पूजनीय लेकिन उपेक्षित

Submitted by RuralWater on Tue, 02/20/2018 - 17:41
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डाउन टू अर्थ, फरवरी 2016

हाल के दशकों में जंगलों और सेक्रेड ग्रोव्स का क्षरण हुआ है। ऐसा उच्च जनसंख्या घनत्व, कृषि विस्तार, शहरीकरण और औद्योगिकीकरण की वजह से है।

तालाब या नदी पवित्र जंगल का एक अभिन्न हिस्सा है, लेकिन वे अलग-अलग स्थानों पर विभिन्न प्रयोजनों के लिये इस्तेमाल में आते हैं। राजस्थान में, वे वाटरशेड, हिमालय और पश्चिमी घाट के नम क्षेत्रों में, वाटर बॉडीज पीक रन ऑफ या बाढ़ से रक्षा करते हैं, जबकि बसंत में टिकाऊ प्रवाह सुनिश्चित करते हैं। ये पीने और सिंचाई के पानी की आपूर्ति भी करते हैं। सेक्रेड ग्रोव्स पर लोगों की निर्भरता भी भिन्न होती है। कुछ समुदाय ग्रोव से सूखी लकड़ियाँ तो कुछ गैर-लकड़ी उत्पादों का उपयोग करते हैं। पेड़ नष्ट करना, पशु चराई आदि पर रोक यहाँ की विशेषता है।

दुनिया भर में सांस्कृतिक और धार्मिक कारणों से वनों और पेड़ों की रक्षा करना एक प्राचीन प्रथा है। शास्त्रीय और ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि पहले के जमाने के राजा-महाराजा, ऋषियों के लिये वन लगाते थे। बदले में ये ऋषि उन्हें आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान करते थे और ज्ञान का प्रसार करते थे। जंगलों के ऐसे ‘गैर-उपयोगी’ मूल्य और जैवविविधता जैसे अप्रत्यक्ष लाभ समुदायों के सामाजिक और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी हुई है।

हालांकि विश्वास और मिथक द्वारा निर्देशित, सेक्रेड ग्रोव्स (पूजनीय और आस्था के प्रतीक वृक्ष) के प्रति श्रद्धा और संरक्षण की भावना के पीछे का मकसद काफी भिन्नता लिये हुए है। हिमाचल प्रदेश के कुछ समुदायों का मानना है कि जंगल देवता की पूजा से उन्हें सूखा, बाढ़ और भूकम्प जैसी तबाही से सुरक्षा मिलती है। राजस्थान के बिश्नोई समुदाय के लिये ये उनके सम्प्रदाय के उन 29 सिद्धान्तों का पालन करने का एक तरीका है, जो हरे पेड़ों को काटने और शिकार करने से रोकता है।

मेघालय के खासी जनजाति को अपने कुछ संस्कारों और अनुष्ठानों के लिये जंगल की आवश्यकता होती है जबकि सिक्किम के कंचनजंघा में रहने वाले बौद्ध मानते हैं कि उनके लिये, उस पवित्र खजाने की रक्षा करना कर्तव्य है, जो जंगलों में छिपे हैं और केवल प्रबुद्ध लामा (आध्यात्मिक शिक्षक) के लिये सामने आएँगे। ये सब एक समुदाय का प्रकृति के साथ साझा किये जाने वाले रिश्ते और ताकत को दर्शाता है।

आश्चर्य की बात है कि सेक्रेड ग्रोव्स न केवल पारिस्थितिक वितरण के मामले में भिन्न होते हैं, बल्कि सम्पत्ति व्यवस्था, प्रबन्धन प्रथा और सामाजिक-पारिस्थितिक प्रासंगिकता के मामले में भी अलग होते हैं। जहाँ अधिकांश अलग-अलग समुदायों से सम्बन्धित है, वहीं खासी पहाड़ियों के मावसामी और गढ़वाल के हरियाली पवित्र जंगल को गाँवों द्वारा मान्यता मिली हुई है। इसके अलावा, क्षेत्रीय अपील वाले ग्रोव्स भी हैं।

