वेदों में प्रदूषण-समस्या का समाधान

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Source
गुरुकुल शोधप्रभा, जुलाई-सितम्बर, 2012


प्रो. ए.के. चोपड़ा1

पानीपानीवायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, आकाश ये सृष्टि के आधारभूत पञ्च महातत्व हैं। इनमें वायु का महत्त्वपूर्ण स्थान है। अथर्ववेद में वायु को प्राण कहा है।2 प्राणशक्ति प्रदान करने वाला वायु है।3 यह वायु पिता के समान पालक, बन्धु के समान धारक, पोषक और मित्रवत सुख देने वाला है। यह जीवन देता है।4 वायु अमरत्व की निधि है। वह हमें जीवन प्रदान करता है।5 संहिताओं में कहा गया है कि यदि अन्तरिक्ष को प्रदूषण से मुक्त करके शान्ति की कामना करते हो तो सर्वप्रथम वायु को प्रदूषणरहित करके, उसकी शान्ति अत्यावश्यक है।6 ऋग्वेद का ऋषि कामना करता है कि प्रदूषण-मुक्त कल्याणकारी वायु मेरे चारों ओर बहे।7 वायु नीचे द्वार वाले (स्तर वाले) मेघ को अन्तरिक्ष और पृथ्वी की ओर प्रेरित करता है, उससे यह वायु सब औषधियों, वनस्पतियों और प्राणियों का राजा है क्योंकि जैसे कोई कृषक फलने और फूलने के लिये यव (जौ) आदि को जल से सींचता है, वैसे इसके कारण उत्पन्न वर्षा सम्पूर्ण भूमि को तर करती है।8

प्रार्थना की गई है कि हे वायु! तुम औषधीय गुणों से युक्त ओस जल को प्राप्त कराओ और हानिकारक प्रदूषित वायु को हमारे मध्य से दूर ले जाओ। तुम ही शुद्ध एवं प्रदूषण-रहित होते हुए सम्पूर्ण औषधियों के भण्डार हो। इसलिये तुम्हें दिव्यशक्तियों का दूत कहा जाता है क्योंकि तुम्हीं सम्पूर्ण दिव्य शक्तियों से सम्पन्न, औषधीय तत्वों से युक्त हो।9

वेद में दो प्रकार की वायुओं का वर्णन है। एक जो समुद्रपर्यन्त जाती है और दूसरी समुद्र से भी परे दूर देश तक बहती है। इनमें एक वायु शरीर के बल को प्राप्त कराती है और दूसरी वायु प्रदूषण को हटाती है।10

वायु को प्रदूषण मुक्त करने में वृक्षों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। अथर्ववेद में कहा है कि जिस पृथ्वी में वृक्ष और नाना प्रकार के वनस्पति सहस्त्रों प्रकार से सदा स्थिर, नित्य रूप से विराजते हैं, उस समस्त पदार्थों और समस्त जगत को धारण करने वाली पृथ्वी की हम स्तुति करते हैं।11 अथर्ववेद में वृक्षों के वनस्पति, वानस्पत्य, औषधि और वीरुध-ये चार भेद बताए गए हैं।12 जिन पर पुष्प न आकर सीधा फल लगे, यथा-वट (बड़), पीपल, गूलर आदि वे वनस्पति हैं। जिन पर फूल और फल लगें, जैसे बेल, आम, जामुन आदि वे वानस्पत्य हैं, जो फलोपरान्त सूख जाते हैं- मक्का, ज्वार, गेहूँ, जौ आदि, वे औषधियाँ हैं तथा जिनमें सहारे के लिये तन्तु होते हैं या जो स्वयं फैल जाती हैं। खरबूज, तरबूज, गिलोय, लता आदि वे वीरुध हैं।

वेद में इन सबको वृक्ष नाम से पुकारा गया है। वेद का आदेश है कि किसी भी मनुष्य को वृक्ष या वनस्पति को नष्ट नहीं करना चाहिए।13 वनस्पति से कहा गया है कि आप वायु के प्रदूषण को दूर करो।14 शतपथ ब्राह्मण में लिखा है कि संसार की सर्वाधिक हितकारी ये औषधियाँ हैं। इनका नाश कभी न करो।15 वेद ने पीपल के वृक्ष में देवताओं का अर्थात दिव्य शक्तियों का निवास माना है।16 जनश्रुति है कि पीपल के वृक्ष पर ब्रह्मराक्षस का निवास होता है। यह इसीलिये प्रसिद्ध किया गया, जिससे लोग इस वृक्ष को न काटें और यह वायु को अधिक शुद्ध कर सके। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने विश्व की समस्त वस्तुओं में जब अपनी स्थिति प्रकट की तब वृक्ष वनस्पतियों में पीपल के अन्तर्गत अपनी सत्ता को दिखाते हुए कहा है कि मैं वृक्षों में पीपल का वृक्ष हूँ।17 यह वाक्य इसीलिये भगवान ने कहा है, जिससे लोग इस महान परोपकारी वृक्ष की सदा रक्षा करें। आज भी हिन्दू समाज में पीपल के वृक्ष को काटना पुत्र हत्या के समान माना जाता है। अत: इसे लोग काटते नहीं हैं। वायु को शुद्ध करने में वृक्षों का महत्त्वपूर्ण स्थान है।

