कुदरती खेती करेगा तो किसान मजदूर नहीं बनेगा

पंजाब में इस समय नए रचनात्मक कृषि सृजन का शंखनाद हो चुका है। खेती विरासत मिशन रासायनिक कृषि के बुरे नजीते भुगत रहे पंजाब के किसानों को नया विचार, नया जीवन व नया संसार देने के लिए प्रयासरत है। पिछले ढाई वर्षों में यह आंदोलन तेजी से कामयाबी की ओर बढ़ा है। शुरू-शुरू में इस आंदोलन के विचार को गए जमाने की बात बता कर इस पर हंसने वाले भी अब इसकी ताकत को समझने व स्वीकारने लगे हैं। यह उस महान व्यक्ति की अतिविशेष कार्यशैली के कारण संभव हुआ है, जिसके लिए त्याग की मूर्ति जैसी उपमा छोटी पड़ जाती है। श्री उमेन्द्र दत्त के काफिले में पंजाब के साधारण लोग ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य विषेशज्ञ, पर्यावरण प्रेमी, साहित्यकार और संगीतकार भी जुड़ चुके हैं।

‘खेती विरासत मिशन’ पंजाब के स्वास्थ्य, पर्यावरण और कृषि को रासायनिक कृषि से हो रहे नुकसानों के खिलाफ आंदोलन चला रहा है। कीटनाशकों के इस्तेमाल से पर्यावरण और स्वास्थ्य को हो रहे नुकसान के बावजूद रासायनिक कीटनाशकों के प्रयोग की सिफारिशें करने के कारण खेती विरासत मिशन के विचारों की सीधी टक्कर पंजाब कृषि विश्वविद्यालय से है। सरकारी घालमेल को नंगा करने के लिए खेती विरासत मिशन के प्रयासों के चलते कीटनाशक उद्योग की आंख में भी यह संस्था खटक रही है। इसके हौसले पस्त करने के लिए उन्होंने इसे कई बार अदालती चक्र में फंसाने का प्रयास भी किया है। लेकिन इससे उमेंद्र दत्त व उनके साथियों के हौसले पस्त नहीं हुए।

खेती विरासत मिशन पंजाब में उसी कुदरती खेती को फिर से स्थापित करने का यत्न कर रहा है जिसमें शुद्ध स्वदेशी ज्ञान, तकनीक और बीज इस्तेमाल हों। जिससे किसान का सम्मान बढ़े, उसका आत्मविश्वास जगे और खेती से उसे जीवन का उल्लास मिले। मिशन का मानना है कि किसान से बड़ा कृषि माहिर और कोई नहीं हो सकता। मिशन के किसानों से बड़ी प्रयोगशाला और क्या हो सकती है। इन किसानों के खेत सभी की खुशी और आनंद की प्रयोगशालाएं हैं एवं इन सबमें केवल मनुष्य ही नहीं धरती के समस्त जीव भी आते हैं। यह दिल की गहराई से निकली कृषि है, हम इसे आध्यात्मिक कृषि कहते हैं, कुदरती कृषि, अहिंसक कृषि या केवल नानक कृषि का नाम दे सकते हैं। यहां किसान अपनी फसलों के साथ साथ पक्षियों, तितलियों, केंचुओं एवं अनेकों प्रजातियों का भी ध्यान रखते हैं। इन किसानों के लिए लिए यह प्राणी भी उनके परिवार के सदस्य हैं।

‘खेती विरासत मिशन’ कुदरती खेती, कुदरती संसाधनों और पुश्तैनी ज्ञान के संरक्षण को समर्पित एक लहर है। कुदरती खेती करते किसान, खेती विरासत मिशन एवं इस की वातावरण पंचायतों के जरिए आपस में जुडे हुए हैं। इसमें से कईयों ने एकदम अपनी सारी जमीन पर कुदरती खेती शुरू कर दी है। जबकि अन्य ने धीरे-धीरे कुदरती खेती की ओर बढ़ने का निर्णय लिया है। किसानों ने कामयाबी से कुदरती खेती अपनाकर सिद्ध कर दिया है कि महंगे एवं जहरीले रसायनों पर आधारित कृषि, किसानों, आम लोगों, देश व कुदरत के साथ एक कोरा मजाक है जिसे तुरंत बंद करना चाहिए।

