हिमालय के एक जलस्रोत की कहानी

Submitted by RuralWater on Sun, 06/26/2016 - 09:37

. लगभग आधे भारत में पानी की किल्लत ने देश के सामने एक बड़ी समस्या खड़ी कर दी है। सरकारी अनुमान के मुताबिक लगभग 33 करोड़ लोग सूखे की चपेट में हैं। सूखे से परेशान ग्रामीण किसान पलायन को भी मजबूर हो रहे हैं। किसानों का आरोप है कि सरकारी उदासीनता ने उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा है।

इन सबके बीच दूूर दराज क्षेत्रों में कई ऐसी कहानियाँ गुम हैं जो बताती हैं कि अगर जल संरक्षण के लिये स्थानीय लोगों ने पहले से प्रयास किया होता तो शायद आज यह दिन देखना नहीं पड़ता।

उत्तराखंड की दुर्गम पहाड़ियों के बीच बसा एक बहुत ही छोटा गाँव पाटुड़ी की कहानी भी कुछ ऐसी है। जल संकट और इससे ऊबरने की इस गाँव की कहानी बेहद दिलचस्प और प्रेरणा देने वाली है।

इस गाँव के लोगों ने 1998-1999 में ही जल संकट का सामना किया था लेकिन अपनी जिद की बदौलत इस संकट से ऊबरे और आज यह गाँव खुशहाल है।

इस गाँव के लोगों ने मिलकर एक संगठन का निर्माण किया, टैंक बनवाये, खुद ही फंड इकट्ठा किया और बिना सरकारी मदद के असंभव को संभव बनाया दिया।

मुलवाड़ी स्रोत पर बनी 120 साल पुरानी टंकी जो आज भी मुख्य रूप से इसका प्रयोग होता हैहिमालय दुनिया की सबसे ज्यादा घनी आबादी वाला किन्तु पर्यावरण की दृष्टि से बेहद संवेदनशील भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे महत्त्वपूर्ण पर्वत श्रृंखला है। पौराणिक कथाअों की मानें तो पर्वतराज हिमालय के अनुपम सौन्दर्य, स्वच्छ धवल हिमाच्छादित शिखर देवताओं का वास स्थल एवं तपोस्थली और मनीषियों की कर्मस्थली रही है। हमेशा ही धार्मिक आस्था वाले लोगों, साहसिक पर्यटकों को तथा शोधार्थियों को अपनी ओर आकर्षित करता रहा है।

हिमालय दुनिया की सर्वश्रेष्ठ मानव सभ्यता का जनक एवं धार्मिक आस्था का प्रतीक होने के कारण हमेशा से ही सम्मानीय रहा है। हिमालय में विशाल प्राकृतिक जल भंडार भी है। विगत कुछ दशकों मे हिमालयी पर्यावरण की गुणवत्ता में निरन्तर गिरावट एवं स्थानीय लोगों की गरीबी तथा उनके जीवन स्तर में क्षरण अब सरकार, पर्यावरणविदों एवं प्रकृति प्रेमियों के लिये चिंता का विषय बन चुका है। गरीबी दूर करने के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध और अवैज्ञानिक तरीके से दोहन किया जाए, दोनों ही सूरत में नुकसान हिमालय का और इसके बाद हमारा है।

मुलवाड़ी मुख्य जल स्रोतइसी तरह के दोहन की चपेट में आया था पाटुड़ी गाँव। यह गाँव उत्तराखण्ड राज्य के टिहरी जनपद में आता है जहाँ से हिमालय की श्रृंखला देखी जा सकती है। यह गाँव ऋषिकेश-गंगोत्री मुख्य मार्ग पर नागनी से 03 किलोमीटर की पैदल चढ़ाई वाले रास्ते में है। फिलहाल इस गाँव को सड़क मार्ग से जोड़ने का काम चल रहा है।

बारिश के मौसम को छोड़ दें तो कच्ची सड़क से होकर इस गाँव तक पहुंचा जा सकता है। गाँव बहुत छोटा है और इसमें महज 70 परिवार निवास करते हैं। गाँव में अधिकतम तापमान 30 डिग्री सेल्सियस के ऊपर नहीं पहुंचता है। सर्दी के मौसम में इस गाँव में बर्फबारी भी होती है। ऊंचाई पर बसे होने तथा आस-पास सघन जंगल के कारण यहाँ शाक-सब्जियाँ भी उगायी जाती हैं। गाँव में राजमा की खेती बहुत होती है। गाँव में पशुपालन भी आजीविका का एक प्रमुख साधन है।

