लोग बागां की आंख्यां का पाणी भी उतर गया

Submitted by RuralWater on Fri, 12/02/2016 - 15:37
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अढ़ाई दशक पहले तक वजीराबाद इलाके के उन गाँवों में से था जहाँ सबसे अधिक तालाब थे लेकिन आज तालाबों के नाम पर केवल एक सिरिया वाला जोहड़ बचा है। इसको भी हर साल दो तीन बार समर्सिबल से ही भरा जाता है ताकि गर्मी के दिनों में भैंसे इसमें अटखेलियाँ कर सकें। ब्राह्मणों वाला तालाब, खोखरा, चिड़िया और बेगाड़ा अब सब दम तोड़ चुके हैं। सूबे सिंह बताते हैं कि फूहड़ और अनियोजित विकास के सामने किसी की भी नहीं चली। जिसके मन में जो आया उसने तालाबों और कुओं के साथ वही व्यवहार किया। अपने मित्र हृदय और बड़े भाई सूबे सिंह बोहरा से मिलने के लिये 15 साल बाद गुड़गाँव के वजीराबाद जाना हुआ तब ताऊ रण सिंह बोहरा स्वस्थ थे। उनसे मिलकर गाँव, गोहांड और परम्पराओं की चर्चा करने का एक अलग ही आनन्द था। 2001 में जब पहली बार उनसे मिला तो उन्होंने लटके-झटकों के साथ वजीराबाद के तालाबों, कुओं की ताकत और उपयोगिता बातों-बातों में समझाई।

उस वक्त भी गाँव में समर्सिबल लग चुके थे। बुजुर्ग रण सिंह को समर्सिबल लगने का दुख था लेकिन इससे अधिक दुख था इनको चलाकर पानी बर्बाद करने का। 15 साल बाद जब इस बार गया तो वजीराबाद काफी बदल चुका था। शायद आज ताऊ रण सिंह होते तो पानी की बर्बादी को देखकर रो पड़ते। वजीराबाद की जनसंख्या इन 15 सालों में सात आठ हजार से 25 हजार तक हो गई है। अब गाँवों में प्रवासी लोगों की संख्या बहुत अधिक हो गई है।

गाँव एक बोराता हुआ कस्बा सा बन गया है। गलियाँ बहुत तंग हो गई हैं लेकिन लोग जैसे-तैसे इन तंग गलियों में से ही अपनी गाड़ियाँ निकालकर गन्तव्यों तक पहुँच जाते हैं। जमीन की बिक्री से कृष्ण, के वंशज यदुवंशी मालामाल हैं। लेकिन घर-घर में लगे समर्सिबल, गाँव में पानी की कहानी अपने आप ही समझा रहे थे। पानी की बन्द बोतलों की बिक्री बताती है कि भूजल स्तर की गुणवत्ता अब बहुत कम हो गई है।

नगर निगम ने लोगों को पानी की आपूर्ति करने के लिये डेढ़ दर्जन से अधिक समर्सिबल लगा दिये हैं। पानी की समस्या का स्थायी समाधान क्या हो और जल प्रबन्धन की व्यवस्था कर भूजल स्तर को ऊँचा कर पानी की समस्या का स्थायी समाधान कर इस ओर किसी का ध्यान नहीं है। सब लोग समस्याओं का तात्कालिक समाधान कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं।

अढ़ाई दशक पहले तक वजीराबाद इलाके के उन गाँवों में से था जहाँ सबसे अधिक तालाब थे लेकिन आज तालाबों के नाम पर केवल एक सिरिया वाला जोहड़ बचा है। इसको भी हर साल दो तीन बार समर्सिबल से ही भरा जाता है ताकि गर्मी के दिनों में भैंसे इसमें अटखेलियाँ कर सकें।

.ब्राह्मणों वाला तालाब, खोखरा, चिड़िया और बेगाड़ा अब सब दम तोड़ चुके हैं। सूबे सिंह बताते हैं कि फूहड़ और अनियोजित विकास के सामने किसी की भी नहीं चली। जिसके मन में जो आया उसने तालाबों और कुओं के साथ वही व्यवहार किया। हर तालाब, जोहड़ 2 से 5 एकड़ का था और किसी भी तालाब की गहराई 15 फीट से कम नहीं थी। 2-3 तालाब तो 25 से 30 फुट तक गहरे थे।

