एक खो गई नदी की तलाश

Submitted by RuralWater on Tue, 04/03/2018 - 14:28
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जलालपुर में सूखी सई नदीजलालपुर में सूखी सई नदीनदी की पहली स्मृतियों में ट्रेन की खिड़की से झाँकता धुँधलका कौंधता हैं। बचपन में पुल से गुजरती ट्रेन की धड़-धड़ सुनते ही हम उचककर खिड़की से झाँकते। लगता था ऊपर से लोहे के भारी-भरकम पिलर्स गिर रहे हैं। उनके गिरने की लयबद्ध आवाज आ रही है। हमारी ट्रेन भी उतनी ही तेजी से भाग रही होती थी।

रफ्तार का असली अहसास पुल से गुजरते वक्त ही होता था। लेकिन जब हमारी निगाह इस सबके पार नदी पर टिकती तो सब कुछ शान्त और ठहरा हुआ दिखता। अक्सर दूर क्षितिज की ओर विलुप्त होती नदी की रेखा और उदास बलुई किनारे। किसी एक किनारे से थोड़ी दूर पर आहिस्ता-आहिस्ता तैरती नाव। लम्बे रेतीले तट पर लोग निर्लिप्त अपना काम करने में जुटे नजर आते। कभी खरबूजे से लदे ऊँट दिखते तो कभी दोपहरी में शरारती बच्चे झमाझम तैरते और डुबकी लगाते आँखों ओझल हो जाते। मगर नदी से हुई इन पहली मुलाकातों में हमारे और नदी के बीच बहुत दूरी थी।

पहली बार नदी से वास्तविक परिचय इलाहाबाद आने पर हुआ। पानी में डूबी घाट की पथरीली सीढ़ियाँ, हिलता हुआ जल और उस पर बहते फूल या कभी-कभार कचरा। इलाहाबाद शहर में नदी अपनी पूरी गरिमा के साथ है। एक अलहदा अस्तित्व लिये हुए। महानगर के पूरे कोलाहल को अपने में समेटती। उसमें गहराई भी है और विस्तार भी।

इलाहाबाद में रिपोर्टिंग के दौरान कई बार झूँसी के पुल पर स्कूटर से भागते हुए यह लोभ होता था कि ठहरकर धूप में नहाई नदी को या क्षितिज की ओर उसकी धुँधली पड़ती रेखाओं को देखूँ। कई बार तो शाम को नदी देखना मन को बेचैन कर देता था। मन स्पंज की तरह संध्या की उस मटियाली उदासी को सोखकर भारी हो जाता था। मगर नदी का एक और रूप देखना अभी बाकी था। यह एक लोकोत्तर रूप था, जो मन से नहीं आत्मा से जुड़ता था। गंगा-यमुना के इस संगम की अलौकिकता का अहसास मुझे तब हुआ जब मैं गोरखपुर से इलाहाबाद की बस से तकलीफदेह यात्रा करता हुआ संगम के करीब पहुँचा।

माघ करीब था। ठंड थी। बस में लोग बहुत कम थे। सारे लोग ठिठुर रहे थे। मैं पीछे की तरफ था। आखिरी सीट पर कोई सनकी व्यक्ति धीमी आवाज में लगातार गीत गाता जा रहा था। वह रहस्यमय सा युवक शायद सारी जिन्दगी मुझे याद रहेगा। जैसे-जैसे इलाहाबाद करीब आ रहा था उसका स्वर ऊँचा होता जा रहा था।

गीत छोड़कर उसने पंत और प्रसाद की कविताएँ ऊंची आवाज में पढ़नी शुरू कर दीं। पुरानी खटारा बस के इंजन की घरघराहट और हिचकोलों के बीच अचानक मेरी निगाह खिड़की से बाहर गई। बाहर फैली अनंत कालिमा के बीच कहीं दूर पीली जगमगाती रोशनी का अम्बार लगा था। क्षितिज में उसका दूर तक विस्तार था। लगा जैसे हजारों रुपहले नहीं बल्कि सुनहले सितारे जमीन पर उतर आये हों। पानी में वे झिलमिल-झिलमिल कर रहे थे।

