सदानीरा के साथ टूट गया पनघट का जमघट

Submitted by RuralWater on Fri, 12/02/2016 - 15:52

पुराना समाज पानी की ताकत और शुद्धता को समझता था तभी तो धोबियों के कपड़े धोने के लिये अलग जोहड़ी बनाई गई थी और वहीं कुआँ इसलिये कि इन्हें पानी के लिये भटकना न पड़े। देश के सर्वाधिक शिक्षित प्रान्तों में से एक नम्बर वन हरियाणा के विकास मॉडल का एक कड़वा सच आज भी यह है कि दलितों के पीने के लिये पानी का कुआँ यहाँ आज भी अलग है। पानी का कोई रंग नहीं है और वह सबका मैल धो देता है, लेकिन जाति का रंग मानव स्वभाव पर इतना गहरा चढ़ गया है कि उसने धोबीवाली कुईं दलितों के लिये अलग कर दी।युवाओं की अरुचि सरकार की गलत नीतियों और बुजुर्गों की लापरवाही के चलते गाँव के तालाबों और कुँओं की वह दौलत लगभग खो दी है, जिस पर न जाने उनकी कितनी पीढ़ियों ने जीवन बसर किया था। भौतिक विकास की बयार के साथ परम्पराओं और मूल्यों के दम तोड़ने के साथ गाँव के शक्तिवाला, भूतलीवाला, रत्तीवाला और मुंशी की बगीची वाला जोहड़ दम तोड़ चुके हैं।

गुड़गाँव की अत्यन्त पॉश कॉलोनी पालम विहार के साथ बसा है दौलताबाद। एक जमाने में रसभरे देसी टमाटर और मीठी गाजर की खेती के लिये दिल्ली और हरियाणा में मशहूर इस गाँव में अब चारों ओर दूर-दूर तक बिल्डर्स का मोर्चा दिखता है।

दिल्ली की सीमा से तकरीबन 3 किलोमीटर दूरी पर स्थित इस गाँव में जमीन की कीमतें आसमान छू रही हैं। इसी का परिणाम है कि यहाँ के किसानों के पास आज रुपयों की भरमार है। भूतलीवाला तालाब को अब पूरी तरह समतल कर दिया गया है। शक्तिवाला तालाब शक्ति का प्रतीक था। थोड़ा बहुत पानी धोबीवाली जोहड़ी और बुज्जनवाली में है। बाकी सब खेतों में तब्दील हो गए हैं।

तालाब ग्रामीणों की सारी अनहोनी और कष्ट अपने ऊपर ले लेता था। दिल्ली प्रशासन में शिक्षक निर्मल बताते हैं कि इस तालाब का पानी कभी सूखता नहीं था और गंगाजल की तरह निर्मल होता था। इसमें शौच साफ करने की बात तो दूर आस-पास तक में मल विसर्जन की मनाही थी।

गाँव के तकरीबन ढाई दर्जन कुओं में पानी की बूँद नहीं है। इन्हीं कुँओं की बदौलत ग्रामीण टमाटर और गाजर की खेती करते थे। अब गाँवों में जो थोड़ी-बहुत जमीन बची है, उस पर लगभग सभी किसान सरसों का उत्पादन करते हैं। ऑडी और दूसरी महंगी कारें, चमचमाते गगनचुम्बी अपार्टमेंट, स्कॉच और पालम विहार की क्लब संस्कृति के बीच लम्बे घूँघट में ठेठ हरियाणवी बोली के साथ सिर पर मटका और पनघट का स्वर कंक्रीट के इस जंगल में गत वर्ष तक मेरे जैसे गमछे वालों को शास्त्रीय संगीत का सा सुखद अहसास देता था।

यह गाँवों के खासतौर से रंगीली गली के बुजुर्गों की जिद रही है कि वे इन कुओं के सिवाय कहीं और का पानी ही पीना पसन्द नहीं करते थे। जिन्दगी के 95 बसन्त देख चुके ग्रामीण चौधरी रामप्रसाद बताते हैं कि कुएँ हमारे समाज की ताकत थी। नए लड़कों ने कई बार इन्हें बन्द कराने या इनमें पम्प लगाने की बात कही।

कुएँ का स्वभाव कि उससे आवश्यकता के हिसाब से लिया जाये तो वह कभी रीतता नहीं है और बुझाता रहता है प्यास। साथ ही खड़े ओमप्रकाश कहते हैं कि जिस समाज का कुआँ नहीं रीतता, वह समाज हरा-भरा रहता है हमेशा। लेकिन अब तो हम भी हार मान गए हैं। ऐसे गुड़गाँव जहाँ बाल्टी भर पानी को कुएँ का प्रतीक मान कुआँ पूजा जाता है।

