जल-समृद्धि के देश में क्यों है ऐसी प्यास

Submitted by RuralWater on Sat, 07/02/2016 - 12:51

.पिछले कई सालों से यह बात जुमले की तरह अक्सर सुनने को मिल जाती है कि तीसरा विश्वयुद्ध पानी के लिये होगा। यह तो खैर कब होगा, क्या होगा, पर मैं तो यह याद दिलाना चाहता हूँ कि जो हो रहा है, वह ही कहाँ कम है। आज भी दो प्रदेशों के बीच युद्ध हो रहा है, दो देशों के बीच भी हो रहा है। बांग्लादेश और भारत पानी को लेकर लड़े। पंजाब से निकलने वाली नदियाँ, जो पाकिस्तान में जाती हैं, उनके लेकर भारत-पाकिस्तान में विवाद रहा।

अपने देश को लें तो तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच कावेरी को लेकर जंग छिड़ी। पंजाब-हरियाणा, पंजाब-राजस्थान, कहाँ नहीं है जंग? हाँ, इसका स्वरूप जरूर बदल रहा है। राज्यों ने भी अपनी नदियों पर बाँध बनवाए हैं और सार्वजनिक होते हुए भी पानी का निजीकरण हुआ है और अब, समाधान के तौर पर हो रहा निजीकरण अपने-आप में ही एक संकट बन रहा है।

बढ़ते जल संकट के साथ जल-संरक्षण और जल-प्रबन्धन की चर्चा भी दुनियाभर में जोरों से की जाती रही है, लेकिन लोग, जो अपनी धरोहर को पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक-दूसरे को सौंपते आये हैं, मरुधारा में भी जल-प्रबन्धन करते आये हैं, उन्हें चर्चा में कहीं शामिल नहीं किया जाता।

राजस्थान में नहर आई, यह नेतृत्व का निर्णय है, अधिकारियों का निर्णय है। लोगों की इच्छा, हो सकता है जगाई गई हो, लेकिन उनको नहीं मालूम कि इस प्रदेश में पानी आएगा तो क्या गुल खिलाएगा? वे अपने आँगन में ही पराए हो जाते हैं, जबकि इस समाज का सुन्दर जल-दर्शन देख इस धरा को सजदा करने को जी चाहता है। इनके संचित ज्ञान का इस्तेमाल कर उस जगह का आगे का जल-प्रबन्धन किया जाये तो शायद दुनिया ही बदली नजर आएगी।

जब मैं ‘संचित ज्ञान’ की बात कर रहा हूँ, तो इसे एक उदाहरण से समझिए। इन्दिरा गाँधी नहर के पहले चरण में जब पानी आया, तो लूणकरणसर के आसपास के दलदल बन गया। बाद में इंजीनियरों को पता लगा कि नीचे जिप्सम की पट्टी है, इसलिये पानी टकराकर रुक गया, वापस ऊपर आ गया। सवाल यह उठता है कि पहले यह सर्वे क्यों नहीं कराया गया?

और मामलों में भले ही हमारा देश गरीब हो, पर पानी के मामले में हम अमीर रहे हैं। पानी की भाषा तक हमारी अतिशय समृद्ध है। पानी के इतने रूप, इतने पर्याय किसी और भाषा में दुर्लभ हैं। बावजूद इसके, आज की तारीख में इस देश में भी जल-संकट दिन-ब-दिन जिस तरह गहराता हुआ दिख रहा है, वह चिन्ताजनक है। आखिर इस हाल तक हम क्यों और कैसे पहुँच गए।हमारे पुरखे मिट्टी के रंग और गंध से उसका स्वभाव जान लेते थे, सतह का दबाव भी वे खूब पहचानते थे। उन्होंने गाँव का नाम कुछ सोच-समझकर ही रखा होगा। अगर पहले गाँव वालों से ही पूछ लिया जाता तो पता लगता कि लूणकरणसर में नमक की बहुतायत है। लेकिन, ‘अब पछताए होत क्या...।’

यहीं पर सरकार की जल-नीति और समाज के जल-दर्शन का फर्क भी समझ लेना चाहिए। जल-नीति सरकार पाँच साल के लिये अपने कार्यकाल में बनाती है और जल-दर्शन वह है, जो हजारों सालों से चला आ रहा है। जिस दिन इस जल-दर्शन पर ध्यान जाएगा, हम कुछ उम्मीद कर सकते हैं। सैकड़ों, हजारों तालाब अचानक शून्य से प्रकट नहीं हुए। उनके पीछे एक इकाई थी बनवाने वालों की, तो दहाई थी बनाने वालों की। यह इकाई, दहाई मिलकर सैकड़ा, हजार बनती थी, पर आज के पढ़े-लिखे लोगों ने उसे शून्य में तब्दील कर दिया।

