अस्तित्व के लिये लड़ रहे हैं आदिवासी

Submitted by UrbanWater on Tue, 04/18/2017 - 11:07
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जल, जंगल और जमीन - उलट-पुलट पर्यावरण (2013) पुस्तक से साभार

जंगलों में अभयारण्य विकसित करने के नाम पर कहीं मुआवजा देकर और कहीं बगैर मुआवजा दिये ही आदिवासियों को विस्थापित करने का काम बड़े पैमाने पर चलाया जा रहा है। हाल ही में यह सुनने को मिला है कि एक एलीफेंट कॉरीडोर के निर्माण की योजना है। इस योजना में उत्तराखण्ड के जंगल से नेपाल के जंगल तक को हाथियों के लिये अविचलित क्षेत्र के तौर पर विकसित किया जाना है। ऐसा इसलिये किया जाएगा ताकि हाथियों के झुंड भारत से नेपाल और नेपाल से भारत बगैर किसी बाधा के रमण कर सकें।भारत की आजादी के लगभग छह दशक के बाद भी कुल आबादी की आठ प्रतिशत आदिवासी जनता खस्ताहाल जिन्दगी जीने को बेबस है। इसे केन्द्र और राज्य की राजनीति करने वाले लोगों ने मौका पाते ही लूटा है।

विज्ञान के विकास के साथ यह सिलसिला और परवान चढ़ा है। विज्ञान के विकास का तात्पर्य यहाँ इन सन्दर्भों में समझना बेहतर होगा कि देश के विकास के नाम पर पनबिजली परियोजना, सिंचाई के नाम पर भीमकाय बाँध परियोजना, कल-कारखानों के लिये कच्चे माल का दोहन आदि ढेरों उपक्रम आदिवासी-बहुल इलाकों में ही चलाए जाते रहे हैं। इसकी वजह यह रही है कि उत्पादन के सारे स्रोत इनके ही इलाकों में पाये जाते हैं। आजादी के बाद इस आबादी ने अपने लोगों पर बहुत लम्बे अरसे तक भरोसा किया, परन्तु परिणाम के तौर पर इनके हाथ गरीबी, भुखमरी और बदहाली ही आई है। संसाधनों पर कब्जा जमाने के लिये उड़ीसा, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल सहित तमाम राज्य सरकारों की पुलिस लाठी और गोली का प्रयोग करने लगी है।

आज के सन्दर्भ में देखा जाये तो इस साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ चल रहे जंगल के आन्दोलनों का स्वर आम नागरिकों के आन्दोलन की तुलना में ज्यादा तीखा हो गया है। आन्दोलन की आग विभिन्न मुद्दों को लेकर समस्त जंगल में लगी हुई है। आदिवासियों की यह लड़ाई पर्यावरण को बचाने से ज्यादा अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई है। दरअसल पर्यावरण और जीवन, जंगल के सन्दर्भ में सीधे तौर पर एक-दूसरे के पूरक हैं। सत्ता वर्ग पर्यावरण बचाने के नाम पर जंगलों में मुनाफे के लिये घुसपैठ कर रहा है। जंगलों में लकड़ी की कटाई पर प्रतिबन्ध लगाकर उनकी रोजी-रोटी छीनने की हर सम्भव कोशिश हो रही है।

जंगलों में अभयारण्य विकसित करने के नाम पर कहीं मुआवजा देकर और कहीं बगैर मुआवजा दिये ही आदिवासियों को विस्थापित करने का काम बड़े पैमाने पर चलाया जा रहा है। हाल ही में यह सुनने को मिला है कि एक एलीफेंट कॉरीडोर (हाथियों के लिये अभयारण्य जैसा) के निर्माण की योजना है। इस योजना में उत्तराखण्ड के जंगल से नेपाल के जंगल तक को हाथियों के लिये अविचलित क्षेत्र के तौर पर विकसित किया जाना है। ऐसा इसलिये किया जाएगा ताकि हाथियों के झुंड भारत से नेपाल और नेपाल से भारत बगैर किसी बाधा के रमण कर सकें। गौरतलब है कि हाथी अपने रास्तों का निर्माण खुद करते हैं और उसे भूलते नहीं है। इसलिये यह उन्हीं पर छोड़ दिया जाये तो बेहतर होगा। हाल के वर्षों में उत्तराखण्ड में अभयारण्य विकसित करने के नाम पर विस्थापन की दर को बहुत बढ़ावा मिला है। पिछले ही साल उत्तराखण्ड के रामपुर के जंगल से होकर जाने वाले ‘कंडी मार्ग’ को यह कहकर बन्द करा दिया गया कि इससे जंगली जानवरों के अस्तित्व को खतरा उत्पन्न हो रहा है। लकड़ी काटने पर पूरी तरह से प्रतिबन्ध लगा दिया गया। उल्लेखनीय है कि उत्तराखण्ड का लगभग 67 प्रतिशत हिस्सा वनाच्छादित है। इन जंगलों में ढेरों रिसॉर्ट बनाए जा रहे हैं। बहुत सारे उद्योग लगाने की मंजूरी भी दी जा चुकी है। डब्ल्यू.डब्ल्यू.एफ. व कार्बेट फाउंडेशन सहित कई एनजीओ देशी-विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के खेल को आगे बढ़ाने में तत्परता से लगे हुए हैं। इस मुद्दे पर मोर्चा ले रहे सात जनसंगठनों के लोग बताते हैं कि इस खेल में पर्यावरणविद भी बराबरी से शामिल हैं। इस खेल को चलाने के लिये बहुत भारी मात्रा में विदेशी पूँजी लगाई गई है। इस अनैतिक खेल में केन्द्र और राज्य, दोनों शामिल हैं। सबको मालूम है कि उड़ीसा राज्य सरकार ने दक्षिण कोरियाई कम्पनी ‘पॉस्को’ को जगतसिंहपुर जिला के अन्तर्गत हजारों एकड़ जमीन 48330 लाख टन लौह अयस्क का भण्डार लूटने के लिये मुहैया कराई है।

