अपने देश में भी केपटाउन सम्भव है

Submitted by Hindi on Sat, 03/17/2018 - 17:37
Source
सर्वोदय प्रेस सर्विस, मार्च 2018

जलसंकट को लेकर दुनिया भर की हालत चिन्ताजनक है। दक्षिण अफ्रीका में एक लम्बे समय से बारिश नहीं हो रही है। इस वजह से केपटाउन को जल-आपूर्ति करने वाले संसाधन नेशलन मंडेलाबेे पर बने बाँध में लगभग तीस फीसदी से भी कुछ कम पानी ही अब शेष रह गया है। तमाम जल-आपूर्ति की पाबन्दियों के बावजूद उक्त बाँध तीन-चार माह में पूरी तरह से खाली हो जाएगा, अगर ऐसा हुआ तो हमारे देखते केपटाउन दुनिया का एकमात्र ऐसा पहला महानगर होगा, जिसके पास दैनिक उपयोग और प्यास बुझाने तक का दो बूँद पानी नहीं होगा। भारत की स्थितियाँ भी कोई कम दयनीय नहीं है। देश के अधिकतर कुओं, तालाबों, बाँधों ने पिछले दो दशक में तेजी से पानी खोया है।

दक्षिण अफ्रीका की राजधानी केपटाउन इस समय भीषण जल संकट से जूझ रहा है। हालात इतने भयानक हो चुके हैं कि यहाँ पानी का संकट अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया है। वैसे तो दक्षिण अफ्रीका का यह खूबसूरत शहर पिछले एक दशक से पानी की किल्लत भोग रहा है और समय रहते इसके समाधान हेतु कुछ भी नहीं किया जा सका। केपटाउन इस समय भयंकर सूखे की चपेट में है। तकरीबन एक पखवाड़े पहले तक प्रति व्यक्ति जहाँ 87 लीटर पानी जैसे-तैसे उपलब्ध करता जा रहा था, वहीं अब यह आपूर्ति प्रति व्यक्ति मात्र 25 लीटर पर सिमट गई है। हैरानी नहीं होना चाहिए कि जल-संकुचन के कारण पैदा हुआ जल-संकट केपटाउन में जल-दंगों की शक्ल ले ले क्योंकि जल-दंगों की आर्थिक से निपटने के लिये सरकार ने सेना और पुलिस को तैयार रहने का जारी आदेश भी दे दिया है।

केपटाउन में तरह-तरह की पाबन्दियाँ आजकल सामान्य हैं। वहाँ कम-से-कम पानी में ज्यादा-से-ज्यादा नहाना धोना निपटा लेना पड़ता है। दुनिया का कोई खूबसूरत शहर सूखे की वजह से सुर्खियों में आ जाये यह दिलचस्प हो सकता है किन्तु उससे कहीं अधिक यह खबर भयावह भी हैं। केपटाउन में घरेलू आपूर्ति लायक भी पानी शेष नहीं है। दरअसल केपटाउन दुनिया के नक्शे में उस स्थान पर स्थित है, जहाँ अटलांटिक और हिन्दमहासागर आपस में मिलते हैं। लेकिन यह पानी अत्यधिक खारा होने की वजह से पीने लायक नहीं हैं और दैनिक उपयोग के योग्य तो बिल्कुल भी नहीं। जिस पानी को यहाँ उपयोग के काबिल बनाया जाता है उसकी बेहद कमी हो गई है। फिर डीसेलीनेशन (गैर-लवणीकृत) टेक्निक बहुत महंगी भी है।

विश्व बैंक के अनुसार डीसेलीनेशन तकनीक से मिलने वाले पानी की लागत तकरीबन 55 रुपया प्रति लीटर आती है। विश्व का एक फीसदी पेयजल इसी प्रक्रिया से उपलब्ध हो रहा है। सऊदी अरब जहाँ नदी व झील न के बराबर है, डीसेलीनेटेड वाटर का दुनिया में सबसे बड़ा स्रोत है। ये संसाधन (प्लांट) शहरों में इस्तेमाल होने वाला 70 फीसदी पानी उपलब्ध करवाते हैं साथ ही उद्योग धंधों में इस्तेमाल होने लायक जल की आपूर्ति भी करते हैं। सऊदी अरब, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन उन देशों में शामिल हैं जो डीसेलीनेटेड वाटर का इस्तेमाल करते हैं।

