सूखे का निदान परम्परागत जल प्रणाली

Submitted by RuralWater on Tue, 06/21/2016 - 12:57
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देश की महज पाँच प्रतिशत जमीन पर पाँच मीटर औसत गहराई में बारिश का पानी जमा किया जाये तो पाँच सौ लाख हेक्टेयर पानी की खेती की जा सकती है। इस तरह औसतन प्रति व्यक्ति 100 लीटर पानी प्रति व्यक्ति पूरे देश में दिया जा सकता है। और इस तरह पानी जुटाने के लिये जरूरी है कि स्थानीय स्तर पर सदियों से समाज की सेवा करने वाली पारम्परिक जल प्रणालियों को खोजा जाये, उन्हें सहेजने वाले, संचालित करने वाले समाज को सम्मान दिया जाये और एक बार फिर समाज को ‘पानीदार’ बनाया जाये। इस बार के सूखे से यह तो स्पष्ट हो गया है कि भारी-भरकम बजट, राहत जैसे शब्द जल संकट का निदान नहीं है।। यदि भारत का ग्रामीण जीवन और खेती बचाना है तो बारिश की हर बूँद को सहेजने के अलावा और कोई चारा नहीं है। बुन्देलखण्ड अभी तीन साल पहले ही कई करोड़ रुपए का विशेष पैकेज उदरस्थ कर चुका था, लेकिन जब बादल नहीं बरसे तो ना तो नल-जल योजनाएँ काम आई और ना ही नलकूप। ना तो बुन्देलखण्ड के लिये अल्पवर्षा नई बात है और ना ही वहाँ के समाज के लिये कम पानी में गुजारा करना, लेकिन बीते पाँच दशक के दौरान आधुनिकता की आँधी में दफन हो गई पारम्परिक जल प्रणालियों के चलते आज वहाँ निराशा, पलायन व बेबसी का आलम है।

सनद रहे कि हमारे पूर्वजों ने देश-काल परिस्थिति के अनुसार बारिश को समेटकर रखने की कई प्रणालियाँ विकसित व संरक्षित की थीं, जिसमें तालाब सबसे लोकप्रिय थे। घरों की जरूरत यानि पेयजल व खाना बनाने के लिये मीठे पानी का साधन कुआँ कभी घर-आँगन में हुआ करता था। धनवान लोग सार्वजनिक कुएँ बनवाते थे।

हरियाणा से मालवा तक जोहड़ या खाल जमीन की नमी बरकरार रखने की प्राकृतिक संरचना हैं। ये आमतौर पर वर्षाजल के बहाव क्षेत्र में पानी रोकने के प्राकृतिक या कृत्रिम बाँध के साथ छोटा तालाब की मानिंद होता है। तेज ढलान पर तेज गति से पानी के बह जाने वाले भूस्थल में पानी की धारा को काटकर रोकने की पद्धति ‘पाट’ पहाड़ी क्षेत्रों में बहुत लोकप्रिय रही है।

एक नहर या नाली के जरिए किसी पक्के बाँध तक पानी ले जाने की प्रणाली ‘नाड़ा या बन्धा’ अब देखने को नहीं मिल रही है। कुण्ड और बावड़िया महज जल संरक्षण के साधन नहीं, बल्कि हमारी स्थापत्य कला का बेहतरीन नमूना रहे हैं। आज जरूरत है कि ऐसी ही पारम्परिक प्रणालियों को पुनर्जीवित करने के लिये खास योजना बनाई जाये व इसकी जिम्मेदारी स्थानीय समाज की ही हो।

यह देश-दुनिया जब से है तब से पानी एक अनिवार्य जरूरत रही है और अल्प वर्षा, मरुस्थल, जैसी विषमताएँ प्रकृति में विद्यमान रही हैं- यह तो बीते दो सौ साल में ही हुआ कि लोग भूख या पानी के कारण अपने पुश्तैनी घरों- पिंडों से पलायन कर गए। उसके पहले का समाज तो हर तरह की जल-विपदा का हल रखता था।

