आरओ को ना कहिए

Submitted by editorial on Fri, 09/07/2018 - 15:15

स्लो सैंड फिल्टरस्लो सैंड फिल्टर (फोटो साभार - विकिपीडिया)लोगों की स्मृति में तकनीकी विकास ने इतनी गहरी पैठ जमा ली है कि उन्होंने सदियों तक साथ देने वाले परम्परागत तौर-तरीकों से मुँह मोड़ लिया है। उदाहरण के तौर पर सामान्य जल को पेयजल के रूप में परिष्कृत करने के लिये आरओ (Reverse Osmosis) का प्रयोग इतना बढ़ गया है कि लोगों ने स्लो सैंड फिल्टर (Slow Sand Filter) जैसी परम्परागत तकनीक को एकदम भूला दिया।

प्रदूषित जल के इस्तेमाल से पैदा होने वाली बीमारियों ने अपना दायरा इतना बढ़ा लिया है कि शायद ही देश का कोई कोना इनकी गिरफ्त से बचा हो। उत्तराखण्ड के प्राकृतिक जलस्रोत भी प्रदूषण की गिरफ्त में हैं। अतः प्रदूषित जल के इस्तेमाल से पैदा होने वाली बीमारियों से लोगों को बचाने के लिये स्लो सैंड फ़िल्टर एक कारगर तरीका हो सकता है।

पहाड़ों की रानी मसूरी में लगभग 50 हजार लोगों को शुद्ध पेयजल, स्लो सैंड फिल्टर के माध्यम से उपलब्ध हो रहा है। चिकित्सकों का कहना है कि शुद्ध पेयजल वही है जिसमें पर्याप्त मात्रा में मिनरल उपलब्ध होते हैं। वे यह भी बताते हैं कि कृत्रिम फिल्टर पानी में उपस्थित मिनरल्स को बाहर निकाल देते हैं। इस तरह स्लो सैंड फिल्टर का इस्तेमाल आज भी प्रासांगिक है क्योंकि इससे मिले पानी में मिनरल्स की उपलब्धता पर्याप्त मात्रा में होती है।

पानी को साफ करने के लिये इस परम्परागत तकनीक का इस्तेमाल उत्तराखण्ड के कई हिस्सों में हो रहा है।

उल्लेखनीय है कि हिमकॉन संस्था ने अर्घ्यम के सहयोग से टिहरी के एक दर्जन गाँवों में स्लो सैंड फिल्टर टैंक का निर्माण कराया है। एक टैंक से प्रतिदिन 40 से 80 परिवारों को शुद्ध जल उपलब्ध कराया जा रहा है। इन गाँवों में टिहरी के चम्बा ब्लॉक के चोपड़ियाली सहित लगभग दर्जन भर गाँव ऐसे थे जहाँ गर्मी में हैजा जैसी संक्रामक बीमारी से लोगों की जान तक चली जाती थी।

इस समस्या से छुटकारा पाने के उद्देश्य से जब ग्रामीणों ने हिमकॉन संस्था के सहयोग से पानी के स्रोतों की जाँच करवाई तो पता चला कि सभी जलस्रोत प्रदूषित हो गए हैं। यही कारण था कि ग्रामीण भयंकर बीमारी की चपेट में घिरे रहते थे।

पानी के स्रोतों के प्रदूषित होने का कारण था गाँवों के सिरहाने पर रानी चौरी स्थित गोविन्द वल्लभ पन्त कृषि एवं वानिकी विश्वविद्यालय का परिसर। इस विश्वविद्यालय से निकलने वाला सीवर जलस्रोतों को प्रभावित कर रहा था। अतः जल को बिना साफ किये इस्तेमाल में लाना मौत को दावत देना था। स्लो सैंड फिल्टर ही इस समस्या के समाधान का एकमात्र उपाय था। आज सभी ग्रामीण शुद्ध पेयजल प्राप्त कर रहे हैं।

