समुद्री हाइड्रोकार्बन, बैक्टीरिया और गैस हाइड्रेट्स विश्व ऊर्जा के भावी संकटमोचक

Submitted by UrbanWater on Thu, 03/16/2017 - 10:57

हाइड्रोकार्बन स्थल के साथ-साथ समुद्र में बहुतायत में पाये जाते हैं। समुद्र में उपस्थित हाइड्रोकार्बनों को ही समुद्री हाइड्रोकार्बन कहा जाता है। समुद्र तल के नीचे चट्टानों में पाये जाने वाले ये हाइड्रोकार्बन पृथ्वी के सबसे महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों में से एक हैं। वास्तव में हाइड्रोकार्बन वे रासायनिक यौगिक होते हैं जो सिर्फ दो तत्वों कार्बन और हाइड्रोजन से बने होते हैं। सरल भाषा में समझें तो प्रत्येक हाइड्रोकार्बन अणु में कार्बन परमाणु एक 'मेरुदण्ड' या 'कार्बन-कंकाल' की भाँति होता है, जिससे हाइड्रोजन परमाणु जुड़े होते हैं।

वर्तमान में विश्व में विभिन्न क्षेत्रों में लगातार ऊर्जा की बढ़ती खपत को दृष्टिगत रखते हुए ऊर्जा विशेषज्ञों ने आगामी वर्षों में प्राकृतिक परम्परागत ऊर्जा स्रोतों से ऊर्जा की नियमित आपूर्ति के लिये चिन्ता जताई है। प्राकृतिक तेल और गैस हमें ईंधन प्रदान करते हैं, जिसका उपयोग हम खाना पकाने से लेकर बिजली स्टेशनों, मोटर वाहनों और हवाई जहाजों तक के लिये करते आ रहे हैं।

आज बॉटलों से लेकर मोबाइल फोनों तक सभी प्रकार के प्लास्टिक उत्पादों को बनाने और कारखानों और खेती में प्रयुक्त रसायनों के लिये भी प्राकृतिक तेल का प्रयोग किया जाता है। संक्षेप में, हमारा आधुनिक विश्व समाज प्राकृतिक तेल और गैस, जिनको आमतौर पर हाइड्रोकार्बन या जीवाश्म ईंधन के रूप में जाना जाता है कि एक सतत आपूर्ति पर काफी निर्भर हो गया है।

समुद्री हाइड्रोकार्बन क्या हैंॽ


हाइड्रोकार्बन स्थल के साथ-साथ समुद्र में बहुतायत में पाये जाते हैं। समुद्र में उपस्थित हाइड्रोकार्बनों को ही समुद्री हाइड्रोकार्बन कहा जाता है। समुद्र तल के नीचे चट्टानों में पाये जाने वाले ये हाइड्रोकार्बन पृथ्वी के सबसे महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों में से एक हैं। वास्तव में हाइड्रोकार्बन वे रासायनिक यौगिक होते हैं जो सिर्फ दो तत्वों कार्बन और हाइड्रोजन से बने होते हैं। सरल भाषा में समझें तो प्रत्येक हाइड्रोकार्बन अणु में कार्बन परमाणु एक 'मेरुदण्ड' या 'कार्बन-कंकाल' की भाँति होता है, जिससे हाइड्रोजन परमाणु जुड़े होते हैं।

वर्तमान में विश्व के अधिकांश देशों में हाइड्रोकार्बन विद्युत ऊर्जा और ऊष्मा ऊर्जा के मुख्य स्रोत के रूप में प्रयुक्त हो रहे हैं क्योंकि ये जलने पर बड़ी मात्रा में ऊष्मा उत्पन्न करते हैं। ऑटोमोबाइलों में ईंधन के रूप में प्रयुक्त पेट्रोल मुख्य रूप से हाइड्रोकार्बन ही होते हैं। इसके अलावा, अनेक हाइड्रोकार्बनों का उपयोग कई उपभोक्ता उत्पादों और औद्योगिक पदार्थों के उत्पादन के लिये प्रयुक्त कार्बनिक रसायनों के संश्लेषण के लिये आधार सामग्री के रूप में भी किया जाता है।