भारतवर्ष में इन वृक्षों की रक्षा हेतु विभिन्न प्रकार की प्रार्थनाएँ की जाती रही हैं। अथर्ववेद का ऋषि कहता है। हे वृक्षों! तुम में हमारे दु:खों को नष्ट करने का सामर्थ्य है। अत: तुम हमारे कष्ट दूर करो। हम तुम्हें सैकड़ों शाखाओं से बढ़ाते हैं।18 जिस प्रकार माता अपने पुत्रों को दु:खों से हटाकर सुखी करती है, उसी प्रकार हे वृक्ष! प्रदूषण से हमें बचाकर तुम हमें सुखी करो।19 अन्यत्र अजशृंगी से प्रार्थना की गई है हे अजशृंगी! अपनी गन्ध से तुम वायु में और जल में व्याप्त होकर प्रदूषण बढ़ाने वाले राक्षस रूपी जीवों को नष्ट करो।20

इसी प्रकार अपामार्ग का वर्णन है कि उसके द्वारा वैज्ञानिकों ने प्रदूषण रूपी असुरों पर विजय प्राप्त की।21 वेदों में दर्भ, सोमलता, अपामार्ग, पाटा, पिप्पली, पृश्निपर्णी, ऋषभ, मधुला, मुञ्ज, सहस्त्रकाण्ड, आव्रयु, शमी, वर्णवती, करीर, पलाश, ढाक, मदावली, उदुम्बर, शतावर आदि 700 के लगभग वनस्पतियों से जीवनरक्षा के लिये स्थान-स्थान पर प्रार्थनाएँ प्राप्त होती हैं। वेद में इन्हें महोपकारी होने के कारण माता के नाम से पुकारा गया है।22 इन पेड़-पौधों के बिना हम जीवन में उन्नति नहीं कर सकते, क्योंकि ये तो प्राण हैं। इनके बिना जीवन भी असम्भव है। अगस्त्य ऋषि प्रार्थना करते हुए यज्ञदेवता को कहता है- हे यज्ञदेव! हम इन वनस्पति, औषधियों के प्रभाव को जान गए हैं।

अब हम इन्हें सैकड़ों शाखाओं वाला बनाएँगे, जिससे हम इनके द्वारा हजारों शाखाओं वाले स्वयं बन जाएँगे।23 मंत्र का भाव यह है कि वृक्ष वनस्पतियों की जितनी सुरक्षा हम करेंगे, उससे हजारों गुणा लाभ हमें ये प्रदान करेंगे। इसी मंत्र के भाव में अपने विचार मिलाते हुए पुराणकार ने कहा है कि एक वृक्ष दस पुत्रों के समान सुखकारी होता है।24 वृक्ष का एक पर्यायवाची नाम तरु भी होता है। जिसका अर्थ है मनुष्यों को प्रदूषण रूपी दु:खों से पार उतारने वाला।25 इनके महत्त्व को देखते हुए अग्नि पुराणकार ने लिखा था-

‘यदि कोई व्यक्ति अपने वंश का विस्तार एवं धन और सुख में वृद्धि की कामना करता है तो वह फल-फूल वाले किसी वृक्ष को न काटे।’

वराहपुराण में स्पष्ट लिखा है कि- पाँच आम के वृक्ष को लगाने वाला कभी नरक में नहीं जाता।26 पद्मपुराण के अनुसार जो मनुष्य सड़क के किनारे छायादार वृक्ष लगाता है, वह स्वर्ग में उतने ही समय तक सुख भोगता है, जितने समय तक वह वृक्ष फलता-फूलता है।

महर्षि वेदव्यास ने वृक्ष-वनस्पतियों को कभी नहीं काटने का आदेश दिया है क्योंकि फूलवाला और फलवाला वृक्ष समस्त संसार का वायु शुद्धि और भूख का नाश करके सैकड़ों प्राणियों का उपकार कर रहा होता है।27 वेदों में तो इन वृक्ष-वनस्पतियों को स्थान-स्थान पर नमस्कार किया गया है- नमो वृक्षेभ्यः हरिकेशेभ्यः28; वनानां पतये नमः29; ओषधीनां पतये नमः30; वृक्षाणां पतये नमः31; अरण्यानां पतये नमः32

