राष्ट्रों का संघ और पर्यावरण सन्तुलन

Submitted by RuralWater on Fri, 05/27/2016 - 16:23
Source
सर्वोदय प्रेस सर्विस, मई 2016

जलवायु बदलाव और इससे जुड़े पर्यावरणीय खतरों की एक खास बात यह है कि एक सीमा के बाद यह काफी हद तक मानवीय हस्तक्षेप के बाहर भी जा सकते हैं। अतः इनके नियंत्रण के लिये जो भी करना है वह बहुत शीघ्र ही करना है अन्यथा तो स्थिति नियंत्रण से बाहर निकल जाएगी। उदाहरण के लिये अनेक वैज्ञानिकों ने जलवायु बदलाव के संकट के सन्दर्भ में कहा है कि यदि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन एक सीमा के बाहर चला गया तो स्थिति मनुष्य के हाथ से बाहर निकल जाएगी। हाल के वर्षों में वैज्ञानिकों में इस बात को लेकर आम सहमति बढ़ी है कि आगामी कुछ दशकों में जलवायु बदलाव व अन्य गम्भीर पर्यावरणीय समस्याओं के कारण अत्यधिक चिन्ताजनक स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। दक्षिण एशिया में तो इनकी अभिव्यक्ति विशेष तौर पर अधिक विनाशक रूप ले सकती है। इसकी एक वजह यह है कि जलवायु बदलाव के दौर में समुद्र का जलस्तर बढ़ने के कारण तटीय क्षेत्रों में सबसे अधिक तबाही की सम्भावना है।

दक्षिण एशिया में बहुत घनी आबादी वाला काफी बड़ा तटीय क्षेत्र मौजूद है। एक अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि अभी तक दक्षिण एशिया में जलवायु बदलाव जैसे गम्भीर खतरों का सामना करने की तैयारी अपेक्षाकृत कम है।

इस समय यह जरूरत बहुत बढ़ गई है कि दक्षिण एशिया में जलवायु बदलाव जैसी गम्भीर पर्यावरणीय समस्याओं और उनसे जुड़ी विकट होती आपदाओं का सामना करने पर अधिक ध्यान केन्द्रित किया जाये। इसके लिये आपसी सहयोग को बढ़ाना जरूरी है और आपसी विवादों से बचना जरूरी है ताकि वास्तविक चुनौतियों का सामना करते हुए प्रतिकूल परिस्थितियों में जीवनरक्षा की अधिकतम तैयारी की जा सके। यह भी ध्यान में रखना जरूरी है कि मनुष्यों की अधिक आबादी के अतिरिक्त दक्षिण एशिया जीवन के विविध रूपों के पनपने के लिये भी बहुत अनुकूल स्थान रहा है। इस व्यापक जैवविविधता की रक्षा भी यहाँ के लोगों की जिम्मेदारी है।

जलवायु बदलाव और इससे जुड़े पर्यावरणीय खतरों की एक खास बात यह है कि एक सीमा के बाद यह काफी हद तक मानवीय हस्तक्षेप के बाहर भी जा सकते हैं। अतः इनके नियंत्रण के लिये जो भी करना है वह बहुत शीघ्र ही करना है अन्यथा तो स्थिति नियंत्रण से बाहर निकल जाएगी।

उदाहरण के लिये अनेक वैज्ञानिकों ने जलवायु बदलाव के संकट के सन्दर्भ में कहा है कि यदि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन एक सीमा के बाहर चला गया तो स्थिति मनुष्य के हाथ से बाहर निकल जाएगी। ऐसे टिपिंग प्वाइंट बहुत चर्चा में रहे हैं जिन्हें पार करना धरती पर जीवन के लिये बहुत खतरनाक रहेगा। यह संकट की स्थिति दक्षिण एशिया के लिये विशेष तौर पर अधिक विकट मानी गई है।

अतः इस समय दक्षिण एशिया के सुरक्षित भविष्य की चिन्ता करने वाले सभी लोगों के लिये सम्भवतः सबसे बड़ी चुनौती यह है कि जो बहुत सीमित समय बचा है उसमें पर्यावरणीय संकट का सामना करने के लिये सर्वश्रेष्ठ तैयारी कर ली जाये। इसके लिये बेकार के विवादों से बचते हुए जलवायु बदलाव जैसी गम्भीर समस्याओं पर नजदीकी आपसी सहयोग से और गहरी निष्ठा से कार्य करना बहुत जरूरी है। इस सन्दर्भ में अगले दो दशक विशेष रूप से बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। अतः तुरन्त ऐसी स्थितियों को तैयार करना बहुत जरूरी है जिनमें इन अति संवेदनशील जिम्मेदारियों को ठीक से निभाया जा सके।

इस सन्दर्भ में एक बहुत उपयोगी सुझाव यह हो सकता है कि दक्षिण एशिया के विभिन्न देश आपस में मिलकर पूर्ण समानता व स्वैच्छिकता के आधार पर एक लोकतांत्रिक संघ की स्थापना करें। इस संघ की प्रस्तावना में स्पष्ट लिखा होना चाहिए कि यह हर स्तर पर समानता, न्याय, शान्ति, लोकतंत्र एवं पर्यावरण की रक्षा पर आधारित है तथा इस मूल सिद्धान्त के अनुकूल ही उसका आचरण भी होना चाहिए।

ऐसे संघ की स्थापना से ऐसी स्थितियाँ उत्पन्न होंगी जिनमें व्यर्थ के विवादों से बचते हुए एक ओर तो गम्भीर पर्यावरणीय संकट का सामना करने की मजबूत तैयारी की जा सकती हैं तथा दूसरी ओर गरीबी व अभाव को दूर करने के प्रयास बेहतर किये जा सकते हैं।

ऐसे संघ की स्थापना की एक बहुत बड़ी उपलब्धि यह भी हो सकती है कि इस क्षेत्र के विभिन्न देशों में आपसी युद्ध की सम्भावना को समाप्त कर दिया जाये। इस क्षेत्र के दो देशों के पास परमाणु हथियार हैं अतः यहाँ आपसी युद्ध की सम्भावना को समाप्त करना विशेष तौर पर एक बड़ी उपलब्धि होगी।

संघ बनने पर यह प्रयास भी निरन्तर जारी रहना चाहिए कि संघ के पड़ोसी देशों के साथ मित्रता के सम्बन्ध बने रहें। इस तरह युद्ध से जुड़े सब तरह के तनाव व सैैन्य खर्च काफी कम करना सम्भव होगा। दूसरी ओर लोगों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिये अधिक खर्च करना सम्भव होगा।

इस तरह दक्षिण एशिया के विभिन्न देशों का लोकतांत्रिक संघ बनने से कई अति गम्भीर समस्याओं को एक साथ सुलझाने में बहुत मदद मिल सकती है। निश्चय ही इस कार्य में अनेक कठिनाइयाँ हैं परन्तु इसके सम्भावित लाभ इतने व्यापक हैं कि इस दिशा में निष्ठावान प्रयास करना बहुत जरूरी है।

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