आर्थिक रूप से महत्त्वपूर्ण हाइड्रोकार्बनों के अन्तर्गत जीवाश्म ईंधन जैसे कोयला, पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस और इनके व्युत्पन्न जैसे प्लास्टिक, पैराफिन, मोम, सॉल्वैंट्स और तेल शामिल हैं। पेट्रोलियम हाइड्रोकार्बन का एक द्रव रूप होता है, जबकि प्राकृतिक गैस हाइड्रोकार्बन का गैस रूप तथा गैस हाइड्रेट्स हाइड्रोकार्बन का ठोस रूप होते हैं।

समुद्री हाइड्रोकार्बन कहाँ मिलते हैंॽ


ऊर्जा, परिवहन और पेट्रो रसायन उद्योग के लिये विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हाइड्रोकार्बन के स्रोत तलछटी चट्टानों में भरे पड़े तेल भण्डार हैं। आमतौर पर हाइड्रोकार्बन समुद्र तल के नीचे तलछटी चट्टानों में महाद्वीपों के किनारों से संलग्न पाये जाते हैं, जहाँ ये पिछले भूवैज्ञानिक काल में नदियों द्वारा लाये गए अवसादों (मिट्टी, गाद, रेत और बजरी के कण) और उनके साथ फँसकर आये पादपों और जीवों के मृत कार्बनिक पदार्थों की मोटी परतों के रूप में जमा होने से बने हैं।

इस तरह लाखों साल पहले, इन अवसादों के उत्तरोत्तर दबते जाने से वे चट्टानों (बलुआ पत्थर और शैलों) में बदलते गए और उनमें फँसकर आये कार्बनिक पदार्थ उच्च तापमानों और दबावों के कारण हाइड्रोकार्बन में बदल गए। वास्तव में हाइड्रोकार्बन कार्बनिक पदार्थों युक्त शैलों में बनते हैं, इसके बाद ये दरारों से रिसते हुए अत्यधिक छिद्रित और पारगम्य चट्टानी संरचनाओं जैसे बलुआ पत्थर और चूना पत्थर में भण्डारों के रूप में जमा हो जाते हैं। अतः ये हाइड्रोकार्बन पृथ्वी की उपसतह से राल रेत (tar sands) और तेल शेल (oil shale) से खनन द्वारा निकाले जाते हैं।

समुद्र में खनन और दोहन क्योंॽ


समुद्र पृथ्वी में उसके स्थल भाग की अपेक्षा चार गुना अधिक विस्तारित है और संसाधनों की दृष्टि से भी कई गुना अधिक समृद्ध है। समुद्र हमेशा से मानव के अधिशोषण करने की प्रवृत्ति के लिये एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र रहा है। कई दशकों से मनुष्य मछली, तेल और गैस के रूप में समुद्री संसाधनों का उपभोग करता आ रहा है।

वैज्ञानिक बिरादरी में सन 1960 में पहली बार गहरे समुद्र में खनन की अवधारणा सामने आई थी, लेकिन यह देखा जा रहा है कि पिछले कुछ वर्षों में समुद्र खनन की प्रक्रिया से सम्बन्धित सैद्धान्तिक व प्रायोगिक वैज्ञानिक अध्ययनों व व्यावहारिक मानवजनित प्रयोगों में काफी तेजी से वृद्धि हुई है। इसका कारण सम्भवतः यह हो सकता है कि पिछले दशकों के दौरान प्रौद्योगिकियों के अद्यतन व संशोधन के लिये बहुमूल्य धातुओं की माँग काफी बढ़ी है, अतः इसकी आपूर्ति के लिये व्यावसायिक संचालकों का ध्यान गहरे समुद्र में जमा इन संसाधनों की ओर आकर्षित होना स्वाभाविक है।

