अपनी दुर्बलता और नमामि गंगे को कोसते निराश स्वामी सानंद

Submitted by RuralWater on Tue, 07/26/2016 - 15:20

 

स्वामी सानंद उत्तर संवाद


.21वें कथन के साथ ‘स्वामी सानंद गंगा संकल्प संवाद शृंखला’ सम्पन्न हुई, तो अलग-अलग सवाल कई के मन में उठे; गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान के आदरणीय रमेश भाई, यमुना जिये अभियान के श्री मनोज मिश्र, नदियों के हालात से निराश डॉ. ओंकार मित्तल व कई अन्य समेत स्वयं मेरे मन में भी। यह स्पष्ट है कि स्वामी जी ने पुरी के शंकराचार्य स्वामी श्री निश्चलानंद सरस्वती जी के आश्वासन पर अपना पूर्व अनशन सम्पन्न किया था।

स्वामी श्री निश्चलानंद जी ने स्वामी सानंद को आश्वस्त किया था कि यदि भाजपा सत्ता में आई, तो वह गंगा के पक्ष में निर्णय करेगी। अनशन सम्पन्न करते हुए स्वामी सानंद ने कहा था कि भाजपा के सत्ता में आने के बाद तीन महीने प्रतीक्षा करुँगा। यदि तीन महीने में प्रधानमंत्री ने अनुकूल घोषणा नहीं की, तो अपने निर्णय पर पुनः विचार करुँगा।

प्रश्न ये थे कि भाजपानीत केन्द्रीय सरकार ने गंगा के सम्बन्ध में अब तक जो निर्णय लिये हैं, स्वामी सानंद उन्हें गंगा के पक्ष में मानते हैं अथवा नहीं? यदि पक्ष में नहीं मानते हैं, तो तीन महीने बीते तो काफी अरसा हो गया; उन्होंने क्या विचार किया? यदि कुछ विचार किया, तो पूर्व की तरह उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया? कहीं ऐसा तो नहीं, कांग्रेस शासन के दौरान रहते उनकी गंगा निष्ठा कुछ और थी और अब भाजपा शासन के रहते कुछ और है?

 

दूर हुआ प्रस्तोता का द्वंद्व


हालांकि उक्त आखिरी सवाल स्वामी जी की निष्ठा पर सवाल करने जैसा है। मेरे मन का द्वंद्व यह भी था कि गंगा पर गलत-सही जो भी हो रहा है, उस पर प्रतिक्रिया देने की सारी जिम्मेदारी क्या स्वामी सानंद जी की ही है? हम सारी अपेक्षाएँ उन्हीं से क्यों करें? हमने खुद गंगा निर्मलता के लिये क्या किया है? दूसरी ओर मेरे मन में यह विचार भी आता था कि जिसने जिस बाबत सार्वजनिक आदर्श व निश्चय प्रस्तुत किया हो, उस पर उसे निभाने की जवाबदेही ज्यादा होती है। उसे जवाबदेह होना ही चाहिए। संयोगवश, किन्तु मेरा यह द्वंद्व ज्यादा दिन नहीं रहा। शृंखला सम्पन्न होने के कुछ दिन बाद ही स्वामी सानंद द्वारा मुझे भेजे एक पत्र ने मेरा यह द्वंद्व दूर कर दिया।

 

हाय रे मेरी दुर्बलता


उन्होंने लिखा-
“शायद आप सरीखे स्नेही मेरी वर्तमान मनःस्थिति जानना चाहें, तो पिछले दो-तीन वर्षों में गंगाजी के क्षेत्र में जो कुछ भी हो रहा है या उससे भी महत्त्वपूर्ण जो जरा भी नहीं हो रहा है, उससे बस यही मन में रहता है:”

“अरे माँ गंगे ये कैसे दुर्दिन आ गए,
सुलाले गोदी में बहुत दिन जागा, कर दया।’’
और फिर

“मत कोई मुझ को याद करे,
इस हारी निराश जिन्दगी पर ना वक्त अपना बर्बाद करे,।’’

“पर हाय रे मेरी दुर्बलता,
एक छलांग लगा देने का निश्चय भी तो नहीं जुटा पा रहा।’’


हालांकि उक्त पंक्तियों से ‘नमामि गंगे’ के दो वर्षीय क्रियाकलापों को लेकर स्वामी सानंद की निराशा काफी-कुछ स्पष्ट थी, फिर भी स्पष्टता को तर्क देने की दृष्टि से मैंने स्वामी जी से सफाई माँगने जैसे अन्दाज में सवाल पूछने की धृष्टता की। उन्होंने उत्तर दिया -

मैं इतना निराश फील करता हूँ कि जैसे मोदी जी ने एक बार कहा था कि कुछ लोगों को निराशा ही दिखती है, तो छोटा-मोटा कुछ हुआ भी हो, तो मुझे दिखाई नहीं देता। जब तक अविरलता की बात न हो, तो निर्मलता की बात करना बेवकूफी है। उसकी बात कोई नहीं कर रहा है। टेनरिज को लेकर कोई नई चीज नहीं हो रही। मैं और सिद्दिकी.. जब कानपुर में थे, तो नीरी का एक पायलट प्रोजेक्ट किया था। कोई फर्क नहीं पड़ा। ऑनलाइन डाटा करने से भी क्या होगा? हम एनवायरनमेंट के डाटा देखते रहे हैं। उनकी क्या रिलायबिलिटी होती है?

