चाहत मुनाफा उगाने की

Submitted by UrbanWater on Sun, 04/16/2017 - 11:35
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जल, जंगल और जमीन - उलट-पुलट पर्यावरण (2013) पुस्तक से साभार

नई आर्थिक नीति 1991 में लागू होने के बाद खेती की जो पारम्परिक व्यवस्था थी, वह टूटने-बिखरने लगी है। नई आर्थिक नीति लागू होने के लगभग तीन दशक पहले 1962 में शुरू हो चुकी हरित क्रान्ति ने खेती के तौर-तरीकों में अद्भुत बदलाव ला दिया। अब खेतों में फसल उगाने की जगह अनाज दोहन की प्रक्रिया शुरू हो गई थी। अनाज दोहन की इस प्रक्रिया में खेती में प्राकृतिक खाद की जगह अब रासायनिक खाद और बहुत ही ज्यादा मात्रा में कीटनाशी का उपयोग होने लगा है। ठेके की खेती के लिये मनठीके की खेती, पट्टे की खेती या अधबँटाई जैसे शब्द हमारी खेती व्यवस्था के कोश में बहुत पहले से मौजूद हैं। इस व्यवस्था के अन्तर्गत भूस्वामी अपने आसामी (खेत जोतने वाले) को कुछ शर्तों पर खेत जोतने का अधिकार दे देता था। अब तक आसामी उपज या भूमि की जोत के आधार पर अनाज का हिस्सा भूस्वामी तक पहुँचाता था। इस व्यवस्था में आसामियों का शोषण होता था, परन्तु अब इस खेती में बदलाव आ रहा है।

कुछ सालों से अनुबन्ध या ठेके की खेती सरकार की नीतियों के कारण विस्तार पाने लगी है। अनुबन्ध की खेती में आसामियों की हालत दिहाड़ी मजदूर-सी हो गई है। इस व्यवस्था में खेती को उद्योग में बदला जा रहा है। पुरानी व्यवस्था में कुछ हद तक ही सही; भूस्वामियों और आसामियों के बीच रिश्तों में संवेदना को जगह मिल जाया करती थी, परन्तु इस नई व्यवस्था में खेती, जो अब कम्पनी या उद्योग में बदल रही है, उसके मालिकों यानी उद्योगपतियों को अपने कामगारों से रिश्ता कायम करने की कोई जरूरत ही नहीं रह गई है।

खेती को वे अपने साम्राज्य विस्तार की तरह देखते हैं, इसलिये वे खेतों में अनाज नहीं, बल्कि मुनाफा उगाना चाहते हैं। वे किसी भी राज्य में जमीन का एक बहुत बड़ा हिस्सा बहुत ही सस्ते दामों पर सरकार की मदद से खरीद लेते हैं। पाँच-छह सालों में उस जमीन का भरपूर दोहन कर बंजर बनाकर छोड़ देना ही इनकी नीति का हिस्सा है।

नई आर्थिक नीति 1991 में लागू होने के बाद खेती की जो पारम्परिक व्यवस्था थी, वह टूटने-बिखरने लगी है। नई आर्थिक नीति लागू होने के लगभग तीन दशक पहले 1962 में शुरू हो चुकी हरित क्रान्ति ने खेती के तौर-तरीकों में अद्भुत बदलाव ला दिया। अब खेतों में फसल उगाने की जगह अनाज दोहन की प्रक्रिया शुरू हो गई थी। अनाज दोहन की इस प्रक्रिया में खेती में प्राकृतिक खाद की जगह अब रासायनिक खाद और बहुत ही ज्यादा मात्रा में कीटनाशी का उपयोग होने लगा है।

