सूखे से बेहाल पशु

Submitted by RuralWater on Tue, 06/28/2016 - 16:26
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‘बिन पानी सब सून’ पुस्तिका से साभार, 5 जून 2016

अप्रैल माह के अन्तिम सप्ताह तक हुए इस सर्वेक्षण के अनुसार 56 प्रतिशत गाँवों के लोग पानी और चारे के अभाव में अपने पशुओं को छोड़ने के लिये विवश थे। किन्तु समय के साथ हन गाँवों की संख्या में भी बढ़ोत्तरी होने की आशंका है। क्योंकि जिन गाँवों के लोग हैण्डपम्प और कुओं का पानी पशुओं के लिये उपयोग कर रहे हैं, वहाँ हैण्डपम्प और कुओं के बन्द होने के साथ ही पशुओं के पानी की समस्या उत्पन्न हो जाएगी और उन्हें भी अपने मवेश छोड़ने के लिये विवश होना पड़ेगा।

बुन्देलखण्ड में सूखे से पशुओं का जीवन भी मुश्किल हो गया है और लोग उन्हें छोड़ने के लिये विवश हैं। प्रस्तुत अध्ययन में सामनेआये तथ्यों से यह बात साफतौर पर सामने आती है। बुन्देलखण्ड क्षेत्र के लोग पशुओं की दो मलभूत जरूरतों को पूरा करने कीस्थिति में नहीं है- एक पीने के पानी और दूसरी चारा। यदि हम सर्वेक्षित गाँवों में पीने के पानी की स्थिति का आकलन करें तो पाते हैं कि 56 प्रतिशत गाँवों में पशुओं के पीने के लिये पानी उपलब्ध नहीं है।

इन गाँवों के लोग पशुओं को खुला छोड़ चुके हैं। वे कहीं भी जाएँ, चारा-पानी मिले तो ठीक अन्यथा प्यास और भूखा से प्राण त्याग दें। जब खुद के लिये ही पानी नहीं है तो पशुओं के लिये कहाँ से लाएँ।

स्पष्ट है कि इंसान की आजीविका में पशुओं की भूमिका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होती हैं। इस दशा में एक और उन्हें अपने पशुओं की भूख-प्यास देखी नहीं जाती, दूसरी ओर वे आजीविका के इस महत्त्वपूर्ण साधन को खोने की स्थिति में हैं।

पशुओं के पीने के पानी की सबसे ज्यादा समस्या सागर जिले में देखी गई। यहाँ सर्वेक्षित गाँवों में से 93 प्रतिशत गाँवों में पशुओं के पीने के लिये पानी उपलब्ध नहीं है। जबकि छतरपुर जिले के 47 प्रतिशत और टीकमगढ़ जिले के 45 प्रतिशत गाँवों में पशुओं के लिये पीने का पानी उपलब्ध नहीं है।

सर्वेक्षित जिन 44 प्रतिशत गाँवों में पशुओं के लिये कुछ पानी उपलब्ध है, उनमें से ज्यादातर गाँवों में लोग हैण्डपम्प के समीप बने गड्ढों में निकास का पानी पशुओं को पिलाने के लिये उपयोग करते हैं। 79 प्रतिशत गाँवों के पशु इसी पानी पर निर्भर हैं। किन्तु जलस्तर नीचे चले जाने से कई हैण्डपम्प या तो बहुत कम चलते हैं या बन्द होने की स्थिति में हैं, इस दशा में इन गाँवों में पशुओं के लिये पानी का संकट पैदा होने लगा है। अध्ययन के दौरान 7 प्रतिशत गाँव ऐसे पाये गए, जहाँ लोग अपने पशुओं को पानी पिलाने के लिये दूर कुएँ से पानी लाते हैं या कुएँ पर पशुओं को ले जाकर उसमें से पानी निकालकर पिलाते हैं। इस तरह वे बहुत मेहनत से पशुओं को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। 3 प्रतिशत गाँवों में तालाबों में बचा पानी पशुओं के पीने के काम आ रहा है, वहीं नदी-नालों के समीप बसे 10 प्रतिशत गाँव के पशुओं के लिये वहाँ पानी उपलब्ध है।