पशुपालन व ईंंधन की आपूर्ति के लिये पहाड के हरेक गाँव की तरह ही पाटुड़ी गाँव भी पास के जंगल पर ही निर्भर है। पाटुड़ी में पानी का एकमात्र स्रोत है और वह है-मुलवाड़ी धारा। सदियों से इस गाँव को यही धारा पानी दे रही है लेकिन लोगों द्वारा भारी पैमाने पर घास और लकड़ी के लिए वनों की कटाई की गयी। स्थानीय लोगों ने इसका विरोध भी किया कि इससे धारा सूख सकती है लेकिन लोगों ने नहीं सुनी।

वर्ष 1998-99 में पहाडी क्षेत्रों में वर्षा कम हुई और लोगों को सूखे का सामना करना पड़ा। मुलवाड़ी स्रोत का पानी कम होने लगा और आसपास के तीन और छोटे- छोटे कुएं भी सूख गये। मुलवाड़ी स्रोत से आ रही पाइप लाइन जिसका निर्माण सन् 1985 में करवाया गया था उसमें भी पानी आना बंद हो गया। 1998 में फरवरी व मार्च के महीने तक गाँववासियों को उतना ही पानी मिल जाया करता था जितने में एक-दो बर्तन भर जाए लेकिन इसके लिए उन्हें तड़के 4 बजे से लाइन में लगना पड़ता था।

15 साल पहले बने चेक डैमउसी वर्ष मई व जून में इस धारा से रोज महज 300 से 400 लीटर पानी ही निकल पाया जो गाँवों वालों के लिए अपर्याप्त था। ऐसे हालात में गाँव के लोगों के पास दो ही विकल्प थे। पहला विकल्प था तीन किलोमीटर नीचे से पानी भरकर लाया जाय लेकिन इसमें ऊपर चढ़ते और उतरते वक्त जोखिम भी था।

दूसरा विकल्प था 4 किलोमीटर दूर दूसरे गाँव से पानी लाना। खैर, दूसरे विकल्प को अपनाते हुए गांव के लोगों ने चार किलोमीटर दूर जाकर चोपड़ियाली गाँव से पानी भरकर लाया। उसी वर्ष सप्ताह में एक बार कपड़े धोने के लिये तीन किलोमीटर दूर पहाड़ पर चढ़कर-उतरकर जाना पड़ता था। उक्त जलस्त्रोत पर पाँच गाँव निर्भर थे इसलिए वहां भी पानी कम ही आता था।

उस वर्ष पानी का संकट इतना गहरा गया कि गाँववासियों को पालतू पशुओं को नीलाम करना पड़ा। पानी की आपूर्ति करने के लिये हर सम्भव प्रयास किया गया लेकिन इससे एक बड़ा सबक यह भी मिला कि प्राकृतिक संसाधनों का सदुपयोग नहीं किया गया तो परिणाम बेहद गम्भीर होंगे।

बहरहाल गाँव के इस संकट को ईश्वरीय देन भी माना जाने लगा और मुलवाड़ी स्त्रोत के निकट गाँव के ही एक बुजुर्ग स्व. अमर सिंह कैंतुरा ने पूजा-अर्चना की। लगातार 15 दिनों तक वहाँ पूजा हुअा और स्व. अमर सिंह तब तक वहाँ से नहीं हटे जब तक बारिश नहीं हुई।

जल संकट ने लोगों को बड़ा सबक दिया और इसके समाधान के लिए उसी वक्त हिमकान द्वारा दूर-दराज के गाँव में सन् 1998 में 63 महिलाओं को साथ लेकर महिला मंगल दल का गठन किया गया । इस दल का मुखिया एक पुरुष को बनाया गया। कुंवर सिंह नेगी गाँव के सक्रीय सामाजिक कार्यकर्ता हैं तथा वे 15 वर्षो तक महिलाओं की सहमति से महिला मंगल दल का कार्य करते रहे।

मुलवाड़ी स्रोत की टंकी स्लो सैण्ड फिल्टर के साथमहिला मंगल दल के सभी सदस्य हर माह के पहले सप्ताह में एक बैठक कर सामाजिक जीवन के विभिन्न पहलुओं पर विचार विमर्श कर मतभेदों का निपटारा करते। धीर-धीरे इस दल के निर्णयों को गाँव में तवज्जो मिलने लगी। कुंवर सिंह नेगी की पुत्रवधु शोभा देवी गाँव की पंचायत प्रधान हैं। उन्होंने विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से गाँव में काफी काम किया जिनमें हिमकान संस्था भी एक थी।