यह नदी किनारे माघ मेले की झलक थी जो हमें दूर से बस में बैठे दिख रही थी। रात के अन्धेरे में भी नदी का विस्तार साफ पता चल रहा था। मैं पल भर के लिये सम्मोहित सा हो गया। मेरी तकलीफ और थकान दोनों मिट गए थे। उधर बस में बैठे व्यक्ति ने शायद कीट्स और शैली को पढ़ना शुरू कर दिया था। बस के सन्नाटे में एक उसकी ही आवाज गूँज रही थी। मुझे लगा कि मैं कोई स्वप्न देख रहा हूँ।

मेरे भीतर उतरी इस अलौकिकता का बड़ा महत्त्व था। इसका महत्त्व तब और समझ में आया जब मैं लौकिक जीवन में एक नदी की तलाश में निकला।

मेरे लिये यह पत्रकारिता की शुरुआत थी और मैं इलाहाबाद में अपने लिये कुछ उल्लेखनीय असाइनमेंट्स तलाश रहा था। जिनके दम पर मैं खुद को सम्भावनाशील पत्रकारों में शामिल कर सकूँ। पर्यावरण और कृषि पर अपने काम के लिये चर्चित पत्रकार प्रताप सोमवंशी उस वक्त अमर उजाला में रिपोर्टिंग इंचार्ज थे। उन्हें शायद किसी विज्ञप्ति में सई नदी में बढ़ते प्रदूषण पर कुछ जानकारी मिली। उनको सई के बारे में मिली तथ्य चौंकाने वाले लगे। पता लगा कि पानी में गिर रहे फैक्टरी के कचरे से उस नदी के पानी का रंग काला पड़ गया है।

उन्होंने मुझसे इस पर चर्चा की और सई नदी में हो रहे प्रदूषण की खोजबीन करने को कहा। थोड़ी सी पड़ताल में यह भी पता लगा कि उत्तर प्रदेश के कई जिले सई नदी के किनारे बसे हैं। खासतौर पर रायबरेली, प्रतापगढ़ और जौनपुर जैसे बड़े जिले। मेरे लिये प्रतापगढ़ और रायबरेली जाने की तैयारी हो गई। दो दिन का वक्त लेकर मुझे नदी पर रिपोर्ट्स की एक सीरीज तैयार करनी थी। इसकी शुरुआत प्रतापगढ़ से होनी थी।

वह नवम्बर के शुरुआती दिन थे। हवाओं मे सर्दियों की आहट मगर धूप में तीखापन था। दो तारीख की सुबह मैं घर से निकल गया। ऑफिस से एक गाड़ी मिली थी। जब गाड़ी शहर से बाहर निकल रही थी तो मैं मन-ही-मन जोड़-जमा कर रहा था। अभी पत्रकारिता में कदम रखे कुछ महीने हुए थे। मैंने उन दिनों अपने काम करने का एक तरीका बना रखा था।

पहले विभागों में जाकर तथ्य जुटाना। उन तथ्यों के आधार पर सीधे फील्ड में जाकर जानकारी हासिल करना और लोगों से बातचीत करना। अन्त में जरूरत पड़े तो विशेषज्ञों की राय को शामिल करना। इस खबर पर काम करना दिलचस्प लग रहा था मगर मन में बहुत उत्साह नहीं था। मैं गंगा और यमुना की भव्यता और अलौकिकता से अभिभूत था। किसी छोटी नदी की पड़ताल मुझे न सिर्फ नीरस लग रही थी बल्कि मन में यह सवाल भी उठ रहा था कि इस पर तैयार रिपोर्ट की उपयोगिता क्या होगी? आखिर कितने लोगों का हित इससे जुड़ा होगा?

बहरहाल, तय प्लान के मुताबिक सबसे पहले तथ्य जुटाने थे। नदी से जुड़े तथ्यों की छानबीन के लिये मैंने जिले के कुछ सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटे। रास्ता पूछते-पूछते हमारी गाड़ी सबसे पहले ऑफिस के गेट पर रुकी। मेरी निराशा उस वक्त और गहरी हो गई जब मुझे कागजों में इस नदी का कोई अस्तित्व ही नजर नहीं आया। विभागों का कहना था कि सई बहुत छोटी नदी है। इसका मानव जीवन पर कोई सीधा प्रभाव नहीं है। भौगोलिक तथ्यों के बारे में अस्पष्टता या तो वास्तव में थी या जानबुझकर बनाई गई थी। कुछ जगहों पर इसे ‘नाले’ की संज्ञा भी दी गई। क्या मैं इतनी दूर एक नाले की रिपोर्टिंग करने आया हूँ?