 

उमा जी सामने होती, तो गर्दन पकड़ लेता


जब से मोदी जी आये हैं, तो यही हो रहा है कि बनारस में इतना अधिक सीवेज ट्रीट होने लगा है। अस्सी बेहतर होता, तो भी.. कुछ कहता। मैं तो निराश ही हूँ। मेरा आकलन है कि जो कुछ हुआ है वह सब निगेटिव है। मैं निराश हूँ।

एक बार तो इतना एक्साइटिड हुआ कि उमा जी सामने होती, तो उनकी गर्दन पकड़ लेता।

मैंने आरटीआई किया है। एक महीने हो गया, अभी तक कोई जवाब नहीं आया है। आरटीआई में मैंने पूछा है कि क्या प्रवाह की बात इररिलेवेंट है? क्या सोचा है कि सीवेज ट्रीट करने से गंगा साफ हो जाएगी?

 

मैं निराश हूँ


आपको याद होगा कि शिन्दे (संप्रग शासनकाल में केन्द्रीय बिजली मंत्री) ने कहा था कि भागीरथी की हर स्ट्रीम में एन्वायरनमेंटल फ्लो सुनिश्चित किया जाएगा। जब हाई लेवल कमेटी की रिपोर्ट नहीं आई, तो मैंने दूसरा उपवास किया था।

मेरा आकलन है कि जो कुछ हुआ है वह सब निगेटिव है। मैं निराश हूँ।

इलाहाबाद तो साहित्यिक नगरी है। ये इलाहाबाद में तीन थर्मल पावर स्टेशन लगा रहे हैं। गंगा जलमार्ग बना रहे हैं। अब गंगाजी पर कोयले के जहाज चलाएँगे। इसके लिये गंगा को खोद रहे हैं। मैंने एक खबर पढ़ी थी। टाइटल था- “कछुओं ने रोका मोदी का जहाज’’। मोदी जी को जलमार्ग का 65 मीटर लम्बा जहाज लांच करना था। सुना कि वह मालवीय ब्रिज से आगे नहीं जा पाया। कछुआ सेंचुरी से पहले ही उसे रोकना पड़ा। जहाज को तो बहता हुआ पानी चाहिए नहीं; उसे तो रुका हुआ पानी चाहिए, तो क्या करेंगे? क्या गंगा का प्रवाह खत्म कर देंगे।

मेरा आकलन है कि जो कुछ हुआ है, वह सब निगेटिव है। मैं निराश हूँ।

 

मोदी जी, आपके मन में क्या कभी गंगाजी की भी बात आती है?


मैं तो मोदी जी से कहूँगा कि माँ ने बुलाया है, तो क्या इसलिये कि गंगाजी को पहले खोद डालो, उसे नोच डालो और फिर एक साड़ी पहना दो, ऐसे जैसे मान लिया हो कि गंगाजी एक डेड मैटर है।‘मन की बात’ में कोई कभी उनसे पूछे कि आपके मन में क्या कभी गंगाजी की भी बात आती है?

 

जब विकास नहीं था, तब समृद्धि थी


मुझे एक तरफ तो लगता है कि गंगा को लेकर लोग कभी सीरियस थे ही नहीं। जब कोई सीरियस ही न हो, तो फिर किसी भी तरफ मोड़ लो। एक प्रोफेसर ने कहा कि यदि विकास ही हर मर्ज की दवा है, तो फिर रूस क्यों टूटा? जब बर्लिन टूटा, तभी किसी ने कह दिया था कि अब रूस टूटेगा। यह कह रहे हैं कि हमारा एकमात्र एजेंडा है- विकास। यह लोगों को बेवकूफ बनाना है। क्या इसी से सब हो जाएगा? हमारी प्राइमरी प्रोडक्शन क्या है- खेती और माइनिंग। खेती तो बढ़ी नहीं। हाँ, माइनिंग जरूर बढ़ी है। यह तो माँ को नोचकर खा जाना है। यही गंगा के साथ है। यह विकास गंगा को भी खा डालेगा। जब विकास नहीं था, तब समृद्धि थी।

लोकतंत्र में निर्णय जनता के हाथ एफडीआई, कोई दान तो है नहीं; यह तो एक इनवेस्टमेंट है। जो कोई इनवेस्ट करेगा, क्या वह निकालेगा नहीं? वह सब बाँट लेगा। उसी से पैसा निकालेगा।

मैंने प्रश्न किया कि तो क्या कोई उम्मीद नहीं दिखती है?

