कृषि क्षेत्र में महिलाओं की सहभागिता

Submitted by RuralWater on Tue, 03/06/2018 - 18:01
Source
कुरुक्षेत्र, फरवरी 2018

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कृषि में महिलाओं को बराबर का दर्जा मिले तो कृषि कार्यों में महिलाओं की बढ़ती संख्या से उत्पादन में बढ़ोत्तरी हो सकती है, भूख और कुपोषण को भी रोका जा सकता है। इसके अलावा ग्रामीण आजीविका में सुधार होगा, इसका लाभ पुरुष और महिलाओं, दोनों को होगा। महिलाओं को अच्छा अवसर तथा सुविधा मिले तो वे देश की कृषि को द्वितीय हरित क्रान्ति की तरफ ले जाने के साथ देश के विकास का परिदृश्य भी बदल सकती हैं। आज देश की कुल आबादी में आधा हिस्सा महिलाओं का है, इसके बावजूद वे अपने मूलभूत अधिकारों से भी वंचित हैं खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में। अधिकारों के अतिरिक्त देखा जाये तो जिन क्षेत्रों में वे पुरुषों के मुकाबले बराबरी पर भी हैं, वहाँ उनकी गिनती पुरुषों की अपेक्षा कमतर ही आँकी जा रही है। इसी में से एक क्षेत्र है कृषि। इसमें भी महिलाओं को अधिकतर मजदूर का दर्जा ही प्राप्त है, कृषक का नहीं।

बाजार की परिभाषा में अनुकूल कृषक होने की पहचान इस बात से तय होती है कि जमीन का मालिकाना हक किसके पास है, इस बात से नहीं कि उसमें श्रम किसका और कितना लग रहा है और इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि भारत में महिलाओं को भूमि का मालिकाना हक ना के बराबर है। इन सबके अतिरिक्त अगर महिला कृषकों के प्रोत्साहन की बात की जाये तो देश में केन्द्र और राज्य सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र को बढ़ावा देने हेतु अनेक प्रकार की योजनाएँ, नीतियाँ व कार्यक्रम हैं परन्तु उन सबकी पहुँच महिलाओं तक या तो कम है या बिल्कुल नहीं है। यही कारण है कि देश की आधी आबादी देश के सबसे बड़े कृषि क्षेत्र में हाशिए पर है।

कृषि जनगणना (2010-11) की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में मौजूदा स्थिति में केवल 12.78 प्रतिशत कृषि जोत ही महिलाओं के नाम पर हैं। यही कारण है कि ‘कृषि क्षेत्र’ में उनकी निर्णायक भूमिका नहीं है। कृषि भूमि पर मालिकाना हक महज एक प्रशासनिक पहलू नहीं है, बल्कि इसका सामाजिक-आर्थिक निहितार्थ भी है। इस एक हक से व्यक्ति की पहचान, उसके अधिकार, निर्णय की क्षमता, आत्मनिर्भरता व आत्मविश्वास जुड़ा हुआ है।

महिलाओं के पास जमीन पर अधिकार न होने से उनका सर्वांगीण विकास और सशक्तीकरण प्रभावित होता है। साथ ही गम्भीर और आपदा की स्थिति में अपने पैतृक भूमि का उपयोग करने में भी वे अक्षम होती हैं। अतः जरूरी है कि पैतृक जोत भूमि में पत्नी का नाम भी पति के साथ दर्ज हो, ऐसा कानून में प्रावधान किया जाना चाहिए। यह भी समझने की आवश्यकता है कि पुरुषों के पलायन के कारण कृषि कार्य पुरुषों से ज्यादा महिलाओं के हाथ में चला गया है, इसके बावजूद महिलाएँ कृषक नहीं हैं, क्योंकि उनके पास कृषि के मालिकाना हक का दस्तावेज नहीं है अर्थात वह खेत की वास्तविक मालिक नहीं हैं।

कृषि क्षेत्र में उनकी सहभागिता का दूसरा पहलू भी है, अधिकतर घरेलू काम जैसे जलावन की लकड़ी, पशुओं के लिये चारा, परिवार के लिये लघु वन उपज पीने का पानी समेत हर काम में महिलाओं की केन्द्रीय भूमिका है, किन्तु उनकी पहचान श्रमिक अथवा पुरुष सहायक के रूप में ही है।

