पीपल्याहाना तालाब मुक्त, अब नहीं बनेगी इमारत
पीपल्याहाना तालाब

पीपल्याहाना तालाब का नीला पानी हवा के झोकों के साथ हिलोरें लेकर अपनी खुशी का इजहार कर रहा है। इस पर मँडराते खतरे के बादल अब छँटने लगे हैं। स्थानीय लोगों ने जुलाई 16 में 6 दिनों तक जल सत्याग्रह किया था। इसमें 61 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता और शहर के पर्यावरण की लगातार लड़ाई लड़ने वाले किशोर कोडवानी सहित सैकड़ों लोगों ने भागीदारी की। धीरे-धीरे यह एक बड़े जन आन्दोलन में बदल गया और कांग्रेस व भाजपा सहित सभी राजनीतिक दलों के नेता इससे जुड़े और उन्होंने दलगत भावनाओं से ऊपर उठकर तालाब को बचाने में सहयोग किया। पीपल्याहाना तालाब को आखिरकार बचा लिया गया है और इन्दौर के लोगों के आन्दोलन की बड़ी जीत हुई है। यहाँ के पीपल्याहाना तालाब की जमीन पर प्रशासन ने कोर्ट भवन बनाने को मंजूरी दे दी थी और तालाब के एक हिस्से को पाटने की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी थी लेकिन शहर के लोगों ने बीते साल जुलाई में इसका विरोध किया और बड़ा आन्दोलन खड़ा किया।

आश्वासन के बाद आन्दोलन स्थगित कर दिया गया था। इस पर अब कहीं जाकर प्रशासन ने तालाब की जमीन को मुक्त करने तथा कोर्ट की इमारत अन्यत्र बनाए जाने का प्रस्ताव कलेक्टर ने सरकार को भेजा है। इससे साफ है कि इन्दौर के लोगों ने अपना तालाब जीत लिया है।

मध्य प्रदेश के इन्दौर में सौ साल पुराने पीपल्याहाना तालाब को बचाने की जनता की साझा मुहिम काफी हद तक सफल होती नजर आ रही है। अब जिला कलेक्टर पी नरहरि ने मध्य प्रदेश सरकार को इस आशय का प्रस्ताव भेजा है, जिसमें जिला कोर्ट की इमारत के लिये पीपल्याहाना तालाब की जमीन के बदले कृषि महाविद्यालय की जमीन पर निर्माण होगा और तालाब की जमीन मुक्त कर दी जाएगी।

अब तालाब की जमीन पर बगीचा भी बनाया जाएगा। इससे पहले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी इस बात का एलान किया था कि पीपल्याहाना तालाब की जमीन पर नया कोर्ट भवन नहीं बनाया जाएगा। मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद जल सत्याग्रह निरस्त कर दिया गया था।

पीपल्याहाना तालाबअब पीपल्याहाना तालाब का नीला पानी हवा के झोकों के साथ हिलोरें लेकर अपनी खुशी का इजहार कर रहा है। इस पर मँडराते खतरे के बादल अब छँटने लगे हैं। स्थानीय लोगों ने जुलाई 16 में 6 दिनों तक जल सत्याग्रह किया था। इसमें 61 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता और शहर के पर्यावरण की लगातार लड़ाई लड़ने वाले किशोर कोडवानी सहित सैकड़ों लोगों ने भागीदारी की। धीरे-धीरे यह एक बड़े जन आन्दोलन में बदल गया और कांग्रेस व भाजपा सहित सभी राजनीतिक दलों के नेता इससे जुड़े और उन्होंने दलगत भावनाओं से ऊपर उठकर तालाब को बचाने में सहयोग किया।

इन्दौर के लोग इस बात से खासे नाराज थे कि एक तरफ सरकारें बारिश के पानी को इकट्ठा करने और उसे जमीन में रिसाने के लिये करोड़ों रुपए खर्च कर तकनीकों का सहारा ले रही है, वहीं दूसरी ओर शहर के रियासतकालीन करीब सौ साल पुराने इस तालाब को जमीन के लालच में नष्ट किया जा रहा है। यह तालाब लोगों की स्मृतियों से भी जुड़ा था।

भावनात्मक जुड़ाव और गर्मियों में पानी के लिये तरसने वाले इस शहर के बाशिन्दों को लगा कि पानी बचाने की इस साझा विरासत को हमें खत्म होने से बचाना है। इसकी शुरुआत एक बुजुर्ग किशोर कोडवानी और उनके चन्द साथियों ने की, लेकिन पानी के मोल को पहचानते हुए धीरे-धीरे यह एक बड़े आन्दोलन में बदल गया। हजारों लोग तालाब बचाने के लिये जल सत्याग्रह में बारिश के बावजूद इकट्ठा होने लगा तो सरकार ने अब यह कदम उठाया है।