जहाँ सबसे कम पानी गिरता है, देश का सबसे सूखा हिस्सा जैसलमेर रामगढ़ खण्ड है। पुरखों का ज्ञान देखिए कि जहाँ तीन-सौ फुट नीचे तक खारा पानी मिलता है, वहाँ करीब चालीस-चालीस किलोमीटर की दूरी पर तीन मीठे पानी के कुएँ ढूँढ निकाले।

किसी संस्था या सरकार ने यहाँ पैसा नहीं लगाया, कोई पंचवर्षीय योजना नहीं बनी, पर उन ग्रामीणों की तपस्या देख नतमस्तक हो जाने को दिल करता है। मीलों दूर चलकर भेड़-बकरियाँ, राहगीर यहाँ मीठा पानी पीने पहुँचते हैं। वहाँ के जल की कलकल, वह मीठा नाद, जिससे असीम तृप्ति का एहसास होता है, आज भी मेरे जेहन में गूँजता रहता है।

सवाल उठता है कि वे आसपास क्यों नहीं रहते? शायद प्रकृति ने इसमें भी कोई रहस्य छिपाया है कि जहाँ चारा है, वहाँ पानी नहीं और जहाँ पानी है, वहाँ चारा नहीं। ‘सस्टेनेबल डवलपमेंट’ शायद इसी का नाम है। साथ ही बिना किसी लिखित कानून के ये लोग इस बात का खयाल रखते हैं कि पानी एक मात्रा से ज्यादा नहीं निकाला जाये।

पानी की समस्या हल करने के लिये आज बड़े पैमाने पर नदियों को जोड़ने की बात की जा रही है। नदियों को जोड़ने के मसले को अगर हम उदारीकरण के अन्तर्गत या बाहर करके भी देखें तो यह एक स्वतंत्र रूप से बनी योजना है। इसकी झलक हमें ऐतिहासिक रूप से राष्ट्रीयकरण के दौर में मिलती है। वह युग के.एल. राव और नेहरूजी का था। तब नदी जोड़ने का बड़ा सपना देखना बड़ा ही अच्छा माना जाता था। आज भी इसे गलत नहीं माना जाता है।

राष्ट्रीयकरण से लेकर उदारीकरण तक अगर जोड़ने की बात है तो वह नदी ‘नदी जोड़ो योजना’ है। वह इन दोनों छोरों को जोड़ती है और, हमें बार-बार गलत साबित करती है कि केवल बाजार का लालच ही नहीं, बल्कि अच्छे राष्ट्रीयकरण का दौर भी नदी जोड़ने से हमें अलग नहीं कर पा रहा था। प्रकृति को जब जरूरत होती है वह अपनी नदियों को जोड़ लेती है।

पहले नदियाँ निचले स्तर में, धाराओं में साम्य लाती हैं। ऐसी जगहों को वहाँ के समाज ने बहुत उदार भाव से देखा होगा। प्रकृति की इन घटनाओं को आदर भाव से संगम घोषित किया गया होगा। वे प्रकृति की इन घटनाओं का आदर करते हैं। अभी जो हम नदी-जोड़ो की बात कर रहे हैं उसमें हम नदियों को संख्या दे देंगे। यह तीर्थ नहीं बनने वाला है। यह तकनीकी कार्य होगा। इसका नतीजा भी तकनीकी ही होगा। हमें यह सब कुछ नदियों पर ही छोड़ देना चाहिए।वह पाँच-दस साल नहीं, बल्कि हजारों-लाखों वर्षों की योजना बनाकर अपने को जोड़ती है। वह गंगा को कहीं बहाती है, यमुना को कहीं बहाती है, तब जाकर वह इलाहाबाद में अपने को मिलाती है। यह जोड़ समाज के लिये संगम या तीर्थ कहलाता है। वह पर्यावरण की एक बड़ी घटना होती है। दोनों नदियों में वनस्पति अलग, जलचर का अलग-अलग स्वभाव होता है।