क्या है स्लो सैंड फिल्टर

स्लो सैंड फिल्टर के निर्माण में रेत, छोटे पत्थर व बड़े पत्थर के तीन लेयर बनाए जाते हैं। ये ऊँचाई में लगभग छह फिट, चौड़ाई में चार फिट और आकार में गोल होते हैं। पानी जब इस फिल्टर के तीनों लेयर से होकर निकलता है तो एकदम शुद्ध हो जाता है। इस विधि को नेशनल एन्वायरनमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (National Environmental Engineering Research Institute,NEERI) ने भी प्रमाणित किया है। ऐसा भी कह सकते हैं कि स्वच्छ पानी को प्रभावी ढंग से उपलब्ध कराने के लिये वर्तमान समय में यह एक नवाचार है। इस फिल्टर से 6 लीटर प्रति मिनट की दर से पीने योग्य पानी निकलता है जिसकी पाइपलाइन के माध्यम से आपूर्ति की जा सकती है।

यहाँ भी हो सकते हैं प्रयोग

वर्षा जलसंचयन के पारम्परिक तरीके जैसे चाल-खाल भी जल भण्डारण के साधन हैं। इनके जल को भी स्लो सैंड फिल्टर पद्धति से पीने योग्य बनाया जा सकता है। वर्षा का जो पानी ढलान से नीचे चला जाता है उसका इस्तेमाल इस फिल्टर के माध्यम से पेयजल के रूप में परिवर्तित करने के लिये किया जा सकता है। छत से गिरने वाले बारिश के पानी को भी इस तकनीक के प्रयोग से पीने योग्य बनाया जा सकता है।

टिहरी के चम्बा क्षेत्र में छत से गिरने वाले बारिश के पानी को 4,000 लीटर क्षमता वाले फेरोसीमेंट टैंकों में संकलित किया जा रहा है। इन टैंकों का निर्माण गाँव के लोग बड़ी संख्या में करवा रहे हैं। इतना ही नहीं गाँव के लोग स्लो सैंड फिल्टर का निर्माण अब निजी तौर पर भी कराने लगे हैं ताकि उन्हें शुद्ध पानी मिल सके।

लोग हुए जागरूक

स्लो सैंड फिल्टर पद्धति के कारण टिहरी के चम्बा क्षेत्र के लोग अब जल संरक्षण के प्रति पहले से कहीं ज्यादा संवेदनशील हो गए हैं। ये वर्षा जल संरक्षण के लिये चाल-खाल बनाते हैं। भूजल का क्षरण कम हो इसलिये बसंत ऋतु में खेती करने पर ज्यादा जोर देते हैं। बसंत के मौसम में मिट्टी नम होती है और फसलों को ज्यादा सिंचाई की जरूरत नहीं होती है।

ग्रामीण अपने आस-पास के जंगल में महत्त्वपूर्ण स्थानों पर छोटे तालाबों के निर्माण को बढ़ावा दे रहे हैं। पिछले 10 वर्षों से लगातार हिमालय सेवा संघ, हिमकॉन जैसे संगठन इस कार्य में ग्रामीणों का सहयोग कर रहे हैं। ये संगठन एक तरफ लोगों को संगठित कर जल संरक्षण के लिये प्रेरित करते हैं और इसके लिये आवश्यक तकनीक का भी प्रसार करते हैं।

हिमालय सेवा संघ के मनोज पाण्डे और हिमकॉन के राकेश बहुगुणा बताते हैं कि जमीन की सतह में प्रवेश करने वाला वर्षाजल भूजल भण्डार को समृद्ध करता है जिससे पहाड़ी घाटियों और ढलानों के आसपास का हिस्सा प्राकृतिक रूप से समृद्ध होता है। ढलानों पर वनस्पतियों की उपस्थिति पानी के मार्ग में अवरोध पैदा करता है जिससे भूजल का स्तर बढ़ता है। वे बताते हैं कि स्प्रिंग के आस-पास के क्षेत्रों में व्यापक वनीकरण करवाया जाता है जिससे भूजल स्तर बना रहता है।

 

 

 

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प्रेम पेशे से स्वतंत्र पत्रकार और जुझारु व्यक्ति हैं, विभिन्न संस्थानों और संगठनों के साथ काम करते हुए बहुत से जमीनी अनुभवों से रूबरू हुए। उन्होंने बहुत सी उपलब्धियाँ हासिल की।

 

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