नवनिर्माण शोध इकाई की मानें तो राज्य सरकार को करोड़ों का घाटा होना तय है। दक्षिण भारत की ‘सुप्त घाटी’ में भी व्यापक स्तर पर आन्दोलन चलाए जा रहे हैं। झारखण्ड और छत्तीसगढ़ में सरकार के जन-विरोधी रवैयों का बड़े पैमाने पर आदिवासी जनता विरोध कर रही है। अपने अधिकारों की लड़ाई को वे जीतना चाहते हैं। इसके लिये वे किसी भी कीमत को चुकाने को तैयार हैं। अफसोस तो यह है कि आदिवासी तबका अपनी लड़ाई के लिये जिस बौद्धिक तबके से उम्मीद लगाए बैठा है, वह खुद अपनी तकलीफों में घिरा है। वह इस भ्रम में जी रहा है कि इस चरमराती व्यवस्था से भी कुछ हासिल किया जा सकता है। यह तबका सड़क, सिंचाई और स्वास्थ्य आदि के नाम पर अरबों, खरबों की परियोजना को विकास का पैमाना बनाकर खुश होता रहता है। सच यह भी है कि संसार में समानता के लिये लड़े गए तमाम आन्दोलनों में बुद्धिजीवियों की अहम भूमिका रही है। उम्मीद है कि उनके दीयों की रोशनी को तेज करने के लिये फिर से बौद्धिक तबका आगे आएगा।

 

जल, जंगल और जमीन - उलट-पुलट पर्यावरण

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें)

क्रम

अध्याय

 

पुस्तक परिचय - जल, जंगल और जमीन - उलट-पुलट पर्यावरण

1

चाहत मुनाफा उगाने की

2

बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के आगे झुकती सरकार

3

खेती को उद्योग बनने से बचाएँ

4

लबालब पानी वाले देश में विचार का सूखा

5

उदारीकरण में उदारता किसके लिये

6

डूबता टिहरी, तैरते सवाल

7

मीठी नदी का कोप

8

कहाँ जाएँ किसान

9

पुनर्वास की हो राष्ट्रीय नीति

10

उड़ीसा में अधिकार माँगते आदिवासी

11

बाढ़ की उल्टी गंगा

12

पुनर्वास के नाम पर एक नई आस

13

पर्यावरण आंदोलन की हकीकत

14

वनवासियों की व्यथा

15

बाढ़ का शहरीकरण

16

बोतलबन्द पानी और निजीकरण

17

तभी मिलेगा नदियों में साफ पानी

18

बड़े शहरों में घेंघा के बढ़ते खतरे

19

केन-बेतवा से जुड़े प्रश्न

20

बार-बार छले जाते हैं आदिवासी

21

हजारों करोड़ बहा दिये, गंगा फिर भी मैली

22

उजड़ने की कीमत पर विकास

23

वन अधिनियम के उड़ते परखचे

24

अस्तित्व के लिये लड़ रहे हैं आदिवासी

25

निशाने पर जनजातियाँ

26

किसान अब क्या करें

27

संकट के बाँध

28

लूटने के नए बहाने

29

बाढ़, सुखाड़ और आबादी

30

पानी सहेजने की कहानी

31

यज्ञ नहीं, यत्न से मिलेगा पानी

32

संसाधनों का असंतुलित दोहन: सोच का अकाल

33

पानी की पुरानी परंपरा ही दिलाएगी राहत

34

स्थानीय विरोध झेलते विशेष आर्थिक क्षेत्र

35

बड़े बाँध निर्माताओं से कुछ सवाल

36

बाढ़ को विकराल हमने बनाया

 


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