मानव जनित आपदाओं से आहत उत्तराखण्ड

Submitted by UrbanWater on Mon, 04/03/2017 - 12:06

उत्तराखण्ड का भू-भाग 800 फीट से 25661 फीट की ऊँचाई तक पहुँचता है। जनता में जागरुकता का अभाव है, जिससे उत्तराखण्ड की प्राकृतिक सम्पदाओं और वन्य क्षेत्रों के समाप्त होने का खतरा मँडरा रहा है। भूकम्प और भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं से सड़क व यातायात मार्ग क्षतिग्रस्त होने, जलस्रोत सूखने, नदियों का जल प्रवाह अवरुद्ध होने और बाँधों के टूटने का भी खतरा होता है। उत्तराखण्ड में भौगोलिक परिस्थितियाँ भी काफी विषम है जिस कारण यहाँ बचाव व राहत कार्य यहाँ की जीवनशैली के समान जटिल होते हैं और अधिकतर समय रहते नहीं हो पाते। देवभूमि उत्तराखण्ड अपने नाम की ही भाँति भारत का एक खण्ड है जो अतुल्य पर्यावरणीय विविधता के कारण विश्वप्रसिद्ध है। राज्य में भारत की दो प्रमुख नदियों गंगा यमुना का उद्गम स्थल है साथ ही यहाँ विश्व विरासत में शामिल फूलों की घाटी स्थित है। इसका 83 प्रतिशत क्षेत्र पर्वतीय है, जिसकी आलौकिक सुन्दरता यहाँ आने वाले सैलानियों के आकर्षण का केन्द्र बनी रहती है और सभी के मन को मंत्रमुग्ध कर देती है। उत्तराखण्ड में वनौषधियों की बहुतायात है जिसमें से लगभग 15 प्रजातियाँ सम्पूर्ण विश्व में मात्र उत्तराखण्ड में ही पाई जाती है।

देवभूमि उत्तराखण्ड की अतुल्यता में कृषि, मील के पत्थर के समान है, जो राज्य की अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका निभाता है। उत्तराखण्ड लगभग 90 प्रतिशत से अधिक आबादी कृषि पर आश्रित है। जहाँ हिमालय से प्रस्फुटित जीवनदायिनी नदियाँ पर्यावरण सन्तुलन का प्रतीक है। ऋषि-मुनियों ने विश्व शान्ति हेतु तप करके उत्तराखण्ड की धरती को पवित्र बनाया है।

सम्पूर्ण विश्व से लोग शान्ति और आध्यात्मिक गहनता की तलाश में उत्तराखण्ड की धरती पर आते हैं। लेकिन इस सब खूबियों के बावजूद राज्य में हर साल आपदा आती रहती है। आज दूरदराज के गाँव बादल फटने की चिन्ता एवं बाढ़ के खतरे से भयभीत रहते हैं। वास्तव में इन कारणों की पड़ताल करने की जरूरत है।

समस्याओं का अम्बार


अनेकों विविधताओं और विशेषताओं को अपने भीतर समाहित करने के बावजूद भी आज इस पवित्र और ऐतिहासिक भूमि का पर्यावरण सन्तुलन डगमगाने लगा है। यह धरती सालों-साल विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक, मानवजनित आपदाओं का बसेरा बनती जा रही है। जिस तरह से उत्तराखण्ड के भौगोलिक और पर्यावरणीय ढाँचे में अकल्पनीय बदलाव आ रहे हैं, वह उत्तराखण्ड के जन-जीवन के लिये ही नहीं अपितु पूरे भारत के लिये शुभ संकेत नहीं है।

उत्तराखण्ड का प्राकृतिक परिवेश समस्त प्राणियों के अस्तित्व का परिचायक है, लेकिन वह आज अपने ही अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। उत्तराखण्ड में उत्पन्न होने वाले पर्यावरणीय संकट में भूकम्प, भूस्खलन, असन्तुलित वर्षा, वनाअग्नि जैसी प्राकृतिक आपदाएँ और वन्य क्षेत्रफल का निरन्तर घटता दायरा जैसी मानवजनित आपदाएँ अहम भूमिका निभा रही हैं।

विपदाओं को जन्म देती असामयिक आपदाएँ


भूकम्प एक प्राकृतिक आपदा है जो पृथ्वी की परत से ऊर्जा के अचानक उत्पादन के परिणामस्वरूप आता है जिससे तीव्र तरंगें उत्पन्न होती हैं, इससे पृथ्वी के भूगर्भ में टेक्टोनिक प्लेटों में हलचल होती है, जिसकी चपेट में पृथ्वी का एक बड़ा भू-भाग आता है। उत्तराखण्ड की धरती भी इससे अछूती नहीं है। भूकम्प संवदेनशील क्षेत्रों में उत्तराखण्ड को 04 व 05 जोन में रखा गया है। उत्तराखण्ड की धरती अनेकों बार थर-थराई भी है।

