22 हजार पनचक्कियों से उत्पादित होगी 35 हजार मेगावाट बिजली

Submitted by RuralWater on Sun, 01/08/2017 - 17:01
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पनचक्की (घराट)पनचक्की (घराट)उत्तराखण्ड राज्य के अक्षय ऊर्जा विभाग ने एक आँकड़ा प्रस्तुत किया है कि राज्य में 22 हजार घराट (पनचक्कियाँ) मौजूद हैं। इन्हें अब वे सरसब्ज करके ऊर्जा पैदा करने के लिये विकसित करेंगे। बाकायदा डीपीआर भी बन चुकी है।

यदि सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो राज्य में ये पनचक्कियाँ ऊर्जा के नए स्रोत बनेंगे और राज्य के लोगों को बिजली की समस्या से निजात मिल जाएगी। साथ ही इन पनचक्कियों से पैदा हुई बिजली को सरकार बेच भी सकेगी। क्योंकि राज्यवासियों को लगभग 15 हजार मेगावाट बिजली की ही आवश्यकता है। जबकि इन पनचक्कियों से लगभग 35 हजार मेगावाट से भी अधिक विद्युत उत्पादन की क्षमता बताई जा रही है। कह सकते हैं कि ये पनचक्कियाँ राज्य में राजस्व का भी नया स्रोत बनेंगी साथ ही पेयजल, सिंचाई के लिये भी सुलभ होगी।

ज्ञात हो कि यह कोई हाल का आँकड़ा नहीं है बल्कि राज्य बनने के बाद से यह विभाग इस तरह के आँकड़े और योजनाएँ प्रस्तुत कर रहा है। सचमुच में यदि राज्य सरकार राज्य के पनचक्कियों को बिजली के लिये विकसित करेगी तो राज्य के पहाड़ी गाँव बिजली की समस्या से छुटकारा पा ही सकते हैं। बता दें कि राज्य के अधिकांश गाँव घनघोर जंगलों के मध्य बसे हैं।

यहाँ बिजली की लाइन पहुँचाने में वन विभाग के कानून आड़े आ रहे हैं। जबकि इस तरह की पनचक्कियाँ हर एक गाँव के पास दो से कम नहीं हैं। उधर चूँकि अक्षय ऊर्जा के आँकड़ों पर गौर करें तो 22 हजार पनचक्कियाँ वर्ष भर चलने वाली हो सकती हैं। जबकि इधर एक गैर सरकारी आँकड़ा राज्य में पनचक्कियों की संख्या लगभग 35 हजार से अधिक बताता है। हो सकता है वह गैर सरकारी आँकड़ा सीजनली और वर्ष भर चलने वाली पनचक्कियों को मिलाकर प्रस्तुत किया गया हो। मगर पहाड़ के बहते पानी का उपयोग करने के लिये वे 22 हजार पनचक्कियाँ ही विकास बाबत अच्छा खासा माध्यम बन सकती हैं।

जानकारों का मानना है कि इन सभी पनचक्कियों को विद्युत हेतु विकसित किया जाता है तो एक तरफ बिजली की समस्या से निजात मिल जाएगी दूसरी तरफ यह कि पनचक्कियों तक पहुँचाने वाली नहरों को सिंचाई, पेयजल आदि के लिये भी उपयोग किया जाएगा। और सबसे बड़ा फायदा इन पहाड़ी गाँव को होगा कि निर्माण के दौरान कोई आपदा इत्यादि के खतरे उन्हें नहीं डराएँगे। सरकारी मुलाजिमों का मानना है कि सबसे बड़ा फायदा इन परियोजना से स्थानीय लोगों के हाथों रोजगार सृजन का भी होगा। अर्थात पहाड़ से प्राकृतिक रूप से बहने वाली ये ‘स्प्रिंग्स’ रोजगार और सविधायुक्त मुफिद होने की प्रबल सम्भावनाएँ समेटे हैं।

पनचक्की से विद्युत का उत्पादनउल्लेखनीय हो कि उत्तराखण्ड के पहाड़ी गाँवों में पनचक्कियों का भावनात्मक रिश्ता है। इन पनचक्कियों से पीसने वाला अनाज लोगों का परस्पर सम्बन्ध बनाता है। अर्थात घराट (पनचक्की) न केवल स्थानीय रोजगार का साधन है, बल्कि पहाड़ी लोक जीवन और परम्पराओं से भी कहीं गहरे तक जुड़ा है। घराट वास्तव में अनाज पिसाई की पुरानी चक्की का नाम है, जो सिर्फ पानी के बहाव से ही चलती है। पानी का बहाव जितना तेज होगा चक्की उतनी ही तीव्र गति से घूमती है।