वेदों में जहाँ वायु की शुद्धि का उपाय वृक्ष-वनस्पति आदि हैं, वहीं दूसरा उपाय यज्ञ है। यह यज्ञ मनुष्यों की शुभ-इच्छाओं को तो पूर्ण करने वाला होता ही है। इससे पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश की शुद्धि होती है और साथ में मन, बुद्धि, शरीर और आत्मा को भी सुवासित करता हुआ, यह अपनी सुगन्ध से विभिन्न प्रदूषणों से हमें बचाता है।33 उच्चैर्घोष ऋषि यजुर्वेद में इसका वर्णन करते हुए कहते हैं- यह यज्ञ सबको पवित्र करने वाला है, आत्मा में ज्ञान का प्रकाश करने वाला है, वायु के साथ देश-देशान्तरों में फैलने वाला है, वायु को शुद्ध करने वाला है, सम्पूर्ण सृष्टि को धारण करने वाला है, यह एक ही स्थान से दूसरे देश तक सुख बढ़ाने वाला है, अत: इस यज्ञ का कभी त्याग नहीं करना चाहिए।34

वायु को शुद्ध करने के लिये यज्ञ करने हेतु ऋग्वेद ने कहा है- हे मनुष्यों! जो सभी प्राणियों का आधार है, उस वायु को प्रदूषण से मुक्त करने के लिये यज्ञ की अग्नि में सुगन्धित, सुखकारी आहुति देने योग्य पदार्थों को अर्पित करो।35 यह यज्ञीय वायु हमें मृत्यु से बचा सकती है।36

वेदों में यज्ञ के द्वारा वायु के प्रदूषण को दूर करने के सैकड़ों मंत्र उद्धृत किये जा सकते हैं। जिनसे यह सुनिश्चित हो जाता है कि वैदिक ऋषि का वायुतत्व-चिन्तन एवं उसके स्वरूप संरक्षण की योजना अति दृढ़ एवं व्यवस्थित है। संसार में पंचतत्वों के अन्तर्गत जिन तत्वों का प्रदूषण हो रहा है, उनमें से एक जल भी है। वेदों में जल के एक सौ एक नाम पर्यायवाची रूपों में गिनाए गए हैं, जिससे इसकी महत्ता का ज्ञान होता है। ऋग्वेद में जल को माता कहा गया है।37 जैसे माता सन्तान को नहला-धुलाकर शुद्ध और पवित्र कर देती है। वैसे ही ये जल प्राणियों को पवित्र करते हैं।38

इन जलों के बिना जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। अत: इन्हें अमृत कहा गया है -
ओ३म् अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा।
ओ३म् अमृतापिधानमसि स्वाहा।


संसार के छह रस अर्थात मधुर, अम्ल, लवण, कटु, कषाय और तिक्त रसों का निर्माण इसी जल से विभिन्न रूपों में हुआ है। ये जल हमारे दोषों को दूर करते हैं तथा शरीर के मलों को नष्ट करते हैं।39 अथर्ववेद में नौ प्रकार के जलों का वर्णन है

1. परिचरा आप :- नगरों आदि के निकट प्राकृतिक झरनों से बहने वाला जल परिचरा आप: कहलाता है।
2. हेमवती आप :- हिमयुक्त पर्वतों से बहने वाला जल हेमवती आप: है।
3. उत्स्या आप:- स्रोत का जल उत्स्या आप: है।
4. सनिष्यदा आप:- तीव्र गति से बहने वाला जल सनिष्यदा है।
5. वर्ष्या आप:- वर्षा से उत्पन्न जल वर्ष्या है।
6. धन्वन्या आप:- मरुभूमि का जल धन्वन्या है।
7. अनूप्या आप:- अनूप देशज जल अर्थात जहाँ दलदल हो एवं वात-कफ के रोग अधिक होते हों, उस देश में प्राप्त होने वाला जल अनूप्या है।
8. कुम्भेभिरावृता आप:- घड़ों में रखा हुआ जल कुम्भेभिरावृता जल है।
9. अनभ्रय: आप:- फावड़े आदि से खोदकर निकाला गया जल अनभ्रय: आप: है।

भारतीय वाङ्मय में जल का विवेचन एक महाभूत के रूप में किया गया है, जो हमारी उपभोग सामग्री के साथ-साथ हमारा आधारभूत भी है। यह जल जीव के सुख-दु:ख का कारण होने से पर्यावरण में कारक होता है। वस्तुत: जल जीव-जगत की आत्मा है। जल के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। इसीलिये प्रकृति ने पृथ्वी के 71 प्रतिशत भाग को जलमय बनाया है। इतना ही नहीं स्वयं हमारे शरीर का 67 प्रतिशत भाग जल ही है। प्राणीमात्र के जीवन के मूलतत्व प्रोटोप्लाज्म में 90 प्रतिशत भाग जल का है। जल के महत्त्व को देखते हुए हिन्दी के कवि रहीम ने कहा था-

रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
पानी बिन न ऊबरे, मोती-मानुष-चून।