स्वामी सानंद का उत्तर था- “लोकतंत्र में निर्णय समाज या जनता करती है। जब जनता को ही गंगा की अविरलता की चिन्ता नहीं है, तो क्या उम्मीद? किसान गन्ना के भुगतान के लिये आन्दोलन कर सकते हैं, गन्ना मिलों से होने वाले प्रदूषण के खिलाफ आन्दोलन नहीं कर सकते। वह यह ही तय कर लें कि अपने प्रदूषण का उचित निष्पादन नहीं करने वाली मिलों को गन्ना नहीं देंगी।

दरअसल, गंगा ही नहीं, पूरे पर्यावरण की स्थिति का ह्रास हुआ है। ऑनलाइन डाटा करने से क्या होगा? हम एनवायरनमेंट के डाटा देखते रहे हैं। उनकी क्या रिलायबिलिटी होती है?

 

आदिगंगा की चिन्ता किसे है?


मोदी में देश का भविष्य देखे, या अखिलेश में देखें। अखिलेश तो पर्यावरण इंजीनियरिंग वाले हैं। इन्होंने क्या किया? नीतीश भी...सब आँकड़े के कर्ता-धर्ता दिखाई देते हैं।

आदिगंगा, कलकत्ता में है। इसी के किनारे कालीघाट है; श्मशान है। ये बताते हैं कि एक वक्त में गंगा की मुख्यधारा यही थी। चातुर्मास के दौरान मैंने जाकर इसका अवलोकन किया था। चूँकि यह चौड़ी थी; जहाज चलाने के उपयुक्त थी, सो आदिगंगा को हुगली में जोड़ दिया। हुगली से मिलने के बाद क्या हुआ? बाकी का विकास हो गया। आदिगंगा दो किलोमीटर से सिकुड़कर 15 मीटर हो गई। इसके ऊपर मेट्रो की इमारत बन गई। यह एक तरफ तो हुगली से मिलती है, दूसरी ओर कहीं जाती नहीं। ज्वार आता है, तो इसका पानी चढ़ जाता है; भाटा आता है, तो उतर जाता है। इसके साथ-साथ कचरा भी वहीं रोल करता रहता है। इसके किनारे ममता जी (प. बंगाल की मुख्यमंत्री) का घर है। चातुर्मास में मैंने गुरूजी से कहा था कि ममता जी से मिलकर कहते हैं कि इसे दूसरी तरफ से जोड़ दें। वह हो न सका। इतने सारे नेता हैं...किसको कहाँ इन सब बातों की चिन्ता है।

 

अपनी सीमा भूला इंसान


मनुष्य अपनी सीमा को भूल जाता है और सामर्थ्य को बढ़ा-चढ़ाकर करना चाहता है। भगवतीचरण वर्मा का एक उपन्यास है - ‘सामर्थ्य और सीमा’। आपको इसे पढ़ना चाहिए। इसमें तराई के बाँध को लेकर उस काल में समझ का चित्र है।

 

सोचता हूँ कि मेरे करने से हुआ क्या?


“सबसे पहले गिरधर महाराज से मिलकर ही मुझे गंगा पर अपने दायित्व निर्वाह की प्रेरणा हुई थी। मैं कल शाम को उनसे मिलने उत्तरकाशी जा रहा हूं।’’

लेखक अरुण तिवारी के साथ स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंदउत्तरकाशी से स्वामी के लौटने पर मैं उनसे पुनः मिलने गया। उम्मीद थी कि वहाँ से मन में जरूर वह कोई निर्णय लेकर लौटे होंगे।

बोले - “यूँ तो गिरधर महाराज ने मुझसे कहा कि तुम्हारा जो काम था, वह तो तुमने कर दिया। उनकी यह बात यूँ तो खुद को सन्तोष देने के लिये काफी है, लेकिन मैं सोचता हूँ कि इससे हुआ क्या?’’