तालाबों के रहते ग्रामीणों में कभी पानी का संकट नहीं देखा था। तालाबों के चारों ओर नीम, पीपल और वट के घने छायादार पेड़ थे। बुजुर्ग इनके नीचे आराम फरमाते थे। गाँव के दुख-सुख की चर्चा करते थे। वृद्धावस्था के दिनों में ताशों की धमाचौकड़ी करते थे। आज तालाब नहीं रहे तो लगता है कि गाँव में बुजुर्ग भी नहीं रहे। कारण की सब लोग घरों में घुसे रहते हैं।

आज अधिकांश तालाबों, जोहड़ों पर अस्पताल, सामुदायिक भवन या सड़कें बन चुकी हैं। वर्ष 1999 में जब मैं वजीराबाद को समझने के लिये आया था तब यहाँ भूजल स्तर बीस से तीस फुट पर था। आज 200 फुट तक चला गया है। सारे कुएँ समाप्त हो गए। 20-22 साल पहले पूरा गाँव इन्हीं कुओं पर निर्भर था।

हर कुएँ के पानी का स्वाद अलग-अलग था। शादी-ब्याह में हलवाई अलग-अलग मिठाइयों के लिये अलग कुएँ के पानी का इस्तेमाल करते थे। गाँव के बुजुर्ग रामचंद्र बताते हैं कि पानी था तब गाँव हरा-भरा था, खुशहाल था, खूब खेती होती थी। हमारे गाँव के चने की दूर-दूर तक मशहूरी थी। अब तालाब नहीं है, कुएँ नहीं हैं, पानी नहीं है, “तो लोग बाग्गां की आंख्यां का पाणी भी उतर ग्या।”बुजुर्ग छित्तर सिंह को भी तालाबों और कुओं के पुराने दिनों की याद आती है। बताते हैं कि एक बार जोहड़ में कूद जाते थे तो पकड़ में नहीं आते थे। घंटों-घंटों तालाब में तैरते थे। जवानी में तो कभी बीमारी तो देखी ही नहीं और यह सब मीठे पानी और तैराकी की बदौलत था। तभी याद आई ताऊ रण सिंह बोहरा की यो बात, “आज-काल के बालक जिब लुक छिप कै दारू धपटा करै हैं, उस उमर मै हम जोहड़ पार करण की होड़ लाया करैं थै।”

 

नरक जीते देवसर

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिए कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें)

क्रम

अध्याय

1

भूमिका - नरक जीते देवसर

2

अरै किसा कुलदे, निरा कूड़दे सै भाई

3

पहल्यां होया करते फोड़े-फुणसी खत्म, जै आज नहावैं त होज्यां करड़े बीमार

4

और दम तोड़ दिया जानकीदास तालाब ने

5

और गंगासर बन गया अब गंदासर

6

नहीं बेरा कड़ै सै फुलुआला तालाब

7

. . .और अब न रहा नैनसुख, न बचा मीठिया

8

ओ बाब्बू कीत्तै ब्याह दे, पाऊँगी रामाणी की पाल पै

9

और रोक दिये वर्षाजल के सारे रास्ते

10

जमीन बिक्री से रुपयों में घाटा बना अमीरपुर, पानी में गरीब

11

जिब जमीन की कीमत माँ-बाप तै घणी होगी तो किसे तालाब, किसे कुएँ

12

के डले विकास है, पाणी नहीं तो विकास किसा

13

. . . और टूट गया पानी का गढ़

14

सदानीरा के साथ टूट गया पनघट का जमघट

15

बोहड़ा में थी भीमगौड़ा सी जलधारा, अब पानी का संकट

16

सबमर्सिबल के लिए मना किया तो बुढ़ापे म्ह रोटियां का खलल पड़ ज्यागो

17

किसा बाग्गां आला जुआं, जिब नहर ए पक्की कर दी तै

18

अपने पर रोता दादरी का श्यामसर तालाब

19

खापों के लोकतंत्र में मोल का पानी पीता दुजाना

20

पाणी का के तोड़ा सै,पहल्लां मोटर बंद कर द्यूं, बिजली का बिल घणो आ ज्यागो

21

देवीसर - आस्था को मुँह चिढ़ाता गन्दगी का तालाब

22

लोग बागां की आंख्यां का पाणी भी उतर गया

 

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