जल इतना महत्त्वपूर्ण है फिर भी इसका प्रदूषण निरन्तर बढ़ता जा रहा है। इसके प्रदूषण के विभिन्न कारण हैं, जिनमें प्रकृतिजनित प्रदूषण-जो भूस्खलन, ज्वालामुखी आदि से होता है, मानवजनित प्रदूषण-जो उद्योग-धंधे, नगर, कृषि आदि से होता है- मुख्य हैं।

वेदों में जल की महत्ता के अनेक मंत्र प्राप्त होते हैं, जिनमें कहा है- जल निश्चय ही भेषज रूप है जल रोगों को दूर करने वाले हैं, जल सब प्राणियों के भेषजभूत हैं। अत: जल से रोगों को भगाया जाये।40 जल को वैद्यों का भी वैद्य कहा गया है।41 जिस प्रकार माता शिशु का और बहनें अपने भाई का हित करती है, उसी प्रकार ये जल सभी प्राणियों के हितैषी हैं।42 जहाँ ऋग्वेद का ऋषि जल को माताओं से भी सर्वोत्तम माता कहता है43 वहीं यजुर्वेद का ऋषि मातृ रूप जल की शुद्धि की कामना करता है।44आप: शान्ति: 45 कहकर वेद में इन जलों को शुद्ध करने की प्रेरणा दी गई है। ये हमें तभी शान्ति प्रदान करेंगे, जब हम इन्हें शुद्ध रखेंगे। जल को प्रदूषित न करने का यजुर्वेद ने स्पष्ट आदेश दिया है।46

वेदों के उपरान्त बनने वाले साहित्य में जल की महत्ता को देखते हुए कहा गया है कि नदी के स्रोतों के निकट, मूत्र करने और शौच करने से करोड़ों जन्मों में भी मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकता। साथ ही लिखा है कि जो व्यक्ति नदियों में या जलाशय में थूकता है, भोजन की झूठन आदि डालता है, वह ब्रह्महत्या के पाप के कारण घोर नरक में जाता है।47 वैदिक साहित्य में जलों को प्रदूषण से बचाने के लिये यह भी आदेश दिया गया था कि जल में मलमूत्र का त्याग नहीं करना चाहिए।48

जल को प्रदूषण से मुक्त करने के जो प्रथम आदेश वेदों में दिये, वे तो मुख्य हैं ही, जल की शुद्धि के कुछ गौण उपाय भी वेदों में बताए गए हैं। जैसे कि यज्ञ करने से वर्षा की उत्पत्ति मानी गई है, जिससे जल प्रवाहित होता है। उसमें गति आती है और वह शुद्ध हो जाता है। प्रवाहमान जल शुद्धता को प्राप्त होता है।

वेदों में नदियों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इन्हें माताओं में भी श्रेष्ठ माता कहकर पुकारा गया है।49 नदियों की पवित्रता के सम्बन्ध में वेद ने कहा है कि जो नदी पहाड़ों से निकलकर समुद्र से जा मिलती है, वह पवित्र होती है।50 प्रकारान्तर से वेद यही कहना चाहता है कि नदी के प्रवाह को अबाध गति से बहने देना उपयुक्त है।

जल-शुद्धि का एक अन्य उपाय वर्षा भी है, किन्तु आज वृक्षों के कटान, उद्योगों के विस्तार और विविध रासायनिक तत्वों के असन्तुलन से पर्यावरण पर गलत असर होने से समय-समय पर वर्षा अथवा अनुकूल वर्षा नहीं हो पा रही है। जिस कारण न केवल कृषि अपितु समग्र वातावरण पर ही इसका दुष्प्रभाव पड़ रहा है। वेद वर्षा के महत्त्व को प्रकट करता हुआ कहता है- जो मेघ गर्जनपूर्वक शब्द करता हुआ बरसता है, उससे दुष्कर्म से उत्पन्न प्रदूषण नष्ट हो जाता है और संसार में दिखाई देने वाले पदार्थ आनन्द का अनुभव करते हैं।51 प्राणियों की कामनापूर्ति तभी होगी जब समय-समय पर इच्छानुसार मेघ बरसता रहेगा।52

वेद में मित्र और वरुण शब्द आये हैं, जो क्रमश: ऑक्सीजन और हाइड्रोजन के वाचक हैं। ये दोनों वर्षा के प्रमुख तत्व हैं जिनके द्वारा जल का निर्माण होता है। यजुर्वेद में दोनों को वर्षाधायक माना है।53 अथर्ववेद में तो इन्हें वर्षा के स्वामी मानकर इनकी उपासना की गई है।54 मित्र और वरुण वायुओं को मिलाने से जल की उत्पत्ति होती है। इस वैज्ञानिक सिद्धान्त को दिखाने वाला मंत्र कहता है कि हे जल! तू मित्र और वरुण नामक वायुओं से पैदा हुआ है; हे अन्नदाता जल! तू विद्युत् के सामर्थ्य से उत्पन्न हुआ है; जल के रूप में परिणत तुझको देवजनों के अन्न के लिये सूर्य की किरणें तुझे अन्तरिक्ष में धारण करती हैं।55