पुराना समाज पानी की ताकत और शुद्धता को समझता था तभी तो धोबियों के कपड़े धोने के लिये अलग जोहड़ी बनाई गई थी और वहीं कुआँ इसलिये कि इन्हें पानी के लिये भटकना न पड़े। देश के सर्वाधिक शिक्षित प्रान्तों में से एक नम्बर वन हरियाणा के विकास मॉडल का एक कड़वा सच आज भी यह है कि दलितों के पीने के लिये पानी का कुआँ यहाँ आज भी अलग है।

पानी का कोई रंग नहीं है और वह सबका मैल धो देता है, लेकिन जाति का रंग मानव स्वभाव पर इतना गहरा चढ़ गया है कि उसने धोबीवाली कुईं दलितों के लिये अलग कर दी। एक ग्रामीण इसके पक्ष में बाकायदा दलील भी देते हैं, भाई दलितों का कुआँ अलग इसलिये बनाया गया है ताकि उनसे किसी का टकराव न हो। गाँव के पास ही स्थित अत्यन्त प्रतिष्ठित बाबा प्रकाशपुरी के सदानीरा तालाब का स्वरूप अब बदल गया है। आश्रम के व्यवस्थापकों ने इस 90 प्रतिशत पक्का कर दिया है, तालाब के तल का एक छोटा सा कोना ही कच्चा छोड़ा गया है।

नरक जीते देवसरइसी में बोर से पानी भरा जाता है। यह वही तालाब है हलवाई जिसका पानी ब्याह-शादियों में छोले उबालने के लिये माँगते थे। इस तालाब का पानी इतना मीठा था कि एक दशक पहले तक लोग यहाँ से टैंकर भरकर ले जाते थे, बाद में जब लोगों ने इसे कारोबार बना लिया तो आश्रम ने इस पर रोक लगाई।

दौलताबाद के साथ ही बसे राजेंद्रा पार्क, सूरत नगर, पालम विहार, न्यू पालम विहार, आदि पिछले डेढ़ दशक में बसी बस्तियों में जन स्वास्थ्य विभाग की आपूर्ति है, समर्सिबल की भरमार है, लेकिन अक्सर यहाँ पानी का संकट गहरा जाता है। अब गाँव में भूजल स्तर 80 से 100 फुट तक चला गया है। यह हालत तो तब है, जबकि गाँव के साथ से ड्रेन बहती है और दौलताबाद की ओर इस ड्रेन की पुश्त भी नहीं बनाई गई है। पूरा गाँव और ये बस्तियाँ समर्सिबल पम्प चलाता है।

भूजल संकट का इससे बड़ा कारण चारों ओर बन रहे बहुमंजिला अपार्टमेंट हैं। इनके निर्माण में पानी की भयावह खपत होती है। जिनमें से कई ने तो उच्च न्यायालय और केन्द्रीय भूजल प्राधिकरण की रोक के बावजूद धड़ल्ले से अत्यधिक पावरफुल समर्सिबल लगा रखे हैं।

 

नरक जीते देवसर

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिए कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें)

क्रम

अध्याय

1

भूमिका - नरक जीते देवसर

2

अरै किसा कुलदे, निरा कूड़दे सै भाई

3

पहल्यां होया करते फोड़े-फुणसी खत्म, जै आज नहावैं त होज्यां करड़े बीमार

4

और दम तोड़ दिया जानकीदास तालाब ने

5

और गंगासर बन गया अब गंदासर

6

नहीं बेरा कड़ै सै फुलुआला तालाब

7

. . .और अब न रहा नैनसुख, न बचा मीठिया

8

ओ बाब्बू कीत्तै ब्याह दे, पाऊँगी रामाणी की पाल पै

9

और रोक दिये वर्षाजल के सारे रास्ते

10

जमीन बिक्री से रुपयों में घाटा बना अमीरपुर, पानी में गरीब

11

जिब जमीन की कीमत माँ-बाप तै घणी होगी तो किसे तालाब, किसे कुएँ

12

के डले विकास है, पाणी नहीं तो विकास किसा

13

. . . और टूट गया पानी का गढ़

14

सदानीरा के साथ टूट गया पनघट का जमघट

15

बोहड़ा में थी भीमगौड़ा सी जलधारा, अब पानी का संकट

16

सबमर्सिबल के लिए मना किया तो बुढ़ापे म्ह रोटियां का खलल पड़ ज्यागो

17

किसा बाग्गां आला जुआं, जिब नहर ए पक्की कर दी तै

18

अपने पर रोता दादरी का श्यामसर तालाब

19

खापों के लोकतंत्र में मोल का पानी पीता दुजाना

20

पाणी का के तोड़ा सै,पहल्लां मोटर बंद कर द्यूं, बिजली का बिल घणो आ ज्यागो

21

देवीसर - आस्था को मुँह चिढ़ाता गन्दगी का तालाब

22

लोग बागां की आंख्यां का पाणी भी उतर गया

 

Disqus Comment

More From Author

Related Articles (Topic wise)

Related Articles (District wise)

About the author

नया ताजा