अभी हमारे देखते-देखते ही घरों के आँगन, गाँव के पनघट व कस्बों के सार्वजनिक स्थानों से कुएँ गायब हुए हैं। बावड़ियों को हजम करने का काम भी आजादी के बाद ही हुआ। हमारा आदि-समाज गर्मी के चार महीनों के लिये पानी जमा करना व उसे किफायत से खर्च करने को अपनी संस्कृति मानता था।

वह अपने इलाके के मौसम, जलवायु चक्र, भूगर्भ, धरती-संरचना, पानी की माँग व आपूर्ति का गणित भी जानता थ। उसे पता था कि कब खेत को पानी चाहिए और कितना मवेशी को और कितने में कंठ तर हो जाएगा। वह अपनी गाड़ी को साफ करने के लिये पाइप से पानी बहाने या हजामत के लिये चालीस लीटर पानी बहा देने वाली टोंटी का आदी नहीं था। भले ही आज उसे बीते जमाने की तकनीक कहा जाये, लेकिन आज भी देश के कस्बे-शहर में बनने वाली जन-योजनाओं में पानी की खपत व आवक का वह गणित कोई नहीं आँक पाता है जो हमारा पुराना समाज जानता था।

राजस्थान में तालाब, बावड़ियाँ, कुईं और झालार सदियों से सूखे का सामना करते रहे। ऐसे ही कर्नाटक में कैरे, तमिलनाडु में ऐरी, नागालैण्ड में जोबो तो लेह-लद्दाख में जिंग, महाराष्ट्र में पैट, उत्तराखण्ड में गुल हिमाचल प्रदेश में कुल और और जम्मू में कुहाल कुछ ऐसे पारम्परिक जल-संवर्धन के सलीके थे जो आधुनिकता की आँधी में कहीं गुम हो गए और अब आज जब पाताल का पानी निकालने व नदियों पर बाँध बनाने की जुगत अनुतीर्ण होती दिख रही हैं तो फिर उनकी याद आ रही है।

गुजरात के कच्छ के रण में पारम्परिक मालधारी लोग खारे पानी के ऊपर तैरती बारिश की बूँदों के मीठे पानी को ‘विरदा’ के प्रयोग से संरक्षित करने की कला जानते थे। सनद रहे कि उस इलाके में बारिश भी बहुत कम होती है। हिम-रेगिस्तान लेह-लद्दाख में सुबह बर्फ रहती है और दिन में धूप के कारण कुछ पानी बनता है जो शाम को बहता है। वहाँ के लोग जानते थे कि शाम को मिल रहे पानी को सुबह कैसे इस्तेमाल किया जाये।

तमिलनाडु में एक जल सरिता या धारा को कई-कई तालाबों की शृंखला में मोड़कर हर बूँद को बड़ी नदी व वहाँ से समुद्र में बेजा होने से रोकने की अनूठी परम्परा थी। उत्तरी अराकोट व चेंगलपेट जिल में पलार एनीकेट के जरिए इस ‘पद्धति तालाब’ प्रणाली में 317 तालाब जुड़े हैं।

रामनाथपुरम में तालाबों की अन्तरशृंखला भी विस्मयकारी है। पानी के कारण पलायन के लिये बदनाम बुन्देलखण्ड में भी पहाड़ी के नीचे तालाब, पहाड़ी पर हरियाली वाला जंगल और एक तालाब के ‘ओने’ (अतिरिक्त जी की निकासी का मुँह) से नाली निकालकर उसे उसके नीचे धरातल पर बने दूसरे तालाब से जोड़ने व ऐसे पाँच-पाँच तालाबों की कतार बनाने की परम्परा 900वीं सदी में चन्देल राजाओं के काल से रही है। वहाँ तालाबों के आन्तरिक जुड़ावों को तोड़ा गया, तालाब के बन्धान फोड़े गए, तालाबों पर कालोनी या खेत के लिये कब्जे हुए, पहाड़ी फोड़ी गई, पेड़ उजाड़ दिये गए। इसके कारण जब जल देवता रुठे तो पहले नल, फिर नलकूप के टोटके किये गए। सभी उपाय जब हताश रहे तो आज फिर तालाबों की याद आ रही है।