इसी मानसिकता ने नई आर्थिक क्रान्ति और विश्व व्यापार संगठन के दबाव में आकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बाजार के हस्तक्षेप को मजबूती प्रदान कर दी। इस बाजारू व्यवस्था के कारण खेती में कई बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ शामिल हो गई हैं। आज तक जो बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ दवा, शीतल पेय पदार्थ, ट्रैक्टर, बीज जैसा कुछ तैयार करती थीं, वे अब आश्चर्यजनक रूप से अनाज उगाने लगी हैं। मकसद साफ है कि ये कम्पनियाँ सीधे तौर पर खेती से मुनाफा कमाना चाहती हैं। अकारण नहीं है कि ये उन्हीं फसलों को तवज्जो दे रही हैं, जिनसे इन्हें अपने उद्योग के लिये कच्चा माल मिल सकेगा।

संसद में दी गई जानकारी के अनुसार ठेके की खेती में मात्र उड़ीसा की एक बीज कम्पनी ‘उड़ीसा स्टेट्स सीड्स कम्पनी’ है, जो धान की खेती कर रही है। अन्यथा चावल के सबसे बड़े उत्पादकों में से एक और सबसे ज्यादा खपत वाले देशों में भी एक भारत में चावल के नाम पर बहुत सारी कम्पनियाँ बासमती चावल (सबसे महंगा चावल) का ही केवल उत्पादन करेंगी। साधारण चावल से बहुत व्यावसायिक लाभ नहीं है, इसलिये कम्पनियाँ इसके उत्पादन में रुचि नहीं दिखा रही हैं। कैडबरी, गोदरेज, महिन्द्रा-एंड-महिन्द्रा, आईटीसी, डाबर इण्डिया लिमिटेड जैसी मुनाफादेह कम्पनियों को सीधे और सरल कृषि व्यवस्था में घुसने की अनुमति देना कितना खतरनाक साबित हो सकता है, इसकी पड़ताल जरूरी है।

सरकार का नियंत्रण अब अपने तंत्रों पर नहीं रह गया है। इस तथ्य को पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने बहुत पहले ही स्वीकार कर लिया था कि विकास के नाम पर स्वीकृत राशि का कुछ ही हिस्सा सही जगह तक पहुँच पाता है।

भ्रष्ट हो चुके शासन तंत्र की स्वीकारोक्ति का यह सच अब बहुत पुराना पड़ गया है। अब भ्रष्टाचार का आलम यह है कि केन्द्र सरकार ने कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि से अपना पल्ला झाड़ना शुरू कर दिया है। सब कुछ निजी हाथों में सौंप देना चाहती है। ग्रामीण विकास की मदों में केन्द्र सरकार ने भरपूर कटौती की है। इसका अन्दाजा मार्च, 2006 में इंसाफ नाम की एक गैर-सरकारी संस्था के दिल्ली के राष्ट्रीय अधिवेशन के उद्घाटन भाषण में भूमण्डलीकरण के दौर में जीने के अधिकार विषय पर पी. साईनाथ द्वारा उपलब्ध कराए गए आँकड़ों से सहज ही लगाया जा सकता है। उनके अनुसार 1991 में सकल घरेलू उत्पाद के अन्तर्गत ग्रामीण विकास पर मात्र 14.5 प्रतिशत खर्च किया गया था।

ग्रामीण इलाकों पर 2006 में यह खर्च गिरकर सिर्फ 5.9 प्रतिशत रह गया। 14.5 प्रतिशत से 5.9 प्रतिशत तक गिर जाने का क्या मतलब है? इसका मतलब यह हुआ कि 30 हजार करोड़ रुपए का निवेश कम हो गया है। कभी भारत गाँवों का देश हुआ करता था। कभी देश की आर्थिक व्यवस्था की नींव कृषि व्यवस्था हुआ करती थी। आज नई तकनीक और नई खोजों के बावजूद खेती पर आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था क्यों चरमरा गई है? किसान, जो अन्न उत्पादन के स्रोत रहे हैं, वे कर्ज में डूबकर आत्महत्या का रास्ता अख्तियार करने को विवश हो रहे हैं। ठेका खेती से गाँवों में रोजगार के अवसर घटते चले जा रहे हैं।