पहले नदियाँ निचले स्तर में, धाराओं में साम्य लाती हैं। ऐसी जगहों को वहाँ के समाज ने बहुत उदार भाव से देखा होगा। प्रकृति की इन घटनाओं को आदर भाव से संगम घोषित किया गया होगा। वे प्रकृति की इन घटनाओं का आदर करते हैं। अभी जो हम नदी-जोड़ो की बात कर रहे हैं उसमें हम नदियों को संख्या दे देंगे। यह तीर्थ नहीं बनने वाला है। यह तकनीकी कार्य होगा। इसका नतीजा भी तकनीकी ही होगा। हमें यह सब कुछ नदियों पर ही छोड़ देना चाहिए।

नदियाँ, समुद्र में प्रवेश करने से पूर्व अपने बहुत सारे टुकड़े करती हैं। अन्यथा, उन रास्तों से प्रवेश कर समुद्र प्रलय मचाता। नदियाँ बहुत सन्तुलन और धैर्य के साथ समुद्र में विलीन होती हैं। गंगा, बांग्लादेश के पश्चिम की नदियाँ अरब सागर में कई टुकड़ों में बँटकर मिलती हैं। प्रकृति पर श्रद्धा रखना वैज्ञानिक सोच है।

यह सोच विकसित करनी होगी कि जितना प्रकृति ने दिया है, उसके हिसाब से अपना जीवन चलाएँ। प्रकृति ने अलग-अलग क्षेत्रों में कई नदियाँ बनाई हैं। अन्यथा, वह एक नदी बनाती। कश्मीर से चलाकर कन्याकुमारी तक उसे पहुँचाती। ऐसा सम्भव नहीं है। भूगोल ऐसी अनुमति नहीं देता है। यह काम पर्यावरण से ज्यादा भूगोल को नष्ट करेगा।

पर्यावरण को सन्तुलित किया जा सकता है, परन्तु भूगोल को नहीं। पृथ्वी की जो ढाल है, चढ़ाव है, जिसके कारण ज्यादातर नदियाँ पूरब की तरफ बहती हैं, उन्हें पश्चिम की तरफ अगर मोड़ेंगे तो आने वाली पीढ़ी हमें माफ नहीं करेगी। पानी का मान पानी के हिसाब से रखना पड़ेगा, वरना पानी कब आदमी का पानी उतार लेगा, हम-आप समझ भी नहीं पाएँगे।

पानी के बारे में हमें अपनी सोच की समीक्षा करनी चाहिए। पानी के बारे में प्रति व्यक्ति घन मीटर और लीटर की जो पद्धति है, वह योजनाकारों की शब्दावली है। इस पद्धति से उन्होंने देश को ज्यादा पानी उपलब्ध करा दिया हो, ऐसा नहीं है। अन्य मामलों में भारत को गरीब देशों में गिना जाता होगा, लेकिन पानी के मामले में हमारा देश अमीर है।

जब हमें आजादी नहीं मिली थी तब हमारे गाँवों में जल-प्रबन्धन बेहतर था। धीरे-धीरे गाँवों के जलस्रोत नष्ट हुए हैं। समाज ने हजारों वर्षों के परिश्रम के बाद जिन परम्पराओं का विकास किया, उसकी हमने उपेक्षा की है। सौ-दो सौ किमी पाइप लाइन बिछाकर मीठा जल लाने का झूठा वायदा किया है। यह दो-चार दिन से ज्यादा का खेल नहीं है। हैण्डपम्प और ट्यूबवेल खारा पानी उलीचते हैं। भेड़-बकरियों तक ने कई इलाकों में इस पानी को पीने से नकार दिया है।हमें प्रत्येक समाज की पानी की जरूरत को जान लेना जरूरी है। चेरापूँजी, गोवा, कोंकण में बहुत पानी गिरता है, अतः वहाँ खेती, घर और जानवरों के लिये पानी का उपयोग अधिक हो सकता है, परन्तु जैसलमेर, बाड़मेर आदि इलाकों में, जहाँ पानी बहुत कम गिरता है, वहाँ उस हिसाब से पानी का उपयोग तय किया जाना चाहिए।

कहीं पानी बहुत कम है, परन्तु जीवन को चलाने के काम में उसकी सुगन्ध न जाये, लोकमानस भी इतना ध्यान रखकर ही पानी का उपयोग तय करता है। इसे तराजू पर रखकर तय नहीं किया जा सकता। इसे जन-विवेक पर छोड़ना होगा। देखा जाये तो हमारे देश में इस कोने से उस कोने तक पानी ठीक मिलता है। यह जरूर है कि हाल के दिनों में पानी की बर्बादी और छीना-झपटी भी हुई है।

