भारत में जल संरक्षण परम्पराएँ

भारतीय वाङ्मय सबसे ज्यादा चर्चित इंद्र हैं। क्या यह महज संयोग है कि इंद्र को वर्षा का देवता भी माना गया है? साहित्य से लेकर परम्पराओं तक भारतीय मनीषियों ने जल और जीवन के तारतम्य को बखूबी समझा और समझाया है। हड़प्पा काल से लेकर मुगल काल तक जल को संग्रहित करने और उसके बेहतर उपयोग के लिये एक से बढ़कर एक तरकीबें विकसित की गई और इनमें से अनेक अब भी हमारे बीच मौजूद है

.भारतीय साहित्य से लेकर समाज में व्याप्त परम्पराओं तक जल की महत्ता को समझकर उसके संरक्षण के लिये बहुविध प्रयास किये जाते रहे। ये शिक्षाएँ व ये प्रयास आज भी प्रासंगिक हैं। प्रस्तुत आलेख में ऐसे ही प्रसंगों का उल्लेख किया जा रहा है।

प्राचीन साहित्य में जल


“मायो मौष घीहि ऊं सीर्घाम्नोः घाम्नो राजस्त्तो वरूण नो मुंच।” -यजुर्वेद 6/22

अर्थात हे राजन, आप अपने राज्य के स्थानों में जल और वनस्पतियों को हानि न पहुँचाओ, ऐसा उद्यम करो जिससे हम सभी को जल एवं वनस्पतियाँ सत्त रूप से प्राप्त होती रहे।

उपरोक्त मंत्र ऐसे अनेक मंत्रों में एक है जिनमें जल संरक्षण एवं जल की महत्ता की बात की गई है। प्राचीन भारतीय सभ्यता में ‘जल ही जीवन है’ का सिद्धांत प्रतिपादित किया गया। वैदिक साहित्य में जल स्रोतों, जल के महत्व, उसकी गुणवत्ता एवं संरक्षण की बात बारबार की गई है। जल के औषधीय गुणों की चर्चा आयुर्वेद (जो एक वेदांग है) के अतिरिक्त ऋग्वेद एवं अथर्ववेद में भी मिलती है। यह माना गया है कि हमारा शरीर पंच महाभूतों अर्थात पंचतत्वों से बना है जिसमें एक तत्व जल भी है। ऋग्वेद का नदी सूक्त नदियों के संरक्षण एवं संवर्धन की कामना का संदेश देते हैं।

अथर्ववेद में कहा गया है यज्ञाग्नि से धूम बनता है, धूम से बादल बनते हैं एवं बादलों से वर्षा होती है। इन्द्र वृत्त आख्यान भी जल के महत्व एवं संरक्षण को प्रतिपादित करता है। इन्द्र, वर्षाजल को बाधित करने वाले दैत्य बाम्बियों पर आधारित है। इसे द्राकाजल कहते हैं। पारिस्थितिकी विज्ञान के आधार पर हम जानते हैं कि कुछ पेड़ों की उपस्थिति वहाँ भूगर्भीय जल होने की संभावना को निरूपित करती है। छान्दोग्य उपनिषद में कहा गया है जल ही जीवन का मूल है। बिना जल के जीवन की कल्पना नहीं हो सकती।

आचार्य भृगु ने शिल्प संहिता को तीन हिस्सों में विभाजित किया है धातु खंड, साधन खंड एवं वास्तु खंड। कृषि, जल एवं खनिज पदार्थों को धातु खंड में रखा गया है। द्रव्य पदार्थों की व्याख्या जल समूह से प्रारंभ होती है। उदाहरणार्थ समुद्रम (समुद्री जल की व्याख्या करते हुए कहा गया है कि अन्य सभी प्रकार के जल को समुद्री जल कहते हैं, इसका उपयोग अस्वयुग (सितम्बर-अक्टूबर) के अतिरिक्त किसी और समय पर नहीं हो सकता।

जल का वर्गीकरण आचार्य वाग्भट्ट ने किया है, वर्षाजल, प्रदूषित जल, समुद्री जल, गर्म जल एवं नारियल पानी। प्राचीन समय में जल को तालाब एवं झीलों में इकट्ठा किया जाता है। जल की उपलब्धता के लिये कुएँ खोदे जाते थे। महान आयुर्वेदाचार्य सुरपाल ने लिखा है- दस कुएँ एक तालाब के बराबर, दस तालाब एक झील के बारे में दस झीलें एक पुत्र के एवं दस पुत्र एक पेड़ के बराबर हैं।

भारत में जल संरक्षण का एक बेहतरीन इतिहास है। यहाँ जल संरक्षण की एक मूल्यवान पारंपरिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परंपरा है उदाहरण स्वरूप नदी, खादिन, तालाब, जोहड़, कुँआ इत्यादि देश के अलग-अलग हिस्सों में इनमें से अलग-अलग तरीकों को अपनाया गया जो वहाँ के जलवायु के उपयुक्त है।