दुनिया के तकरीबन 120 देशों में समुद्री पानी को पीने योग्य बनाने वाली तकरीबन सत्रह हजार डीसेलीनेशन वॉटर प्लांट लगे हैं और करीब-करीब बीस करोड़ लोग इन्हीं प्लांट का बना पानी पी रहे हैं। सऊदी अरब एक्वीफर्स प्रक्रिया के जरिए जमीन के नीचे जल संग्रहण करके इस तकनीक का इस्तेमाल करता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक जाहिर हुआ है कि वर्ष 2050 तक चीन और भारत भी जल संकट से जूझा रहे होंगे तब समुद्री खारे पानी को पीने योग्य बनाना ही एकमात्र विकल्प होगा। भारत में भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर ने भी डीसेलीनेशन तकनीक विकसित की है जिससे समुद्री पानी को पीने योग्य बनाया जा सकता है। इस तरह के कई प्लांट्स पंजाब, पश्चिम बंगाल और राजस्थान में काम कर रहे हैं। भाभा के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित की गई इस तकनीक से प्रतिदिन 63 लाख लीटर पानी पीने योग्य बनाया जा सकता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2030 तक दुनिया के तकरीबन चार अरब लोग पेयजल में परिवर्तित समुद्री खारा पानी इस्तेमाल करने लगेंगे।

पिछले दिनों भारत पहुँचे इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भारत को गल मोबाइल, नामक जो एक डीसेलीनेशन कार भेंट में दी थी, वह प्रतिदिन बीस हजार लीटर समुद्री खारा पानी पीने योग्य बनाती है। इस गल मोबाइल डीसेलीनेशन कार का इस्तेमाल कच्छा केरण में तैनात बीएसएफ के जवान करेंगे। यह कार नब्बे किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से दौड़ सकती है, जिसका स्व-ऊर्जा स्रोत होता है।

दुनिया की चालीस फीसदी आबादी समुद्री किनारों पर बसती है। जबकि दुनिया के दस में से एक व्यक्ति को पीने का साफ पानी उपलब्ध नहीं होता है। यहाँ तक कि बाजार में बिकने वाली बोतलबन्द मिनरल वॉटर भी सौ फीसदी स्वच्छ शुद्ध नहीं है। भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा तय किये चालीस से अधिक मानकों में से यहाँ कई नदारद है जिनसे कई तरह की परेशनियाँ पैदा होती हैं।

यहाँ यह जान लेना बेहद जरूरी हो जाता है कि बोतलबन्द पानी बेचने वाली कम्पनियों के उत्पादन भी भारतीय मानक ब्यूरो की अनिवार्य प्रमाणनता के अन्तर्गत आते हैं। अभी उपभोक्ता मंत्रालय के मुताबिक वित्त वर्ष 2017-18 के दौरान बी आई एस (भारतीय मानक ब्यूरों) ने पानी बेचने वाली पच्चीस कम्पनियों पर छापेमारी करते हुए जो नमूने एकत्रित किये थे, उनमें से ज्यादातर खरे नहीं रहे। कम-से-कम ग्यारह मामलों में अदालती फैसलों के बाद इस कम्पनियों पर कार्रवाई की गई और कम्पनियों से भारी जुर्माना भी वसूल किया गया। तात्पर्य यही है कि पानी अमूल्य है और पीने का पानी तो अद्वितीय है। पानी बचाना बेहद जरूरी है। पानी बचेगा तो जीवन बचेगा और जीवन बचेगा तो मनुष्य बचेगा। इसीलिये कहा गया है कि तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिये ही होगा। इसका सबसे ताजा उदाहरण दक्षिण अफ्रीका की राजधानी केपटाउन है, जहाँ जल संकट से पैदा होने वाले जल-दंगों के लिये पुलिस और सेना को सतर्क कर दिया गया है।