कल-कल करता पानी तेजी से बह रहा था। चौड़े पाट थे। दोनों तरफ हरियाली। मगर नदी का पानी बिल्कुल कोला के जैसा था। हाँ! उस रंग को परिभाषित करने के लिये मेरे पास कोई और शब्द नहीं हैं। मैंने गन्दे नाले तो देखे थे मगर एक पूरी नदी का स्वच्छ सा लगने वाला पानी कोला की तरह कभी नहीं देखा था। मैं नदी के पाट पर खड़ा उसे बहते हुए देख रहा था। गंगा और गोमती के बीच से बहने वाली यह जीवनरेखा की मटमैली पड़ गई थी। यह कोई अलौकिक अनुभूति नहीं थी मगर यह मन को छीजने वाली अनुभूति अवश्य थी। “मैं रिपोर्टर हूँ!” मेरे परिचय देने पर अधिकारी ने उदासीनता से मेरी तरफ देखा। उसके देखने में थोड़ा कौतुक भी था। किसी नदी की छानबीन करने वाला रिपोर्टर शायद उसने पहली बार देखा था। उसने मुझसे बैठने के लिये भी नहीं कहा मगर मैं डायरी और पेन निकालकर उसके सामने वाली कुर्सी पर जम गया और उसके बोले गए शब्दों को टीपना शुरू कर दिया। यह तय था कि इस नदी को ‘सिस्टम’ भूल चुका था। हर जगह नदी के महत्त्व को कम आँकते हुए यह अहसास दिलाया गया कि मैं किसी मूर्खतापूर्ण काम पर निकला हूँ।

लेकिन जब मैं वापस गाड़ी में बैठा और हम अपनी लिस्ट के मुताबिक जिले के उस अन्तिम दफ्तर के गेट से बाहर निकल रहे थे तब तक नदी मेरे जेहन में धुँधली सी शक्ल लेने लगी थी।

हालांकि सई और इससे लगे इलाकों के बारे में समुचित आँकड़े उस समय तक शायद ही कहीं उपलब्ध थे। फिर भी मुझे यह अनुमान लग गया कि सई नदी के किनारे बसे ग्रामीण इलाकों की 50 हजार से ज्यादा आबादी इस नदी के प्रदूषण से प्रभावित हो रही थी। इसकी जिम्मेदार दरअसल रायबरेली की औद्योगिक इकाइयाँ थीं। भौगोलिक दृष्टि से सई गोमती की एक सहायक नदी है। जो हरदोई जिले से उन्नाव, रायबरेली और प्रतापगढ़ होते हुए जौनपुर के समीप गोमती में मिल जाती है। अब हम लोगों के रास्ता पूछते हुए नदी की तरफ बढ़ रहे थे।

जब हम नदी के करीब पहुँचे तो धूप चढ़ चुकी थी। मुझे प्यास लग रही थी। गाँव में खड़ी गाड़ी को हमेशा की तरह अधनंगे बच्चे घेरे हुए थे और दूर बैठे बुजुर्ग कौतुक से ताक रहे थे। वहाँ से मुझे गाँव वालों के साथ पैदल नदी तक जाना था। मैंने उनसे पानी माँगा। थोड़ी देर में एक युवक जग में पानी लेकर आया। उसकी तली में कचरा जैसा जमा था। मगर प्यास बहुत तेज लगी थी सो मैंने कुछ घूँट पानी से गला तर कर लिया। हम नदी की तरफ बढ़े। पेड़ों का झुरमुट पार करते हुए बलुई धरती पर पैर धँसाते जब हम नदी तक पहुँचे तो मेरे मन में माघ की उस रात संगम की अनुभूति फिर छूती सी निकल गई। प्रकृति अपनी प्राचीनता और शाश्वतता में यहाँ मौजूद थी।

