पानी का शहर बेपानी
हम क्यों भूल जाते हैं कि उत्तराखंड सिर्फ ऊर्जा प्रदेश के नाम पर उजड़ने के लिए ही नहीं है। अभी उसमें बहुत ताकत है और वो ताकत है, उसके पहाड़ व जल श्रोत।

गर्मी के साथ दिल्ली में महंगाई बढ़ी और पानी थोड़ा और दूर हो गया। बस्तियों में मारामारी कॉलोनियों में भी हाय तौबा। पिछले साल पूर्वी दिल्ली में पानी पर घमासान हुआ। ये सब जायज है चूंकि दिल्ली की जीवनरेखा यमुना हो सकती थी पर उसके बारे में चर्चा भी खतरनाक है।

किन्तु पानी के पेट में पानी ना हो तो जरूर जानकर आश्चर्य होता है। उत्तराखंड में नदी किनारे के लोग क्यों प्यासे हैं? क्यों पानी की परियोजनाओं के लिए नई टिहरी में लोग भूख हड़ताल पर बैठते है? माना की पर्वतीय ग्रामीण क्षेत्रों मे पेयजल परियोजनाओं के लिये 1.53 अरब रुपये की मंजूरी केन्द्र से उत्तराखंड को मिली है। मामला तो ये है कि अभी तक टिहरी बांध से 300 क्यूसेक दिल्ली को और 200 क्यूसेक पश्चिमी उत्तर प्रदेश को मिलता है पर उसी बांध से उजड़े लोगो को पानी नहीं, क्यों? मिड डे मील योजना के लिए बच्चे पानी भर रहे हैं, पढ़ेंगे कब? पिछले वर्ष राज्य सरकार ने टिहरी, रुद्रप्रयाग, पौड़ी व अल्मोड़ा आदि को पानी की कमी का जिला घोषित किया गया था।

देहरादून, हरिद्वार और उधमसिंहनगर में गिरते जल स्तर पर अध्ययन किया जा रहा है। विश्व बैंक ने भी उत्तराखंड में स्वजल परियोजना के लिए करोड़ों का कर्जा दे रखा है। छोटे-छोटे गैर सरकारी संगठन, ग्राम प्रधानों के साथ मिलकर इसे कार्यरूप दे रहे हैं। काम भी वैसे ही हो रहा है।

प्रश्न यह है कि पहाड़ प्यासा क्यों है? उत्तराखंड में एक कहावत है पहाड़ की जवानी और पानी पहाड़ के काम नहीं आती। दोनो हीं मैदान में जाते हैं। रोजगार के लिए जवानी मैदान में पलायन करती है। पानी नदी से नीचे बह जाता है। पर्यटन का ढोल पीटा तो पानी के लिए तंगी।

बांध बनाए तो भी बिजली-पानी नीचे ही भेजा। पहाड़ और भी ज्यादा प्यासा हो गया। भागीरथी नदी पर मनेरी भाली बांध की सुरंग के ऊपर व पास के गांवों का पानी सूखा। अलकनंदा पर विष्णुगाड बांध से लामबगड़ से लेकर गोविंदघाट तक के गांवों का पानी सूखा। ऐसे अनेकों उदाहरण है। 1300 किलोमीटर से ज्यादा लम्बाई मे सुरंगे प्रस्तावित है। टिहरी बांध झील से निकट के गांवो को पानी लेने का अधिकार नही है। ऐसे में पहाड़ की प्यास कैसे कम होगी? अभी तो ये 1.53 अरब रुपए विभिन्न पेयजल परियोजनाओं की निर्माण के लिए मिले हैं, उससे लोगों को आस बंधी है। पर कैसे संभव है कि एक तरफ जंगल काटते जाओ, डूबाते जाओ, खेती की जमीन जो सात प्रतिशत रह गई है, उसे भी बांध के कार्यों व अन्य निर्माण कार्यों, होटल, चैड़ी सड़को में खत्म किया जा रहा है। तो पानी के खेत यानि जंगल तो खत्म! फिर भले ही पैसा लाने के लिए आप कितनी ही हैण्डपंप या नदी से पानी लाने के लिए पेयजल परियोजना लाओ पर पहाड़ की प्यास इससे बुझने वाली नहीं है।

हम क्यों भूल जाते हैं कि उत्तराखंड के सिर्फ ऊर्जा प्रदेश के नाम पर उजड़ने के लिए ही नहीं है। अभी उसमें बहुत ताकत है और वो ताकत हैं, उसके पहाड़ व प्रत्येक जल स्त्रोत। प्रसिद्ध पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणाजी ने नारा दिया था।

‘धार ऐंच पाणी, ढाल पर डाला, बिजली बणांवा खाला-खाला’। यानि की नदियों का पानी पहाड़ो की चोटियों पर ले जाओ और पहाड़ी ढलानो पर पेड़ लगाओ तब हर पानी के स्त्रोत से बिजली बनाओं। इस नारे का कार्यरूप ये हो सकता है कि जहां से नदियां निकलती है वहीं से छोटी नहरों से पानी पास के क्षेत्रों में ले जाया जाए। जिससे पानी को नीचे से उपर ले जाने की समस्या काफी हद तक निबट जाएगी। पीने के पानी सहित खेतों को भी पानी मिलेगा। पहाड़ो की ढलानों पर चौड़े पत्तीवाले पेड़ो सहित मिश्रित जंगल लगाए जाए। जिससे पेड़ो की जड़े मिट्टी को बांधेगी तो भूस्खलन तो रुकेगा ही साथ पानी भी रुकेगा और हरियाली से वर्षा में भी अंतर आएगा। भूजल स्तर भी बढ़ेगा। जब गाड गदेरों में पानी लगातार होगा तो हर जगह आप बिजली बना सकते हैं।

इन चारों कार्ययोजनाओं का आपस में गहरा संबंध है। एक दूसरे से जुड़ी है और अनेक समस्याओं का समाधान इनमें छुपा है। पर अपनाए कौन? चूंकि ये समस्याओं का स्थायी समाधान है। पलायन रोकने के से लेकर स्थायी समृद्धि का हल इसमें है। जब तक घर के प्यासे को पानी नहीं पिला पाएगें तबतक दिल्ली-उत्तर प्रदेश को पानी देनेवाले दाता बनने का गर्व कैसा?

(लेखक माटू नाम के जनसंगठन से जुड़े हैं)

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