प्राचीन साहित्य में कई स्थानों पर वर्षाजल एवं उसकी भविष्यवाणी की चर्चा भी आती है। ऋग्वेद में रीता (एक प्रकार का पवित्र दैवीय नियम) की चर्चा आती है जो आवश्यक वर्षा की उपलब्धता से सम्बन्धित है।

कृषि पाराशर (चौथी शताब्दी ईसापूर्व) में वर्षाजल एवं वर्षा प्रणाली की व्याख्या की गई है। यहाँ तक कि वर्षाजल संग्रहण के लिये खेतों में छोटे बाँध बनाने की चर्चा भी है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में जल प्रबंधन की विस्तृत चर्चा है। इसमें वर्षा मापन के लिये द्रोण नामक यंत्र की चर्चा भी है। जल की उपलब्धता के अनुसार कृषि योग्य भूमि को दो प्रकार में विभाजित किया है। देव मात्रिका (वह क्षेत्र जो पूर्णतः वर्षाजल पर निर्भर है) एवं अदेवमात्रिका (जिसके लिये जल के अन्य स्रोतों जैसे नदी, तालाब, कुएँ के साथ-साथ वर्षाजल भी उपलब्ध हों) जल संग्रहण के लिये सहोदक सेतु एवं अहारणोदक सेतु बनाने का भी जिक्र है अर्थात बाँध बनाने का जल संरक्षण कार्यों में नए वास स्थानों पर विशेष रूप से जनता की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करने की बात की गई है। उसमें जलस्रोतों पर कर लगाने एवं जिन स्थितियों में कर माफी हो सकती है इसका भी जिक्र है जैसे नये जलस्रोत से जल पर पाँच वर्ष तक छूट रहेगी मरम्मत किये गये स्रोत पर चार वर्ष तक कर में छूट मिलेगी इत्यादि।

सुश्रुत संहिता का 45वें अध्याय पेयजल पर है। उन्होंने जल को दो प्रकार में विभाजित किया है गंगा (शुद्ध) एवं समुद्र (अशुद्ध) गंगा को पुनः 4 (चार) प्रकारों में विगत किया गया है धारा, कश, तौशारा (इकट्ठा किया गया वर्षाजल) एवं हैमा (हिग संवत) उपरोक्त उदाहरणों के आधार पर हम कह सकते हैं कि प्राचीन साहित्य में जल की महत्ता को ध्यान में रखते हुए उसे देवता का दर्जा मिला है (आपो देवता) साथ ही उसके स्रोत संरक्षण के तरीकों एवं उसके शुद्धीकरण की भी चर्चा है।

तालिका 1 : भारत के विभिन्न हिस्सों में विभिन्न प्रकार के पारंपरिक जल संरक्षण संरचनाओं की सूची

जैव भौ. क्षेत्र

संरचना

व्याख्या

राज्य/क्षेत्र

परा-हिमालय

जिंग

बर्फ से जल इकट्ठा करने का टैंक

लद्दाख

पश्चिमी हिमालय

कुल

पर्वतीय क्षेत्रों में जल के नाले

जम्मू, हिमाचल

नौला

छोटे तालाब

उत्तरांचल

कुह्ल

प्राकृतिक धाराओं से सिंचाई का बाँध

हिमाचल प्रदेश

खत्रि

पत्थरों को कुरेद कर बनाए गए टैंक

हिमाचल प्रदेश

पूर्वी हिमालय

अपतानी

सीढ़ीनुमा क्षेत्र जहाँ पानी के आने और निकलने के रास्ते होते हैं।

अरुणाचल प्रदेश

उत्तर पूर्वी हिमालय

आबो

रन ऑफ (बहते पानी का संग्रहण)

नागालैंड

कियो-ओ-निही

नदियों से नहर

नागालैंड

बाँस बूँद सिंचाई

बाँस की नलियों के द्वारा धाराओं से जल लाकर ड्रिपइरिगेशन

मेघालय

ब्रह्मपुत्र घाटी

डोंग

तालाब

असम

डूंग/झंपोस

धान के खेतों एवं छोटे सिंचाई नहर धारा को जोड़ने वाले

प. बंगाल

गंगा सिंधु मैदान

आहर-पइन

कैचमेन्ट बेसिन में बाँध एवं नाले/नहरें बनाना

द. बिहार

जलप्लावन (इनुनडेरान) नहरे

प. बंगाल

दिघी

छोटे चौकोर या गोल जलाशय जिन्हें नदी से भरा जाता था।

दिल्ली एवं आसपास

बावली

सीढ़ीदार कुएँ

दिल्ली-आसपास

आर

कुण्डा/कुण्डी

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