हरित क्रान्ति से लाभान्वित होने वाले प्रमुख राज्यों में से एक पंजाब में ठेके की खेती से राज्य और केन्द्र सरकार की खेती के प्रति बेरुखी के कारण उत्पन्न हालात से लोग बहुत ही तनाव में हैं। इस वजह से पंजाब के लोगों में नशाखोरी का चलन आम हो गया है। इस गम्भीर हालत में इन किसानों से उनकी धरती छीनकर, बहला-फुसला कर या बहुत सस्ते दामों पर लेकर ठेके की खेती को मंजूरी देना कतई उचित नहीं है। अगर इस प्रवृत्ति पर रोक नहीं लगाई गई तो परिणामस्वरूप अगले कुछ सालों में किसान-मजदूरों की आत्महत्या की दर में वृद्धि होगी। ऐसे परोक्ष नकारात्मक परिणामों के अलावा समाज में कई तरह की विकृतियाँ पैदा होंगी।

कर्नाटक, आन्ध्रप्रदेश और महाराष्ट्र में, खासकर कर्नाटक में ठेका खेती के कारण किसानों की आर्थिक स्थिति कमजोर होने से वेश्यावृत्ति का चलन बढ़ रहा है। देश के प्रत्येक राज्य के गाँवों में युवाओं में नशाखोरी के चलन में इजाफा हो रहा है। बेहतर तो यह होगा कि ग्रामीण समाज मुनाफाखोरी के इस धंधे के खिलाफ अपनी चौपालों में बहस की शुरुआत करे। इस बहस को निर्देशित करने का जिम्मा निश्चित तौर पर जनसंगठनों के माथे ही होना चाहिए। सम्भव है कि इन्हीं बहसों से लड़ने की ताकत समाज को मिल पाएगी और व्यावसायिक खेती पर लगाम लगाई जा सकेगी।

 

जल, जंगल और जमीन - उलट-पुलट पर्यावरण

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें)

क्रम

अध्याय

 

पुस्तक परिचय - जल, जंगल और जमीन - उलट-पुलट पर्यावरण

1

चाहत मुनाफा उगाने की

2

बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के आगे झुकती सरकार

3

खेती को उद्योग बनने से बचाएँ

4

लबालब पानी वाले देश में विचार का सूखा

5

उदारीकरण में उदारता किसके लिये

6

डूबता टिहरी, तैरते सवाल

7

मीठी नदी का कोप

8

कहाँ जाएँ किसान

9

पुनर्वास की हो राष्ट्रीय नीति

10

उड़ीसा में अधिकार माँगते आदिवासी

11

बाढ़ की उल्टी गंगा

12

पुनर्वास के नाम पर एक नई आस

13

पर्यावरण आंदोलन की हकीकत

14

वनवासियों की व्यथा

15

बाढ़ का शहरीकरण

16

बोतलबन्द पानी और निजीकरण

17

तभी मिलेगा नदियों में साफ पानी

18

बड़े शहरों में घेंघा के बढ़ते खतरे

19

केन-बेतवा से जुड़े प्रश्न

20

बार-बार छले जाते हैं आदिवासी

21

हजारों करोड़ बहा दिये, गंगा फिर भी मैली

22

उजड़ने की कीमत पर विकास

23

वन अधिनियम के उड़ते परखचे

24

अस्तित्व के लिये लड़ रहे हैं आदिवासी

25

निशाने पर जनजातियाँ

26

किसान अब क्या करें

27

संकट के बाँध

28

लूटने के नए बहाने

29

बाढ़, सुखाड़ और आबादी

30

पानी सहेजने की कहानी

31

यज्ञ नहीं, यत्न से मिलेगा पानी

32

संसाधनों का असंतुलित दोहन: सोच का अकाल

33

पानी की पुरानी परंपरा ही दिलाएगी राहत

34

स्थानीय विरोध झेलते विशेष आर्थिक क्षेत्र

35

बड़े बाँध निर्माताओं से कुछ सवाल

36

बाढ़ को विकराल हमने बनाया

 


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