पारिस्थैतिकी के निर्माण में जल आधारभूत कारक है। वनस्पति से लेकर जीव-जन्तु अपने पोषक तत्वों की प्राप्ति जल के माध्यम से करते हैं। जब जल में भौतिक या मानविक कारणों से कोई बाह्य सामग्री मिलकर जल के स्वाभाविक गुण में परिवर्तन लाती है, जिसका कुप्रभाव जीवों के स्वास्थ्य पर प्रकट होता है। इन दिनों ऐसे ही प्रदूषित जल की मात्रा दिनों दिन बढ़ रही है, फलस्वरूप पृथ्वी पर पानी की पर्याप्त मात्रा मौजूद होने के कारण दुनिया के अधिकांश हिस्से में पेयजल की त्राहि-त्राहि मची दिखती है।

भारत में हर साल कोई 40 करोड़ हेक्टेयर मीटर पानी मिलता है। उसका खर्च तीन प्रकार से होता है: सात करोड़ हेक्टेयर मीटर भाप बनकर उड़ जाता है, 11.5 करोड़ हेक्टेयर मीटर नदियों आदि से बहता है, शेष 21.5 करोड़ हेक्टेयर मीटर जमीन में जज्ब हो जाता है। फिर इन तीनों में लेन-देन चलता रहता है। जमीन में जज्ब होने वाले कुल 21.5 करोड़ हेक्टेयर मीटर पानी में से 16.5 करोड़ हेक्टेयर मीटर पानी मिट्टी की नमी बनाए रखता है और बाकी पाँच करोड़ हेक्टेयर मीटर जल भूजल स्रोतों में जा मिलता है।

पिछले कुछ सालों के दौरान पेड़ों की कटाई अन्धाधुन्ध हुई, सो बारिश का पानी सीधे जमीन पर गिरता है और मिट्टी की ऊपरी परत को काटते हुए बह निकलता है। इससे नदियों में मिट्टी अधिक पहुँचने के कारण वे उथली तो हो रही है, साथ ही भूजल का भण्डार भी प्रभावित हुआ है। इसके विपरीत नलकूप, कुओं आदि से भूजल का खींचना बेतरतीब बढ़ा है।

सन 1944 में गठित ‘फेमिन इनक्वायरी कमीशन’ ने साफ निर्देश दिये थे कि आने वाले सालों में सम्भावित पेयजल संकट से जूझने के लिये तालाब ही कारगर होंगे। कमीशन की रिपोर्ट तो लाल बस्ते में कहीं दब गई और देश की आजादी के बाद इन पुश्तैनी तालाबों की देखरेख करना तो दूर, उनकी दुर्दशा करना शुरू कर दिया। चाहे कालाहांडी हो या फिर बुन्देलखण्ड या फिर तेलंगाना; देश के जल-संकट वाले सभी इलाकों की कहानी एक ही है।

इन सभी इलाकों में एक सदी पहले तक कई-कई सौ बेहतरीन तालाब होते थे। यहाँ के तालाब केवल लोगों की प्यास ही नहीं बुझाते थे, यहाँ की अर्थव्यवस्था का मूल आधार भी होते थे। मछली, कमलगट्टा , सिंघाड़ा, कुम्हार के लिये चिकनी मिट्टी; यहाँ के हजारों-हजार घरों के लिये खाना उगाहते रहे हैं। तालाबों का पानी यहाँ के कुओं का जलस्तर बनाए रखने में सहायक होते थे। शहरीकरण की चपेट में लोग तालाबों को ही पी गए और अब उनके पास पीने के लिये कुछ नहीं बचा है।