मातृसत्तात्मक परिवारों को छोड़ दिया जाये तो वे सामान्य परिवारों में कभी घर की मालिक भी नहीं बन पाती हैं जिसकी वजह से कृषि सम्बन्धी निर्णय, नियंत्रण के साथ-साथ किसानों को मिलने वाली समस्त सुविधाओं में से 65 प्रतिशत कृषि कार्य का भार अपने कंधों पर उठाने वाली महिला वंचित रह जाती हैं और इस सबके बावजूद उन्हें किसान का दर्जा नहीं मिलता है।

विश्व खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार भारतीय कृषि में महिलाओं का योगदान करीब 32 प्रतिशत है, जबकि कुछ राज्यों (जैसे कि पहाड़ी तथा उत्तर-पूर्वी क्षेत्र तथा केरल राज्य) में महिलाओं का योगदान कृषि तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पुरुषों से भी ज्यादा है। भारत के 48 प्रतिशत कृषि से सम्बन्धित रोजगार में औरतें हैं जबकि करीब 7.5 करोड़ महिलाएँ दुग्ध उत्पादन तथा पशुधन व्यवसाय से सम्बन्धित गतिविधियों में सार्थक भूमिका निभाती हैं। आँकड़ों के मुताबिक कृषि उत्पादनों में महिलाओं का योगदान 20 से 30 प्रतिशत ही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कृषि में महिलाओं को बराबर का दर्जा मिले तो कृषि कार्यों में महिलाओं की बढ़ती संख्या से उत्पादन में बढ़ोत्तरी हो सकती है, भूख और कुपोषण को भी रोका जा सकता है। इसके अलावा ग्रामीण आजीविका में सुधार होगा, इसका लाभ पुरुष और महिलाओं, दोनों को होगा। सरकार की विभिन्न नीतियों जैसे जैविक खेती, स्वरोजगार योजना, भारतीय कौशल विकास योजना इत्यादि में महिलाओं को प्राथमिकता दी जा रही है और यदि महिलाओं को अच्छा अवसर तथा सुविधा मिले तो वे देश की कृषि को द्वितीय हरित क्रान्ति की तरफ ले जाने के साथ देश के विकास का परिदृश्य भी बदल सकती हैं।

यही वजह है कि महिलाओं को कृषि क्षेत्र के प्रति जागरूक करने और उन्हें इस क्षेत्र में सम्मानजनक स्थान दिलाने के उद्देश्य से पिछले वर्ष कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा प्रति वर्ष 15 अक्टूबर को राष्ट्रीय महिला किसान दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया था। निर्णय का आधार संयुक्त राष्ट्र संगठन द्वारा 15 अक्टूबर को अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाना था। 15 अक्टूबर, 2017 को देश भर के समस्त कृषि विश्वविद्यालयों, संस्थानों एवं कृषि विज्ञान केन्द्रों में ‘राष्ट्रीय महिला किसान दिवस’ मनाया गया। इस दिवस का उद्देश्य कृषि में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी को बढ़ाना है।

इसके अलावा, कृषि और सम्बद्ध क्षेत्रों में महिलाओं को और अधिक सशक्त बनाने के लिये तथा उनकी जमीन, ऋण और अन्य सुविधाओं तक पहुँच को बढ़ाने के लिये कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने किसानों के लिये बनी राष्ट्रीय कृषि नीति में उन्हें घरेलू और कृषि भूमि दोनों पर संयुक्त पट्टे देने जैसे नीतिगत प्रावधान किये हैं। इसके साथ कृषि नीति में उन्हें किसान क्रेडिट कार्ड जारी करना, फसल, पशुधन पद्धतियों, कृषि प्रसंस्करण आदि के माध्यम से जीविका के अवसरों का सृजन करवाए जाने जैसे प्रावधानों का भी जिक्र है।