कल-कल करता पानी तेजी से बह रहा था। चौड़े पाट थे। दोनों तरफ हरियाली। मगर नदी का पानी बिल्कुल कोला के जैसा था। हाँ! उस रंग को परिभाषित करने के लिये मेरे पास कोई और शब्द नहीं हैं। मैंने गन्दे नाले तो देखे थे मगर एक पूरी नदी का स्वच्छ सा लगने वाला पानी कोला की तरह कभी नहीं देखा था। मैं नदी के पाट पर खड़ा उसे बहते हुए देख रहा था। गंगा और गोमती के बीच से बहने वाली यह जीवनरेखा की मटमैली पड़ गई थी। यह कोई अलौकिक अनुभूति नहीं थी मगर यह मन को छीजने वाली अनुभूति अवश्य थी। यह सब कुछ किसी भव्य त्रासदी की तरह था। उस महानायक की तरह जिसके स्तुति गीत कभी लिखे ही नहीं गए।

“यह सई नदी जो आप देख रहे हैं वह आज की नहीं त्रेता युग की है, इस नदी का हजारों साल पुराना इतिहास है।” गाँव के एक बुजुर्ग की आवाज मेरे कानों से टकराई। उन्होंने मुझे भारत की तमाम नदियों की तरह इस नदी से जुड़ी पौराणिक कथा भी बताई। सई दरअसल ‘सती’ का अपभ्रंश है। मान्यता है कि वह उस कुंड से निकली हैं जहाँ पार्वती सती हुई थीं। इसी कारण सई नदी के किनारे कई शिव मन्दिर दिखते हैं। कहते हैं राम और सीता जब चौदह वर्ष के लिये अयोध्या से वन के लिये गए तब और जिस वक्त वनवास काट कर लौटे उस दौरान सई नदी में स्नान करना नहीं भूले। इसका जिक्र रामचरितमानस में भी है। अयोध्याकांड में तुलसीदास कहते हैं-

सई उतरि गोमतीं नहाए। चौथे दिवस अवधपुर आए।
जनक रहे पुर बासर चारी। राज काज सब साज सँभारी।।


यह वही नदी थी जिसे कभी राम और सीता ने प्रणाम किया होगा। जब घर से निकलकर इस नदी के तट पर खड़े हुए होंगे तो मन में न जाने कितनी आशंकाएँ होंगी, कितने द्वंद्व होंगे, कितनी टूटन रही होगी और जब वापस आये... फिर उसी तट पर खड़े हुए। चौदह साल बाद उसी नदी के जल को जब अंजलि में उठाया होगा तो शायद उन्हें लगा हो कि एक युग जी लिया।

हथेली में जल लिये राम वो राम नहीं रहे होंगे जो चौदह साल पहले थे। सीता भी वो सीता नहीं रही होंगी। वे ज्यादा परिपक्व हो उठे होंगे। धूप में तपे होंगे। शरीर पर युद्ध में लगे घावों के निशान होंगे, अपने प्रियजनों से लम्बे बिछोह की पीड़ा मन के किसी कोने में घनीभूत होगी। नदी भी वो नदी नहीं रही होगी। समय नदी की तरह बहता जाता है और नदी की तरह ही ठहरा भी होता है। सई नदी के उस बहते पानी ने कहीं-न-कहीं राम के तप्त मन को शीतलता दी होगी। मगर त्रेता युग से बहने वाली सई नदी बीते कुछ दशकों से खुद ही दहक रही थी।

युग के युग बीत चुके हैं। ...और नदी अब खुद अपना दुख बयान कर रही है।

मैं नोट कर रहा था। और मेरे चारों तरफ गाँव के लोग नहीं नदी बोल रही थी। प्रतापगढ़ जिले का बड़ा हिस्सा इस नदी के साथ गलबहियाँ करता है। कुल फासला 450 किलोमीटर से भी अधिक का है। प्रतापगढ़ में बहुंचरा, दढ़ैला, तेजगढ़, इशीपुर, ढेकाही और राजापुर जैसे कई बड़े गाँव सई नदी के किनारे बसे हुए हैं। वहीं नदी से लगे छोटे गाँव भी कम नहीं हैं।