भटिंडा जिला के गांव महिता के कुदरती खेती किसान हरतेज सिंह गर्व से कहते हैं, ‘देखो केचुओं की गोलियां, जो पहले गायब हो गई थीं फिर से खेत में भर गई हैं।’ वह आगे कहते हैं, ‘हमारे खेत की मिट्टी को मुट्ठी में भरकर देखो-इसकी नरमी को, इसकी महक को, इसके भीतर पल रही अनंत जिंदगी को देखो, यह है काम जो हम कर रहे हैं।’

खेती विरासत मिशन के किसान जीवामृत एवं गाढ़े जीवामृत का इस्तेमाल करते हैं। जीवामृत देसी गाय के गोबर एवं मूत्र से बनाया जाता है। इसके इस्तेमाल से सूक्ष्म जीव तेजी से क्रियाशील हो जाते हैं। केंचुए जैसे अनेक अन्य जीव भी क्रियाशील हो जाते हैं। इनके बढ़ने से पक्षी एकत्र होने लगते हैं। गांव चैना के चरनजीत सिंह पूनी जीवामृत के गुण का बखान करते हुए कहते हैं, ‘जीवामृत डालने से धरती खुराकी तत्वों से भरपूर होने लगती है।’ चरनजीत सिंह पूनी जहां खुद सफल कुदरती खेती कर रहे हैं वहीं वह पूरे पंजाब में शिविर लगाकर सैंकड़ों अन्य किसानों को ट्रेनिंग भी दे रहे हैं।

खेती विरासत मिशन के किसानों ने धरती से मां-बेटे का रिश्ता फिर से जोड़ लिया है। उन्होंने इंसान के धरती के साथ आध्यात्मिक एकाकार को फिर से स्थापित किया है। यही कारण है कि वह कृषि में किसी भी जहरीले रसायन डालने व खेतों में आग लगाने को पाप समझते हैं। वह इन गतिविधियों को धरती के विरुद्ध हिंसा मानते हैं। वह अक्सर कहते हैं कि मां का दूध पीते हैं खून नहीं।

कुदरती खेती कर रहे किसानों से आम तौर पर यह सवाल पूछा जाता है, ‘क्या यह आर्थिक रूप से लाभदायक है?’ उत्तर होता है हां। धरती संबंधी यह रूहानी विज्ञान, किसानों के लिए आर्थिक तौर पर भी लाभप्रद सिद्ध हो रहा है। गांव दबड़ीखाना के सफल किसान अमरजीत ढिल्लों बताते हैं, ‘कुदरती खेती सस्ती है। इसमें खर्च बहुत कम है, न कोई कर्ज, न ब्याज और न ही मंहगी खादें, कीटनाशक दवाएं या बीज।’ उदाहरण के तौर पर गन्ना एवं चना बोने वाले अधिकांश किसानों का खर्च लगभग न के बराबर था। वह अनेकों किसानों का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि रसायनों पर आधारित कृषि में 3000 रूपए प्रति एकड़ के मुकाबले कुदरती खेती में खर्च मात्र 100-200 रूपए प्रति एकड़ ही आया। उनका कहना है, ‘हमारे अधिकांश किसानों ने यूरिया, डीएपी एवं कीटनाशको पर खर्च करना बिलकुल ही बंद कर दिया है, हजारों अन्य किसानों ने यह खर्च कम कर दिया है।’ मालवा क्षेत्र में नरमा बोने वाले किसान, साल में 7000 रूपए प्रति एकड़ रसायनों पर खर्च करते हैं।

कुदरती किसान इस धन को गांव से बाहर जाने से रोकना चाहते हैं। मोगा के गांव ढुडीके के किसान चमकौर सिंह के अनुसार यह किसानों की स्वदेशी लहर है। ढुडीके को लाला लाजपत राय व अन्य गदरी नेताओं की जन्म भूमि होने का सम्मान हासिल है। यहां के किसान इन रसायनों को बनाने व बेचने वाली बहुराष्ट्रीय एवं बड़ी कंपनियों की और सेवा करने को तैयार नहीं हैं। वे पंजाब की कृषि में स्वदेशी आंदोलन चलाने की तैयारी कर रहे हैं। किसान बहिष्कार करने व स्वदेशी आंदोलन चलाने के नारे को वर्तमान हालातों के मुताबिक ढालकर किसानी की आजादी का आंदोलन चलाएंगे। इसी आंदोलन के तहत ही खेती विरासत मिशन ने नारा दिया है -’बहुराष्ट्रीय कंपनियां हमारे खेत छोड़ो।’