 

वेग टर्म्स में दिए उमा बयानों का कोई मतलब नहीं


वहाँ जाकर कई बातें अपडेट हुईं। पता चला कि पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय छह बाँधों को क्लियरेंस देने की बात कहता है। गंगा पुनर्जीवन, नदी विकास एवं जल संसाधन मंत्रालय की रिपोर्ट इसके खिलाफ है।

उसने इसके खिलाफ एफीडेविट भी दिये हैं। मैंने एफीडेविट देखे। उसके बाद मिनिस्टर्स की मीटिंग हुई। प्रधानमंत्री कार्यालय ने भी उसमें प्रतिनिधित्व किया। हालांकि यह बात अपुष्ट ही है, किन्तु मुझे तो किसी ने कहा कि उमाजी ने यहाँ तक कहा कि उक्त बाँधों को क्लियरेंस दी गई, तो वह धारी देवी से अलकनंदा में छलांग लगा लेंगी।

अब यदि जलमंत्री यह कहती है, तो एक तरफ तो लगता है कि उन्होंने हिम्मत तो दिखाई। दूसरी तरफ, उमा जी बार-बार गंगा को लेकर मदनमोहन मालवीय समझौते की बात करती हैं। वह कहती हैं कि अब तक की किसी सरकार ने उसकी पालना नहीं की; मोदी सरकार करेगी। इसका क्या मतलब है? वह समझौता तो सिर्फ हरिद्वार के लिये था। उसमें हरिद्वार से हर समय 1,000 क्यूसेक प्रवाह देने की बात थी। उन्हें स्पष्ट कहना चाहिए।

अब यदि वह कहें कि उत्तरकाशी में हर समय 1,000 क्यूसेक प्रवाह देंगी, तो वहाँ तो सर्दियों में 1,000 क्यूसेक प्रवाह नहीं रहता; तो क्या सर्दियों में मनेरी - एक, मनेरी-दो प्रोजेक्ट बन्द कर देंगी? इसी तरह यदि वह कहें कि इलाहाबाद में 1,000 क्यूसेक प्रवाह देंगी, तो क्या इलाहाबाद में इससे काम चल जाएगा? यह तो स्वीकार्य ही नहीं होगा।

उमाजी ने कहा कि अक्टूबर, 2016 में गंगा में सफाई का असर दिखने लगेगा। इसका क्या मतलब हुआ? यह साफ बीओडी के स्तर में दिखने की बात है या आँखों से दिखने की? यूँ कोई कहे कि सितम्बर की तुलना में अक्टूबर में गंगा ज्यादा साफ दिखेंगी, तो यह बेमतलब है। टेम्स में था कि 1985 की तुलना में इतना इम्प्रूवमेंट हुआ। गंगा के लिये भी यह बात होनी चाहिए। सफाई की बात करें, तो वर्ष, स्थान के आधार पर तुलनात्मक बात करें या तत्व आधारित अन्य पैरामीटर रखें। ऐसे वेग टर्म्स में दिये बयानों को कोई मतलब नहीं।’’

 

दवे की तरफ से भी ब्यूरोक्रेसी ही बोलेगी


मैंने कहा कि अब तो पर्यावरण मंत्री बदल गए हैं। नए मंत्री अनिल माधव दवे तो नदी को समझने वाले माने जाते हैं। मंत्री बनने के बाद उन्होंने अपने बयान में कहा भी है कि नदी को बहते रहना चाहिए। अब तो आपको उम्मीद करनी चाहिए।स्वामी जी नाउम्मीद ही दिखे; बोले - “मालूम नहीं, आप उन्हें किस रूप में जानते हैं। नर्मदा महोत्सव की प्लानिंग के लिये उनके बुलाने पर एक बार मैं गया था। उनसे दो घंटे बात कर मुझे तो निराशा ही हुई थी।.... तब से जो उन्होंने किया, मैं उसका प्रशंसक नहीं हूँ और जो मैंने किया, वह उसके प्रशंसक नहीं हैं।

मेनका गाँधी को जीव प्रेमी बताई जाती हैं। आप ही बताइए कि पर्यावरण मंत्री रहकर उन्होंने क्या किया? अखिलेश तो पर्यावरण इंजीनियरिंग वाले हैं। नीतीश ने ही क्या किया? मेरा मानना है कि जावड़ेकर के पर्यावरण मंत्री रहते हुए उनकी तरफ से ब्यूरोक्रेसी ही बोलती थी, दवे की तरफ से भी ब्यूरोक्रेसी ही बोलेगी।”

 

नए गंगा राज्य मंत्री के बयान से निराशा


“जिस दिन उमा जी ने हरिद्वार में 231 परियोजनाओं की लांचिंग की, उसी दिन नए जल संसाधन राज्य मंत्री संजीव बालियान ने मुजफ्फरनगर के शुक्रताल में आयोजन किया। रुड़की से आने वाली सौलानी नदी आकर गंगा में मिलती है। उसमें पेपर मिल का कचरा मिलता है। उस मौके पर संजीव बालियान बोले - “गंगा की धारा प्यार से आये या उसेे जबरदस्ती लाना पड़े, तो हम उसे किनारे ले आएँगे।’’ अब गंगा पुनर्जीवन का मंत्री यदि गंगा के साथ जबरदस्ती की बात करे, तो क्या इससे गंगा का पुनर्जीवन होगा?’’

 

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