तीस्ता नदी जल समझौते की चुनौतियाँ और सम्भावनायें

Submitted by Hindi on Sat, 04/21/2018 - 17:20
Source
इंडियन काउंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने इस अल्प कार्यकाल में देश की विदेश नीति को एक नई दिशा देने वाली और पड़ोसी देशों के साथ सहयोगात्मक और सकारात्मक सम्बन्ध बनाने की पहल की है। अत: पड़ोसी राष्ट्रों के मुखिया इस बात की कवायद लगा रहे हैं कि भारत की यह एनडीए सरकार कुछ द्विपक्षीय मुद्दों को सुलझाने की पहल कर सकती है। इस क्रम में बांग्लादेश के साथ तीस्ता नदी जल हिस्सेदारी काफी समय से निदान की प्रतीक्षारत है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मार्च, 2014 में बिमस्टेक शिखर वार्ता के दौरान तीस्ता जल समझौते को करने का भरोसा दिलाया था, परन्तु कुछ अड़चनों के कारण समझौता नहीं बन पाया।

तीस्ता नदीतीस्ता नदी का उद्गम भारत के सिक्किम राज्य से होता है, जहाँ से निकल कर यह पश्चिमी बंगाल होते हुए बांग्लादेश में जाती है। वर्ष 1983 में भारत और बांग्लादेश के बीच एक तदर्थ जल हिस्सेदारी पर समझौता हुआ जिसके तहत 39 एवं 36 प्रतिशत जल बहाव मिलना तय किया गया। इस समझौते द्वारा तीस्ता नदी के जल वितरण का समान आवंटन प्रस्ताव ही व्यापक तौर पर नई द्विपक्षीय संधि का आधार था। मार्च 2010 में भारत और बांग्लादेश के मध्य एक मंत्रालय स्तर पर 37वीं संयुक्त नदी आयोग की बैठक हुई जो कि महत्त्वपूर्ण इसलिये थी क्योंकि इस बैठक में यह निर्णय लिया गया कि तीस्ता नदी पर एक समझौता होना चाहिए।

इसी क्रम में यूपीए सरकार और शेख हसीना नेतृत्व वाली बांग्लादेश सरकार वर्ष 2013 में एक जल समझौते की ओर अग्रसर होने लगी, जिसके तहत दोनों देशों की 18 वर्ष तक 50-50 प्रतिशत जल हिस्सेदारी होगी। इस संधि पर भारत की वर्तमान और पूर्व सरकारों की नीतियों में अधिक अंतर नहीं रहा है, वे सकारात्मक थीं, पर पश्चिमी बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस करार के पक्ष में नहीं थीं। गत वर्ष उनका कहना था कि राज्य के उत्तरी भाग में जल की सख्त जरूरत है इसलिये समानुपात जल वितरण संभव नहीं है। इस बात पर भारतीय मीडिया और बांग्लादेश में ममता बनर्जी की तीखी आलोचना हुई।

ममता बनर्जी ने इस मुद्दे पर मार्च, 2015 में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना से बात की। यह वार्ता सकारात्मक रही तथा ममता बनर्जी ने बांग्लादेश को उचित जल बँटवारे का आश्वासन दिया। यहाँ एक बात गौर करने की है कि केंद्र सरकार की बजाय पश्चिमी बंगाल की सरकार इस मुद्दे पर ज्यादा हावी नजर आई। वर्तमान में राज्य सरकारों का दखल विदेश नीति में देखा जा रहा है।

संविधान से इतर, राज्य सरकार की मुख्यमंत्री दूसरे देश के नेता के साथ किसी मुद्दे पर बात करे, ऐसा देखने को कम मिलता है। इस प्रकरण का दूसरा पहलू है कि पश्चिमी बंगाल और बांग्लादेश में ऐतिहासिक, सांस्कृतिक तथा भाषायी समरूपता है, जो उन्हें एक दूसरे के नजदीक लाती है। जिस प्रकार तमिलनाडु श्रीलंका में रह रहे तमिलों के मसले पर दोनों देशों के मध्य होने वाले निर्णयों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है, उसी प्रकार पश्चिमी बंगाल की सरकार भी तीस्ता मामले पर अगुवाई कर संधि को अंतिम रूप दे सकती है। वर्ष 1905 के विभाजन से पहले तक बंगाल एक संयुक्त प्रान्त था, अत: इस क्षेत्र के नेता यहाँ की भौगोलिक और सांस्कृतिक आकांक्षाओं को ढंग से पहचान सकते हैं।

इस संधि को कार्यान्वित करने के पीछे भारत के सामरिक हित भी हैं, जैसे भारत का उत्तर पूर्व का क्षेत्र सामरिक दृष्टि से काफी महत्त्वपूर्ण है और यदि यह संधि असफल रहती है तो बांग्लोदश की नीतियाँ और कृत्य इस क्षेत्र को प्रभावित करेंगे। बांग्लादेश की आर्थिक विपन्नता भारत में शरणार्थी और अवैध घुसपैठ की समस्या को भी बढ़ाएगी। मोदी सरकार से बांग्लादेश की सरकार उम्मीद रखती है कि इस संधि को जल्दी अंतिम रूप दिया जाये। अत: शेख हसीना ने इस मुद्दे को भारत बांग्लादेश रिश्ते में वरीयता पर रखा है।

इस संधि के होने से बांग्लादेश को कृषि के तौर पर आर्थिक लाभ हो सकता है, साथ ही उत्तरी बांग्लादेश में जीवन-यापन के लिये भी इस जल की नितांत आवश्यकता है। बांग्लादेश के उत्तरी क्षेत्र में चावल, पटसन और चाय की खेती काफी होती है और तीस्ता नदी का जल इसके लिये बहुत महत्त्वपूर्ण है। इस प्रकार से आर्थिक वृद्धि होने पर भारत में अवैध बांग्लादेशी आवागमन कम होने की संभावना है जिसका अप्रत्यक्ष लाभ भारत को हो सकता है। यह संधि एक मायने में और महत्त्वपूर्ण है; दोनों देश संधि के उपरांत संयुक्त रूप से बाढ़ और सूखे की आपदा से लड़ सकते हैं। इसके अतिरिक्त यदि बांग्लादेश की शेख हसीना नेतृत्व वाली सरकार यह समझौता करने में सफल रहती है तो वहाँ कट्टरपंथी समूह की आवाज भी दब जाएगी। दूसरी तरफ, पश्चिमी बंगाल की सरकार को अपना पक्ष रखते हुए सकारात्मक रवैया अपनाना चाहिए और भारत की केंद्र सरकार के साथ सहयोगात्मक रुख अपनाना चाहिए, जिससे कि यह संधि शीघ्र संपन्न हो सके। दोनों देशों के मध्य यह करार एक दीर्घकालीन मधुर सम्बन्धों को स्थापित कर सकता है।

लेखक परिचय
राकेश कुमार मीना, अनुसंधान अध्येता, आई.सी. डब्लू.ए., सप्रू हाउस, नई दिल्ली
 

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