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय का लक्ष्य कृषि उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ किसानों के कल्याण के लिये उपाय करना है। साथ ही अपने समग्र जनादेश लक्ष्यों और उद्देश्यों के भीतर यह भी सुनिश्चित करना है कि महिलाएँ कृषि उत्पादन और उत्पादकता में प्रभावी ढंग से योगदान दें और उन्हें बेहतर जीवनयापन के अवसर मिले। इसलिये महिलाओं को सशक्त बनाने और उनकी क्षमताओं का निर्माण करने और इनपुट प्रौद्योगिकी और अन्य कृषि संसाधनों तक उनकी पहुँच को बढ़ाने के लिये उचित संरचनात्मक, कार्यात्मक और संस्थागत उपायों को बढ़ावा दिया जा रहा है और इसके लिये कई प्रकार की पहल की जा चुकी है।

इसी तरह की पहल में एक महत्त्वपूर्ण पहल थी कृषि में महिलाओं की अहम भागीदारी को ध्यान में रखते हुए कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने वर्ष 1996 में भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद के अन्तर्गत केन्द्रीय कृषिरत महिला संस्थान की स्थापना भुवनेश्वर में की। यह संस्थान कृषि में महिलाओं से जुड़े विभिन्न आयामों पर कार्य करता है। इसके अलावा, भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद के 100 से अधिक संस्थानों ने कई तकनीकों का सृजन किया ताकि महिलाओं की कठिनाइयों को कम कर उनका सशक्तिकरण हो।

देश में 680 कृषि विज्ञान केन्द्र हैं। हर कृषि विज्ञान केन्द्र में एक महिला वस्तु विशेषज्ञ हैं। वर्ष 2016-17 में महिलाओं से सम्बन्धित 21 तकनीकियों का मूल्यांकन किया गया और 2.56 लाख महिलाओं को कृषि सम्बन्धित क्षेत्रों जैसे सिलाई, उत्पाद बनाना, वैल्यू एडिशन, ग्रामीण हस्तकला, पशुपालन, मधुमक्खी पालन, पोल्ट्री, मछली पालन आदि का प्रशिक्षण दिया गया।

इसके अतिरिक्त विभिन्न प्रमुख योजनाओं, कार्यक्रमों और विकास सम्बन्धी गतिविधियों के अन्तर्गत महिलाओं के लिये कम-से-कम 30 प्रतिशत धनराशि का आवंटन सुनिश्चित किया गया है। साथ ही विभिन्न लाभार्थी-उन्मुखी कार्यक्रमों, योजनाओं और मिशनों के घटकों का लाभ महिलाओं तक पहुँचाने के लिये महिला समर्थित गतिविधियाँ शुरू करना तथा महिला स्वयं सहायता समूहों के गठन पर ध्यान केन्द्रित करना ताकि क्षमता निर्माण जैसी गतिविधियों के माध्यम से उन्हें सूक्ष्म ऋण से जोड़ा जा सके और सूचनाओं तक उनकी पहुँच बढ़ सके एवं साथ ही विभिन्न स्तरों पर निर्णय लेने वाले निकायों में उनका प्रतिनिधित्व हो। इसके अलावा कृषि मंत्रालय द्वारा कई महिला समर्थित कदम भी उठाए गए हैं जो काफी महत्त्वपूर्ण हैं।

किन्तु सरकार द्वारा इतना ही काफी नहीं है। महिला सशक्तिकरण के लिये तो वैश्विक-स्तर पर भी तमाम प्रयास किये गए हैं किन्तु इसका समग्र रूप में अब तक लाभ नहीं लिया जा सका है। अब आधुनिक समय में यदि इस तरह की पहल की जाती है जिसमें इन समस्याओं से मुक्ति का रास्ता निकलता है तो इसे सामाजिक रूप से स्वीकार्य बनाने की चुनौती प्रकट हो सकती है।

महिला सशक्तीकरण और महिला शिक्षा की दिशा में किये जा रहे प्रयासों का भी यही हाल है। किन्तु इसके विपरीत सामाजिक रुझान भी यह है कि लड़कियों के प्रति तमाम अंकुश और शोषण के बावजूद आज महिलाओं के बीच अपने पैरों पर खड़े होने की जिद भी समाज में देखने को मिलती है। वास्तविक भारत यानी ग्रामीण क्षेत्र की जो तस्वीर है उसे बदलने की भी जरूरत है।