वेदों में जल को शुद्ध करने के लिये वायु और सूर्य को महत्त्वपूर्ण माना है। 56 अथर्ववेद में जल के कीटाणुओं को नष्ट करने की बात कही गई है और वहाँ कहा गया है कि कीटाणुओं को नष्ट करने का सामर्थ्य सूर्य की तीव्र किरणों में विद्यमान है।57

वेद में जल की शुद्धि का एक उपाय यज्ञ भी है। भगवान कृष्ण ने द्रव्ययज्ञ, तपोयज्ञ, योगयज्ञ, स्वाध्याययज्ञ, ज्ञानयज्ञ का जहाँ वर्णन किया है58 वहाँ उनमें द्रव्ययज्ञ से अभिप्राय है कि जिसमें मंत्रोच्चारणपूर्वक शास्त्रोक्त सुगन्धित रोगनाशक, पवित्र प्राकृतिक पदार्थों का अग्नि में विधिपूर्वक समर्पण किया जाता है, इसमें अग्नि को प्राप्त हुए पदार्थ अग्नि की विशिष्ट कार्य प्रक्रिया में दहन होने पर सूक्ष्म से सूक्ष्मातिसूक्ष्म होते जाते हैं और गुणरूप होकर वायु को प्राप्त हो जाते हैं। किसी भी प्रकार की ऊष्मा को प्राप्त हुए पदार्थ का तैलीयादि तत्व शीघ्र ही वाष्पित प्रक्रिया से वायु को प्राप्त हो जाता है यह स्वयंसिद्ध सिद्धान्त है। इससे वायु शुद्ध हो जाती है, यह वायु जहाँ-जहाँ जाती है, तब प्रथम स्तर पर आकाशस्थ जल वाष्प को एवं भूमिसतह पर विद्यमान जलस्रोतों, जलमार्गों और जलाशयों को स्पर्श रूप से संयोग बनाती हुई शुद्ध करती जाती है। पुन: मेघ तथा अन्तरिक्ष को यह शुद्ध करती है। इस प्रकार द्रव्ययज्ञ से शुद्धि निरन्तर होती है। यजुर्वेद में लिखा है कि जो पदार्थ संयोग से विकार को प्राप्त होते हैं, वे अग्नि के निमित्त से अतिसूक्ष्म परमाणु रूप होकर वायु के बीच रहा करते हैं और कुछ शुद्ध भी हो जाते हैं। परन्तु जैसी यज्ञ के अनुष्ठान से वायु और वृष्टि जल की उत्तम शुद्धि और पुष्टि होती है, वैसे दूसरे उपाय से कभी नहीं हो सकती।59

इस प्रकार जल का प्रदूषण हम विभिन्न वैदिक उपायों से दूर कर सकते हैं।

पञ्चमहाभौतिक तत्वों में पृथ्वी सबसे स्थूल तत्व है। उत्पति के क्रम में यह सबसे अन्तिम है। वेदों में इसके इक्कीस नाम गिनाए गए हैं। शतपथब्राह्मण में लिखा है कि जल से उत्पन्न फेन जब कुछ ठोस आकृति में परिवर्तित हुआ, तब वह मृद कहलाया।60 इस पृथ्वी के धारक-तत्व वेद में सत्य, ऋत, संकल्प, तप, त्याग आदि बताए गए हैं, जिनसे यह पृथ्वी स्थिर है।61 पृथ्वी पर प्रदूषण फैलाने वाले तत्व वेद की भाषा में वे हैं, जो अपनी मानसिक एवं शारीरिक शक्तियों के बल से पृथ्वी निवासियों में घृणा, द्वेष, हिंसा, स्वार्थ आदि की प्रवृत्तियाँ उत्पन्न कर रहे हैं। अथर्ववेद में इन प्रवृत्तियों से बचने की प्रार्थना की गई है।62 इस वेद का बारहवें काण्ड के प्रथम सूक्त के 63 मंत्र इस पृथ्वी के प्रदूषण को दूर करने के विभिन्न उपायों को बता रहे हैं। इसलिये इस सूक्त का नाम ही भूमि-सूक्त है। वेद में पृथ्वी को माता के नाम से और स्वयं को पृथ्वी-माता के पुत्र के रूप में चित्रित किया गया है-

माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या:।63 यह पृथ्वी जो प्राणीमात्र का भरण-पोषण करने वाली है, सोना, चाँदी, हीरा, पन्ना आदि अनेक प्रकार के रत्नों की यह खान है, सब वस्तुओं का यह आधार है। सभी जंगम जीवजगत पदार्थों को यह बसाने वाली है- ऐसी इस पृथ्वी को हम अपने गलत कार्यों से दूषित न करें।64