इस सूची में कुमाऊँ का जगेश्वर धाम, गढ़वाल का बद्री वन, पश्चिमी घाट का पूंगावनम (सबरीमाल के भगवान अय्यप्पन का बाग), मध्य प्रदेश में अमरकंटक और सिक्किम का देमोजोंग शामिल हैं। बरगद के पेड़, अंजीर और नीम जैसे कुछ वृक्षों को भी श्रद्धा से देखा जाता है, क्योंकि वे अक्सर बड़े क्षेत्रों में फैले होते हैं और कई सेक्रेड ग्रोव्स को कवर करते हैं। हालांकि, जंगल की कई ऐसी प्रजातियाँ हैं, जिन्हें एक जगह पर पवित्र माना जाता है, लेकिन दूसरी जगह नहीं। बाँस को कुछ पूर्वोत्तर क्षेत्रों में पवित्र माना जाता है जबकि गंगा के मैदानी इलाकों में कई समुदाय इसे ‘बुरी आत्मा’ का निवास स्थल मानते हैं।

भूमि स्वामित्व अधिकार और प्रबन्धन जिम्मेदारियाँ भी भिन्न हो सकती हैं। कई जगहों पर व्यक्तिगत परिवार सेक्रेड ग्रोव्स के प्रबन्धन के लिये जिम्मेदार हैं, जबकि अन्य जगहों पर यह दायित्व समुदायों, ट्रस्टों या धार्मिक संगठनों पर होता है। हिमालय में, कुछ जगह पर जंगल संवर्धन का काम नहीं होता और इसे सामाजिक कार्य करने और संसाधनों का उपयोग करने के लिये लोगों के लिये छोड़ दिया जाता है।

तालाब या नदी पवित्र जंगल का एक अभिन्न हिस्सा है, लेकिन वे अलग-अलग स्थानों पर विभिन्न प्रयोजनों के लिये इस्तेमाल में आते हैं। राजस्थान में, वे वाटरशेड (जल संरक्षण कार्यों में काम आते हैं।) हिमालय और पश्चिमी घाट के नम क्षेत्रों में, वाटर बॉडीज पीक रन ऑफ या बाढ़ से रक्षा करते हैं, जबकि बसंत में टिकाऊ प्रवाह सुनिश्चित करते हैं। ये पीने और सिंचाई के पानी की आपूर्ति भी करते हैं। सेक्रेड ग्रोव्स पर लोगों की निर्भरता भी भिन्न होती है। कुछ समुदाय ग्रोव से सूखी लकड़ियाँ तो कुछ गैर-लकड़ी उत्पादों का उपयोग करते हैं। पेड़ नष्ट करना, पशु चराई आदि पर रोक यहाँ की विशेषता है।

जीवन का भण्डार


सम्भवतः सेक्रेड ग्रोव्स देश के कुल वन क्षेत्र का 1 प्रतिशत से अधिक नहीं हैं, फिर भी ये बड़े पारिस्थितिक तंत्र को अपनी सेवाएँ देते हैं। ये लगभग सभी जैव-भूगोल, जलवायु और कृषि-पारिस्थितिक क्षेत्रों में मौजूद हैं। प्राथमिक वनस्पति या पुरानी माध्यमिक वनस्पतियों के अवशेष यहाँ हैं। इस वजह से यहाँ उच्च प्रजातीय समृद्धि है। ये कई दुर्लभ और खतरे में आ चुकी प्रजातियों का संरक्षण करती हैं। ये अव्यवस्थित पारिस्थितिक तंत्रों के मैट्रिक्स में ‘कीस्टोन संरचना’ के रूप में भी कार्य करते हैं।

अनगिनत बड़े पेड़, गीले या नम माइक्रोसाइट्स और सेक्रेड ग्रोव्स के इकोटोन (दो बायोमेस के बीच संक्रमण क्षेत्र) छोटे पैचेज पर पारिस्थितिक विविधता और कार्यात्मक विविधता का निर्माण करते हैं। कई स्थानों पर ये संरक्षित क्षेत्र, सीड रेन, स्थानीय और क्षेत्रीय प्रजातियों को शरण देकर सूखे और बाढ़ से बचाते हैं। पवित्र जंगल विशाल कार्बन सिंक होने के कारण, जलवायु परिवर्तन के शमन और अनुकूलन के लिये भी महत्त्वपूर्ण हैं। स्थानीय रूप से श्रद्धेय ग्रोव समुदायों के एकजुटता को बढ़ावा देते हैं और ज्ञान के अन्तर-समुदाय आदान-प्रदान में मदद करते हैं। इस ज्ञान की मान्यता समुदायों और संरक्षक के बीच संघर्ष को हल करने का प्रभावी तरीका हो सकता है।

समुदायों के संरक्षण लोकाचार, जो 19वीं सदी के अन्त तक लोगों द्वारा स्वामित्व और प्रबन्धित था, को जैव विविधता और पारिस्थितिक तंत्र सेवाओं के उच्च स्तर से परिलक्षित होता है। यद्यपि 0.5 हेक्टेयर से भी कम क्षेत्र में फैले सेक्रेड ग्रोव्स, खाद्य और कृषि संघटन के अनुसार ‘जंगल’ नहीं हैं, फिर भी, इनके पास संरक्षित क्षेत्रों और जंगलों के पारिस्थितिक और सामाजिक-आर्थिक कार्यों को बढ़ाने की क्षमता है।