यह स्पष्ट है कि अप्रैल माह के अन्तिम सप्ताह तक हुए इस सर्वेक्षण के अनुसार 56 प्रतिशत गाँवों के लोग पानी और चारे के अभाव में अपने पशुओं को छोड़ने के लिये विवश थे। किन्तु समय के साथ हन गाँवों की संख्या में भी बढ़ोत्तरी होने की आशंका है। क्योंकि जिन गाँवों के लोग हैण्डपम्प और कुओं का पानी पशुओं के लिये उपयोग कर रहे हैं, वहाँ हैण्डपम्प और कुओं के बन्द होने के साथ ही पशुओं के पानी की समस्या उत्पन्न हो जाएगी और उन्हें भी अपने मवेश छोड़ने के लिये विवश होना पड़ेगा।

सर्वेक्षित 66 गाँवों में से जिन 37 (56 प्रतिशत) गाँवों में पशुओं के लिये पानी उपलब्ध नहीं है, वहाँ लोगों ने 12804 पशुओं को खुला छोड़ दिया है, जो वहाँ मौजूद कुल पशुओं का 91 प्रतिशत है। यदि हम पशुओं को खुला छोड़ने की स्थिति का आकलन कों तो सर्वेक्षित तीनों जिलों में स्थिति बेहद गम्भीर है। छतरपुर जिले के सर्वेक्षित गाँवों में 4500 पशुओं में से 4105 यानी 91 प्रतिशत पशु खुले छोड़ दिये गए है, वहीं सागर जिले के सर्वेक्षित गाँवों में मौजूद 2500 पशुओं में से 2015 पशु और टीकमगढ़ जिले के सर्वेक्षित गाँवों के कुल 7000 पशुओं में से 6674 पशु खुले छोड़ दिये गए हैं। ये पशु पानी और चारे की तलाश में भटक रहे हैं और प्यास तथा भूख के कारण अपने प्राण त्याग रहे हैं।

 

सर्वेक्षित गाँवों में पशुओं की स्थिति

जिला

सर्वेक्षित गाँवों की संख्या

गाँवों की संख्या जहाँ से पशु छोड़े गए

इन गाँवों में कुल पशुओं की संख्या

छोड़े गए पशुओं की संख्या

छोड़े गए पशुओं का प्रतिशत

छतरपुर

32

15

4500

4105

91 प्रतिशत

सागर

14

13

2500

2025

81 प्रतिशत

टीकमगढ़

20

09

7000

6674

95 प्रतिशत

कुल

66

37

14000

12804

91 प्रतिशत

 

पलायन की ओर बुन्देलखण्ड


सूखे की परिस्थिति में बुन्देलखण्ड के लोगों के सामने रोजगार और भरण पोषण की समस्या महत्त्वपूर्ण रूप से सामने आई हैं। गाँव में रोजगार के कोई साधन नहीं हैं। मनरेगा का क्रियान्वयन भी इतना बेहतर नहीं है कि लोगों की बेरोजगारी की समस्या हल कर सकें। लोग दिल्ली, अहमदाबाद, भोपाल, आदि शहरों में रोजगार तलाश रहे हैं।

प्रस्तुत अध्ययन में पलायन की इस स्थिति का आकलन करने पर हम पाते हैं कि सर्वेक्षित गाँवों में कुल मिलाकर 55 प्रतिशत आबादी पलायन पर है।

अध्ययन में यह पाया गया कि सर्वेक्षित गाँवों में पलायन पर गए कुल मिलाकर 19746 लोगों में महिलाओं की संख्या 8833 है। यानी जनवरी 2016 से लेकर अब तक सर्वेक्षित गाँवों से पलायन पर गए लोगों में 45 प्रतिशत महिलाएँ और 55 प्रतिशत पुरूष हैं। खास बात यह है कि बड़ी संख्या में बच्चे और बुजुर्ग भी पलायन पर हैं।