हिमकान संस्था द्वारा ही सबसे पहले महिला मंगल दल का गठन इस गाँव में किया गया। हिमकान संस्था द्वारा महिला मंगल दल के साथ मिलकर सर्वप्रथम मुलवाड़ी के आसपास 2000 से अधिक पौधे लगाये गये। इसके पश्चात अगले तीन वर्षो तक इस जल ग्रहण क्षेत्र में 10,000 पौधा रोपण किया गया तथा खेती वाली जमीन पर भी चारे वाले पौधों का रोपण किया गया जिसमें प्रमुख रूप से शहतूत व गुरीयाल को प्राथमिकता दी गई थी। इसके साथ ही जल ग्रहण क्षेत्र में हिमकान द्वारा तीन चालों का निर्माण भी करवाया गया। बाद में महिला मंगल दल द्वारा मनरेगा कार्यक्रम के माध्यम से 10 चालों का निर्माण करवाया गया।

इस जल ग्रहण क्षेत्र में ही तीन चेक-डैम का निर्माण हिमकान के माध्यम से किया गया। बाद के वर्षों में मनरेगा कार्यक्रम के माध्यम से भी पाटुड़ी गाँव में चेक डैम बने जो कि आज भी काम कर रहे हैं व गाँव के लोग इनका मलवा साफ करते हैं। हिमकान द्वारा सन् 2001 में पाटुड़ी गाँव में 20,000 लीटर क्षमता वाली पानी की टंकी का निर्माण भी करवाया गया।

सन् 1998-99 में ग्राम पाटुड़ में जंगल सुरक्षा समिति का गठन भी किया गया था और इसका अध्यक्ष कुंवर सिंह नेगी को बनाया गया था। जंगल सुरक्षा समिति का मुख्य कार्य मुलवाड़ी के जंगलों की सुरक्षा करना था ताकि कोई भी इस 20 हेक्टेयर के जंगल से चारा और ईंधन न ला सके। इसके पश्चात कुवंर सिह जी की अध्यक्षता में इस जंगल सुरक्षा समिति व महिला मंगल दल ने वन विभाग की सहायता से 20 तथा विकास खण्ड की सहायता से 30 चेक डैमों का निर्माण करवाया गया जो सराहनीय है। आज भी जंगल सुरक्षा समिति व महिला मंगल दल सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं। वर्तमान में अतर सिंह इस कमेटी के अध्यक्ष हैं।

संगठन तो बन गये थे लेकिन काम करने के लिये फंड कहाँ से आये यह भी एक बड़ी चिंता थी। इस चिंता को दूर करने के लिए एक बैठक की गयी जिसमें तय हुआ कि सदस्य खुद ही फंड और संसाधन जुटायेंगे। सभी इस बात पर सहमत हो गये कि सभी सदस्य हर महीने10-10 रुपये देंगे जिसे जमाकर फंड तैयार किया जायेगा और इसका उपयोग जनहित के कामों में किया जायेगा। महिला मंगल दल आज भी हर महीने निर्धारित राशि फंड में दे रहे हैं। इस छोटी राशि के जरिये ही आज कोष में 2 लाख से अधिक रुपये जमा हो चुके हैं।

गाँव के लोगों ने जल संकट से निपटने के लिये बारिश की बूंंदों को सहेजने को भी बेहद गम्भीरता से लिया। हालांकि पहले भी वे बारिश के पानी को संजोकर रखते थे लेकिन अनौपचारिक तौर पर या कभी कभार ही। जल संकट बढ़ने पर इन्होंने व्यापक स्तर पर बारिश के पानी को संरक्षित करने की योजना बनायी। हिमकान की मदद से बारिश के पानी को टंकियों में संरक्षित करने की रणनीति तैयार की गयी। इस विचार को अमली जामा पहनाने के लिये पाटुड़ी में 10 फेरोसीमेंट टंकियों का निर्माण किया गया। एक-एक टंकी की क्षमता 5-5 हजार लीटर थी।