कोई वक्त था जब नदी के पानी से ही घर का खाना पकता था और लोग पीते भी थे। अधिकांश जगहों पर पानी जमीन की सतह के बहुत नीचे मिलता है। गाँव वाले बताते हैं कि कुएँ से एक बाल्टी पानी के लिये ‘साठ हाथ’ पानी खींचना पड़ता है। यह पानी भी खारा होता है। इसमें अगर दाल पकाएँ तो वह गलती नहीं है। इतना ही नहीं अब इन गाँवों के मवेशी नदी का पानी नहीं पी सकते।

महुआर गाँव के लोगों ने बताया कि पालतू पशुओं को नदी के करीब नहीं जाने दिया जाता। तेज गर्मी में अगर किसी जानवर ने आदतन पानी पी लिया तो उसकी मौत हो जाती है। बाद में मुझे पता लगा कि जल में घुलने वाले ऑक्सीजन की अत्यधिक कमी के कारण यहाँ के पानी में मछलियाँ नहीं के बराबर रह गई हैं। पानी में घुल रहे औद्योगिक कचरे का धात्विक आयन जलीव जीवों के भीतर एकत्र होता रहता है और उन्हें खत्म कर देता है। इस प्रदूषण का असर मनुष्यों पर भी होता है। यह इंसानों में लेड विषाक्तता और पारद विषाक्तता को जन्म देता है। इसका असर धीरे-धीरे होता है और लम्बे समय तक बना रहता है।

सई नदी के जल से देवताओ के स्नान की परम्परा थी। घुश्मेश्वर का धाम सई नदी के किनारे स्थित है। भगवान घुश्मेश्वर बाबा को भक्त सई नदी के जल से स्नान कराते थे। इसी तरह प्रतापगढ़ के बेल्हा देवी मन्दिर में सई नदी के जल से माँ बेल्हा देवी का अलंकार किया जाता था। पानी प्रदूषित होने के कारण यह भी बन्द हो चुका है। यह नदी इस इलाके के लोगों के भोजन का साधन थी, आमदनी थी, उत्सव थी या कुल मिलाकर कहें तो पूरा-का-पूरा जीवन ही थी। इन दिनों जब मई-जून की भीषण गर्मी पड़ती है तो सई नदी सूखने की कगार पर पहुँचने लगती है। जल के स्थान पर जगह-जगह बालू के रेतीले टापू नजर आते हैं।यह विषैलापन पूरी पारिस्थितिकीय को प्रभावित कर रहा है। रायबरेली समेत कई पश्चिमी जिलों की फैक्टरियों से गिरने वाले औद्योगिक कचरे से सई नदी का पानी इस कदर जहरीला हो चुका है कि यह राजेपुर के पास गोमती और कैथी (वाराणसी) में गंगा को भी प्रदूषित करता है। महुआर, बैत पट्टी, रुद्रपुर, कादीपुर, चलाकपुर, पिपरी, सुनारी, बोदी, खजुनी, गोपालपुर, बशीरपुर, देवलहा, मतुई जैसे गाँवों की लम्बी सूची मैं नोटबुक पर लिखता जा रहा था जो नदी से सीधे जुड़े थे। किसी जमाने में मल्लाह नदी के किनारे तरबूज की खेती करते थे। इन खेतों की सिंचाई नदी के पानी से ही होती थी। अब यह सब कुछ खत्म हो चुका है।

लोगों ने जब यह बताया कि विषैले पानी के कारण नदी की मछलियाँ अब लगभग खत्म हो चुकी हैं तो यह भी पता लगा कि किस तरह दस साल पहले कई गाँव आजीविका के लिये मछली पर ही आश्रित थे। रोहू, टेंगर और पहिना ऐसी मछलियाँ थीं जिन्हें इसी नदी से पकड़कर बेचा जाता था।

सई नदी के तटीय इलाकों में पानी के भीतर अजगर भी पाये जाते थे। मछली पकड़ने वाले इन अगजरों से खूब वाकिफ थे। मगर प्रदूषित पानी के कारण न तो अब इन अगजरों को न तो खाने के लिये मछलियाँ मिलती थीं और न ही ये नदी के भीतर अपना ठिकाना बना सके। लोगों ने बताया कि इन दिनों अक्सर किसी गाँव के आसपास तपती धूप से परेशान ये अगजर चोटिल अथवा घायल पड़े मिल जाते हैं। सैकड़ों बरस में जहाँ उनकी प्रजाति पनपती रही अब वही जगह उनकी मौत की वजह बन रही थी।