पञ्चभूतों में अग्नि का अपना विशिष्ट महत्त्व है। जैमिनी ऋषि ने इसे विश्व की पहली किरण बताया है।65 यह लोक इस अग्नि से ही प्रकाशित है।66 वेदों में अग्नि के 108 नाम हैं, जिनसे इसकी महत्ता एवं गुणों पर प्रकाश पड़ता है। अग्नि घर्षण से उत्पन्न होती है, ऐसा ऋग्वेद का कथन है।67 यह अग्नि जो जलों के भीतर वडवानल के रूप में है, बादल में विद्युत रूप में है, मनुष्य-शरीर में जठराग्नि के रूप में है, पत्थरों में है, औषधियों में प्रविष्ट है, वनस्पतियों में है, चन्द्रमा या दूध और घी में है, गौ आदि चौपायों में है, पक्षियों में है, वनस्थ जीवों में है, सूर्यलोक में है, पृथ्वीलोक में है, अन्तरिक्षलोक में है, विद्युत में है, पवन में है, वह अग्नि हमारी रक्षा करे- 68 यह कहकर यजुर्वेद के ऋषि ने उस अग्नि के प्रति स्वयं को समर्पित करने का भाव दिखाया है।

वेद में इन अग्नियों के अतिरिक्त गार्हपत्याग्नि, दक्षिणाग्नि और आहवनीयाग्नि की भी चर्चा की है। मनुष्यों का गृहस्थ-जीवन सुखमय और शान्तिपूर्ण हो, यह गार्हपत्याग्नि से प्रार्थना की जाती है। इस अग्नि के बिना सांसारिक जीवन में शान्ति असम्भव है। यज्ञ-काल में संसार का हित चाहते हुए जो उपकार की भावनाओं को तीव्र किया जाता है, वह दक्षिणाग्नि है तथा जिसमें अग्निहोत्र किये जाते हैं, वह अग्नि आहवनीय है। यह सौराग्नि का प्रतीक मात्र है। इन तीनों अग्नियों का समाज में विघटन न होना चाहिए।

कीटाणुओं के विनाश और वर्षा को उत्पन्न करने में अग्नि परम सहायक है।69 वर्षा के जल का अवरोध करने वाले मेघों को यह अग्नि विनष्ट करता है।70

पञ्चभूतों में आकाश की उत्पति आत्मा से मानी गई है।71 वेदों में आकाश के सोलह नाम गिनाए गए हैं। हमारी सम्पूर्ण स्थिति एवं गति आकाश में है। आकाश हमारा आश्रय है। आकाश निराकार है। आयुर्वेद के चिकित्सकों की दृष्टि में ध्वनि-प्रदूषण से प्राणियों की श्रवणशक्ति पर बुरा असर पड़ता है, जिस कारण श्रवणशक्ति का ह्रास आदि सम्भव है। उनकी दृष्टि में ध्वनि से न केवल कान ही अपितु हृदय, तंत्रिका तंत्र और पाचन तंत्र भी प्रभावित होते हैं, जिसके फलस्वरूप रक्तवाहिनियों का संकुचन, हृदय गति में बढ़ोत्तरी, रक्तचाप में परिवर्तन, आहारनाल की गड़बड़ियाँ आँखों की पुतली के आकार में असमानता, दृष्टि-क्षमता में हानि आदि का होना सम्भव है। अत्यधिक शोर से मन पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

मस्तिष्क की उद्विग्नता के कारण मानसिक कार्यक्षमता घट जाती है। व्यक्ति की स्मरण-शक्ति समाप्त होने लगती है। वह चिड़चिड़ेपन के रोग से ग्रस्त हो जाता है। सिरदर्द आदि भी सम्भव है। लम्बे समय तक ध्वनि प्रदूषण के कारण न्यूरोटिक मेंटल डिसऑर्डर हो जाता है। मांसपेशियों में तनाव और खिंचाव एवं स्नायुओं में उत्तेजना का होना स्वाभाविक है। न केवल शारीरिक ही अपितु मनुष्य के सांस्कृतिक जीवन पर भी ध्वनि का असर पड़ता है। शान्तिमय जीवन पर कोलाहल का असर पड़ने से उसमें नकारात्मक चिन्तन उभरता है, जिससे वह अपने जीवन के उन्नति के मार्ग बन्द कर लेता है। न केवल मनुष्य ही अपितु पशु पक्षी भी इस उच्च ध्वनि से प्रभावित होते हैं और उनमें स्वाभाविकता नष्ट होने लगती है। इसीलिये वेद में मधुर ध्वनि के उच्चारण का आदेश दिया गया है72 जिस कारण उच्चध्वनि के विभिन्न दुष्प्रभावों से इस प्रकृति को संरक्षित किया जा सके। ऐसे सैकड़ों मंत्र वेद में हैं, जिनमें मधुर ध्वनि बोलने का सन्देश दिया गया है तथा उनके लाभ दर्शाए गए हैं।