राज्य में अब तक 9.0 रिक्टर पैमाने पर सबसे तीव्र वेग का भूकम्प 01 सितम्बर 1803 को बदरीनाथ में आया था। इसके बाद 28 मई 1816 को गंगोत्री, 14 मई 1935 इको लोहाघाट, 02 अक्टूबर 1937 को देहरादून, 28 अगस्त 1988 को धारचूला में ऐसे भूकम्प आये जिनकी तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 7.0 और 8.0 के बीच थी, इसके अलावा आज भी सैंकड़ों की संख्या में हल्के भूकम्प महसूस किये जाते हैं।

साल-दर-साल तीव्र गति से जनसंख्या वृद्धि भी भूकम्प में होने वाले जान-माल के नुकसान में एक अहम भूमिका अदा करते हैं। आबादी का निरन्तर बढ़ना और बस्तियों के विस्तार से होने वाले नुकसान को हम मानवजनित आपदा की श्रेणी में शुमार कर सकते हैं। नियमानुसार अब सभी प्रकार के निर्माण भूकम्परोधी होंगे किन्तु भूकम्परोधी निर्माण की बजाय कंकरीट के भारी-भरकम इमारतों का निर्माण लगातार किया जा रहा है। साथ ही सड़क व अन्य निर्माण के कार्यों में इस्तेमाल किये जाने वाले विस्फोटों के परिणामस्वरूप उत्तराखण्ड के पहाड़ों की भूसंरचना को अधिक क्षति पहुँच रही है, जिसके कारण भूकम्प की स्थिति में पहाड़ों के दरकने की शंका अधिक रहती है।

बढ़ते कंकरीट के जंगलों के कारण हल्के भूकम्प में ही पहाड़ों के दरकने से मकान जमींदोज हो जाते हैं। आर.एस.ए.सी.-यूपी रीमोट सेंसिंग एप्लिकेशन के वैज्ञानिक सर्वेक्षण में इस बात की पुष्टि की गई है कि उत्तराखण्ड जोन चार व पाँच में आता है, जहाँ के अधिकांश गाँवों पर जमींदोज होने को खतरा मँडरा रहा है। भूकम्प से पहाड़ियों में दरारें पड़ जाती हैं, जो अधिकांशतः बरसात के दौरान भूस्खलन का कारण बनती है। यही नहीं, अतिवृष्टि के कारण भी भूस्खलन व बाढ़ आती है। जिसे सम्पूर्ण विश्व ने 2013 में केदारनाथ आपदा के रूप देखा था, जिसमें हजारों लोग असमय काल के गाल में समा गए और रामबाड़ा जैसा पर्वतीय भाग मैदानी क्षेत्र में परिवर्तित हो गया था। यह उत्तराखण्ड के सीने पर लगे अमिट घावों का एक छोटा सा प्रमाण है।

दावानल में राख होते जंगल


हर वर्ष मई-जून के महीने में उत्तराखण्ड के जंगल दावाग्नि से झुलसने लगते हैं। मई-जून का महीना हर बार उत्तराखण्ड के पहाड़ों के लिये काफी संघर्ष भरा रहता है। क्योंकि जंगलों में लगने वाली आग हर साल हजारों हेक्टेयर भूमि को स्वाहा कर देती है, जिससे अमूल्य वनौषधि के साथ-साथ पर्यावरण और वन्य प्राणियों को भी क्षति पहुँचती है।

आँकड़ों के अनुसार उत्तराखण्ड के जंगलों में 1984 से 2012 तक हजारों बार आग लगी है, लेकिन 2016 में लगी आग अधिक भीषण थी, जिसमें लगभग 2500 हेक्टेयर वन्यक्षेत्र जल गए। इसके अलावा कई लोगों की भी मृत्यु हुई थी। वैसे तो जंगलों में आग लगने के अनेक कारण हैं, जिनमें कई प्राकृतिक कारण और अधिकांशतः मानवजनित कारण है। इनमें मजदूरों द्वारा शहद, साल के बीज जैसे कुछ उत्पादों को इकट्ठा करने के लिये जानबूझकर आग लगाई जाती है।

कई बार जंगल में काम कर रहे मजदूरों, वहाँ से गुजरने वाले लोगों या चरवाहों द्वारा गलती से जलती हुई कोई चीज वहाँ छोड़ देने के कारण भी जंगल में आग लग जाती है। यही नहीं आस पास के गाँवों के लोगों द्वारा दुर्भावना व पशुओं के लिये ताजी घास उपलब्ध कराने हेतु भी आग लगाई जाती है। जो गर्मियों दौरान जंगल में भीषण आग का रूप धारण कर लेती है। इसके अलावा जंगल में लगने वाली आग में मुख्य भूमिका चीड़ के पेड़ निभाते हैं। आमतौर पर चीड़ के पेड़ जब एक दूसरे से रगड़ खाते हैं तो अक्सर आग लग जाती है।

