सतलुज नदी की पर्यावरणीय स्थिति

Submitted by RuralWater on Sat, 10/29/2016 - 16:44

एक ओर नदियों में पानी का कम होना और दूसरी ओर पानी का प्रदूषित होते जाना समस्या को लगातार पेचीदा बना रहा है। सतलुज की स्थिति भी कोई अच्छी नहीं है। नदी किनारे के शहरों और औद्योगिक इकाइयों का प्रदूषित पानी नदियों में डाले जाने के कारण नदी का पानी गन्दा होता जा रहा है। लुधियाना से आगे के भाग की हालत सबसे खराब है। लुधियाना में 300 के लगभग बड़े और मध्यम दर्जे के उद्योग हैं और 50,000 के करीब लघु उद्योग इकाइयाँ हैं। सतलुज नदी सिंधु जल तंत्र की सबसे पूर्वी और सबसे लम्बी नदी है। इसे संस्कृत में शतद्रु कहा जाता था। तिब्बत के राक्षस ताल से निकलकर यह 260 किलोमीटर सफर तय करके शिपकिला में भारत के हिमाचल प्रदेश में दाखिल होती है। हिमाचल प्रदेश में इस पर कड़छम-वांगतू 1000 मेगावाट, नाथपा झाकड़ी 1530 मेगावाट, कोलडैम 800 मेगावाट, भाखड़ा 1000 मेगावाट की जलविद्युत परियोजनाएँ बनाई गई हैं। कुछ और प्रस्तावित हैं, जिनमें खाब-शासो प्रमुख है।

भाखड़ा से दक्षिण-पश्चिम में बहते हुए यह फिरोजपुर के पास व्यास नदी में मिलकर पाकिस्तान के भेड़ियाँ-कलां से 15 किलोमीटर पूर्व में पाकिस्तान में दाखिल हो जाती है। उच्च-शरीफ के 17 किलोमीटर उत्तर में यह चेनाब से मिल जाती है। यहाँ से आगे इसका नाम पंचनद हो जाता है। पंचनद बहावलपुर से लगभग 100 किलोमीटर पश्चिम में सिंध से मिल जाती है।

ऐसा माना जाता है कि 4 से 5 हजार साल पहले सतलुज, घग्गर के साथ मिलकर दक्षिण-पूर्व की ओर बहती थी। यही सरस्वती नदी कहलाती थी। हजारों साल पहले भूगर्भ में टेक्टोनिक गतिविधियों से उस क्षेत्र की चट्टानों की सतह ऊपर उठती गई और सतलुज का प्रवाह सिंध की ओर मुड़ गया।

अब सतलुज यमुना लिंक नहर बनाकर सतलुज को पहले यमुना फिर गंगा से जोड़ने की योजना है। इससे गंगा-यमुना से सतलुज तक सस्ता जहाजरानी मार्ग मिल जाएगा और हरियाणा के असिंचित क्षेत्र की सिंचाई सम्भव हो जाएगी, लेकिन पंजाब इस पानी को हरियाणा को देने को तैयार नहीं है। उसका तर्क है कि जिस समय जल बँटवारे के समझौते हुए हैं, उसके बाद अब पंजाब को आने वाली हिमालयी नदियों का जल बहुत कम हो चुका है।

इसलिये नदी तटीय अधिकार के सिद्धान्त के अनुसार पंजाब केवल अपनी जरूरत से फालतू पानी ही देने का जिम्मेदार है, क्योंकि पंजाब के पास अपनी जरूरत से ज्यादा पानी नहीं है। अत: वह हरियाणा को पानी नहीं देगा। अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है।

असल में हिमालयी नदियों में पानी के कम होने का कारण तो जलवायु परिवर्तन है। इसका समाधान तो हिमालय में जल संरक्षण के उपाय करके कुछ हद तक सम्भव है। वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण हिमालय में हिमरेखा पीछे की ओर खिसक रही है। बर्फ गिरने की मात्रा भी कम हो गई है।