फिर भी सराहना नहीं मिलती


रिपोर्ट्स बताती हैं कि हाल के दशकों में जंगलों और सेक्रेड ग्रोव्स का क्षरण हुआ है। ये ग्रोव्स भारत के गंगा के मैदानों में लगभग ना के बराबर हैं। ऐसा उच्च जनसंख्या घनत्व, कृषि विस्तार, शहरीकरण और औद्योगिकीकरण की वजह से भी है। ये गिरावट जमीन पर कब्जा जमाने की वजह से भी है। लेकिन व्यवस्थित निगरानी के अभाव में, यह कहना मुश्किल है कि क्या सेक्रेड ग्रोव्स की संख्या बढ़ रही है या इसे कितना नुकसान हो रहा है।

भारत का वन सर्वेक्षण (फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इण्डिया) सेटेलाइट डेटा के जरिए वन क्षेत्र की निगरानी करता है। इसमें 23.5 मेटरेस रिजॉल्यूशन के आकाशीय यंत्र का इस्तेमाल होता है। इसका न्यूनतम माप एक हेक्टेयर का होता है। इस वजह से इन सेक्रेड ग्रोव्स का मापन ठीक से नहीं हो पाता है।

इन जंगलों को गाँव स्तर की जनगणना, सर्वेक्षणों और वन विभाग द्वारा तैयार किये गए नक्शे में अलग भूमि उपयोग श्रेणी के रूप में नहीं माना जाता है। इस वजह से हम देश के वन क्षेत्र में 3,775 वर्ग किमी (1 वर्ग किमी, 100 हेक्टेयर है) की हालिया वृद्धि में इन पवित्र जंगल के योगदान को नहीं जान पाते। इसी तरह पूर्वोत्तर में 628 वर्ग किमी वन क्षेत्र का नुकसान हुआ है। इसमें सेक्रेड ग्रोव्स का क्या योगदान है, इसे हम समझने में असमर्थ हैं। इससे भी बुरा यह कि विभिन्न समय में शोधकर्ताओं द्वारा विभिन्न तरीके से एकत्र किये गए आँकड़े (ज्यादातर विजुअली अनुमानित) गलत निष्कर्ष लेकर आते हैं। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सेंटर ऑफ एक्सेलेंस, सीपीआर एनवायरन्मेंटल एजुकेशन सेंटर का एक आकलन बताता है कि देश भर में 10,377 सेक्रेड ग्रोव्स हैं। मंत्रालय की वेबसाइट पर ये संख्या 13,270 है।

ऐसी विवादित रिपोर्टों से पता चलता है कि सामाजिक-सांस्कृतिक और पारिस्थितिक मूल्यों के बावजूद, सेक्रेड ग्रोव्स पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है। सबसे पहले तो पवित्र जंगल को एक विशिष्ट वर्ग वाले जंगल के रूप में नहीं माना गया, जबकि सभी गैर कृषि भूमि को औपनिवेशिक शासन द्वारा जंगल और बंजर भूमि के रूप में सूचीबद्ध किया गया। इससे ये क्षेत्र रिजर्व और संरक्षित वन बन गए। इस पर वन विभाग का या राजस्व विभाग का नियंत्रण हो गया।

चूँकि ज्यादातर पवित्र वनों की सांस्कृतिक और धार्मिक प्रासंगिकता थी, इसलिये उनका बहुत अधिक दोहन हुआ। ये काम ठेके पर संगठित तौर से वाणिज्यिक उपयोग के लिये हुआ। राजनैतिक शक्ति से वंचित स्थानीय समुदाय मूकदर्शक बना रहा। 1970 के दशक में जाकर सरकार ने अपनी ही एजेंसियों की उन गतिविधियों पर रोक लगा दी, जिसमें जंगलों को बदलना और हरे पेड़ों की कटाई जैसे काम शामिल थे।

दूसरा, मुख्यधारा के साथ अलग-अलग रहे समुदायों का एकीकरण और बाजार अर्थव्यवस्था के कारण पवित्र वनों का मूल्य कम हुआ। जंगल के उपयोग मूल्यों के मुकाबले इसके गैर-उपयोग मूल्यों और अमूर्त लाभों पर ध्यान कम होता गया। श्रद्धा कम होती गई। इसके साथ ही वन संसाधनों का जबरदस्त दोहन होने लगा।

