जरूरी है जल की निगरानी का सवाल

Submitted by UrbanWater on Sat, 09/17/2016 - 15:31

विश्व जल निगरानी दिवस, 18 सितम्बर पर विशेष



पारम्परिक जलस्रोतों की अनदेखी ने बढ़ाया जल संकटपारम्परिक जलस्रोतों की अनदेखी ने बढ़ाया जल संकटदेश में आज जल की निगरानी और अंकेक्षण प्रणाली की जरूरत महसूस की जा रही है। इसका प्रमुख कारण है कि जल संकट निरन्तर बढ़ता जा रहा है और हम हैं कि इस ओर ध्यान न देकर पानी को न केवल बर्बाद कर रहे हैं बल्कि जो बचा हुआ भी है, उसे अपने स्वार्थ के चलते और प्रदूषित करते चले जा रहे हैं।

देश में सर्वत्र पानी के लिये हाहाकार मचा हुआ है। कहीं पानी के लिये राज्य बरसों से झगड़ रहे हैं, तो कहीं धरने, प्रदर्शन, आगजनी और सत्याग्रह हो रहे हैं, तो कहीं पानी के संकट से जूझते लोग पानी के टैंकरों तक को लूट लेते हैं, तो कहीं पानी के लिये प्रदर्शन कर रहे लोगों पर पुलिस लाठी-डंडे-गोली बरसा रही है।

विचारणीय यह है कि 2030 में जब देश की आबादी का आँकड़ा दो अरब के करीब हो जाएगा, तब क्या होगा? यही वजह है कि वैज्ञानिक, पर्यावरणविद, जल विशेषज्ञ और भूजल विज्ञानी बरसों से चिल्ला रहे हैं कि अब तो चेतो। आजादी के मात्र दस साल बाद ही 1957 में योजना आयोग ने कहा था, देश में 232 गाँव बेपानी हैं। आज यह संख्या दो लाख से ऊपर है। नदियों को लें, देश की किसी भी नदी का जल आज पीने और आचमन करने लायक भी नहीं है।

हमारे यहाँ हर इंसान को मरते समय कंठ में दो बूँद गंगा जल पड़ जाये, यह चाह रहती है। पर आज इसकी पवित्रता पर ही संकट है। हमारे उद्योग और शहर नदियों का उपयोग मैला ढोने वाली मालगाड़ी की तरह कर रहे हैं। स्थिति इतनी खराब है कि प्रदूषण फैलाने वाले उद्योग भी अब प्रदूषित जल का शिकार बन रहे हैं।

पर्यावरणविद बार-बार कहते हैं कि सरकार पहले तो प्रदूषण करने वाले, ‘मैला जल बनाने वाले उद्योगों को बढ़ाती है, फिर मैला हटाने की कार्ययोजना बनाती है।’ इन दोनों कामों में राष्ट्रीय खजाना खाली होता है। कुछ मालामाल होते हैं पर ज्यादातर इससे बेकार, बीमार, कंगाल और लाचार हो जाते हैं। मौजूदा दौर में जल की निगरानी और पर्यावरणीय लेखा द्वारा ही लोगों की जीविका और जमीर का महत्त्व जानकर सरकार को समझाया जा सकता है।

सरकार के हिसाब-किताब में नदी का लुप्त होना और सूखना कितनों का जीवन तबाह करता है; जीवन, जीविका, जमीर को किस तरह से प्रभावित करके व्यवस्था को लाचार बना देता है, आदि-आदि विषयों-मुद्दों को शामिल किया जा सकता है। सच है कि प्राकृतिक संसाधनों की समाप्ति के बाद ही समाधान ढूँढे जाते हैं, उस समय हम पछताते हैं। अभी समय है, जबकि जल प्रदूषण, भूजल शोषण और अतिक्रमण रोकने वाले कानून बनें।

प्राकृतिक संसाधनों के ह्रास का हिसाब-किताब विधानसभा और संसद में रखकर विकास के नाम पर चल रहे नदी-जल विनाश को रुकवाया जाये। दरअसल नदी पारिस्थितिकी के बिगाड़ से प्राकृतिक ह्रास को आँकड़ों में जानना अब जरूरी हो गया है। इसीलिये अब इसका मूल्यांकन, निगरानी और लेखा रूप में खर्च-लाभ का अनुपात समझना अत्यन्त आवश्यक है।

गौरतलब है देश में बाँधों से जितनी बिजली देने का वायदा किया गया था, उसका आधा भी पूरा नहीं हुआ। दूसरी बाँधों पर होने वाले खर्च का जो अन्दाजा लगाया गया था, उससे दस गुणा से ज्यादा खर्च हो गया है लेकिन लाभ आधे से भी कम ही मिला। इसी लाभ ने प्रकृति और पर्यावरण के शुभ को कितनी हानि पहुँचाई, यह गणना अब जरूरी हो गई है।

अब समय आ गया है कि परियोजनाओं में आय-व्यय, प्राप्ति और भुगतान के साथ-साथ ‘शुभ’ को भी शामिल किया जाये। शुभ का अर्थ है; राष्ट्रीय हित में प्राकृतिक संसाधनों की समृद्धि। प्रदूषण से रोगियों की तादाद में बेतहाशा बढ़ोत्तरी भी जल प्रदूषण के खाते में लिखी जाये। नदी की ऊर्जा, सिंचाई, पेयजल पूर्ति, मनरेगा आदि में पर्यावरणीय प्रभाव को महत्त्व दिया जाये। यह केवल सार्थकता की तरह नहीं, इसे प्राकृतिक समृद्धि की गणना वाला प्रपत्र बनाकर प्रस्तुत करना चाहिए।

