पानी दूर हुआ या हम

Submitted by RuralWater on Thu, 07/07/2016 - 16:25
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.ग्लेशियर पिघले। नदियाँ सिकुड़ी। आब के कटोरे सूखे। भूजल स्तर तल, वितल, सुतल से नीचे गिरकर पाताल तक पहुँच गया। मानसून बरसेगा ही बरसेगा; अब यह गारंटी भी मौसम के हाथ से निकल गई है।

इस बार अधिक वर्षा की सम्भावना बताई गई है; बावजूद इसके हमारे कई इलाके मानसून की पारम्परिक तिथि निकल जाने के बाद भी सूने पड़े आकाश की ओर निहार रहे हैं। हम क्या करें? वैश्विक तापमान वृद्धि को कोसें या सोचें कि दोष हमारे स्थानीय विचार-व्यवहार का भी है ? दृष्टि साफ करने के लिये यह पड़ताल भी जरूरी है कि पानी, हमसे दूर हुआ या फिर पानी से दूरी बनाने के हम खुद दोषी हैं?

पलटकर देखिए। भारत का दस्तावेजी इतिहास 75,000 वर्ष पुराना है। आज से 50-60 वर्ष पहले तक भारत के ज्यादातर नगरों में हैण्डपम्प थे; कुएँ थे; बावड़ियाँ, तालाब और झीलें थी; लेकिन नल नहीं थे। अमीर से अमीर घरों में भी नल की चाहत नहीं पहुँची थी। दिल्ली में तो एक पुराना लोकगीत काफी पहले से प्रचलित था - ‘फिरंगी नल न लगायो...।’ स्पष्ट है कि तब तक कुआँ नहीं जाता था, प्यासे के पास। प्यासा जाता था कुएँ के पास।

कालान्तर में हमने इस कहावत को बेमतलब बना दिया। पानी का इन्तजाम करने वालों ने पानी को पाइप में बाँधकर प्यासों के पास पहुँचा लिया। बाँध और नहरों के जरिए नदियों को खींचकर खेतों तक ले आने का चलन तेज हो गया। हमें लगा कि हम पानी को प्यासे के पास ले आये। 2016 का महाराष्ट्र गवाह है कि असल में वह भ्रम था। हमने पानी को प्यासों से दूर कर दिया।

हुआ यह कि जो सामने दिखा, हमने उसे ही पानी का असल स्रोत मान लिया। इस भ्रम के चलते हम असल स्रोत के पास जाना और उसे संजोना भूल गए। पानी कहाँ से आता है? पूछने पर बिटिया कहेगी ही कि पानी नल से आता है? क्योंकि उसे कभी देखा ही नहीं कि उसके नगर में आने वाले पानी का मूल स्रोत क्या है? किसान को भी बस नहर, ट्युबवेल, समर्सिबल याद रहे; नदी और धरती का पेट भरने वाली जल सरंचनाओं को वे भी भूल गए। आँख से गया, दिमाग से गया।

पहले एक अनपढ़ भी जानता था कि पानी, समंदर से उठता है। मेघ, उसे पूरी दुनिया तक ले जाते हैं। ताल-तलैया, झीलें और छोटी वनस्पतियाँ मेघों के बरसाए पानी को पकड़कर धरती के पेट में बिठाती हैं। नदियाँ, उसे वापस समंदर तक ले जाती हैं। अपने मीठे पानी से समंदर के खारेपन को सन्तुलित बनाए रखने का दायित्व निभाती हैं। इसीलिये अनपढ़ कहे जाने वाले भारतीय समाज ने भी मेघ और समंदर को देवता माना। नदियों से माँ और पुत्र का रिश्ता बनाया।