माफियाओं के जाल में उलझा पर्यावरण


उत्तराखण्ड के जंगलों में लगने वाली आग, भूकम्प, भूस्खलन, अतिवृष्टि, जैसी प्राकृतिक घटनाएँ सालों-साल बढ़ती जा रही हैं। जिसका सीधा प्रभाव उत्तराखण्ड के अस्तित्व पर पड़ रहा है। जैसे मैग्नेसाइट, टाल्क व नदियों में अवैध खनन और वनों के कटाव के कारण इंसान ने प्रकृति का चीरहरण कर प्राकृतिक परिवेश को ही परिवर्तित कर दिया है। जिस कारण पर्यावरण में अकल्पनीय बदलाव आ रहे हैं, जो आपदा का रूप धारण कर लेते हैं।

वनों के कटने से पर्यावरण चक्र असन्तुलित हुआ है। वृक्षों को पहाड़ों का जीवन रक्षक कहा जाता है, जो वर्षा के दौरान पहाड़ों को दरकने से बचाते हैं क्योंकि पेड़ों की विशाल जड़ें पहाड़ों के भीतर मजबूत पकड़ बनाए रखती हैं। लेकिन वनों के कटने से पहाड़ कमजोर हो गए हैं, जिससे बरसात में अक्सर भूस्खलन का दौर प्रारम्भ हो जाता है। वनों के अवैध दोहन व पर्यावरण चक्र बिगड़ने के कारण वर्षा भी अनियमित हो गई है। पहाड़ी क्षेत्रों में अतिवृष्टि भी होने लगी है। वनों के कटाव से गर्मी अधिक पड़ने लगी है, जलस्रोत सूखते जा रहे हैं। परिणामतः जलसंकट का खतरा भी उत्तराखण्ड के सिर पर बैठा है।

कुमाऊँ विश्वविद्यालय अल्मोड़ा परिसर कॉलेज के डॉ. जे.एस. रावत के अनुसन्धान अध्ययनों से पता चला कि ऊपरी ढलान में मिश्रित सघन वन होने से भूजल में 31 प्रतिशत की वृद्धि हो जाती है। बाँज के पेड़ जल संग्रह में 23 प्रतिशत, चीड़ 16 प्रतिशत, खेत 13 प्रतिशत, बंजर भूमि 5 प्रतिशत और शहरी भूमि सिर्फ 2 प्रतिशत का योगदान करते हैं।

डॉ. रावत की सिफारिश है कि पहाड़ की चोटी से 1000 मीटर नीचे की तरफ सघन रूप से मिश्रित वन का आवरण होना चाहिए। ऐसे ही एक अध्ययन से पता चला है कि कुमाऊँ के 60 जलस्रोतों में 10 में पानी का प्रवाह बन्द हो गया था, 18 मौसमी स्रोत बनकर रह गए थे और बाकी के 32 के प्रवाह में कमी दर्ज की गई। इन सभी स्रोतों तक घटते जलस्तर को कारण आसपास से बाँज के जंगल का कटना बताया गया है।

पर्यावरणीय जागरुकता की आवश्यकता


उत्तराखण्ड का भू-भाग 800 फीट से 25661 फीट की ऊँचाई तक पहुँचता है। जनता में जागरुकता का अभाव है, जिससे उत्तराखण्ड की प्राकृतिक सम्पदाओं और वन्य क्षेत्रों के समाप्त होने का खतरा मँडरा रहा है। भूकम्प और भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं से सड़क व यातायात मार्ग क्षतिग्रस्त होने, जलस्रोत सूखने, नदियों का जल प्रवाह अवरुद्ध होने और बाँधों के टूटने का भी खतरा होता है।

उत्तराखण्ड में भौगोलिक परिस्थितियाँ भी काफी विषम है जिस कारण यहाँ बचाव व राहत कार्य यहाँ की जीवनशैली के समान जटिल होते हैं और अधिकतर समय रहते नहीं हो पाते। उत्तराखण्ड में हो रहा प्रकृतिक दोहन समय रहते नहीं रोका गया तो राज्य का पर्यावरणीय सन्तुलन ही समाप्त हो जाएगा। इसीलिये सरकार व जनता को समानता से प्रकृति के दोहन को राकने की जरूरत है। क्योंकि प्रकृति और मानव एक दूसरे के पूरक हैं और दोनों के अस्तित्व के लिये प्रकृति एवं इंसान के मध्य एक समान सन्तुलन आवश्यक है।

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