उधर इस मामले में इन्दौर कलेक्टर पी नरहरि कहते हैं- "अब जिला कोर्ट के नए भवन के लिये कृषि कॉलेज की 20 एकड़ जमीन आवंटित करने का प्रस्ताव जिला प्रशासन ने मध्य प्रदेश सरकार को भेज दिया है। इसी के साथ पीपल्याहाना तालाब की जमीन को पूर्ण रूप से मुक्त करने सम्बन्धी प्रस्ताव भी शासन को भेजा गया है।"

अब नए प्रस्ताव के मुताबिक पीपल्याहाना तालाब को नए ढंग से सँवारा भी जाएगा। जमीन मुक्त होने सम्बन्धी आदेश आने के बाद इन्दौर नगर निगम और जिला प्रशासन तालाब के आसपास तालाब को संरक्षित करने के लिये बगीचा और जल संरक्षण तकनीकों के साथ इसका सौन्दर्यीकरण करेंगे। बगीचे को इन्दौर के ही प्रतिष्ठित रीजनल पार्क की तरह से विकसित किये जाने की कार्य योजना पर फिलहाल काम चल रहा है। जल्दी ही कागजी कार्यवाही भी पूरी हो जाएगी। इसके लिये नगर निगम पहले ही जिला प्रशासन को एक पत्र भेजकर पीपल्याहाना तालाब उसे सौंपने का प्रस्ताव भेज चुका है।

प्रशासनिक अधिकारी इस बात से पूरी तरह आश्वस्त है कि मध्य प्रदेश शासन भी जिला प्रशासन के तालाब की जमीन मुक्त कर कृषि कॉलेज की 20 एकड़ जमीन आवंटित करने के प्रस्ताव पर जल्दी ही मुहर लगा देगा। इस बारे में मुख्यमंत्री सहित प्रदेश के वरिष्ठ मंत्री पहले ही तालाब बचाने के पक्ष में नजर आये थे। मुख्यमंत्री खुद इन्दौर की जनता को इस बात की आश्वस्ति दे भी चुके हैं।

आन्दोलन के दौरान प्रदेश सरकार ने पीपल्याहाना तालाब की जमीन पर कोर्ट भवन नहीं बनाए जाने से हाथ खींचते हुए इसके लिये वैकल्पिक स्थान तय करने के लिये एक समिति का गठन किया था। समिति ने आसपास स्थान देखे और तालाब से थोड़ी ही दूरी पर स्थित कृषि कॉलेज की भूमि का चयन किया। जिला प्रशासन ने भू राजस्व संहिता के प्रावधानों के मुताबिक अब जमीन की अदला-बदली का नियम उल्लेखित करते हुए कोर्ट भवन निर्माण हेतु पीपल्याहाना तालाब की जमीन को वापस कर कृषि महाविद्यालय की जमीन को आवंटित करने का प्रस्ताव बनाया है।

किशोर कोडवानीकृषि कालेज के सर्वे नम्बर 260 में से आंशिक जमीन कोर्ट भवन निर्माण में लेने के लिये 10 जनवरी को दावे आपत्ति आमंत्रित की थी। 25 जनवरी तक नियत अवधि में प्रशासन को इससे जुड़ी करीब 1300 दावे-आपत्ति और सुझाव मिले थे। प्रशासन ने इनका निराकरण मात्र 10 दिनों में करके कृषि कॉलेज की जमीन पर कोर्ट भवन निर्माण को उचित माना और इस आशय का प्रस्ताव भी मध्य प्रदेश सरकार को बनाकर भेज दिया है। इससे पहले नवम्बर 16 में भी भोपाल में प्रदेश के मुख्य सचिव की अध्यक्षता में इस बाबत हुई बैठक में भी इसे सैद्धान्तिक तरीके से स्वीकार कर लिया गया था।

कोडवानी ने बताया कि 2009 से उनकी कानूनी लड़ाई चल रही है। 18 मार्च 2016 को एनजीटी ने निर्माण कार्यों में निर्देशों के पालन की बात कही। लेकिन निर्माण एजेंसी के ठेकेदार ने इनकी अवहेलना की और रातोंरात ठेकेदार के लोगों ने बीच तालाब में सड़क बनाना शुरू कर दी है तो उनके पैरों के नीचे से धरती खिसक गई।

कुछ समय के लिये उन्हें लगा कि वे धनबल के खिलाफ इस लड़ाई में हारते जा रहे हैं, उनकी आँखें भीग गईं पर दूसरे ही पल विचार आया कि उनके साथ सच है और प्रकृति भी तो क्यों न लड़ाई जारी रखी जाये। उन्होंने इस बार अपनी लड़ाई में लोगों का साथ लिया। आन्दोलन को लोगों का अभूतपूर्व सहयोग मिला और जन प्रतिनिधि भी इससे जुड़ते गए। सांसद, विधायक महापौर, नगर निगम, पार्षद, बुद्धिजीवी, पर्यावरणप्रेमी, कर्मचारी, किसान हर कोई तालाब बचाने सामने आया। अन्ततः अब सरकार को भी बेकफुट पर आना पड़ा।

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