जल संकट को लेकर दुनिया भर की हालत चिन्ताजनक है। दक्षिण अफ्रीका में एक लम्बे समय से बारिश नहीं हो रही है। इस वजह से केपटाउन को जल-आपूर्ति करने वाले संसाधन बेहद खराब स्थिति में पहुँच गए हैं। इस शहर को जल-आपूर्ति करने वाले नेशनल मंडेलाबे पर बने बाँध में लगभग तीस फीसदी से भी कुछ कम पानी ही अब शेष रह गया है और मौसम वैज्ञानिकों का आकलन है कि हाल फिलहाल यहाँ बारिश होने की कोई सम्भावना नहीं है। प्रबल आशंका बनी हुई है कि जल-आपूर्ति की तमाम पाबन्दियों के बावजूद उक्त बाँध तीन-चार माह में पूरी तरह से खाली हो जाएगा, अगर ऐसा हुआ तो हमारे देखते केपटाउन दुनिया का एकमात्र ऐसा पहला महानगर होगा, जिसके पास दैनिक उपयोग और प्यास बुझाने तक का दो बूँद पानी नहीं होगा।

केपटाउन की तरह सम्पूर्ण संयुक्त अरब अमीरात भी विकराल जल-संकट की चपेट में आ गया है। यहाँ जल-संकट से निपटने के लिये जो योजना बनाई गई है। वह बेहद ही अजीबो गरीब है। यहाँ अंटार्कटिका से समुद्र के रास्ते एक हिमखंड खींचकर लाने की कोशिश की जा रही है। हिमखण्ड को खींचकर लाने की जिम्मेदारी एक निजी कम्पनी का सौंपी जा रही है। इस योजना के तहत 8,800 किलोमीटर दूर यह हिमखण्ड यहाँ पहुँचेगा फिर उसके टुकड़े तोड़-तोड़कर संग्रह किये जाएँगे। अनुमान लगाया जा रहा है कि यह हिमखण्ड लगातार पाँच बरस तक यूएई के लोगों की प्यास बुझाएगा। संयुक्त अरब अमीरात की इस अजीबो गरीब योजना से यह अन्दाज लगाना कठिन होता जा रहा है।

माना कि शेष दुनिया में जल संकट की समस्या भले ही अभी इतनी विकराल नहीं हो किन्तु दुनिया की एक बड़ी आबादी पानी की विकरालता से परेशान तो हो रही है। एक आकलन के अनुसार दुनिया की एक अरब से अधिक आबादी को आज भी पीने का साफ पानी नहीं मिलता है जबकि तीन अरब लोग कम-से-कम एक महीना तो पानी की कमी का सामना करते ही हैं। खबरें बता रही हैं कि वर्ष 2025 तक दुनिया की दो तिहाई आबादी जलसंकट की गिरफ्त में आ जाएगी।

भारत की स्थितियाँ भी कोई कम दयनीय नहीं हैं। देश के अधिकतर कुओं, तालाबों बाँधों ने पिछले दो दशक में तेजी से पानी खोया है। दो दशक पूर्व तक जहाँ पानी 2530 फीट जमीन के नीचे पानी उपलब्ध था वहाँ वह 200-300 फीट तक नीचे उतर चुका है। कहीं-कहीं तो इस गहराई ने भी साथ छोड़ दिया है। देश की लगभग तीन सौ नदियाँ खतरे की सूचना दे चुकी हैं। हिमालय से निकलने वाली साठ फीसदी जलधाराएँ सूखने के कगार पर हैं जिनमें गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी बड़ी नदियाँ शामिल हैं। वर्ष 2016 में देश के नौ राज्यों के तकरीबन पैंतीस करोड़ लोग जल संकट से प्रभावित हुए थे। आशंका है कि भारत में भी केपटाउन जैसे हालात हो सकते हैं।

Disqus Comment

More From Author

Related Articles (Topic wise)

Related Articles (District wise)

About the author

नया ताजा