वैसे महिलाओं की शिक्षा, आर्थिक- सामाजिक सशक्तिकरण के लिये काफी प्रयास किये गए हैं किन्तु जरूरत इस बात की है कि बदलते समय के अनुकूल उनके हक में समुचित विधान बनाए जाएँ। महिला कृषक को वैधानिक आधार मिले, तब जाकर हम समाज में वास्तविक बदलाव ला सकते हैं। इसके साथ ही उनकी सामाजिक स्वीकृति भी मिलनी प्रारम्भ होगी।

इन सबके साथ कृषि और सम्बद्ध गतिविधियों में महिलाओं की भागीदारी को सुदृढ़ बनाने के लिये, केन्द्र सरकार द्वारा उचित संरचनात्मक, कार्यात्मक और संस्थागत उपायों द्वारा महिलाओं को सशक्त, क्षमता निर्माण और इनपुट प्रौद्योगिकी तक उनकी पहुँच बढ़ाई जा रही है। कृषि मंत्रालय के अनुसार, केवल वित्तीय वर्ष 2016-17 में ही महिलाओं से सम्बन्धित कम-से-कम 21 तकनीकों का मूल्यांकन किया गया और 2.56 लाख महिलाओं को कृषि सम्बन्धी क्षेत्रों जैसे कि पशु से जुड़े पशुपालन और पोल्ट्री में प्रशिक्षित किया गया।

भारत सरकार ने राज्यों को विधवा, अबला, परित्यक्त और निराश्रित महिलाओं की पहचान करने की सलाह दी है जिन्हें मनरेगा के तहत 100 दिन का रोजगार प्राप्त हो। जब कृषि क्षेत्र और महिला के उत्थान की बात आती है, तो बागवानी की भूमिका को भूलना नहीं चाहिए। ये भारतीय अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बागवानी कृषि गहन श्रमसाध्य क्षेत्र है और इस कारण ये महिला रोजगार के अवसरों को बढ़ाते हैं।

फलों और सब्जियों का इस्तेमाल घरेलू उपभोग के लिये ही नहीं किया जाता है, बल्कि ये विभिन्न उत्पादों- जैसे अचार, संसाधित सॉस, जैम, जेली स्क्वैश आदि के लिये भी जरूरी हैं। वास्तव में, देश के कई राज्यों जैसे- पूर्वी क्षेत्र में सिक्किम, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश सहित हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर उत्तर प्रदेश में ग्रामीण महिलाओं के लिये बागवानी एक प्रमुख व्यवसाय है। राष्ट्रीय-स्तर पर देखें तो 28.2 लाख टन फल और 66 लाख टन सब्जियों के उत्पादन के साथ भारत विश्व में फलों और सब्जियों का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है।

महिला रोजगार और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में यदि देखें तो झारखण्ड राज्य ने महत्त्वपूर्ण उदाहरण पेश किया है। राज्य सरकार ने लीक से हटकर स्थानीय भावनाओं के प्रति संवेदनशीलता दिखाते हुए एक योजना बनाई है जिसके तहत हर गाँव में एक पानी और स्वच्छता समिति शामिल होगी जिसमें अनिवार्य रूप से गाँव की एक महिला सदस्य होगी। समिति के उस विशेष सदस्य को ‘जल सहिया’ (जल मित्र) के रूप में पहचाना जाएगा।

उस समिति में महिला सशक्तिकरण सुनिश्चित करने के लिये, यह भी अनिवार्य किया गया है कि उक्त महिला सदस्य समिति की कोषाध्यक्ष होगी। अधिकारियों के मुताबिक, यह समिति गाँवों में जल आपूर्ति योजनाओं के कार्यान्वयन के लिये जिम्मेदार है। इससे निश्चित रूप से सामुदायिक भागीदारी सुनिश्चित हुई है और बेहतर परिणाम भी सामने आये हैं।

लेखक परिचय


गौरव कुमार

(लेखक राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग, भारत सरकार में कार्यरत हैं।)

ईमेल : gauravkumarsss1@gmail.com

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