इस प्रकार पर्यावरण की रक्षा के लिये सर्वप्रथम आवश्यक है कि पर्यावरण की स्वाभाविकता को यथावत बनाए रखा जाये। क्योंकि यदि हम पर्यावरण की मूल व्यवस्था पर कुठाराघात करते चले जाएँगे और दूसरी ओर स्वस्थ रहने के भी उपाय ढूँढते रहेंगे तो हमें कभी सफलता नहीं मिल सकती। आवश्यक है कि प्रकृति के उपासक होकर समग्र सृष्टि में देवतत्व की चेतना को मानते हुए ऋषियों के द्वारा बताए गए यज्ञ, सौमनस्य, संगतिकरण, दान आदि को जीवन में अपनाते हुए सौहार्द की भावना के साथ हम सब उन्नति करें।

1. कुलसचिव, गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार (उत्तराखण्ड)
2. वातो ह प्राण उच्यते। अथर्व. 11.04.15
3. वायुर्मा तत्र नयतु वायुः प्राणान् दधातु मे।। अथर्व.19.43.2
4. उत वात पितासि न उत भ्रातोत नः सखा। स नो जीवातवे कृधि। ऋग्. 10.183.2
5. यददो वात ते गृहेऽमृतस्य निधिर्हितः। ततो नो देहि जीवसे। ऋग्. 10.186.3
6. अन्तरिक्षं शान्तिस्तद् वायुना शान्तिः। मैत्रायणी संहिता 4.1.3
7. मयोर्भूवातो अभि वात। ऋग्.10.169.1
8. ऋग्. 06.37.3
9. आ वात वाहि भेषजं वि वात वाहि यद्रपः।
त्वं हि विश्वभेषजो देवानां दूत ईयसे। ऋग. 10.137.3
10. द्वाविमौ वातौ वात आ सिन्धोरा परावतः ।
दक्षं ते अन्य आ वातु परान्यो वातु यद्रपः। ऋग्. 10.137.2
11 अथर्व. 12.1.27
12 (क) वनस्पीन् वानस्पत्यानोषधीरुत वीरुध: । अथर्व 08.8.14
(ख) भूमेश्च वै सोऽग्नेश्चौषधीनां च वनस्पतीनां च वानस्पत्यानां च वीरुधां च प्रिय धाम भवति य एवं वेद।अथर्व. 15.6.3
13. ऋग्. 6.48.17
14. वनस्पति शमिता, वनस्पतिं शमितारम्। क्रमशः यजु. 29.35; 28.10
15. जगत्यः औषधयः । शता.1.2.2.2 ।।
16. अश्वत्थो देवसदनस्तृतीयस्यामिती दिवि। अथर्व. 5.4.3 ।
17. अश्वत्थ: सर्ववृक्षाणाम्। श्रीमद्भगवद्गीता 10.26 ।।
18. मातेव पुत्रेभ्यो मृड केशेभ्यः शमी। अथर्व. 6.30.3
19. वृक्षि त्वं शतवल्शा वि रोह। अथर्व. 6.30.2
20. त्वया वयंमप्सरसो गन्धर्वाश्रातयामहे ।
अजशृङ्गयजः रक्ष: सर्वान् गन्धेन नाशय। अथर्व. 4.37.2
21. अथर्व. 4.19.4
22. औषधीरिति मातरस्तद्वो देवरीरुपब्रुवे। यजु. 12.78
23. यजु. 5.43
24. दशपुत्रसमं तरु: || मत्स्यपुराण
25. तारयति प्राणिनः प्रदूषणात् दुःखसागरात् इति तरुः।
26. पञ्चाम्रवापी नरकं न याति। वराहपुराण
27. एतेषां सर्ववृक्षाणां छेदनं नैव कारयेत्।
चतुर्मासे विशेषेण बिना यज्ञादिकारणम्।।
एकेनापि सुवृक्षेण पुष्पितेन सुवासिना।
वासितं वै वनं सुपुत्रेण कुलं यथा।
28. यजु.16.17
29. यजु.16.18
30. यजु.16.19
31. यजु.19.19
32. यजु.16.20
33. सत्यार्थप्रकाश, स्वामी दयानन्द सरस्वती, पृ०24
34. वसो: पवित्रमसि द्यौरसि पृथिव्यासि मातरिश्वनो घर्मोડसि विश्ववधाડसि। परमेण धाम्ना दृंहस्वा मा ह्वार्मा ते यज्ञपतिर्ह्वार्षीत्।। यजु. 1.2
35. तस्मा एतत्पन्यतमाय जुष्टमग्नौ मित्राय हविराजुहोता।। ऋग. 3.51.5
36. मित्राय हव्यं घृतवज्जुहोत। ऋग्. 3.59.1
37. ऋग्र्. 1.23.16
38. ऋग्. 10.9.2
39. ( क) इदमापः प्रवहता यत् किञ्च दुरितं मयि। ऋग्. 1.23.2
ख), इदमापः प्रवहतावद्यं च मलं च यत्। यजु. 6.17
40. आप इद्वा उ भेषजीरापो। अमीवचातनी:। आपः सर्वस्य भेषजीस्तास्ते कृण्वन्तु भेषजम्। ऋग्. 10.137.6
41. अनभ्रयः खनमाना विप्रा गम्भीरे अपसः । भिषग्भ्यो भिषक्तरा आपो अच्छा वदामसि । अथर्व. 19.2.30
42. अम्बयो यन्त्यध्वभिर्जामियो अध्वरीयताम्। पृञ्चतीर्मधुना पयः। ऋग. 1.23.16
43. ऋग्. 6.50.7
44. यजु. 4.2 ।।
45. यजु. 36.17
46. मापो ओषधिर्हिंसी: | यजु. 6.22
47. मूत्रं वाथ पुरीषं वा गङ्गातीरे करोति यः।
न दृष्टा निष्कृतिस्तस्य कस्य कोटिशतैरपि।
उच्छिष्टं कफकं चैव गंगागर्भे च यस्त्यजेत्।
स याति नरकं घोरं ब्रह्महत्यां च विन्दति।
पद्मपुराण 8.7.8.10
48. नाप्सु मूत्रं पुरीषं कुर्यान्र निष्ठीवेत्। तैत्ति.आर. 1.26.7
49. नद्यो मातृतमः। ऋग्. 1.158.5

