कृषि क्षेत्र भगवान भरोसे

Submitted by UrbanWater on Tue, 04/11/2017 - 10:32
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राष्ट्रीय सहारा (हस्तक्षेप), 8 अप्रैल 2017

पैदावार बढ़ाने के लिये सबसे पहले सिंचाई के साधन विकसित करने पर जोर दिया जाना चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों से लोगों का पलायन रोकने के लिये इन इलाकों में शिक्षा, सड़क, अस्पताल, पेयजल और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएँ मुहैया करानी होंगी। इस स्थिति में जो व्यक्ति स्वेच्छा से खेती करना चाहे तो करे अन्यथा रोजगार का कोई अन्य विकल्प अपना सकता है। किसान व ग्रामीणों का इस तरह से सशक्तीकरण किया जाये जिससे वह अपनी जरूरतें स्वयं पूरी कर सकें और उन्हें किसी के आगे हाथ फैलाने की जरूरत न पड़े। देश की दो तिहाई आबादी की आजीविका खेती-बाड़ी पर निर्भर है। रोजगार की दृष्टि से देखें तो 50 फीसद श्रमबल कृषि क्षेत्र से जुड़ा हुआ है लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि लोकतांत्रिक आधारित दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र के लिये अभी तक कोई राष्ट्रीय नीति नहीं बन पाई है। इस कारण यह क्षेत्र बुरी तरह से पिछड़ता जा रहा है। केन्द्र में अब तक जितनी भी सरकारें बनी हैं उनका पूरा फोकस सिर्फ उद्योग जगत पर ही रहा है।

इस क्षेत्र के लिये हर साल आम बजट में बड़े-बड़े प्रावधान किये जाते हैं। समय-समय पर बड़ी-बड़ी योजनाएँ बनाई जाती हैं। संकट से उबारने के नाम पर सस्ता कर्ज और प्रोत्साहन पैकेज दिये जाते रहे हैं। इस हिसाब से देखें तो कृषि क्षेत्र को सिर्फ भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है जबकि देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में इसका 14 फीसद का महत्त्वपूर्ण योगदान है। यही नहीं, अर्थव्यवस्था की 45 फीसद माँग ग्रामीण क्षेत्र से ही निकलती है जिनकी क्रय शक्ति कृषि से होने वाली आय पर ही निर्भर है।

विदेश व्यापार की बात करें तो कुल निर्यात में कृषि क्षेत्र का 12 फीसद का योगदान है। इसके बावजूद कृषि क्षेत्र के लिये अभी तक कोई व्यापक नीति न बन पाना समझ से परे है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि देश की 82 फीसद कृषि जोत लघु एवं सीमान्त श्रेणी के दायरे में आ गई है। इनमें खेती करना अब लाभकारी नहीं रह गया है। यही नहीं, छोटी जोतों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। कुल मिलाकर देखें तो अब खेती लाभकर कार्य नहीं रहा। केवल इसके बूते किसानों में समृद्धि नहीं लाई जा सकती है। इसके लिये समग्र और समेकित नीति बनाने की जरूरत है।

क्यों है जरूरी


राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के लिये कृषि क्षेत्र पर ध्यान देना जरूरी है। यह मान भी लिया जाये कि देश में पर्याप्त खाद्यान्न का उत्पादन हो रहा है लेकिन आपदा की स्थिति में खाद्यान्न की कमी पड़ने पर गम्भीर परिणाम भुगतने पड़ते हैं। आयात की स्थिति में विदेशी राष्ट्र मजबूरी का खूब फायदा उठाते हैं। ऐसे कई उदाहरण हैं जब किसी राष्ट्र में बाढ़ या सूखा जैसी प्राकृतिक आपदा अथवा युद्ध के दौरान खाद्यान्न आपूर्तिकर्ता देश अपनी जिंसों के भाव अनाप-शनाप बढ़ा देते हैं।

संकट की स्थिति में बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा का इन्तजाम करना आसान काम नहीं होता। वर्ष 1951 से 1966 के दरम्यान अमेरिका से पीएल-480 के तहत खाद्यान्न का आयात होता था। वर्ष 1965 में पाकिस्तान से युद्ध के समय अमेरिका ने यह आपूर्ति बन्द कर दी। देश में वर्ष 1966-67 में भयंकर सूखा भी पड़ा। इससे यहाँ खाने के लाले पड़ गए। इससे सबक लेने के बाद हमारे यहाँ हरित क्रान्ति का सूत्रपात हुआ। इसके बाद क्या है, यह कहने की जरूरत नहीं। इसका परिणाम सबके सामने हैं।

दुनिया में सबसे तेज आर्थिक विकास दर का दावा करने वाले देश में हर साल बड़ी संख्या में किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं। इसकी मूल वजह यह है कि हमारे यहाँ कृषि से जुड़ी जो नीतियाँ हैं वह कारगर नहीं रह गई हैं। किसी भी सरकार ने किसानों से जुड़ी समस्या का ईमानदारी से समाधान करने का प्रयास नहीं किया है। इसके विपरीत किसानों को याचक बनाने की कोशिश की जा रही है।