दोपहर ढल रही थी। मैं गाँव से लौट पड़ा। धूल में लिपटे अधनंगे लड़के कुछ दूर तक शोर मचाते हुए गाड़ी के पीछे दौड़ते रहे और धीरे-धीरे निगाहों से ओझल हो गए।

सड़क पर पीछे की तरफ भागते पेड़ों के झुरमुट के पीछे नदी के किनारे मन्दिरों की यदा-कदा झलक दिख जाती थी। कभी इन मन्दिरों में सई नदी के जल से देवताओ के स्नान की परम्परा थी। घुश्मेश्वर का धाम सई नदी के किनारे स्थित है। हमारे साथ गाड़ी में चल रहे एक गाँव वाले ने बताया कि भगवान घुश्मेश्वर बाबा को भक्त सई नदी के जल से स्नान कराते थे। इसी तरह प्रतापगढ़ के बेल्हा देवी मन्दिर में सई नदी के जल से माँ बेल्हा देवी का अलंकार किया जाता था। पानी प्रदूषित होने के कारण यह भी बन्द हो चुका है।

कुल मिलाकर यह नदी इस इलाके के लोगों के भोजन का साधन थी, आमदनी थी, उत्सव थी या कुल मिलाकर कहें तो पूरा-का-पूरा जीवन ही थी। इन दिनों जब मई-जून की भीषण गर्मी पड़ती है तो सई नदी सूखने की कगार पर पहुँचने लगती है। जल के स्थान पर जगह-जगह बालू के रेतीले टापू नजर आते हैं। राजेपुर, विजईपुर व ऊदपुर... इन तीन गाँवों के पास सई-गोमती का संगम होता है। सई ऊदपुर ग्राम की तरफ से कई बीघा उत्तर दिशा में कटाव ले चुकी है।

अगले दिन हम रायबरेली में थे।

मेरे हाथों में फिरोज गाँधी महाविद्यालय के प्राणि विज्ञान विभाग की रिपोर्ट थी। सई नदी पर तैयार की गई इस रिपोर्ट के लिये नदी के किनारे धार्मिक, सामाजिक और औद्योगिक महत्त्व की कुल 11 जगहें चुनी गई थीं, जैसे गौसगंज (हरदोई), बनी (उन्नाव), जगदीशपुर, बेला-प्रतापगढ़ (प्रतापगढ़) और राजापुर त्रिमुहानी (जौनपुर)।

रिपोर्ट में जल के नमूनों का रासायनिक विश्लेषण मौजूद है। रिपोर्ट से पता लगता है कि सई नदी के पानी में विलयशील ऑक्सीजन की मात्रा कम होती जा रही है। जल में लेड, क्रोमियम, निकेल, कोबाल्ट जैसे विषैले धात्विक आयनों की मात्रा सामान्य से बहुत ज्यादा थी। रायबरेली में राजघाट पुल के पास लिये गए नमूनों में रोग कारक जीवाणुओं की संख्या बहुत अधिक पाई गई।

कुछ साल पहले इलाहाबाद विश्वविद्यालय में रसायनशास्त्र विभाग के रीडर एके श्रीवास्तव के निर्देशन में दिनेश कुमार सिन्हा ने सई नदी पर चल रही रिसर्च में एक नई चीज जोड़ी। जल की गुणवत्ता के मानकों के आधार पर पानी का परीक्षण किया गया था। मानक के अनुसार 50 से कम पर ही नदी का पानी मनुष्यों के लिये अनुकूल होता है और अगर मानक स्तर 100 के ऊपर जाता है तो इसे अत्यधिक प्रदूषित माना जाता है। रायबरेली के ही दस अलग-अलग स्थानों से लिये गए नमूनों में इसका अधिकतम स्तर 205.5 पाया गया। शोध छात्रों की टीम ने बताया कि प्रदूषण की सबसे बड़ी वजह रायबरेली की चीनी मिल, पेपर मिल का रासायनिक कचरा और नगरपालिका के अवशिष्ट हैं जो सीधे नदी में गिरते हैं।