खेती विरासत मिशन महसूस करता है कि आज के युग की फौरी जरूरत है कि स्वदेशी आंदोलन के सिद्धांत पर खेती आंदोलन चलाकर भारतीय कृषि को आजाद करवाया जाए और भारतीय किसानों को पश्चिमी देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों के तथाकथित विकास माडल से मुक्त करवाया जाए। कृषि का यह पश्चिमी माडल हमारी प्राचीन संस्कृति, वैदिक कृषि उसूलों, पर्यावरण एवं कुदरत का विरोधी है। बहुराष्ट्रीय कंपनियो की गुलामी से निकलने के लिए यह संस्था बीज बैंक (कुदरती खेती विरासत केंद्र) स्थापित कर रही है। कुदरती किसानों ने एक दूसरे से बीजों का लेनदेन शुरू कर दिया है। यहां स्थाई बीज बैंक स्थापित होने के बाद किसानों को बढ़िया बीज बिना किसी लूट के मिल सकेगा।

कुदरती खेती के इस आंदोलन से किसानों की सोच में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन आया है। अब किसान खेती करने लिए न तो कृषि विश्वविद्यालय और न ही कृषि विभाग के विशेषज्ञों की सलाह का मोहताज है। डा. हरमिंदर सिंह सिद्धू एक होम्योपैथिक डाक्टर होने के साथ-साथ रायकोट के गांव जलालदीवाल के कुदरती किसान भी हैं। उनका कहना है, ‘हमारा प्रत्येक किसान अपने आप में विशेषज्ञ है। वह कुदरती खेती के विज्ञान को समझता है और उसी के मुताबिक कार्य करता है। जरूरत पड़ने पर वह अपने साथी किसानो से सीखता है। वह प्रतिदिन कुदरती कृषि में विचरता है। उसके रोम-रोम में कुदरती कृषि बसती है।’ खेती विरासत मिशन पूरे पंजाब एवं साथ लगने वाले अन्य क्षेत्रों के किसानों को अपने साथ जोड़ रहा है। भगत पूर्ण सिंह द्वारा स्थापित पिंगलवाड़ा सोसायटी, अमृतसर की सम्मानजनक समाज सेवी संस्था है। इस संस्था ने कुदरती खेती आंदोलन को अपना पूरा समर्थन दिया है। संस्था ने गांव धीरकोट (जंडियालागुरु) में अपना 37 एकड़ का फार्म पूर्ण रूप से कुदरती खेती को समर्पित कर दिया है। सुलतानपुर लोधी के जानेमाने संत बाबा बलबीर सिंह सींचेवाल, जिन्होंने कारसेवा के माध्यम से काली बेई को पुनर्जीवित करने का महान कार्य किया है, वह भी खुले तौर पर कुदरती खेती आंदोलन में शामिल हैं। अब वह अपने धार्मिक कार्यक्रमों में कुदरती खेती का खुलकर प्रचार कर रहे हैं तथा उसे अमली रूप में लागू करवा रहे हैं। इसी तरह बहुत सारे पेशेवर लोग भी इस आंदोलन से जुड़ गए हैं।

अब खेती विरासत मिशन अपनी शक्तियो को केंद्रित करके पूरे के पूरे गांव को कुदरती खेती में लाकर एक माडल खड़ा करने की ओर अग्रसर है। फरीदकोट के गांव चैना एवं दबड़ीखाना इस दिशा में पहले चुने गए गांव हैं। इसके अलावा खेती विरासत मिशन पंजाब के गिरते जलस्तर, बिगड़ते स्वास्थ्य को लेकर भी चिंतित है। इन मामलों पर भी मिशन बराबर ध्यान दे रहा है। दोनों मामलों को लेकर संवाद शुरू है।
 

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