तालाब और कुआँ पूजन को जरूरी कर्म मानकर संस्कारों का हिस्सा बनाया। जैसे-जैसे नहरी तथा पाइप वाटर सप्लाई बढ़ती गई। जल के मूल स्रोतों से हमारा रिश्ता कमजोर पड़ता गया। ‘सभी की जरूरत के पानी का इन्तजाम हम करेंगे।’ नेताओं के ऐसे नारों ने इस कमजोरी को और बढ़ाया। लोगों ने भी सोच लिया कि सभी को पानी पिलाना सरकार का काम है। इससे पानी संजोने की साझेदारी टूट गई।

परिणामस्वरूप, वर्षाजल संचयन के कटोरे फूट गए। पानी के मामले में स्वावलम्बी रहे भारत के गाँव-नगर ‘पानी परजीवी’ में तब्दील होते गए।

हमारी सरकारों ने भी जल निकासी को जलाभाव से निपटने का एकमेव समाधान मान लिया। जल संसाधन मंत्रालय, जल निकासी मंत्रालय की तरह काम करने लगे। सरकारों ने समूचा जल बजट उठाकर जल निकासी प्रणालियों पर लगा दिया। ‘रेन वाटर हार्वेस्टिंग’ और ‘रूफ टाॅप हार्वेस्टिंग’ की नई शब्दावलियों को व्यापक व्यवहार उतारने के लिये सरकार व समाज.. दोनों आज भी प्रतिबद्ध दिखाई नहीं देती। लिहाजा, निकासी बढ़ती जा रही है। वर्षाजल संचयन घटता जा रहा है। वाटर बैलेंस गड़बड़ा गया है। अब पानी की ‘फिक्सड डिपोजिट’ तोड़ने की नौबत आ गई है। भारत, ‘यूजेबल वाटर एकाउंट’ के मामले में कंगाल होने के रास्ते पर है।

दूसरी तरफ कम वर्षा वाले गुजरात, राजस्थान समेत जिन्होंने भी जल के मूल स्रोतों के साथ अपने रिश्ते को जिन्दा रखा, वे तीन साला सूखे में भी मौत को गले लगाने को विवश नहीं हैै; वरना और क्या कारण हो सकता है कि पिछले 68 वर्षों में सिंचाई व बाढ़ नियंत्रण के नाम पर देश के कुल बजट का सबसे ज्यादा हिस्सा खाने वाला महाराष्ट्र के बाँधों में आज एक फीसदी पानी भी शेष नहीं है; उसके 29,000 गाँवों को सूखा करार देना पड़ा है और 7200 करोड़ का सूखा राहत पैकेज पाने के बावजूद, बुन्देलखण्ड के हलक आज भी प्यासे ही हैं?

जल के असल स्रोतों से रिश्ता तोड़ने और नकली स्रोतों से रिश्ता जोड़ने के दूसरे नतीजों पर गौर फरमाइए।

नहरों, नलों और बोरवेलों के आने से जलोपयोग का हमारा अनुशासन टूटा। पीछे-पीछे फ्लश टाॅयलट आये। सीवेज लाइन आई। इस तरह नल से निकला अतिरिक्त जल, मल व अन्य कचरा मिलकर नदियों तक पहुँच गए। नदियाँ प्रदूषित हुईं। नहरों ने नदियों का पानी खींचकर, उन्हें बेपानी बनाने का काम किया। इस कारण, खुद को साफ करने की नदियों की क्षमता घटी।

परिणामस्वरूप, जल-मल शोधन संयंत्र आये। शोधन के नाम पर कर्ज आया; भ्रष्टाचार आया। शुद्धता और सेहत के नाम पर बोतलबन्द पानी आया। फिल्टर और आर ओ आये। चित्र ऐसा बदला कि पानी, पुण्य कमाने की जगह, मुनाफा कमाने की वस्तु हो गया। समंदर से लेकर शेष अन्य सभी प्रकार के जल स्रोत प्रदूषित हुए, सो अलग। बोलो, यह किसने किया? पानी ने या हमने? पानी दूर हुआ कि हम?
 

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अरुण तिवारीअरुण तिवारी

शिक्षा:


स्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

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