नीति तय करने का समय

पंजाब जैसे राज्य अभी हर खरीद पर 14.5 प्रतिशत से ज्यादा का मंडी शुल्क वसूलते हैं। इस प्रकार एफसीआई को 12,000-13,000 करोड़ रुपए इस मद पर देने पड़ जाते हैं। इस राशि का करीब 60 प्रतिशत हिस्सा पंजाब और हरियाणा के पास जाता है। अगर ऐसा न हो तो एफसीआई उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे अन्य राज्यों में ज्यादा खरीद कर सकता है। किसानों को उनके कृषि रकबे के आधार पर नियत भुगतान करने का तरीका अपनाया जा सकता है, लेकिन उसने इस दिशा में अभी तक पहल नहीं की है। किसानों की कर्ज माफी के पक्ष में तर्क रखने वालों का पूछना भी बनता है कि उद्योगपतियों के मामले में कर्ज माफी ठीक है, तो किसानों के लिये क्यों नहीं। यह तर्क सटीक लगता है कि जब उद्योग के ऋणों का नवीनीकरण नैतिक रूप से संकट का सबब नहीं माना जाता तो कृषि के लिये यह समस्या क्यों होनी चाहिए। सच तो यह है कि खेती के मामले में बैंकों को कोई खतरे जैसी बात भी नहीं है। औद्योगिक ऋण के बरक्स तो कतई नहीं क्योंकि कृषि ऋण की उत्तर प्रदेश सरकार के जरिए वसूली हो रही है। कोई भी प्रयास उद्योगपतियों के लिये एक अवसर सरीखा रहा।

हालांकि उसमें भी एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अगर इसे ऋण फँसाए बैंक/या ऐसे ही जरिए से किया जाता है, तो कम्पनियों के प्रवर्तक अपनी कम्पनियों से पूरी तरह हाथ धो बैठेंगे। अगर ऐसा नहीं भी होता है, तो भी बैंकों के पास उनके शेयरों का बड़ा हिस्सा पहुँच जाएगा। जहाँ तक कृषि ऋणों की बात है तो भूमि रकबे को कब्जे में लेने का प्रश्न ही नहीं।

अब यह योगी आदित्यनाथ सरकार पर है कि वह कैसे सुनिश्चित करेगी कि ऋण माफी के चलते वित्त-पोषण के तौर-तरीके ही पटरी से न उतर पाएँ। सवाल मौजूं है कि ऋण-मुक्ति से किसानों के हालात कैसे बेहतर होते हैं। यकीनन ऋण भुगतान के दबाव फौरी तौर पर कम होंगे लेकिन अगर किसानों को उनकी उपज गेहूँ/चावल या दूध या गन्ने के वाजिब दाम नहीं मिलते तो वे फिर से संकट की गिरफ्त में आ जाएँगे। इसलिये आदित्यनाथ के पास अपनी नीतियों को तत्काल चुस्त-दुरुस्त करने के सिवा कोई विकल्प नहीं है। उन्होंने भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) सरीखी आठ मिलियन टन गेहूँ की तत्काल खरीदी की घोषणा कर दी है। यह कैसे सम्भव होगा? देखा जाना है, लेकिन ऐसा सम्भव हुआ तो किसानों को उनकी 37-38 मिलियन टन गेहूँ/चावल की उपज के लिये वाजिब दाम दिलाना सम्भव हो सकेगा।

गेहूँ खरीदी के सामने समस्या


लेकिन अगर एफसीआई को इतना गेहूँ उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों से खरीदना पड़े तो उसे पंजाब, हरियाणा और आन्ध्र प्रदेश जैसे राज्यों में खरीद को कम रखना होगा। अभी एफसीआई जो 55-60 मिलियन टन की खरीद करता है, उसमें करीब 60 प्रतिशत हिस्सा इन तीन राज्यों से ही आता है। इसलिये अगर मुख्यमंत्री ज्यादा खरीद चाहते हैं, तो वह कितनी ज्यादा होगी, यह केन्द्र सरकार पर निर्भर करता है। अगर एफसीआई उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों और पूर्वी प्रान्तों से अधिक खरीद करता है, तो पंजाब जैसे राज्यों पर निर्भरता को कम कर सकता है।