कागजों पर आँकड़ों में देखें तो हर जगह पानी दिखता है लेकिन हकीकत में पानी की एक-एक बूँद के लिये लोग पानी-पानी हो रहे हैं। जहाँ पानी है, वह इस्तेमाल के काबिल नहीं है। आज जलनिधि को बढ़ता खतरा बढ़ती आबादी से कतई नहीं है।

खतरा है आबादी में बढ़ोत्तरी के साथ बढ़ रहे औद्योगिक प्रदूषण, दैनिक जीवन में बढ़ रहे रसायनों के प्रयोग और मौजूद जल संसाधनों के अनियोजित उपयोग से। यह दुखद है कि जिस जल के बगैर एक दिन भी रहना मुश्किल है, उसे गन्दा करने में हम-हमारा समाज बड़ा बेरहम है। यह जान लेना जरूरी है कि धरती पर इंसान का अस्तित्व बनाए रखने के लिये पानी जरूरी है तो पानी को बचाए रखने के लिये बारिश का संरक्षण ही एकमात्र उपाय है।

यदि देश की महज पाँच प्रतिशत जमीन पर पाँच मीटर औसत गहराई में बारिश का पानी जमा किया जाये तो पाँच सौ लाख हेक्टेयर पानी की खेती की जा सकती है। इस तरह औसतन प्रति व्यक्ति 100 लीटर पानी प्रति व्यक्ति पूरे देश में दिया जा सकता है। और इस तरह पानी जुटाने के लिये जरूरी है कि स्थानीय स्तर पर सदियों से समाज की सेवा करने वाली पारम्परिक जल प्रणालियों को खोजा जाये, उन्हें सहेजने वाले, संचालित करने वाले समाज को सम्मान दिया जाये और एक बार फिर समाज को ‘पानीदार’ बनाया जाये। यहाँ ध्यान रखना जरूरी है कि आंचलिक क्षेत्र की पारम्परिक प्रणालियों को आज के इंजीनियर शायद स्वीकार ही नहीं पाएँ सो जरूरी है कि इसके लिये समाज को ही आगे किया जाये।

सनद रहे कि हमारे पूर्वजों ने देश-काल परिस्थिति के अनुसार बारिश को समेटकर रखने की कई प्रणालियाँ विकसित व संरक्षित की थीं, जिसमें तालाब सबसे लोकप्रिय थे। घरों की जरूरत यानि पेयजल व खाना बनाने के लिये मीठे पानी का साधन कुआँ कभी घर-आँगन में हुआ करता था। धनवान लोग सार्वजनिक कुएँ बनवाते थे।

हरियाणा से मालवा तक जोहड़ या खाल जमीन की नमी बरकरार रखने की प्राकृतिक संरचना है। ये आमतौर पर वर्षाजल के बहाव क्षेत्र में पानी रोकने के प्राकृतिक या कृत्रिम बाँध के साथ छोटा तालाब की मानिंद होता है। तेज ढलान पर तेज गति से पानी के बह जाने वाले भूस्थल में पानी की धारा को काटकर रोकने की पद्धति ‘पाट’ पहाड़ी क्षेत्रों में बहुत लोकप्रिय रही है।

एक नहर या नाली के जरिए किसी पक्के बाँध तक पानी ले जाने की प्रणाली ‘नाड़ा या बन्धा’ अब देखने को नहीं मिल रही है। कुण्ड और बावड़िया महज जल संरक्षण के साधन नहीं, बल्कि हमारी स्थापत्य कला का बेहतरीन नमूना रहे हैं। आज जरूरत है कि ऐसी ही पारम्परिक प्रणालियों को पुनर्जीवित करने के लिये खास योजना बनाई जाये व इसकी जिम्मेदारी स्थानीय समाज की ही हो।

जल संचयन के स्थानीय व छोटे प्रयोगों से जल संरक्षण में स्थानीय लोगों की भूमिका व जागरुकता दोनों बढ़ेगी, साथ ही इससे भूजल का रिचार्ज तो होगा ही जो खेत व कारखानों में पानी की आपूर्ति को सुनिश्चित करेगा।

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