हाल ही के कुछ वर्षों में अब समुद्री पर्यावरण को अक्षय ऊर्जा के स्रोत के रूप में लक्षित किया गया है। विश्व में हाइड्रोकार्बन जैसे प्राकृतिक गैस, तेल आदि का अधिकांश उत्पादन समुद्री कूपों के खनन द्वारा किया जाता है। भारत में तटीय अरबसागर एवं बंगाल की खाड़ी में से पेट्रोलियम पदार्थों का दोहन किया जाता है। इनमें से अरबसागर का बॉम्बे हाई नामक क्षेत्र अत्यधिक प्रसिद्ध है।

यद्यपि वैज्ञानिक बिरादरी में सन 1960 में पहली बार गहरे समुद्र में खनन की अवधारणा सामने आई थी, लेकिन यह देखा जा रहा है कि पिछले कुछ वर्षों में समुद्र खनन की प्रक्रिया से सम्बन्धित सैद्धान्तिक व प्रायोगिक वैज्ञानिक अध्ययनों व व्यावहारिक मानवजनित प्रयोगों में काफी तेजी से वृद्धि हुई है। इसका कारण सम्भवतः यह हो सकता है कि पिछले दशकों के दौरान प्रौद्योगिकियों के अद्यतन व संशोधन के लिये बहुमूल्य धातुओं की माँग काफी बढ़ी है, अतः इसकी आपूर्ति के लिये व्यावसायिक संचालकों का ध्यान गहरे समुद्र में जमा इन संसाधनों की ओर आकर्षित होना स्वाभाविक है।

वर्तमान में तकनीकों के विकास के साथ ही हाइड्रोकार्बनों के अलावा अन्य पदार्थों जैसे बहुधात्विक सल्फाइडों (polymetallic sulphides), मैंगनीज पिंडों (manganese nodules) और कोबाल्ट-समृद्ध फेरोमेंगनीज पर्पटियों (cobalt-rich ferromanganese crusts) के लिये भी समुद्री खनन किया जाने लगा है। हाइड्रोकार्बन के एक स्रोत के रूप में गैस हाइड्रेट्स का निष्कर्षण भी आजकल वैज्ञानिकों के शोध का विशेष रुचिकर विषय बनता जा रहा है।

भारत के खनन मंत्रालय ने भी प्राइवेट कम्पनियों की सहायता से अब समुद्र के नीचे से परमाणु सम्बन्धी पदार्थ व अन्य कीमती धातुओं को निकालने की योजना के तहत समुद्र के नीचे खनन के लिये पचास ब्लॉक (स्थान) तय किये हैं। इसके लिये दक्षिण भारत, बंगाल व अरब सागर में सम्भावनाएँ खोजी जा रही हैं। विशेषतौर पर आन्ध्र प्रदेश, उड़ीसा, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, केरल, गुजरात, पुदुचेरी, अंडमान में इसके लिये स्थान तय किये जा रहे हैं। अतः इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि भविष्य में हाइड्रोकार्बनों का उत्खनन समुद्रों से ही किया जाएगा।

हाइड्रोकार्बन बैक्टीरिया क्या हैंॽ


वैज्ञानिकों के अनुसार प्रकाश संश्लेषक बैक्टीरिया (photosynthetic bacteria) विश्व महासागरों में प्रतिवर्ष लाखों टन हाइड्रोकार्बन उत्पादित कर रहे हैं। महासागरों में दो प्रकार के हाइड्रोकार्बन बैक्टीरिया पाये जाते हैं एक हाइड्रोकार्बन-उत्पादक और दूसरे हाइड्रोकार्बन-निम्नीकरण बैक्टीरिया, जो एक दूसरे के साथ सन्तुलन में उपस्थित होते हैं। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं की अन्तरराष्ट्रीय टीम का अनुमान है कि महासागरों में साइनोबैक्टीरिया (cyanobacteria) की प्रमुख रूप से दो प्रजातियाँ प्रोक्लोरोकोकस (Prochlorococcus) और सिनेकोकोकस (Synechococcus) हाइड्रोकार्बन की अधिकांश मात्रा उत्पादित करती हैं।

