सुसवा नदी के पानी से कैंसर होने की प्रबल सम्भावना

Submitted by RuralWater on Fri, 08/12/2016 - 11:17
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.मसूरी की पहाड़ियों से निकलनी वाली सभी छोटी-बड़ी नदियाँ देहरादून से होकर गुजरती हैं। यही वजह थी कि देहरादून का मौसम वर्ष भर सुहावना ही रहता था। हालांकि यह अब बीते जमाने की बात हो चुकी है। इसलिये कि देहरादून की सभी छोटी-बड़ी नदियाँ अतिक्रमण और प्रदूषण की भेंट चढ़ गई हैं।

देहरादून के क्लेमॉनटाउन से एक छोटी नदी निकलती है सुसवा, अर्थात सुर-सुर सरिता गाकर और अपने आबाद के बहाव क्षेत्र में सुसवा घास की पैदावार करके मथुरावाला में रिस्पना और बिन्दाल नदी से संगम बनाती हुई वह 20 किमी बहकर सौंग नदी में मिल जाती है। इस अन्तराल में सुसवा नदी के पानी की महत्ता ही बेजोड़ थी।

एक तरफ सुसवा घास का साग और दूसरी तरफ सुसवा नदी की मछली। सो इस दौरान मछली तो दूर इस नदी के बहाव ने अब सीवर का रूप ले लिया है। इसमें बहने वाला गन्दला पानी इतना जहरीला हो चुका है कि आस-पास के लोग आये दिन एक नई बीमारी के शिकार हो रहे हैं।

ज्ञात हो कि उत्तराखण्ड की अस्थायी राजधानी देहरादून से होकर गुजरने वाली सुसवा नदी का पानी किसी को भी कोमा में पहुँचा सकता है। प्रदूषण नियंत्रण विभाग की ओर से की गई सैम्पलिंग में यह चौंकाने वाले तथ्य सामने आई हैं। पानी में मैग्नीशियम, कैल्शियम से लेकर डिजॉल्व ऑक्सीजन की मात्रा दोगुनी से अधिक हो चुकी है।

विशेषज्ञों के मुताबिक इतनी मात्रा में प्रदूषण होने से इस पानी की जद में आने वाले व्यक्ति कोमा तक में जा सकते हैं। दूधली निवासी अजय कुमार ने उत्तराखण्ड पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से सूचना का अधिकार कानून के तहत सुसवा नदी के पानी की गुणवत्ता की जानकारी माँगी थी। यथा नियंत्रण बोर्ड ने 11 जनवरी 2016 को आई सुसवा नदी की प्रदूषण रिपोर्ट अजय कुमार को भेजी है।

मथुरावाला में रिस्पना और बिन्दाल नदी से संगम बनाती सुसवा नदीइस रिपोर्ट को विश्लेषण बाबत जब विशेषज्ञ डॉ. प्रशांत सिंह से बात की गई तो और भी चौंकाने वाले तथ्य सामने आये हैं। रिपोर्ट के मुताबिक विशेषज्ञ डॉ. सिंह बताते हैं कि नदी में कैल्शियम की मात्रा 216 मिलिग्राम प्रति लीटर पाई गई है। इस कारण बीआईएस 2012 स्टैंडर्ड के हिसाब से इस पानी में कैल्शियम की मात्रा 75 से 200 मिलिग्राम प्रति लीटर तक हो सकती है। इससे अधिक होने पर गॉल ब्लैडर, गुर्दे की पथरी हो सकती है। उन्होंने आगाह किया कि ज्यादा मात्रा में इस पानी के इस्तेमाल से बड़ी आँत का कैंसर, हाइपर टेंशन और स्ट्रोक तथा मोटापा जैसी खतरनाक बीमारी होने की प्रबल सम्भावना है।

उन्होंने उत्तराखण्ड पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की इस रिपोर्ट के आधार पाया कि नदी में मैग्नीशियम की मात्रा 194 मिलिग्राम प्रति लीटर पाई गई। उनका कहना है कि बीआईएस 2012 स्टैंडर्ड के हिसाब से पानी में मैग्नीशियम की मात्रा 30 से 100 मिलिग्राम प्रति लीटर होनी चाहिए। इससे अधिक मैग्नीशियम होने पर हार्टबीट असन्तुलित होना, लो ब्लड प्रेशर से लेकर साँस की समस्या और कोमा में जाने जैसे हालात पैदा हो सकते हैं।

इसके अलावा रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि नदी के पानी में डिजॉल्व ऑक्सीजन की मात्रा 3.6 मिलिग्राम प्रति लीटर पाई गई। डॉ. सिंह का मानना है कि इतनी अधिक मात्रा में डिजॉल्व ऑक्सीजन होने पर अगर इस पानी को जानवर भी पीएँगे तो बीमार हो जाएँगे। और-तो-और इस हालात में मछलियों के लिये भी पानी में जीवित रहना मुश्किल है। यही वजह है कि सुसवा नदी से मछलियाँ गायब हो गई हैं।