अब हिमालयी वनों के संरक्षण और पानी के किफायती इस्तेमाल से ही समस्याओं का हल निकल सकता है। हिमालयी प्रदेशों को अपने वनों के संरक्षण के लिये अतिरिक्त सहायता राशि दी जानी चाहिए, ताकि धन की कमी के चलते वन संरक्षण कार्य में बाधा न आये। एक ओर नदियों में पानी का कम होना और दूसरी ओर पानी का प्रदूषित होते जाना समस्या को लगातार पेचीदा बना रहा है।

सतलुज की स्थिति भी कोई अच्छी नहीं है। नदी किनारे के शहरों और औद्योगिक इकाइयों का प्रदूषित पानी नदियों में डाले जाने के कारण नदी का पानी गन्दा होता जा रहा है। लुधियाना से आगे के भाग की हालत सबसे खराब है। लुधियाना में 300 के लगभग बड़े और मध्यम दर्जे के उद्योग हैं और 50,000 के करीब लघु उद्योग इकाइयाँ हैं। इनमें इलेक्ट्रो प्लेटिंग, रंगाई, कई तरह के रासायनिक उद्योग शामिल हैं। इनका असंशोधित प्रदूषित जल लुधियाना के बीच से बहते बुड्ढा-नाला में डाल दिया जाता है।

यह नाला आगे जाकर वलीपुर-कलां में सतलुज में मिल जाता है। एक समय बुड्ढा नाला शुद्ध पानी का स्रोत था। इसमें मछली भी पाई जाती थी, लेकिन अब यह गन्दा नाला बन चुका है। इसमें किसी भी जल जीव का जिन्दा रहना अब सम्भव ही नहीं है। सतलुज में मिलकर सतलुज के जल जीवों को भी यह नुकसान पहुँचा रहा है। इसमें शहरी मल-जल और औद्योगिक प्रदूषित जल की भारी मात्रा विद्यमान है।

इसी प्रदूषित जल को सतलुज से निकलने वाली नहरों द्वारा पंजाब के बड़े हिस्से में सिंचाई के लिये प्रयोग किया जाता है। इस पानी का कुछ भाग राजस्थान को भी दिया जाता है, जिससे फसलों में भी प्रदूषण के फैलने के हालत बन गए हैं। यह रोग फैलने का कारण बन रहा है।

2008 में पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से किये गए एक अध्ययन से सामने आया कि बुड्ढा नाला के साथ लगते गाँवों में भूजल और नलों से दिये जा रहे पानी में कैल्शियम, मैग्नीशियम, फ्लोराइड, पारा, बीटा-एंडोसल्फान, हैप्टाक्लोर, एमोनिया, फॉस्फेट, संखिया, निकल, और सेलेनियम जैसे जहरीले पदार्थों की मात्रा सुरक्षित स्तर से बहुत ही ज्यादा थी।

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार बुड्ढा नाला के पानी को शुद्ध करने के लिये 6,80,000 घन मीटर प्रशोधन क्षमता प्रतिदिन होनी चाहिए, जबकि जमालपुर, नालों के और भाटियाँ प्रशोधन संयंत्रों की कुल क्षमता केवल 311 मिलियन लीटर प्रतिदिन है। यह नाला सतलुज में मिलकर सिंचाई के माध्यम से स्वास्थ्य के लिये कितना खतरा पैदा कर रहा है।

इस बात का अध्ययन किया जाना चाहिए। इसके प्रशोधन की समुचित व्यवस्था की जानी चाहिए। दक्षिण पंजाब और राजस्थान में जहाँ तक यह पानी जा रहा है वे इलाके इस नुकसान की चपेट में आ चुके हैं। वर्तमान विकास के मॉडल का यह सबसे दुविधाजनक पहलू है कि ज्यों-ज्यों विकास आगे बढ़ता है, प्रदूषण की समस्या नियंत्रण से बाहर होती जाती है।

हम लोग और सरकारें तात्कालिक लाभ के लिये आँखें बन्द किये रहते हैं, जबकि इसका जहाँ तक समाधान सम्भव है, वहाँ तक कोई कोताही नहीं बरती जानी चाहिए। केवल पैसा कमाने के लिये इस कद्र जिन्दगी को दाँव पर नहीं लगाया जा सकता।

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