अध्ययन में यह पाया गया कि पलायन पर गए कुल लोगों में 15 प्रतिशत आबादी 0 से 5 वर्ष आयु समूह के बच्चों की है। स्पष्ट है कि 45प्रतिशत महिलाओं के पलायन पर होने से पलायन करने वाले बच्चों की संख्या में भी बढ़ोत्तरी हुई। पलायन पर बच्चों को साथ ले जाने वाली महिलाओं के लिये वहाँ के सुविधाजनक आवास, स्वच्छ पेयजल के अभाव तथा पोषण, स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में अपने बच्चों का पालन पोषण करना पड़ रहा है।

पलायन करने वाली 17 प्रतिशत आबादी 6 से 17 वर्ष के बच्चों और किशोर-किशोरियों की है। इस तरह हम देखते हैं कि बुन्देलखण्ड से पलायन करने वालों में बच्चों यानी अवयस्कों की संख्या 32 प्रतिशत है। यानी जिस आयु समूह को पोषण और शिक्षा की सर्वाधिक जरूरत है, वह बड़ी संख्या में पलायन पर है। बुन्देलखण्ड के अकाल और पलायन का यह सबसे चिन्ताजनक पहलू है। पलायन करने वाले लोगों का आयु के अनुसार आकलन करने पर हम पाते हैं कि पलायनग्रस्त लोगों में 18 से 40 वर्ष आयु समूह के लोगों की संख्या सबसे ज्यादा 43 प्रतिशत है। जबकि 41 से 60 वर्ण आयु समूह के लोगों की संख्या 24 प्रतिशत और 1 प्रतिशत लोग 60 वर्ष से अधिक उम्र के हैं।

बुन्देलखण्ड के पलायन से सरकार भी अच्छी तरह वाकिफ है। केन्द्रीय मंत्रीमंडल की आन्तरिक समिति ने प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजी एक रिपोर्ट में बुन्देलखण्ड से हो रहे पलायन पर चिन्ता जाहिर की गई। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि बुन्देलखण्ड से बड़ी संख्या में लोग पलायन कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार टीकमगढ़ जिले से 579371 लोग पलायन कर चुके हैं, जबकि छतरपुर से 766809 लोग, सागर से 849148, पन्ना से 256270 तथा दतिया से 270277 लोग पलायन पर जा चुके हैं। इस तरह आज पलायन बुन्देलखण्ड के जीवन का एक जरूरी हिस्सा बन गया है, जिसे बदलने के लिये सघन और ठोस उपायों की जरूरत है।

पलायन की पीड़ा और बंधुआ मजदूरी
सूखे के चलते पलायन की पीड़ा कितनी तकलीफदेह होती है, यह धर्मपुरा गाँव के माखनलाल की कहानी से जानी जा सकती है। छतरपुर जिले की बक्स्वाहा ब्लाक के इस गाँव की जनसंख्या लगभग 1200 है। जिनमें 40 परिवार दलित समुदाय के, 15 आदिवासी और 66 अन्य पिछड़ा वर्ग के हैं। यहाँ के माखनलाल बताते हैं कि “मेरे परिवार में कुल 9 सदस्य हैं, जिसमें हम पति, पत्नी और 7 बच्चे हैं। मेरे पास किसी प्रकार की कोई जमीन नहीं है, मात्र एक पुश्तैनी झोपड़ी है। रोजगार के लिये केवल कृषि आधारित मजदूरी है, जो कि फसल के मौसम में ही मिलती है। गाँव में मजदूरी 20-25 दिन के लिये मिलती है, जिसमें 120-150 रुपए मजदूरी (प्रतिदिन) मिलती है। मेरे पास गरीबी रेखा का कार्ड है, जिससे मेरे परिवार को 40 किलोग्राम अनाज प्रतिमाह प्राप्त होता है।

