्य विषय था ‘बुन्देलखण्ड की जल समस्या, केन-बेतवा जोड़ तथा विकल्पों पर जन सवांद’। यह जल संसद विज्ञान शिक्षा केन्द्र, बांदा, नवधान्य तथा ग्राम सेवा समिति एवं नवचेतना समिति, निवाड़ी द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित की गई थी। जल संसद में बुन्देलखण्ड के ग्यारह प्रमुख जिलों, उत्तर प्रदेश के झाँसी, ललितपुर, जालौन, हमीरपुर, महोबा, बांदा, छत्रपति साहूजीनगर, एवं मध्य प्रदेश के छतरपुर, दतिया, पन्ना, एवं टीकमगढ़ के प्रतिनिधि शामिल हुए।

यह जल संसद बुन्देलखण्ड पर जबरदस्ती थोपी जाने वाली एक समस्या पर चिन्तन व विकल्प खोजने के लिये आयोजित की गई थी। यह समस्या है बुन्देलखण्ड की जीवनदायिनी दो नदियों केन-बेतवा को जोड़ने का भारत सरकार का प्रस्ताव। वास्तव में यह भारत सरकार द्वारा भारत की विभिन्न नदियों को जोड़ने की महत्त्वाकांक्षी योजना का ही एक हिस्सा है। इस योजना के तहत मध्य प्रदेश के पन्ना एवं छतरपुर जिलों के बीच से गुजरने वाली केन नदी पर एक ऊँचा बाँध बनाकर एक लिंक नहर के जरिए पानी को बेतवा नदी में डालने का प्रस्ताव है।

भारत सरकार के इस प्रस्ताव का मुख्य आधार है जलाधिक्य वाली नदियों का पानी जलाभाव वाली नदियों में डालना। वास्तविकता यह है कि केन एवं बेतवा दोनों ही नदियों का उद्गम क्षेत्र मध्य प्रदेश में है एवं दोनों लगभग एक ही किस्म की भौगोलिक परिस्थितियों से गुजरते हुए समानान्तर बहती हैं एवं अन्ततः यमुना नदी में मिल जाती हैं। विज्ञान शिक्षा केन्द्र के भारतेन्दु प्रकाश का कहना है कि यदि बुन्देलखण्ड में पिछले सौ या पचास साल के वर्षा के आँकड़ों का आकलन किया जाय तो स्पष्ट होता है कि जब-जब केन नदी के जलग्रहण क्षेत्र में कम वर्षा हुई है उसी समय बेतवा नदी के जलग्रहण क्षेत्र में भी कम वर्षा हुई है। साथ ही अतिवृष्टि के मामले में भी दोनों क्षेत्रों की स्थिति एक जैसी रही है।

इसके अलावा यह बात समझ से परे हैं कि जब केन के जलग्रहण क्षेत्र में सिंचाई की पूरी व्यवस्था नहीं हो पाती है तो केन का पानी दूसरे नदी में डालने का क्या मतलब है? इसके अलावा उतार-चढ़ाव युक्त पहाड़ी इलाकों वाले बुन्देलखण्ड में यह योजना बिल्कुल अव्यावहारिक है। साथ ही इस योजना के बनने से डाउनस्ट्रीम में पड़ने वाले छतरपुर, पन्ना व बांदा जिले के तमाम इलाके पानी से वंचित हो जाएँगे। इसके अलावा इस क्षेत्र में पड़ने वाला विश्व प्रसिद्ध पन्ना बाघ रिजर्व का एक हिस्सा भी डूब क्षेत्र में आ जाएगा।

प्रस्तावित योजना से छतरपुर, टीकमगढ़ एवं झाँसी जिले के हजारों हेक्टेयर उपजाऊ जमीन डूब जाएँगी। साथ ही परियोजना के डाउनस्ट्रीम में केन नदी में पहले से मौजूद गंगऊ एवं बरियारपुर बाँध के जलविहीन हो जाने की आशंका है। हजारों लोगों के अपने पुश्तैनी जमीन से विस्थापित होना तो सबसे प्रमुख समस्या है ही, जिस पर कोई ध्यान ही नहीं दे रहा है। इसके अलावा हमीरपुर, महोबा, जालौन एवं बांदा जिले के जलमग्न हो जाने की आशंका है।

नवधान्य की वंदना शिवा का कहना था कि इतने बड़े बजट वाली महाकायी योजना को लागू करने की बात कैसे सोची जा सकती है जबकि जल संसाधन विभाग में काफी संख्या में अधूरी परियोजनाएँ लम्बित पड़ी हुई है। साथ ही देश भर के जल संसाधनों का निजीकरण करने की एक सोची-समझी चाल है।