रिपोर्ट बताती है कि सुसवा नदि के पानी में बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) की मात्रा 36 मिलिग्राम प्रति लीटर पाई गई है। इस बाबत रिपोर्ट का विश्लेषण बताता है कि पानी में इतनी अधिक मात्रा में बीओडी होने पर एक झटके में बहुत सी मछलियाँ मर सकती हैं। यही नहीं इस वजह से नदी के पानी का बहाव भी कम होता जाता है।

गौरतलब हो कि सुसवा नदी का पानी इतना खतरनाक हो चुका है कि इसकी जद में आने वाले पाँच लाख से अधिक लोग प्रभावित हो सकते हैं। सुसवा नदी देहरादून के लगभग बीचोंबीच पटेलनगर से होते हुए दूधली गाँव से आगे जाकर सौंग नदी में मिलती है। इस तरह इस नदी के बहाव क्षेत्र में लगभग पाँच लाख से अधिक की आबादी आती है।

बिन्दाल और रिस्पना नदी का संगम स्थलइस अन्तराल में सुसवा नदी का जहरीला पानी किसानों के लिये मुसीबत बन गया है। नदी के आसपास के इलाकों में इस पानी की वजह से लोगों ने बासमती की खेती बन्द कर दी है। किसानों का कहना है कि सुसवा नदी के पानी से सिंचाई करने की वजह से कईयों को गम्भीर चर्म रोग हो गए हैं।

दूधली और इसके आसपास से बहने वाली सुसवा नदी के पानी में हाई मैग्नीशियम, कैल्शियम और दूसरे हानिकारक केमिकल होने की पुष्टि बाकायदा उत्तराखण्ड पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की 2011 की रिपोर्ट में लिये गए सैम्पलिंग में पाई गई है। यही वजह है कि इस नदी से जुड़े क्षेत्रों में लोगों को खतरनाक बीमारियाँ हो रही हैं।

किसान नारायण सिंह बोरा ने कहा कि नदी का पानी काफी दूषित हो गया है। पशु भी इसका पानी पीते हैं। इस पानी से जो घास उगती है, उसे पशु नहीं खाते। किसान जय सिंह वर्मा ने बताया कि शहर का सीवर वाला पानी सुसवा में आता है। जब उससे सिंचाई करते हैं तो खुजली हो जाती है। कई किसानों को इस पानी की वजह से चर्म रोग हो चुके हैं। खेती भी खराब हो गई है। पहले बासमती उगाते थे, लेकिन अबकी बासमती में वह खुशबू नहीं रही, इसलिये वे गन्ना उगाते हैं।

किसान लाल सिंह ने बताया कि पानी बेहद दूषित होने की वजह से उनकी खेती पर बुरा प्रभाव पड़ा है। किसान राजू ने बताया कि बचपन में वह इस नदी में से मछली पकड़ते थे, लेकिन अब इसमें मछली नहीं होती है। उन्होंने बताया कि इस नदी के बहाव क्षेत्र में सुसवा घास होती थी जिसे लोग साग के रूप में इस्तेमाल करते थे, जो कि अब नहीं उगता है। वे आगे बताते हैं कि सुसवा साग इस नदी की पहचान थी। वर्तमान में इस नदी के पानी से बहुत बदबू आती है। किसानों ने माँग की है कि इस नदी में जल्द-से-जल्द गन्दगी का प्रवाह रोका जाये और सुसवा नदी को पुराने रंग में लाया जाये।

गन्दगी में तब्दील सुसवा नदी

 

 

सुसवा एक मुलायम घास होती है, जो बारहमास उगती है। इस घास की सब्जी बहुत ही स्वादिष्ट होती है, जैसा कि स्थानीय लोग बताते है। इस क्षेत्र में सुसवा का साग बड़ा ही प्रचलित था, परन्तु जबसे नदी का पानी भंयकर गन्दला हुआ तब से लोग सुसवा साग की मिठास ही भूल गए हैं। सुसवा साग से ही इस नदी का नाम सुसवा नदी पड़ा। सुसवा उन्हीं जगह होता है जहाँ पुदिना होता है। सुसवा नदी मथुरावाला में रिस्पना और बिन्दाल नदी से संगम बनाती है। इसके बाद रिस्पना और बिन्दाल नदी का सुसवा में विलय होने के बाद हरिद्वार के खड़खड़ी तक सुसवा नदी के रूप में बहती है और गंगा में समा जाती है।

 

 

 

 

आरटीआई कार्यकर्ता अजय कुमार का कहना है कि उत्तराखण्ड पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को नदी में आर्सेनिक और लैड की जाँच करनी चाहिए। साथ ही नदी से लगे इलाकों में पेयजल स्रोतों के पानी की भी जाँच किसी केन्द्रीय एजेंसी से होनी चाहिए। हैण्डपम्पों के पानी में भी हल्की बदबू आती है जो कि लोगों के लिये खतरनाक है। उनका कहना है कि इस नदी का पानी आगे जाकर गंगा में मिल रहा है। अगर ऐसा ही पानी गंगा में मिलेगा तो गंगा कैसे साफ होगी?

 

 

 

 

 

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प्रेम पेशे से स्वतंत्र पत्रकार और जुझारु व्यक्ति हैं, विभिन्न संस्थानों और संगठनों के साथ काम करते हुए बहुत से जमीनी अनुभवों से रूबरू हुए। उन्होंने बहुत सी उपलब्धियाँ हासिल की।

 

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