जिन विकास परियोजनाओं ने देश को तबाह किया है, उन्हें रुकवाना व जन, जल, जंगल, जमीन, जंगली जानवर और जंगलवासियों के जीवन को समृद्ध बनाने का रास्ता सुझाना भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक का अधिकार है। इसीलिये जमीनी हकीकत का पता लगाकर संसद को विकास के नाम पर हो रहे विनाश का अहसास कराना चाहिए। संसद ही प्राकृतिक संसाधनों की समृद्धि का रास्ता निकाल सकेगी। यह रास्ता ग्राम पंचायत, नगर पंचायत, महानगरपालिका, जिला पंचायत, विधानसभा से शुरू किया जा सकता है। भूजल प्रदूषण दूर करने पर कितना समय और शक्ति खर्च होगी, यह भी इन्वायरमेंटल ऑडिट में शामिल किया जाना जरूरी है। इस हेतु भूसांस्कृतिक क्षेत्रों की विविधता का सम्मान करते हुए पर्यावरणीय ऑडिट की मार्गदर्शिका तैयार करनी होगी। अंकेक्षकों के लिये पारिस्थितिकी प्रशिक्षण केवल जानकारी देने वाला ही नहीं, अपितु प्राकृतिक विनाश का अहसास कराने वाला होना चाहिए।

अंकेक्षक को जब प्रकृति के विनाश का अहसास होगा, तभी वह प्रकृति बचाने का मानस बना सकेगा। जब प्रकृति को अंकों से गणना करने पर लाभ-हानि का अहसास होता है और उसे बचाने या सृजन की दिशा में गति बढ़ती है, तभी वास्तविकताओं का आभास होता है।

अब यदि यह प्रक्रिया शुरू नहीं हुई तो हम बेपानी बन जाएँगे। बीमार होकर मरने लगेंगे। ऐसी स्थिति में ही राष्ट्र विनाश का रास्ता पकड़ते हैं। अभी पानी की लड़ाई गाँवों-शहरों, खेतों, उद्योगों, सिंचित व असिंचित क्षेत्रों और नदी के ऊपर-नीचे के राज्यों के बीच चल रही है। अब जल के लिये विश्व युद्ध जैसी परिस्थितियाँ बन रही हैं।

नियंत्रक महालेखा परीक्षक की जिम्मेदारी बहुत अहम होती है। देश को हाानि से बचाना व हमारी गलतियाँ बताना उसकी जिम्मेदारी है। उसके बाद हमारा धर्म है कि हम गलती सुधारते हैं या उसे दबाते हैं।

जिन विकास परियोजनाओं ने देश को तबाह किया है, उन्हें रुकवाना व जन, जल, जंगल, जमीन, जंगली जानवर और जंगलवासियों के जीवन को समृद्ध बनाने का रास्ता सुझाना भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक का अधिकार है। इसीलिये जमीनी हकीकत का पता लगाकर संसद को विकास के नाम पर हो रहे विनाश का अहसास कराना चाहिए। संसद ही प्राकृतिक संसाधनों की समृद्धि का रास्ता निकाल सकेगी।

यह रास्ता ग्राम पंचायत, नगर पंचायत, महानगरपालिका, जिला पंचायत, विधानसभा से शुरू किया जा सकता है। जिस राजनेता, अधिकारी, व्यापारी ने प्रकृति को हानि पहुँचाई है, उसे सीधी सजा भुगतनी पड़े, ऐसा काम अब भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक को शुरू करना चाहिए। इस प्रकार ही प्राकृतिक शोषकों की संख्या कम हो पाएगी।

प्रसन्नता की बात है कि कुछ बरसों से देश के नियंत्रक महालेखापरीक्षक अब विकास के नाम पर हुए प्राकृतिक विनाश का हिसाब लेने लगे हैं।

अभी तक उनके द्वारा रुपए के खर्च का हिसाब रखा जाता था। इससे पहले इसमें राष्ट्रीय समृद्धि बढ़ी या घटी, का आकलन नहीं होता था। सरकार की अभी तक जो भी अच्छी कोशिशें हुई हैं; यानी खर्च से ज्यादा प्रकृति की सृजनात्मकता को बढ़ाने में जिस परियोजना ने मदद की है, उसका ब्यौरा भी अब संसद में प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

आशा की जाती है कि भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक अब राजकीय निधि के आकलन को वित्तीय सूचकांकों तक सीमित नहीं रखेंगे। अब प्राकृतिक, सांस्कृतिक व सामाजिक सूचकांकों के आधार पर भी वे इसे करना चाहेंगे। जरूरत है कि अब नदी विनाश को रोकने वाली पर्यावरणीय लेखा प्रणाली लागू की जाये।

यदि ऐसा होता है तो देश के खजाने की लूट को रोक पाना और पानी की समस्या का भी हल निकल पाना सम्भव हो सकेगा। असल में यह संवेदनशीलता जल संरक्षण, नदी संरक्षण, भूजल संरक्षण व झीलों के संरक्षण के प्रति एक नए युग का सूत्रपात करने वाली होगी। इस कार्य से प्रकृति प्रेमियों को संरक्षण व प्रोत्साहन मिलेगा और समाज का नदियों व जल के प्रति जुड़ाव भी बढ़ेगा।


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