बुन्देलखण्ड के लोगों का मानना है कि नियोजन प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए उन पर ऊपर से थोपे जाने वाली एक महाकायी योजना है। स्थानीय लोगों के लिये इस योजना की जमीनी हकीकत अभी अनजानी है। देश भर के तमाम नदियों के जलग्रहण क्षेत्र में वर्षाजल संग्रहण के प्रयास के बिना एवं इन क्षेत्रों में पड़ने वाले जंगलों के बारे में वन विभाग की बगैर कोई मंजूरी के ही ऐसी योजनाओं का प्रचार-प्रसार करना देश की नियोजन प्रक्रिया के साथ एक मजाक है।

ललितपुर से आये मंगल सिंह का कहना था कि एक ओर तो सरकार बगैर जानकारी के नदी जोड़ जैसी बड़ी योजना को लोगों पर थोप रही है दूसरी तरफ जिले में कई गाँवों में सार्वजनिक भूमि पर सार्वजनिक प्रयास से बने तालाबों की जमीन पर सरकार द्वारा चक काटकर अन्य उपयोग के लिये आवंटित किये जा रहे हैं। यह तो उच्चतम न्यायालय द्वारा तालाबों आदि पर किसी किस्म के निर्माण न होने देने के जुलाई 2001 के आदेश का सरासर उल्लंघन है। साथ ही गाँव में आठ प्रतिशत भूमि सार्वजनिक उपयोग के लिये छोड़ने के अपने ही सिद्धान्त का सरकार उल्लंघन कर रही है।

जल संसद में आये लोगों ने इस बात पर जोर दिया कि जब बुन्देलखण्ड में पहले से ही गंगऊ, बरियारपुर, रंगवा (सभी केन व सहायक नदियों पर), राजघाट, माताटीला, ढुकवां, बरवा, पारीछा (सभी बेतवा व सहायक नदियों पर), लाचूर व पहाड़ी (धसान नदी पर) बाँध सहित करीब 35 से ज्यादा बड़े बाँध पहले से मौजूद हैं। एक तरफ इनकी क्षमता का पूरी तरह उपयोग भी अभी तक नहीं हो पाया है तो नए परियोजना द्वारा स्थानीय व्यवस्था को प्रभावित करना कहाँ तक उचित है? हमीरपुर जिले से आये प्रेम सिंह का मानना है कि बुन्देलखण्ड के तमाम क्षेत्रों में आज भी सातवीं शताब्दी तक के तालाब व बन्धी मौजूद हैं जो लम्बे समय से स्थानीय लोगों के लिये जल का प्रमुख स्रोत रहे हैं। लोग मानते हैं कि यदि उन्हीं प्राचीन जल व्यवस्था को और बेहतर बना दिया जाय तो पूरे क्षेत्र की पानी की समस्या का सम्पूर्ण हल सम्भव है।

जल संसद ने पूरे दिन की कार्यवाही के पश्चात सर्वसम्मति से चार सूत्रीय एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें कहा गया कि नदियों को जोड़ने की यह योजना जोड़ने की नहीं बल्कि नदियों को मोड़ने एवं लोगों को तोड़ने की योजना है। केन-बेतवा को जोड़ने की योजना स्थानीय प्रकृति व संस्कृति के अनुकूल न होने के कारण बुन्देलखण्ड की जनता इस अनैतिक योजना का स्पष्ट विरोध व अस्वीकार करती है। बुन्देलखण्ड में मौजूद समस्त प्राचीन जल व्यवस्थाओं पर कब्जा रोककर उन्हें समृद्ध बनाया जाय। पूरी नदी जोड़ योजना के समस्त दस्तावेज स्थानीय लोगों के लिये सार्वजनिक किये जाएँ एवं ग्राम सभाओं की सहमति ली जाय और तब तक योजना पर कोई काम न हो।

प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी चन्द्रशेखर आजाद की कर्मभूमि में उनके जन्मदिवस के दिन सम्पन्न हुए इस जल संसद में लोगों ने सरकार को आगाह किया कि बुन्देलखण्ड की जनता के साथ ऐसा अलोकतांत्रिक मजाक करने का अधिकार किसी को नहीं है। साथ ही क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को ऐसी अप्राकृतिक योजना द्वारा तोड़े जाने के खिलाफ जन आन्दोलन का आह्वान किया है।

 

केन-बेतवा नदीजोड़

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिए कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें)

क्रम

अध्याय

1

केन-बेतवा नदीजोड़ क्यों असम्भव है

2

केन नदी घाटी

3

बेतवा नदी घाटी

4

नदीजोड़ प्रस्ताव

5

विनाशकारी होगा केन-बेतवा नदीजोड़

6

केन-बेतवा नदी जोड़ योजना का बुन्देलखण्ड जल संसद द्वारा विरोध

7

विरोध में उठते स्वर एवं प्रतिक्रियाएँ

 

(देशबन्धु 150803 एवं सामयिक वार्ता अगस्त 2003)

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