तीसरा, परिवारों के स्वामित्व वाले सेक्रेड ग्रोव्स को परम्परागत संयुक्त परिवारों के विघटन का भी नुकसान हुआ। चौथा, कुछ नीतियों ने वन संरक्षण के महत्त्व को कमजोर किया, जैसे, सब्सिडी मूल्य पर वन आधारित वस्तुओं और सेवाओं को बढ़ावा देना, रासायनिक उर्वरक के इस्तेमाल, वन संसाधन आधारित स्थानीय स्वास्थ्य सेवा की जगह आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएँ और वनों द्वारा रिचार्ज किये गए पारम्परिक तरीकों से अलग अन्य स्रोतों से पीने और सिंचाई के पानी की आपूर्ति आदि।

पाँचवीं बात ये कि सरकार ने सामुदायिक वानिकी को बढ़ावा देने के लिये कुछ कार्यक्रमों को शुरू किया। इसमें जंगलों का संरक्षण शामिल था। लेकिन सरकारी समर्थन बहुत कम रहा। केरल में एक परिवार को सेक्रेड ग्रोव्स की देखभाल के लिये एक बार सिर्फ 3,000 रुपए का भुगतान मिलता है, जबकि जंगल भूमि की बहाली के लिये 30,000 रुपए प्रति हेक्टेयर उपलब्ध कराया जाता है। इसके अलावा, पारम्परिक वन ज्ञान और संस्थागत सेट अप वन संरक्षण के लिये काफी कुशल है।

जंगल संरक्षण के लिये कोई इनाम या इसके क्षरण के लिये किसी दंड का प्रावधान नहीं है। वन प्रबन्धन में सामुदायिक भागीदारी को नीतियों में अधिक मान्यता प्राप्त हो रही है, लेकिन स्वदेशी ज्ञान और भण्डारण क्षमता, मूल्य वृद्धि और वन उत्पादों के विपणन पर कम ध्यान दिया गया है। छठी बात ये है कि लोगों को वन संरक्षण और वन कार्बन स्टॉक वृद्धि से मिलने वाले आय अवसरों की पूरी तरह जानकारी नहीं है।

जैव विविधता पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन, जलवायु परिवर्तन और सतत विकास लक्ष्य (2015-30) पर फ्रेमवर्क कन्वेंशन ने वन संरक्षण के माध्यम से स्थायी सामाजिक-आर्थिक विकास के नए अवसरों का पता लगाया है। इन अवसरों के दोहन के लिये नीतियों में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है। वृक्षों के लम्बे जीवन, फॉरेस्ट कवर और पारिस्थितिकी तंत्र सेवा की धीमी बहाली प्रक्रिया को देखते हुए, शोध और उपचार से जुड़ी दीर्घकालीन योजनाओं द्वारा अल्पकालिक (एक से तीन वर्ष) प्रोजेक्ट को बदलने की आवश्यकता है।

अब तक, पवित्र वनों की पारिस्थितिकी सेवा, जैसे फसलों के परागण, कीट नियंत्रण, ढलान की स्थिरता, जलस्रोतों का रिचार्ज, सीड रेन और जलवायु परिवर्तन शमन और अनुकूलन के स्रोत आदि को केवल गुणात्मक रूप में व्यक्त किया गया है। इन सेवाओं को मापने की जरूरत है। उन्हें आर्थिक दृष्टि से महत्त्व देना होगा। लोगों के साथ-साथ नीतिनिर्माताओं तक रिसर्च आउटपुट जाना चाहिए ताकि जंगल संरक्षण को अन्य भूमि उपयोगों और व्यवसायों की तरह आर्थिक रूप से सक्षम बनाया जा सके। अन्त में इस सम्मानित लेकिन उपेक्षित ग्रोव्स को राष्ट्रीय संरक्षण योजना में तत्काल शामिल किया जाना चाहिए। इसके प्रबन्धन को सहभागितापूर्ण टिकाऊ सांस्कृतिक परिदृश्य और आजीविका विकास कार्यक्रमों का अभिन्न अंग बनाया जाना चाहिए। हमारे पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा करने का ये एकमात्र तरीका है।

लेखक परिचय


पीएस रामकृष्णन, के जी सक्सेना

(पीएस रामकृष्णन अन्तरराष्ट्रीय स्तर के प्रसिद्ध पारिस्थितिकीविद हैं। केजी सक्सेना, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के स्कूल ऑफ एनवायरन्मेंटल साइंसेज संकाय के सदस्य हैं।)

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