हम वापस लौट आये थे। सई नदी पर मेरी दो छोटी-छोटी रिपोर्ट अखबार में प्रकाशित हुई।

इसके बाद करीब 14 साल बीत चुके हैं। हालात और बिगड़ चुके हैं। अखबारों में रिपोर्ट अब भी छपती हैं। सई नदी अब दम तोड़ रही है। उन्नाव में असोहा के पास से गुजरती नदी का जल लगभग सूख चुका है। नदी किनारे जर्जर नावें औंधी पड़ी हैं। मल्लाहों के पास रोजी-रोटी का कोई जरिया नहीं है।

एक अखबार के उन्नाव संस्करण में छपी खबर तो जैसे सई नदी की दुर्दशा को बयान करती हुई कविता करने लगती है। देखें- “नदी की कोर पर बैठे साधु सन्त पवित्र डुबकी लगाने को तरस रहे हैं। पशु पंक्षी भी इस नदी का पवित्र पी प्यास बुझाने की आस छोड़ इधर उधर सूखी चोंच खोले उड़ चले हैं। वर्षों से वेलौरा चौपई, भाउमऊ, मझेरिया, पथरहा सोहा रामपुर, सेमरी आदि गाँवों की निषाद विरादरी के सामने परिवार का भरण-पोषण की गम्भीर समस्या है। नदी में अब न तो कहीं नाव दिखाई पड़ती हैं न ही मछली पकड़ने वाले जाल। धोबी घाट भी उजड़ गए हैं। धोबी समाज के लोग नदी के किनारे हइया-छू करते कपड़े धोते नजर आते हैं।”

हजारों वर्ष प्राचीन सई नदी का अब लोक जीवन से तादात्म्य टूट चुका है। अखबारों में लगातार छपने वाली खबरें बताती हैं कि कभी आस्था का केन्द्र बनी इस नदी किनारे के बसे हजारों गाँवों के लोग ही इसे प्रदूषित कर रहे हैं। सैकड़ों गाँवों के गन्दे नाबदान का पानी इसी नदी में खोल दिया गया है। कूड़ा-करकट या फिर खर-पतवार सब कुछ नदी में फेंका जा रहा है। मृत व्यक्तियों के अन्तिम संस्कार से लेकर पशु पक्षियों के शव भी इसी नदी की कोख में समा रहे हैं। नदी के विशाल रेतीले तटों पर बालू खनन माफिया घूम रहे हैं। नदी में भटककर पहुँचे कछुओं का लगातार चोरी-छिपे शिकार चल रहा है। रायबरेली में सई नदी के आसपास गन्दगी लगातार बढ़ रही है। अब वहाँ का भी सारा कूड़ा नदी किनारे फेंका जाने लगता है। इसमें मरे हुए जानवर भी शामिल हैं। आसपास से गुजरते ‘सभ्य’ लोग नाक रुमाल रखकर निकलते हैं।

यह एक छोटी नदी की त्रासद महागाथा है। रिपोर्टिंग के दौरान जिसके बारे में किसी सरकारी अफसर ने ‘नाला’ कहते हुए बातचीत की थी। इस पर रिपोर्ट नहीं शायद एक महाकाव्य लिखे जाने की जरूरत थी। इसका मर्म प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट नहीं बयान कर सकती। यह वो नदी है जिससे जुड़ी राम का कथाएँ थीं, हजारों गाँव की सुबह और शाम में उसकी लहरों का स्वर गूँजता था। नदी में मछलियाँ थीं, किनारों पर उड़ते परिन्दे थे। तट पर लोग बालू खोदते थे तो दो-ढाई फीट पर पीने का स्वच्छ पानी निकल आता था। नदी हर गाँव में बहती थी। हर घर में बहती थी। हर मन्दिर, हर मन में।

हम अपने भीतर को तब पहचानते हैं जब बाहर से रू-ब-रू होते हैं। मन के आइने में परावर्तित बाहरी छवियाँ ही शायद हमारा संस्कार बन जाती हैं। नदियाँ शायद हमारे जीवन का संस्कार थीं। जो नदी किनारे नहीं रहे वो भी जीवन की उस अजस्र अलौकिक कल-कल से सिंचित होते थे। सई तो बाहर सूखी, लेकिन हम सबके भीतर भी एक नदी सूख चुकी है।

सम्पर्क
दिनेश श्रीनेत
9910999370
ईमेल - dshrinet@gmail.com
 

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