पंजाब जैसे राज्य अभी हर खरीद पर 14.5 प्रतिशत से ज्यादा का मंडी शुल्क वसूलते हैं। इस प्रकार एफसीआई को 12,000-13,000 करोड़ रुपए इस मद पर देने पड़ जाते हैं। इस राशि का करीब 60 प्रतिशत हिस्सा पंजाब और हरियाणा के पास जाता है। अगर ऐसा न हो तो एफसीआई उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे अन्य राज्यों में ज्यादा खरीद कर सकता है।

किसानों को उनके कृषि रकबे के आधार पर नियत भुगतान करने का तरीका अपनाया जा सकता है, लेकिन उसने इस दिशा में अभी तक पहल नहीं की है। जैसे कि तमाम आदानों पर सब्सिडी को डीबीटी के माध्यम से दिया जाये लेकिन सूचनाएँ मिल रही हैं कि डीबीटी के जरिए होने वाले अन्य भुगतान भी ठप हैं। पूरी तरह मुक्त निर्यात बाजार, वायदा आयोग का बड़े स्तर पर उपयोग और सशक्त खुदरा बाजार किसानों की आय में स्थिरता के लिये बेहद आवश्यक हैं। इस दिशा में खाद्य मंत्रालय के कड़े प्रयासों से सफलता की उम्मीद की जा सकती है।

डेयरी उद्योग के महत्त्व को देखते हुए यह एक और क्षेत्र है, जिस पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। जहाँ गुजरात में 49 प्रतिशत दूध का प्रसंस्करण होता है, वहीं उत्तर प्रदेश में यह आँकड़ा अभी तक मात्र 12 प्रतिशत पर ठिठका हुआ है।

किसानों की आमदनी में इजाफे के लिये जरूरी है कि अमूल की भाँति सहकारिताएँ राज्य में स्थापित की जाएँ। सहकारिताओं के कारण ही गुजरात में गायों की संख्या कमोबेश भैंसों की संख्या जितनी ही बनी रही है (गायों की संख्या जहाँ 2003 में 7.4 मिलियन से बढ़कर 10 मिलियन हो गई वहीं भैंसों की संख्या इस अवधि में 7.1 मिलियन से बढ़कर 10.4 मिलियन हो गई)। लेकिन उत्तर प्रदेश में ऐसा नहीं है (गायों की संख्या में इस अवधि के दौरान 18.6 से बढ़कर 19.6 मिलियन तक का मामूली इजाफा हुआ जबकि भैंसों की संख्या 5.2 मिलियन से बढ़कर 30.6 मिलियन हो गई)।

नर पशुओं के अनुपात में तेजी से गिरावट-(गायों और भैंसों, दोनों में)-मजबूत मांस उद्योग को बयाँ करने वाला आँकड़ा है। हालांकि सच यह है कि गुजराती किसान कुल गायों में बैलों के 32 प्रतिशत हिस्से की अच्छे से देखभाल करते हैं, वहीं उत्तर प्रदेश के किसान (जहाँ बैलों का हिस्सा 25 प्रतिशत है) ऐसा नहीं कर पाते। दोनों राज्यों में नर भैंसों का अनुपात मादा भैंसों की तुलना में नीचा है, इसका अर्थ यह है कि या तो उन्हें मार दिया जाता है, या इधर-उधर घूमने को खुला छोड़ दिया जाता है।

जहाँ तक चीनी का मामला है, अगर राज्य सरकार पहल करते हुए किसानों को गन्ने के भुगतान की गरज से चीनी मिलों को ऋण देती है, तो यह मौसमी-राहत होगी। मिलों को त्रुटिपूर्ण नीति का शिकार होना पड़ रहा है। चूँकि उन्हें बढ़े-चढ़े दामों पर गन्ना खरीद को बाध्य किया जाता है, इसलिये बकाया भुगतान की समस्या फिर से सिर उठा लेगी। रंगनाथन कमेटी की सिफारिशों के रूप में रास्ता हमारे सामने है। अब यह आदित्यनाथ पर है कि इन सिफारिशों को कितनी तत्परता से लागू कराते हैं। अगर ऐसा नहीं हो सका तो कर्ज माफी योजना बेमानी साबित हो सकती है।

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