हालांकि, साइनोबैक्टीरिया द्वारा उत्पादित हाइड्रोकार्बन की यह मात्रा लगातार दूसरे प्रकार के हाइड्रोकार्बन-निम्नीकरण बैक्टीरिया द्वारा अपघटित की जाती रहती है। गामाप्रोटिओबैक्टीरिया (Gammaproteobacteria) जैसे एल्केनिवोरेक्स (Alcanivorax), मेरिनोबेक्टर (Marinobacter) स्यूडोमोनास (Pseudomonas) और एसीनेटोबेक्टर (Acinetobacter) तथा एल्फाप्रोटिओबैक्टीरिया (Alphaproteobacteria) प्रमुख रूप से हाइड्रोकार्बन-निम्नीकरण बैक्टीरिया के रूप में पहचाने गए हैं। जब कभी भी समुद्र में तेल रिसाव जैसी घटना होती है, तब हाइड्रोकार्बन-निम्नीकरण बैक्टीरिया ही उसका अपघटन तेजी से करने लगते हैं।

कुछ शोध संस्थानों में इन हाइड्रोकार्बन बैक्टीरिया को कृत्रिम रूप से संवर्धित करने में भी सफलता मिली है। चूँकि प्राकृतिक रूप से हाइड्रोकार्बनों के निर्माण में लाखों वर्ष लग जाते हैं और बढ़ती हुई ऊर्जा की माँग को देखते हुए इन स्रोतों का भविष्य असुरक्षित है। अतः ऊर्जा की भावी माँग को दृष्टिगत रखते हुए अन्य वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की खोज तथा उनका विकास किया जा रहा है। परन्तु यह भी सत्य है कि हाइड्रोकार्बनों का विकल्प वे स्वयं ही हैं।

अतः हाइड्रोकार्बन बैक्टीरिया से भविष्य के लिये ऊर्जा तथा औद्योगिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु हाइड्रोकार्बनों के निर्माण की अपार सम्भावनाएँ हैं। यह भी सत्य है कि यदि बैक्टीरिया द्वारा व्यावहारिक रूप से हाइड्रोकार्बन का उत्पादन सफल होता है, तो इससे न केवल भविष्य में ऊर्जा की चिन्ताओं से मुक्ति मिलेगी, वरन यह एक अभूतपूर्व उपलब्धि भी होगी। जैसा कि माना जाता है कि पृथ्वी पर जीव की उत्पत्ति सूक्ष्मजीवी के रूप में समुद्र से हुई है। अब समुद्र के ही ये सूक्ष्मजीव, पृथ्वी के सबसे विकसित जीव मानव की भविष्य की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये मार्गदर्शक बनेंगे।

प्राकृतिक दृष्टि से भारत में तेल या गैस इतनी मात्रा में नहीं है कि वह उनके लिये पूरी तरह आत्मनिर्भर हो। अतः ऊर्जा की अत्यधिक कमी और लोगों की बढ़ती घरेलू माँगों को पूरा करने के लिये भारत हर साल लगभग 160 अरब अमेरिकी डालर का तेल और गैस का आयात करता है। वैसे तो भारत विश्व का सातवाँ बड़ा पेट्रोलियम उत्पादक देश है, लेकिन कुल वैश्विक उत्पादन में इसकी भागीदारी मात्र 2.5 प्रतिशत ही है। ऊर्जा सुरक्षा प्राप्त करने के लिये भारत ने हाइड्रोकार्बन की खोज और खनन की सम्भावनाओं को लेकर वैश्विक कम्पनियों के साथ स्थायी तंत्र व नीतियाँ निर्धारित की हैं।

