भूकम्प के साये में है उत्तराखण्ड

Submitted by editorial on Sat, 08/25/2018 - 12:15

वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजीवाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी (फोटो साभार - डब्ल्यूआईएचजी)उत्तराखण्ड भूकम्प की दृष्टि से अति-संवेदनशील है और राज्य के विभिन्न हिस्सों में अक्सर महसूस किये जाने वाले भूकम्प के झटकों को गम्भीरता से लेने की जरूरत है यह कहना है वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान (Wadia Institute of Himalayan Geology) से जुड़े भू-वैज्ञानिकों का।

उत्तराखण्ड में अक्सर आने वाले इन भूकम्प के झटकों की बड़ी वजह है इस प्रदेश का हिमालय क्षेत्र में स्थित होना। हालांकि भूकम्प के इन झटकों की क्षमता रिक्टर स्केल पर कम होती है लेकिन ये भविष्य में आने वाले किसी बड़े खतरे का संकेत भी हो सकते हैं।

हाल में ही वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान का स्वर्ण जयन्ती समारोह मनाया गया जिसमें देश-विदेश के 150 विशेषज्ञ और शोधकर्ताओं ने भाग लिया था। इस समारोह में बताया गया कि वर्ष 2015 में नेपाल में आये बेहद विनाशकारी भूकम्प के बाद राज्य में अब तक भूकम्प के 52 झटके महसूस किये जा चुके हैं।

500 साल के अन्तराल पर आता है विनाशकारी भूकम्प

समारोह में अपनी बात रखते हुए संस्थान के पूर्व निदेशक पद्मश्री प्रोफेसर वीसी ठाकुर ने बताया कि भूकम्प की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों में प्रत्येक पाँच सौ वर्ष के अन्तराल पर विनाशकारी भूकम्प के आने की सम्भावना रहती है। उन्होंने बताया कि इस प्रकार के भूकम्प की क्षमता रिक्टर स्केल पर आठ या इससे अधिक भी हो सकती है। “उत्तराखण्ड के भूकम्पीय इतिहास पर यदि गौर करें तो वर्ष 1400 में गढ़वाल क्षेत्र में रिक्टर स्केल पर आठ से उच्च क्षमता वाला भूकम्प आया था। इसके बाद सम्बन्धित भूकम्पीय क्षेत्र में इतनी ही क्षमता का भूकम्प 1803 के आसपास रिकॉर्ड किया गया था। इस तरह यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वर्ष 2300 के आसपास इतनी ही क्षमता का भूकम्प फिर आएगा” प्रोफेसर वीसी ठाकुर ने कहा। उन्होंने राज्य के भूकम्प की दृष्टि से अतिसंवेदनशील होने की बात पर जोर देते हुए कहा कि यहाँ भूकम्परोधी निर्माण की तकनीक को प्रमुखता से लागू किया जाना चाहिए जिससे बड़े भूकम्पीय झटकों की स्थिति में होने वाले नुकसान को कम-से-कम किया जा सके।

हिमालय का जारी है निर्माण

वाडिया के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. कौशिक सेन व डॉ. ए के सचान ने इण्डियन व यूरेशियन प्लेट की टक्कर के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि इन दोनों प्लेटों के बीच हुई यह टक्कर केवल एक नहीं बल्कि टक्करों की एक शृंखला थी, जो 70 मिलियन से लेकर 32 मिलियन वर्ष पूर्व तक लगातार चलती रही। सम्पूर्ण पृथ्वी छह प्लेटों में विभाजित है। इन बड़े प्लेटों के कई छोटे विभाजन हैं।

इन प्लेटों के बीच होने वाली टक्कर को प्लेट विवर्तनिकी के नाम से जाना जाता है और पृथ्वी पर नजर आने वाली सभी आकृतियाँ- पहाड़, मैदान, पठार, समुद्र आदि इसी घटना का परिणाम हैं। हिमालय की उत्पत्ति भी इसी विवर्तनिक घटना के कारण हुई है जो आज भी जारी है। भूकम्प भी इसी विवर्तनिक घटना का परिणाम हैं।

प्लेटों के बीच होने वाली टकराहट ही पर्वतों के निर्माण और भूकम्प का भी कारण है। इसके अलावा संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. आर जे पेरुमल ने वर्ष 1950 में तिब्बत-असम हिमालय क्षेत्र में रिक्टर स्केल पर आये 8.6 की क्षमता वाले भूकम्प के बारे में बताने के साथ ही अन्य ववर्तनिक घटनाओं पर भी चर्चा की। विश्व भर में ज्वालामुखी विस्फोट से मिले खनिजों पर प्रकाश डालते हुए वाडिया संस्थान के पूर्व विशेषज्ञ डॉ. एस घोष ने प्रोटोजोइक टाइम प्लान के बारे में बताया। उन्होंने बताया कि आज से 1800 से 542 मिलियन वर्ष पहले विश्व भर में ज्वालामुखी विस्फोट के साथ बेहद शक्तिशाली भूकम्प आये जिससे ताम्बा, जिंक आदि जैसे बेहद महत्त्वपूर्ण खनिज पृथ्वी की गर्भ से सतह पर आये।

आ सकता है विनाशकारी भूकम्प

भू-विशेषज्ञों की माने तो उत्तराखण्ड में 134 फाल्ट सक्रिय स्थिति में हैं। ये फाल्ट भविष्य में रिक्टर स्केल पर सात या उससे अधिक तीव्रता के भूकम्प लाने की क्षमता रखते हैं। वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के एक्टिव टेक्टोनिक्स ऑफ कुमाऊं एंड गढ़वाल हिमालय (Active Tectonics of Kumaon and Garhwal Himalaya) नामक ताजा अध्ययन में इस बात का खुलासा किया गया है। सबसे अधिक 29 फाल्ट उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून में पाये गए हैं।

सबसे गम्भीर बात यह है कि यहाँ कई फाल्ट लाइन में बड़े निर्माण भी किये जा चुके हैं जो भूकम्प की स्थिति में काफी विनाशकारी साबित हो सकते हैं। गढ़वाल में कुल 57, जबकि कुमाऊँ में 77 सक्रिय फाल्ट पाये गए हैं। संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. आर जे पेरुमल के मुताबिक भूकम्पीय फाल्ट का अध्ययन करने के लिये गढ़वाल व कुमाऊँ मंडल को अलग-अलग जोन में विभाजित किया गया है।

फाल्ट की पहचान के लिये सेटेलाइट चित्रों का सहारा लिया गया है। इसके बाद हर फाल्ट की लम्बाई मापी गई और उनकी सक्रियता का भी पता लगाया गया। अध्ययन में पता चला कि इन फाल्टों के प्रभाव क्षेत्र में लगभग 10 हजार साल पूर्व रिक्टर स्केल पर सात व आठ की क्षमता वाले भूकम्प आ चुके हैं। इस अध्ययन में इन फाल्टों की सक्रियता की भी चर्चा की गई है। भू-विशेषज्ञों के अनुसार ये फाल्ट आज भी सक्रिय हैं और भविष्य में कभी भी एक्टिव हो सकते हैं जिससे काफी शक्तिशाली भूकम्प आ सकते हैं। कुमाऊँ मंडल में रामनगर से टनकरपुर के बीच ऐसे भूकम्पीय फाल्टों की संख्या सबसे अधिक पाई गई है।

 

 

 

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