जो ईमानदार किसान समय पर कर्ज लौटा रहे हैं उन्हें प्रोत्साहन मिलने के बजाय वे अपने आपको ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं जबकि बकायादारों का कर्ज माफ किया जा रहा है। यह काम सभी दल कर रहे हैं। इसके पीछे निश्चित तौर पर राजनीतिक हित छिपे हुए हैं। हकीकत यह है कि यदि कृषि क्षेत्र के लिये व्यापक योजना बनाई जाये तो देश से आसानी से गरीबी को दूर किया जा सकता है।

सिरे नहीं चढ़ी योजना


ऐसा नहीं है कि कृषि के समग्र विकास के लिये प्रयास नहीं किये गए। जब 19 मार्च, 1998 को मैंने वाजपेयी सरकार में कृषि मंत्री पद की शपथ ली थी उसी दिन सबसे पहला आदेश समग्र एवं व्यापक राष्ट्रीय कृषि नीति बनाने के लिये जारी किया था। यह आदेश कृषि मंत्रालय से जुड़े सभी विभागों को जारी किया गया था। इस नीति को अन्तिम रूप देने के लिये तीन महीने का समय दिया गया था लेकिन भारी दबाव के बावजूद विभिन्न विभागों ने नीति के नाम पर सिर्फ एक-दो वाक्यों में ही सुझाव दिये। इसमें नियम कम और उपदेशात्मक रवैया ज्यादा था।

अन्तत: नीति बनाने का काम मैंने खुद ही शुरू किया। इसके लिये 22 पेज का दस्तावेज तैयार किया। इस नीति में सिंचाई परियोजना, राष्ट्रीय कृषि बीमा, फसलों का विपणन, वाजिब न्यूनतम समर्थन मूल्य और मंडी समिति व्यवस्था में सुधार सम्बन्धी बिन्दुओं को प्रमुखता से शामिल किया गया। इसके साथ ही किसानों की आय बढ़ाने के लिये बागवानी और डेयरी विकास के लिये कई प्रावधान किये गए।

कैसे फँसी योजना


इस प्रस्ताव को कैबिनेट के समक्ष भी पेश किया गया जिसे कुछ संशोधनों के लिये वापस भेज दिया गया। इसके बाद वाजपेयी के नेतृत्व वाली यह सरकार गिर गई। उसके बाद जितने भी कृषि मंत्री आये उनमें से किसी ने भी इस प्रस्ताव पर गौर करना ही मुनासिब नहीं समझा। यह फाइल कृषि मंत्रालय में आज भी पड़ी है। इस योजना के सिरे न चढ़ पाने लिये नौकरशाही का ढुलमुल रवैया प्रमुख रूप से जिम्मेदार रहा। इसके बाद हालांकि तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने इस दिशा में कई बार प्रयास किये लेकिन उनकी सरकार भी ज्यादा दिन नहीं चल पाई।

मौजूदा समय में जो कदम उठाए जा रहे हैं उनसे खेती-किसानी का कोई भला नहीं होने वाला। मुझे तो लगता है रानजीतिक दल भी नहीं चाहते हैं कि किसान आत्मनिर्भर बनें। यदि ऐसा हो गया तो फिर कर्ज माफी रूपी लॉलीपाप के जरिए उन्हें वोट कैसे मिल पाएगा। हकीकत यह है कि जो नेतृत्वकर्ता, परिवार, कम्पनी या सरकार व्यवस्था के दोषों के वक्तव्यों को अपनी व्यक्तिगत आलोचना मानता है वह उस संगठन को गर्त में ले जाने का काम करता है। जबकि राजनीतिक दलों और सरकारों का नैतिक दायित्व है कि वह जनहित में काम करें।

कैसी हो नीति


नियंत्रण बाजार में बड़ी तेजी के साथ बदलाव आ रहे हैं। आगे भी समय के साथ चीजें बदलेंगी। यदि कृषि से जुड़ी नीति बनाई जाये तो उसमें इन बदलावों का राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तर समावेश किया जाना चाहिए। मौजूदा परिदृश्य में देखा जाये तो सिर्फ खेती से किसानों का भला नहीं होना वाला। इसके लिये ग्रामीण क्षेत्र में लघु एवं कुटीर उद्योग स्थापित करने होंगे। किसानों की आय बढ़ाने के लिये खाद्य प्रसंस्करण इकाइयाँ दुधारू गाय साबित हो सकती हैं।

पैदावार बढ़ाने के लिये सबसे पहले सिंचाई के साधन विकसित करने पर जोर दिया जाना चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों से लोगों का पलायन रोकने के लिये इन इलाकों में शिक्षा, सड़क, अस्पताल, पेयजल और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएँ मुहैया करानी होंगी। इस स्थिति में जो व्यक्ति स्वेच्छा से खेती करना चाहे तो करे अन्यथा रोजगार का कोई अन्य विकल्प अपना सकता है। किसान व ग्रामीणों का इस तरह से सशक्तीकरण किया जाये जिससे वह अपनी जरूरतें स्वयं पूरी कर सकें और उन्हें किसी के आगे हाथ फैलाने की जरूरत न पड़े। यदि सरकार इस ध्येय के साथ कृषि से जुड़ी नीति बनाए तो इससे किसानों में खुशहाली आ सकती है। इसका फायदा पूरी अर्थव्यवस्था को मिलेगा।

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