राजनीतिक रूप से बलशाली इलाका कमजोर इलाकों से पानी छीन लेता है। असल में इस कारण से ही यह समस्या हमारे सामने आई है। हमें घनमीटर और लीटर के चक्कर को छोड़कर क्षेत्र की क्या जरूरत है, इसके आधार पर हल निकालना होगा। जब हमें आजादी नहीं मिली थी तब हमारे गाँवों में जल-प्रबन्धन बेहतर था। धीरे-धीरे गाँवों के जलस्रोत नष्ट हुए हैं।

समाज ने हजारों वर्षों के परिश्रम के बाद जिन परम्पराओं का विकास किया, उसकी हमने उपेक्षा की है। सौ-दो सौ किमी पाइप लाइन बिछाकर मीठा जल लाने का झूठा वायदा किया है। यह दो-चार दिन से ज्यादा का खेल नहीं है। हैण्डपम्प और ट्यूबवेल खारा पानी उलीचते हैं। भेड़-बकरियों तक ने कई इलाकों में इस पानी को पीने से नकार दिया है।

वास्तव में जल संकट के मामले में नवीन और प्राचीन की गुंजाईश नहीं होती है। प्रकृति पानी गिराने का तरीका अगर नहीं बदलती है, तो संग्रह के तरीके कैसे बदल सकते हैं? पानी रोकने का तरीका फैशन नहीं है, जो हर दो साल में बदला जा सके। कुण्ड, तालाब, नदियों, पाइन आदि में जलसंग्रह होकर भूजल को ऊपर उठाता है। फिर साल भर हम नए-पुराने अलग-अलग तरीकों से पानी को खींचकर उपयोग में लाते हैं।

पानी की इज्जत करने उसे किफायत से खर्च करना सीखना होगा। कहा जाता है कि यह बाजार की दुनिया है। बाजार ही हमें रोज-रोज पानी की सही कीमत बताता है। बाहर निकलकर एक बोतल पानी खरीदिए, आपको वह लगभग दूध के दामों पर मिलेगा। लेकिन यही पानी साफ-सुथरे और विश्वसनीय ढंग से घर में आता है, तो हम इसे दैनिक कार्यों से लेकर लॉन सींचने और गाड़ी धोने तक में बिना सोचे बहा डालते हैं। इसलिये बाजार में बिकने वाली पानी की बोतल को हमेशा सामने रखें। पानी के इस्तेमाल में किफायत बरतना आ जाएगा।

पिछले बरसों में तालाबों की विदाई के साथ बाढ़ का आगमन भी हुआ है। एक-दो घंटे भी पानी बरस जाये, तो सड़कें लबालब हो जाती हैं, घरों में पानी घुस जाता है। कारण यह कि पहले यह पानी जिन तालाबों में इकट्ठा होता था, अब वहाँ कॉलोनी और मॉल बन गए हैं।

उस पानी की स्मृति उसे वहीं ले आती है और हम अपने को बाढ़ से घिरा पाते हैं। दस साल के ही आँकड़े देख लीजिए। मुम्बई, बंगलुरु, चेन्नई, दिल्ली, इन्दौर, भोपाल सारे शहरों में महज एक घंटे की बारिश में बाढ़ का खतरा घिर आता है।
इस सन्दर्भ में फतेहपुर सीकरी को याद कर सकते हैं। अकबर को महान कहा जाता है, लेकिन यह प्रसंग उसके साम्राज्य का नहीं, पानी से जुड़ा है। अकबर ने फतेहपुर सीकरी में नई राजधानी बसाई, बहुत काम करवाया, परन्तु सिर्फ 16 साल बाद उसे यह जगह छोड़ देनी पड़ी। वजह थी पानी की कमी। इसीलिये आज के पर्यटक को भी वहाँ के सारे महल नए-से लगते हैं। नए-से ही छोड़ दिये गए थे।

आज हमारी सारी राजधानियाँ, सारे शहर स्वभाव से फतेहपुर सीकरी बन चले हैं। शहरों में पानी सौ-दो सौ किलोमीटर दूर से आता है। जिनका नहीं आता, वे भी ऐसे जुगाड़ में हैं।