50. ऋग्. 7.95.2
51. यत्पर्जन्यः कनिक्रदत्स्तनयन् हंसि दुष्कृतः।
प्रतीदं विश्वं मोदते यत्किं च पृथिव्यामधि। ऋग्. 5.83.9
52. निकामे निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु। यजु. 22.22
53. मित्रावरुणौ त्वा वृष्टयावताम्। व्यन्तु वयोक्तं रिहाणा मरुतां पृषतीर्गच्छ वशा पृश्निर्भूत्वा दिवं गच्छ ततो नो वृष्टिमावह। यजु. 2.16
54.मित्रावरुणौ वृष्टयाधिपती तौ मामवताम्। अथर्व. 5.24.5
55. उतासि मैत्रावरुणो वसिष्ठो, उर्वश्या ब्रह्मन् मनसोऽधिजातः।
द्रप्सं स्कन्नं ब्रह्मणा दैव्येन विस्वदेवाः पुष्करे त्वाददन्त। ऋग्. 7.33.11
56. पावकासः शुचयः सूर्या इव सत्वानो न द्रप्सिनो घोरवर्पसः।
शुची वो हव्या मरुतः शुचीनाम् शुचिजन्मानः शुचयः पावकाः। ऋग्. 1.64.2
57. अथर्व. 1.4.2
58. द्रव्यय ज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथा परे।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः । श्रीमद्भगवद्गीता- 4.27
59. पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः प्रसव उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः।
देवीरापो अग्रेगुवो अग्रेपुवो अग्रे इमामद्य यज्ञं नयताग्रे यज्ञपतिं सुधातुं यज्ञपतिं देवयुवम्। यजु. 1.12
60. शतपथब्राह्मण 6.1.3.3
61. सत्यं बृहद् ऋतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथ्वीं धारयन्ति। अथर्व. 12.1.1
62. यो न द्वेषत्पृथ्वी यः पृतन्याद् योऽभिदासान्मनसा यो वधेन।
तं नो भूमे रन्धय पूर्वकृत्वरि। अथर्व. 12.1.14
63 अथर्व. 12.1.12
64. विश्वम्भरा वसुधानी प्रतिष्ठा हिरण्यवक्षा जगतो निवेशनी।
वैश्वानरं बिभ्रती भूमिरग्निमिन्द्र ऋषभा द्रविणे नो दधातु। अथर्व. 12.1.6
65. अग्निर्वा प्रथमा विश्वज्योतिः। जैमिनीय ब्राह्मण 1.2.32
66. अग्निना वा अयं लोको ज्योतिष्मान्। तैतिरीय ब्राह्मण 3.9.5.4
67. इममु त्यमथर्ववदग्निं मन्थन्ति वेधसः।
त्वामग्ने पुष्करादध्यथर्वा निरमन्थत। ऋग. 6.15.17
68. अथर्व. 3.21.1-2
69. अग्निवृत्राणि जङ्घनद् द्रविणस्युर्विपन्यया।
समिद्धः शुक्र आहुतः। ऋग्. 10.118.1
70. अग्निरद्भ्यो निरदहज्जरूथम्। ऋग्. 10.80.3
71. तस्माद् वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः।
तैत्तिरीयोपनिषद्, ब्रह्मानन्द वल्ली 1-2
72. मधुमन्मे निक्रमणं मधुमन्मे परायणम्।
वाचा वदामि मधुमद् भूयासं मधुसन्दृशः। अथर्व. 1.34.3
 

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