गैस या मीथेन हाइड्रेट्स क्या हैंॽ


गैस या मीथेन हाइड्रेट्स दबाव और तापमान की विशिष्ट परिस्थितियों के अन्तर्गत समुद्री तलछट में पाये जाने वाले मीथेन के जमाव हैं। उच्च दबाव और कम तापमान में जल के अणु बर्फ की भाँति दिखने वाले क्रिस्टलों का निर्माण करते हैं, जो मीथेन को उनकी जालनुमा रचना में फँसा लेते हैं। मीथेन के ये जमाव 300 मीटर या उससे अधिक की गहराई में वहाँ पाये जाते हैं, जहाँ कहीं भी अवसादों में पर्याप्त मीथेन और जल होता है। पृथ्वी के जैविक कार्बन का आधे से अधिक भाग मीथेन हाइड्रेट्स के रूप में पाया जाता है, जबकि बहुत कम भाग कुल जीवाश्म ईंधनों में निहित होता है।

गैस या मीथेन हाइड्रेट्स कहाँ मिलते हैंॽ


मीथेन हाइड्रेट्स या तो समुद्रतल के नीचे या आर्कटिक परामृदा के नीचे पाये जा सकते हैं। दुनिया भर के सभी महासागरों के नीचे अरबों और अरबों टन गैस हाइड्रेट जमे हुए पड़े हैं। विश्व स्तर पर अनेक सरकारी एजेंसियाँ, निजी ऊर्जा कम्पनियाँ और विश्वविद्यालय व शोध संस्थान समुद्र तल में जमे हुए विशाल तटीय मीथेन हाइड्रेटों की क्षमता और उनके उपयोग को लेकर काफी शोध कर रहे हैं। जल और मीथेन के अणुओं के साथ-साथ हाइड्रोकार्बन से बने इन क्रिस्टलीकृत पॉलिहेड्रल मीथेन हाइड्रेटों में 90 प्रतिशत मीथेन और 10 प्रतिशत उच्च श्रेणी वाले हाइड्रोकार्बन (मुख्य रूप से ईथेन, प्रोपेन, और कुछ ब्यूटेन) होते हैं। एक लीटर ठोस हाइड्रेट से 165 लीटर प्राकृतिक गैस प्राप्त की जा सकती है।

क्या भारत में भी हो रहे हैं हाईड्रोकार्बन व गैस हाइड्रेट सम्बन्धी शोधॽ


प्राकृतिक दृष्टि से भारत में तेल या गैस इतनी मात्रा में नहीं है कि वह उनके लिये पूरी तरह आत्मनिर्भर हो। अतः ऊर्जा की अत्यधिक कमी और लोगों की बढ़ती घरेलू माँगों को पूरा करने के लिये भारत हर साल लगभग 160 अरब अमेरिकी डालर का तेल और गैस का आयात करता है। वैसे तो भारत विश्व का सातवाँ बड़ा पेट्रोलियम उत्पादक देश है, लेकिन कुल वैश्विक उत्पादन में इसकी भागीदारी मात्र 2.5 प्रतिशत ही है। ऊर्जा सुरक्षा प्राप्त करने के लिये भारत ने हाइड्रोकार्बन की खोज और खनन की सम्भावनाओं को लेकर वैश्विक कम्पनियों के साथ स्थायी तंत्र व नीतियाँ निर्धारित की हैं।

भारत में पर्यावरण, सुरक्षा, पेट्रोलियम गतिविधियों के तकनीकी और आर्थिक पहलुओं में सन्तुलन बनाए रखते हुए तेल और प्राकृतिक गैस संसाधनों के कुशल प्रबन्धन को बढ़ावा देने के लिये 8 अप्रैल 1993 को हाईड्रोकार्बन महानिदेशालय (डी.जी.एच.) की स्थापना पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अन्तर्गत की गई। भारत के पास अनुमानतः 18,900 खरब घन मीटर के मीथेन हाइड्रेट्स के भण्डार हैं।