सभी शहरों और राजधानियों में 50-60 साल पहले तक बड़े तालाब हुआ करते थे, जो वर्षाजल का संचय करते थे। ये भूजल स्रोतों को समृद्ध करते थे। यही भूजल कुएँ के जरिए इस्तेमाल में लाया जाता। लेकिन, तकनीक की बदौलत परिदृश्य बदल गया।

हम जमीन में छेदकर ट्यूबवेल, बोरिंग लगाकर ईंधन और बिजली की मदद से पानी खींचने लगे। फिर धीरे-धीरे जमीन की कीमतें आसमान छूने लगीं, तो एक नया शब्द आया-भूमाफिया। इसने देखते-ही-देखते 30-40 वर्षों में शहरों ही नहीं, आसपास के गाँवों के तालाबों को भी लपेटे में ले लिया। भूजल समृद्ध करने वाले तालाब गायब हो गए, लेकिन नागरिकों को कोई खास परेशानी नहीं हुई, क्योंकि सरकारों ने कहा कि तुम हमें वोट दो, हम तुम्हें पानी देंगे।

यहाँ तो ठीक है, परन्तु न भूलने वाली बात यह है कि पानी भले ही किसी और जगह से आ रहा हो, पर हमारे अन्धाधुन्ध इस्तेमाल से एक-न-एक दिन वहाँ का जलस्रोत भी सूख ही जाएगा। कार्टुनिस्ट देवेंद्र ने बहुत पहले एक कार्टून बनाया था- नल निचोड़ने के दिन आ गए। इसमें एक व्यक्ति आँगन में लगे नल को निचोड़ रहा है, जिसमें दो बूँद पानी टपकता है।

कहने का अर्थ यह है कि हम लगातार बेफिक्र नहीं रह सकते।...सरकारें पानी देंगी, कभी कम भी देंगी। हम नए घड़े फोड़कर विरोध का नाटक भी करेंगे। नए घड़े ही फोड़े जाएँगे, क्योंकि घरों में पुराने घड़े हैं ही नहीं।

पिछले बरसों में तालाबों की विदाई के साथ बाढ़ का आगमन भी हुआ है। एक-दो घंटे भी पानी बरस जाये, तो सड़कें लबालब हो जाती हैं, घरों में पानी घुस जाता है। कारण यह कि पहले यह पानी जिन तालाबों में इकट्ठा होता था, अब वहाँ कॉलोनी और मॉल बन गए हैं।

उस पानी की स्मृति उसे वहीं ले आती है और हम अपने को बाढ़ से घिरा पाते हैं। दस साल के ही आँकड़े देख लीजिए। मुम्बई, बंगलुरु, चेन्नई, दिल्ली, इन्दौर, भोपाल सारे शहरों में महज एक घंटे की बारिश में बाढ़ का खतरा घिर आता है।...हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि इन्द्र का एक पर्यायवाची ‘पुरन्दर’ भी है। पुर, यानी नगर-शहर। सो, पुरन्दर का अर्थ हुआ, नगरों को तोड़ने वाला। इन्द्र की बाढ़ का एक प्रसंग श्रीकृष्ण से जुड़ा है, जब उन्होंने छिनी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर उस इलाके को बाढ़ से बचा लिया था। लेकिन द्वारका को भी याद करें, जो स्वयं कृष्ण की बनाई राजधानी थी, वह डूब गई थी।

काश! हम इस गर्मी में इन्द्र, कृष्ण, तालाब, हमारे नल-किसी को न भूलें। इस बार बरसात के बारे में जो संकेत हैं, उस पर खुश हों, पर इसे गम्भीरता से लें। पुराने तालाब दुरुस्त करें। नए तालाब बनाना सम्भव न हो तो अपने घर-आँगन-छत में बारिश का पानी जमा करके (वॉटर हार्वेस्टिंग के जरिए) भूजल संवर्द्धन की कोशिश करें। जितना हो सके आसमान से गिरने वाले निर्मल जल को धरती की गोद में आने वाले दिनों के लिये भर लें।

(लेखक प्रसिद्ध पर्यावरणविद हैं)

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अनुपम मिश्रबहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी होगी कि सीएसई की स्थापना में अनुपम मिश्र का बहुत योगदान रहा है. इसी तरह नर्मदा पर सबसे पहली आवाज अनुपम मिश्र ने ही उठायी थी.

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