पिछले साल हमारे गाँव में सूखे की समस्या ने एक विकराल रूप धारण किया और गाँव में खरीफ और रबी की फसल न होने के कारण मुझे और मेरे परिवार को कृषि आधारित मजदूरी भी प्राप्त नहीं हुई। मेरे अलावा गाँव में अन्य 20 परिवार भी थे, जिनकी हालत मेरी तरह ही थी। हमने आपस में चर्चा कर रोजगार की तलाश में गाँव से बाहर जाने का फैसला किया।

जून 2015 में 46 लोग अपने बच्चों के साथ दिल्ली गए, जिसमें 29 लोग काम करने वाले थे, जिनकी उम्र 18-43 वर्ष के बीच थी। हम दिल्ली में एक व्यक्ति से मिले, जिसे लोग जमींदार बिल्डर के नाम से जानते थे। उसे हम पहले से नहीं जानते थे। उसने हमें रोहतक, हरियाणा में अल्वालिया कंशट्रक्शन कम्पनी में मजदूरों की आवश्यकता के बारे में बताया और क्या हम काम करना चाहेंगे के बारे में पूछा। हम सभी लोग काम के लिये तैयार हो गए, जिसमें 9 लोग मिस्त्री का काम करेंगे और इनको 350 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से वेतन दिया जाएगा और 19 लोग मजदूरी का काम करेंगे, जिन्हें 250 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से वेतन दिया जाएगा, यह तय हुआ। हम सभी लोगों ने 8 जून 2015 से काम शुरू किया और तीन माह तक काम किया। कार्य करने का प्रतिदिन 8 घंटे तय किया गया था, लेकिन वास्तविक रूप से सुबह 8 से रात 12 बजे (लगभग 16 घंटे) तक काम कराया गया। हम सभी का कुल वेतन 7,11,000 हुआ लेकिन तीन माह में सभी मजदूरों को मात्र 70 हजार रुपए दिये गए। 10 सितम्बर 2015 तक सभी ने काम किया था। हमने अपने वेतन का भुगतान करने की बात कही तो जमींदार बिल्डर ने कहा कि आप लोगों को दस दिन तक रुकना पड़ेगा। उसके बाद आप लोगों को आपका भुगतान किया जाएगा। हम सभी लोग बिना काम के 10 दिन तक वेतन भुगतान का इन्तजार करते रहे, किन्तु दस दिन बाद भी हमारा वेतन नहीं मिला। हम सभी लोग बुरी तरह वहाँ फँस गए थे और निकलने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। इसी बीच मेरी बेटी भवानी को पीलिया हो गया और उसकी हालत बिगड़ने लगी। हम सभी लोगों ने यहाँ से बाहर निकलने का सोचा। मैं और मेरा एक साथी दोनों ने बीमारी का बहाना करके गेटपास बनवाया और वहाँ से बाहर निकलकर दिल्ली पहुँचे। एक आटो चालक ने हमारी मदद की और एक गैर सरकारी संगठन ने रोहतक एसडीएम के पास भेजा। रोहतक एसडीएम ने हमारी मदद की और पुलिस के साथ कम्पनी साइट पर गए और सभी मजदूरों से बात की और सभी के बयान दर्ज किये। सभी को बस द्वारा दिल्ली पहुँचाया गया और सरकारी विभागों से मदद की उम्मीद में चक्कर लगाने लगे। लेकिन किसी ने हमारी मदद नहीं की, गैरसरकारी संगठन की मदद से हम सभी वहाँ से छुटे और सभी मजदूरों ने गाँव वापस आने का फैसला किया। मैंने (माखन लाल) लेबरकोर्ट, चंड़ीगढ़ जाने का फैसला किया। लेबरकोर्ट, चंडीगढ़ में दिसम्बर 2015 में हमारा में हमारा केस दर्ज हुआ, 4 सुनवाई के बाद मार्च 2016 में 4 लाख का चेक प्राप्त हुआ है। परन्तु हमारी मजदूरी का अनुमान 7 लाख 11 हजार थे। इसमें प्रत्येक मिस्त्री को 19 हजार व प्रत्येक मजदूर को 14 हजार का चेक प्राप्त हुआ है।



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