भारत और अमेरिका के एक संयुक्त वैज्ञानिक अभियान के तहत सन 2006 में केरल-कोंकण बेसिन, कृष्णा गोदावरी बेसिन, महानदी बेसिन और अण्डमान द्वीप समूह के आसपास के समुद्री क्षेत्रों में गैस हाइड्रेट्स के अन्वेषण किये गए थे। इनके अनुसार कृष्णा, गोदावरी बेसिन संसार का सबसे समृद्ध और सबसे बड़ा हाइड्रेट क्षेत्र है। इसके साथ ही महानदी बेसिन में भी हाइड्रेट्स का पता लगा है और अण्डमान क्षेत्र में समुद्र तल से 600 मीटर नीचे हाइड्रेट के सबसे सघन भण्डार पाये गए हैं।

भारत के विभिन्न समुद्री संस्थानों व विश्वविद्यालयों में गैस हाइड्रेट व अन्य हाईड्रोकार्बन सम्बन्धी शोधकार्य लगातार जारी हैं। राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान, गोवा के भारतीय राष्ट्रीय गैस हाइड्रेट कार्यक्रम अभियान के तहत भारतीय प्रायद्वीप के निष्क्रिय महाद्वीपीय मग्नतट से संलग्न भागों और अण्डमान अभिसारी मग्नतटों में पाये जाने वाले गैस हाइड्रेट्स की उपस्थिति और उनके भूवैज्ञानिक तथा भूरासायनिक नियंत्रणों को समझने के लिये शोध किये जा रहे हैं।

इन शोधों ने भी सबसे अधिक मोटाई में संचयित गैस हाइड्रेट के संचयनों में से एक को कृष्णा-गोदावरी बेसिन में और विश्व में सबसे मोटे व गहरे गैस हाइड्रेट स्थिरता क्षेत्रों में से एक को अण्डमान सागर में पाये जाने की पुष्टि की है और इन तीनों बेसिनों में एक पूर्ण विकसित गैस हाइड्रेट पेट्रोलियम तंत्र के अस्तित्व का प्रमाण मिला है। हालांकि उनको केरल-कोंकण बेसिन में गैस हाइड्रेट का कोई प्रमाण नहीं मिला है। अधिकांश गैस हाइड्रेट मृदा-बहुल तलछटों में दरार-भराव के रूप में अथवा छिद्र-भराव या दोनों सूक्ष्म व स्थूल-कणों वाले तलछटों में बिखरे हुए कण-विस्थापित अंशों के रूप में पाये गए हैं।

पिछले कुछ वर्षों से जापान सागर में उपस्थित अपतटीय गैस हाइड्रेट्स से मीथेन निकालने के लिये प्रयासरत जापान को अब इसमें सफलता मिल गई है। इसी तरह संयुक्त राज्य अमेरिका भी अलास्का के उत्तरी ढलान पर किये गए मीथेन हाइड्रेट्स सम्बन्धी अपने एक सफल परीक्षण के बाद इनका ऊर्जा स्रोत के रूप में प्रयोग करने के लिये विभिन्न अनुसन्धान परियोजनाओं पर कार्य कर रहा है। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के अनुसार विश्व में गैस हाइड्रेट्स में 10,000 से 100,000 खरब घन फुट के बीच प्राकृतिक गैस की मात्रा हो सकती है।

शोधों से स्पष्ट हुआ है कि भारत के अपतटीय क्षेत्रों में अधिकांशतया सभी हाइड्रेट्स में गैस सूक्ष्मजीवीय स्रोतों से उत्पन्न होती है; अण्डमान सागर में केवल एक ही स्थल पर एक ऊष्माजनित गैस स्रोत के सीमित प्रमाण प्रदर्शित हुए हैं। गैस हाइड्रेट पेट्रोलियम तंत्र की अवधारणा का भारत के अपतटीय क्षेत्रों में गैस हाइड्रेटों की उपस्थिति पर भूगर्भिक नियंत्रण को चिह्नित करने के लिये प्रभावी ढंग से उपयोग किया जा सकता है। भारत के पास संसार के सबसे बड़े मीथेन हाइड्रेट भण्डार होने के वरदान को तकनीकी प्रगति के माध्यम से यदि इसके दोहन का कोई सस्ता और सुरक्षित तरीका निकाला जा सका तो देश के लिये यह अत्यधिक लाभदायक सिद्ध हो सकता है।