स्प्रिंग जलग्रहण क्षेत्रवैसे पाटुड़ी की पेयजल व्यवस्था मुख्य रूप से मुलवाड़ी स्रोत पर आज भी निर्भर है। वैसे तो यहाँ सन् 1995 से पर्वतीय परिसर रानीचैरी से पाइप लाइन द्वारा पेयजल उपलब्ध करवाया जा रहा है लेकिन लम्बी पाइपलाइन होने के कारण गर्मी में पानी उपलब्ध नहीं हो पाता है। मुलवाड़ी स्रोत व जंगल संरक्षण की कहानी बहुत समय पहले की है जिसे पटुड़ी निवासी आज भी जारी रखे हुए हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि इस स्रोत पर निर्मित पानी की टंकी 120 सालों से भी पुरानी है। इन टंकियों को बनाने के लिये पत्थर व चूने का प्रयोग किया गया है। उस वक्त चूना बनाने के लिये इस स्रोत के पास ही स्थानीय बजरी का चूना बनाया गया जिसके लिये पास की जगह पर भट्टी के लिये गड्ढा बनाया गया था जिसके नीचे ईंधन के लिये लकड़ी व सूखे पेड़ डाल दिये गये थे तथा उसके ऊपर स्थानीय बजरी (लाइम स्टोन) का भरान किया गया था। इस तकनीक मे दक्ष स्थानीय चर्मकार कारीगरों के द्वारा इस भट्टी को जलाया गया। भट्टी लगातार तीन महीन तक चली थी और उसे बुझने में भी 3 महीने का वक्त लगा था। स्थानीय लोगों के सहयोग से इस भट्टी से निकले चूने, पत्थर द्वारा एक टंकी मूलवाड़ी स्रोत पर तथा दो टंकी गाँव में बनायी गयी। इन टंकियों का प्रयोग आज भी लोग पानी भरने के लिए करते हैं।

मूलवाड़ी स्रोत से पानी के वितरण के लिये गांव के दोनों हिस्सों के लिये कच्ची गूलों का निर्माण किया गया था जिस पर हर वर्ष दोमट मिट्टी की लिपाई की जाती थी ताकि पानी का रिसाव कम हो। इसके साथ ही पेड़ों की मदद से नालियाँ बनायी गयीं। इन्हें नियमित अंतराल पर बदलना पड़ता था। गर्मी के मौसम में जब पानी कम हो जाता था तब लोग इन नालियों का प्रयोग नहीं करते थे बल्कि बर्तनों से जलस्त्रोत से पानी भरा करते थे।

यहाँ आज भी यही परम्परा चल रही है। लोग बर्तन लेकर जाते हैं और जलस्त्रोत से पानी भरते हैं लेकिन यहाँ भी तय है कि किसे कितना पानी भरना होगा ताकि सभी को समान रूप से पानी मुहैया हो सके। हिमकान द्वारा इस वर्ष हिमालय सेवा संघ और अर्घ्यम, बंगलुरू की सहायता से यहाँ पर पानी के टैंको की मरम्मत का कार्य किया गया है। इसके साथ ही पुराने ढांचे को स्लो सैण्ड फिल्टर के रूप में बदला गया है। इस नेक काम में गाँववासियों का पूरा सहयोग मिला।

उल्लेखनीय है कि सघन जंगलों के बीच जल स्रोतों के करीब जल संरक्षण-संग्रहण एवं व्यवस्थित शोधन करने की एक लोक परम्परा इस पूरे दुर्गम हिमालयी क्षेत्र मे रही है। बिना सरकारी अनुदान लिये उपलब्ध स्थानीय संसाधनों एवं लोक भागीदारी से सैकड़ों वर्षों से यहां जल संरक्षण किया जा रहा है, यह उन क्षेत्रों के लिये प्रेरणा है जिन क्षेत्रों के लोग सरकारी लापरवाही को कोसते रहते हैं।

मुलवाडी स्रोत का संरक्षित जल संग्रहण क्षेत्रपााटुड़ी गाँव ने यह दिखा दिया कि जन जागरण हो जाये तो सरकारी मदद के बिना भी बहुत कुछ किया जा सकता है। याद दिलाते है। इस बीच उत्साही मित्रों एवं पटुडी के सक्रीय ग्राम समाज की पहल पर नई पीढी के नौजवान साथियों एवं विद्यार्थियों को प्रेरित करने तथा अपने जंगल व पानी के इतिहास से जोडने के प्रयास किये जा रहे हैं ताकि भविष्य में पेयजल का संकट दुबारा सिर न उठा सके।

सन्दर्भ


1. गोविंदबल्लभ पन्त कृषि एवं वानिकी विश्वविद्यालय, रानीचैरी।
2. वन विभाग, चम्बा टिहरी गढ़वाल।
3. विकास खण्ड, चम्बा टिहरी गढ़वाल।
4. ग्राम प्रधान व कुंवर सिंह नेगी, ग्राम पाटुड़ी।
5. हिमकान एवं आई. जी. एस. एस. एस.-जलगाम प्रबंधन परियोजना।

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