नदी अथवा नालों से चक्की तक पानी गूल की सहायता से लाया जाता है। इस तरह घराट चलाने वाली गूल से सिंचाई व पेयजल इत्यादि के कामों में भी लाया जाता है। यह भी खास है कि पनचक्की उसी नदी नाले के किनारे पर बनाया जाता है जहाँ पानी वर्ष भर रहता है। पनचक्की ऐसी लोक तकनीकी है जो पानी से ही चालित होती है। पनचक्की का ताना-बाना प्राकृतिक संसाधनों से विकसित किया जाता है।

गौरतलब हो कि मौजूदा समय बाजार में आटे की थैलियाँ उपलब्ध होने और गाँवों में भी बिजली, डिजल चालित चक्कियाँ स्थापित होने से इन पनचक्कियों के अस्तित्व पर संकट मँडराने लग गया है। इतना ही नहीं सरकारों की उदासीनता के कारण इस तरह की सस्ती और परम्परागत तकनीक समाप्त होती जा रही है। जबकि राज्य बनने के दो वर्ष बाद सरकार ने इन पनचक्कियों के नवीनीकरण बाबत बाकायदा ‘उतराखण्ड विकास समिति’ का गठन किया था।

यह समिति इन पनचक्कियों का अध्ययन करेगी और साथ-ही-साथ इन पनचक्कियों को विद्युत उत्पादन के लिये विकसित करना समिति का प्रमुख कार्य था। समिति ने तत्काल इन पनचक्कियों का सर्वेक्षण कर दिया था और इसके बाद से यह समिति सिर्फ-व-सिर्फ कागजों की धूल चाटती ही रह गईं।

अक्षय ऊर्जा विकास अभिकरण के मुताबिक एक पनचक्की से पाँच से पन्द्रह किलोवाट बिजली पैदा की जा सकती है। सरकार के आँकड़े गवाह हैं कि राज्य में अभी भी लगभग 22 हजार पनचक्कियाँ मौजूद है। यदि उरेडा की तकनीकी पर गौर फरमाएँ तो इन पनचक्कियों से लगभग एक हजार मेगावाट से लेकर तीन हजार मेगावाट तक की बिजली उत्पादित की जा सकती है।

अकेल उत्तरकाशी जनपद में 2075 पनचक्कियाँ मौजूद हैं। इनमें से मात्र 35 पनचक्कियों का उच्चीकरण करवाया जा रहा है, जिनमें अब 25 इलेक्ट्रिकल पनचक्कियाँ हैं। बता दें कि इलेक्ट्रिकल पनचक्की के लिये डेढ़ लाख और मेकेनिकल पनचक्की के लिये 50 हजार रु. की अनुदान की धनराशी सरकार द्वारा दी जाती है। उत्तरकाशी में उरेडा के परियोजना अधिकारी मनोज कुमार का कहना है कि पनचक्की को विकसित करने के लिये सरकार 90 फीसदी अनुदान देती है। लोग अनुदान का फायदा उठाकर बहुउद्देशीय पनचक्की चलाएँ तो यह कमाई का अच्छा जरिया बन सकता है।

घराट चलाते स्थानीय ग्रामीणहमने एक ऊर्जा नीति बनाई है, जिसमें इन पनचक्कियों को यानि लघु पनबिजली को प्रमुखता से रखा है। ताकि स्थानीय स्तर पर रोजगार के साधन भी उपलब्ध हो और पर्यावरण का भी सन्तुलन बना रहे। हम लघु पनबिजली योजनाओं को पंचायतों के मार्फत विकसित करना चाहते हैं, जिसका रोडमैप तैयार है। जल्दी हम इस ओर क्रियान्वयन की कार्यवाही करने वाले हैं। कह सकता हूँ कि आज के दौर में ऊर्जा का सबसे बड़ा आधार हमारी पनचक्कियाँ ही हैं। इन्हें विकसित करना हमारी जिम्मेदारी है।... हरीश रावत, मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड

ऐसा कोई गाँव नहीं जहाँ पनचक्की नहीं है, विशेषकर पहाड़ी गाँव। विभाग ने पनचक्कियों के लिये बाकायदा एक रोडमैप तैयार कर दिया है, जिसे सरकार की भी संस्तुति मिल चुकी है। जल्दी ये पनचक्कियाँ ऊर्जा की स्रोत बनेंगी।... प्रबन्धक निदेशक, अक्षय ऊर्जा विकास अभिकरण, उत्तराखण्ड
 

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प्रेम पेशे से स्वतंत्र पत्रकार और जुझारु व्यक्ति हैं, विभिन्न संस्थानों और संगठनों के साथ काम करते हुए बहुत से जमीनी अनुभवों से रूबरू हुए। उन्होंने बहुत सी उपलब्धियाँ हासिल की।

 

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