क्या गैस (मीथेन) हाइड्रेट्स को भावी ऊर्जा स्रोत समझा जा सकता हैॽ


मीथेन उत्सर्जन की घटनाएँ भूमण्डलीय तापन, कार्बन चक्र के एकान्तरण तथा जैव प्रभाव से जुड़ी हुई हैं। गैस हाइड्रेट संसाधनों के आकलन से प्राप्त जानकारी के अनुसार हाइड्रेट संचयनों के भीतर उपस्थित गैस की वैश्विक प्रचुर मात्रा, गैस हाइड्रेट्स के प्रति बढ़ रही रुचि के पीछे का एक प्रमुख कारक है।

पिछले कुछ वर्षों से जापान सागर में उपस्थित अपतटीय गैस हाइड्रेट्स से मीथेन निकालने के लिये प्रयासरत जापान को अब इसमें सफलता मिल गई है। इसी तरह संयुक्त राज्य अमेरिका भी अलास्का के उत्तरी ढलान पर किये गए मीथेन हाइड्रेट्स सम्बन्धी अपने एक सफल परीक्षण के बाद इनका ऊर्जा स्रोत के रूप में प्रयोग करने के लिये विभिन्न अनुसन्धान परियोजनाओं पर कार्य कर रहा है।

अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के अनुसार विश्व में गैस हाइड्रेट्स में 10,000 से 100,000 खरब घन फुट के बीच प्राकृतिक गैस की मात्रा हो सकती है। हालांकि उनका मानना है कि इस गैस का कुछ भाग कभी भी उचित कीमतों पर सुलभ नहीं हो सकता। लेकिन यदि इस कुल ऊर्जा का एक अंश भी व्यावसायिक रूप से निष्कर्षित किया जा सका, तब भी इससे ऊर्जा की एक विशाल मात्रा प्राप्त की जा सकती है।

इस सन्दर्भ में अपने एक शोध का उदाहरण देते हुए उनका कहना है कि अमेरिका शेल भण्डारों (U.S. shale reserves) में लगभग 827 खरब घन फुट प्राकृतिक गैस उपस्थित होने का अनुमान है। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के एक और अनुमान के अनुसार जीवाश्म ईंधनों के सभी ज्ञात भण्डारों में निहित कार्बन की तुलना में गैस हाइड्रेट्स के अन्दर कार्बन की अधिक मात्रा फँसी हुई होती है।

निष्कर्ष


समुद्री हाइड्रोकार्बन विशेष रूप से हाइड्रोकार्बन बैक्टीरिया और मीथेन हाइड्रेट्स पर किये गए अब तक के शोधों से एक बात सामने निकलकर आती है कि यद्यपि इनमें प्रायोगिक तौर पर ऊर्जा की अपार सम्भावना है, परन्तु व्यावहारिक स्तर पर इसके दोहन की ठीक से शुरुआत भी नहीं हुई है। क्योंकि इसकी लागत और प्रत्यक्ष मीथेन उत्सर्जन के घातक प्रभाव को दृष्टिगत रखते हुए ऊर्जा विशेषज्ञ भी उलझन में हैं कि जब तक कोई उन्नत व प्रभावी मॉडल तैयार नहीं किया जाता, तब तक भावी वैकल्पिक ऊर्जा की सम्भावनाओं के बावजूद भी समुद्री हाइड्रोकार्बन बैक्टीरिया और मीथेन हाइड्रेट्स को विश्व ऊर्जा के भावी स्रोतों के रूप में निरुपित करने में समय अवश्य लग सकता है, परन्तु उनके एक उत्तम ऊर्जा स्रोत होने से इनकार भी नहीं किया जा सकता है।

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